Love without wish Chapter-20
- 29 June, 2026
धनंजय ज़ब आराध्या कों गोद मे लेकर अंदर आता है तो. घुघट के अंदर से उसे आरध्या का नाराज होना महसूस हो रहा था। लेकिन आज उसके चेहरे पर शुकुन था। जिसका वो होना चाहता था वो आज उसके बाहों मे थी।
कुछ देर तक धनंजय उसे गोद मे लिए यू हीं खड़ा रहा। ज़ब आराध्या कों लगा की धनंजय उसे उतार नहीं रहा तो वो खुद कों उसकी गोद से हिलाने लगती है लेकिन कुछ कहती नहीं !! उसके यू हिलने से धनंजय अपने ख्यालों से बाहर आता है और अपनी आँखे छोटी कर के कहता है, क्या हुआ तुम्हें जो तुम उछल कूद मचा रही हो।
आरध्या कुछ नहीं बोलती और फिर से उसकी गोद से उतरने की कोशिश करती है। धनंजय उसे घूरते हुए कहता है, शादी से देख रहा हूँ तुम्हारी कैंची जैसी जुबान अचानक बंद हो गयी है.... मिस पिलर !! ये सुनते हीं आरध्या अपने सर से घुघट उठाती हुई कहती है, मिस पिलर नहीं.... मिस्टर ठाकुर !! मिसेस ठाकुर ! कहती हुई अपनी आईबरों उठा देती है।
उसकी हरकत देख धनंजय अपने मन मे मुस्कुरा देता है। आरध्या अपनी बातों कों पूरा करती हुई कहती है, मानती हूँ आपकी बॉडी बिल्कुल हट्टी कट्टी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की आप हमे अपनी गोद के पालने मे उठाये रखे। उतारीये हमे !!
धनंजय उसे खुद के नजदीक करते हुए थोड़ा ऊपर उठा लेता है। आरध्या उसकी हरकत से थोड़ा घबरा जाती है। धनंजय उसकी घबराहट भाँप लेता है और कहता है.... घबरा गयी मिसेस ठकुराइन !! बिल्कुल नहीं ठाकुर !! अब आप मुझे उतारते है याँ नहीं !!
धनंजय उसे तंग करते हुए कहता है, आपको बहुत जल्दी है मेरे साथ सुहागरात मनाने की !! चलिए फिर हम यही करते है। ये कहते हुए उसे बिस्तर पर लिटा देता है।
आरध्या उसकी बात सुनकर कर जल्दी से अपने पैर कों पीछे मोड़ती हुई खुद कों समेट कर बैठ जाती है और उसे घूरती हुई कहती है, लगता है दिमाग़ खराब हो गया है आपका !! सुहागरात तो क्या!! मै आपके साथ सुहागदिन ना भी ना मनाऊ !! अगर मुझे मालूम होता की मेरी शादी आपके साथ होने वाली है तो मै कभी नहीं करती आपसे शादी !!
अभी तक जो धनंजय बिल्कुल हल्के मूड मे आरध्या कों तंग कर रहा था लेकिन जैसे हीं उसके मुँह से शादी ना करने की बात सुनता है। जिससे उसका गुस्सा बिल्कुल बढ़ जाता है और वो गुस्सै मे उसके पैर कों पकड़ कर अपनी तरफ खींचते हुए कहता है, मुझसे शादी नहीं करनी थी तो किससे करनी थी तुम्हें शादी !!
अचानक धनंजय का ये रूप देख आरध्या सहम जाती है और खुद कों संभालती हुई कुछ कहने की कोशिश करती है। इस समय उसके लाल होंठ फड़फड़ा रहे थे कुछ कहने कों लेकिन उसके होठों से सिर्फ टूटे फूटे शब्द निकल रहे थे..... वो..... मै..... मेरा मतलब..... ये नहीं था !! लेकिन धनंजय की नजर उसकी गुलाबी होठों पर थी जो उसे बहका रही थी और वो धीरे धीरे उसके होठों की तरफ झुक रहा था।
उसको यू झुकता देख आरध्या अपनी आँखे बंद करती हुई उसको हल्का सा खुद के ऊपर से थकेलती हुई कहती है, मैंने अभी आपको ये हक नहीं दिया है मिस्टर ठाकुर !! आपने धोखे से मुझसे शादी की है और ये बात मै नहीं मानती।
धनंजय उसकी बाजु पकड़ कर अपने करीब करता हुआ कहता है, " शादी तो तुम्हें किसी ना किसी से करनी हीं थी फिर मुझसे हो गयी तो इतना क्यों बुरा लग रहा है तुम्हें !! कहीं ऐसा तो नहीं की तुम्हें कोई और पसंद हो इसलिये तुम इस शादी कों निभाना नहीं चाहती हो !!
आरध्या कहती है, मेरा हाथ छोड़िये मिस्टर ठाकुर !! मुझे दर्द हो रहा है। रही बात किसी से शादी करने की तो किसी मे और आप मे फर्क है !!
अच्छा मिसेस ठकुराइन !! क्या फर्क है मुझे मे और किसी और मे !! आरध्या उसे धक्का देती हुई बिस्तर से उठती हुई कहती है, "आप एक नंबर के बद दिमाग़, बट तमीज और अकरु किस्म के आदमी है और मुझे ऐसा पति नहीं चाहिए था समझे आप !!" ये कहते हुए अपने गहने उतारने लगती है।
धनंजय उसकी बातें सुनकर मुस्कुरा देता है और उसके पीछे आ कर खड़ा हो जाता है। अब दोनों एक दूसरे कों आईने मे देख रहे होते है। धनंजय उसके गले का हार खोलने लगता है। वो उसे रोकने की कोशिश करती है तो धनंजय उसे इशारे से मना कर देता है। जिससे आरध्या रुक जाती है।
धनंजय उसके गहने कों आराम से उतारते हुए कहता है, अच्छा तो फिर ये भी बता दो मिसेस ठकुराइन की तुम्हें कैसे पति चाहिए। जरा मै भी सुनु की कैसे पति चाहिए तुम्हें !!
आरध्या मुस्कुरा देती है। उसकी मुस्कान देख धनंजय के चेहरे पर सुकून उतर आता है। वो आराम से आरध्या के एक एक गहनों कों उतार रहा होता है। आरध्या आईने मे उसे इतनी सिद्द्त से गहने उतारते देख कहती है, " ऐसा चाहिए जिसे मेरा मजाक समझ आये। जिसे मेरी ख़ामोशी पढ़नी आये। जिसे मेरी ना और हाँ मे फर्क करना समझ आये। रही बात मान -सम्मान की तो अगर उसे प्यार हुआ मुझसे प्यार हुआ तो वो मुझे मान सम्मान देगा !! रही बात प्यार की तो प्यार उसकी आखों मे दिखे मेरे लिए। बेक़रारी उसकी आखों मे हो। मेरे होने का अहसास वो आँखे बंद कर के भी महसूस करे। हमेशा साथ दें और सम्मान दें। अगर कभी बहस और लड़ाई हो तो बात अधूरी छोड़ कर कभी ना जाये। बात हमेशा पूरी करे। अपनी मन की अच्छी बुरी जो भी भावनाएं हो वो सीधे और खुले मन से मुझसे करे और पूछे की क्या बात है !!
अपने मन मे कोई गलतफहमी ना पाले। कोई गलत विचार लाने और सोचने से पहले मुझसे बात करे। हमारे बीच हर तरह की बेखौफ बातें हो। हम बिना ये सोचे समझे एक दूसरे से बातें कर जाये की कौन सी बात किसे बुरी लगेगी और किसे अच्छी।ऐसा जीवनसाथी चाहती हूँ मै।"
धनंजय उसकी बातें सुनते हुए उसके सारे गहने उतार देता है। बालों मे लगे गजरे कों खोल देता है। फिर उसे अपनी तरफ घुमाते हुए कहता है, " अगर मै ऐसा बन जाऊ तो मेरे साथ रहोगी !!"आरध्या मुस्कुरा कर अपना जबाब हाँ मे देती है।
फिर धनंजय कहता है तो. ठीक है, हम आज और अभी से शुरुआत करते है एक दूसरे की बेहतर जीवनसाथी बनने की !! पहले जाओ फ्रेश होकर आ जाओ। फिर आराम से बातें करेंगे।
कुछ देर बाद आरध्या और धनंजय कपड़े बदल कर सोफे पर बैठे थे। धनंजय उसके हाथों. कों पकड़ कर कहता है, जरूरी नहीं की शादी की पहली रात सिर्फ जिस्मो का मिलने हो याँ मन का मिलन हो। शादी की पहली रात अगर दो लोगों की समझ का मिलन हो तो रिस्ते की खूबसूरती ज्यादा बेहतर होती है। आगे रिश्ता शुरुआत करने से पहले मुझे तुमसे कुछ पूछना भी है और बताना भी है !! उम्मीद करता हूँ की तुम मुझे गलत नहीं समझोगी !!
आराध्या की तरफ देखते हुए कहता है, मुझे शुरुआत मे नहीं मालूम था की मेरी शादी तुमसे होने वाली है। दिल्ली से आने के. बाद मै चाहता जरूर था की अगर भविष्य मे कभी मै खुद के लिए कोई जीवनसाथी चाहूं तो वो सिर्फ तुम होगी। ज़ब घर पर आया और सबने शादी की बात की तो मै बहुत नाराज हुआ। तब जा कर दादी ने बताया की मेरी शादी तुमसे हो रही है। सच कहुँ तो. बहुत खुश हुआ मै और तुम्हें सिर्फ देखने के लिए हल्दी की शाम कों महाकाल के मंदिर चला आया।
वहाँ तुम दिखी भी और मै तुम्हारे पीछे आया भी लेकिन तुम किसी और के बाहों मे थी। जो मुझे अंदर से चोट पहुंचा गया। और फिर मुझे लगा की तुम अपने चाचा चाची के दबाब मे शादी कर रही हो। ज़ब मुझे बारात मे संकल्प दिखा तो उसकी पर्सनालिटी से मुझे लगा की ये वही लड़का है जो मंदिर मे तुम्हारे साथ था। पहले तो गुस्सा आया मुझे उसे देख कर फिर बातों बातों मे मालूम हुआ की तुम दोनों का रिश्ता भाई बहन का है। यकीन मानो दिल कों बहुत सुकून मिला। क्यों मिला ये नहीं बता सकता लेकिन जरूर मिला।❤️
ये बात मेरे दिल दिमाग़ मे थी जो तुम्हें बता दी। उम्मीद करता हूँ की तुम मुझे गलत नहीं समझोगी !! आरध्या मुस्कुरा कर कहती है, ज़ब आप ने हमारे रिस्ते की शुरुआत इतनी ईमानदारी से की है तो मुझे भी हमारे रिस्ते कों ईमानदारी से हीं निभानी है। अच्छा हुआ की आपने अपने दिल की बात मुझे बता दी।
धनंजय मुस्कुरा कर कहता है, चलो अब सो जाते है। आरध्या कहती है, एक बैड पर !! हाँ तो क्या हुआ !! नहीं मुझे नहीं सोना है !! क्यों तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है। इतना बड़ा बैड है। तुम एक तरफ और मै एक तरफ सो जाऊंगा और भरोसा रखो ज़ब तक हम दोनों दिल से तैयार नहीं होते, तब तक मै अपनी मर्यादा नहीं तोडूंगा। तुम बेफिक्र होकर सो सकती हो। ये कहते हुए धनंजय उसके माथे कों चूमते हुए कहता है, गुडनाइट !! मिसेस ठकुराइन !! चलो सो जाते है। आरध्या भी मुस्कुराते हुए उसके माथे कों चूम लेती है। उसके इस तरह चूमने से धनंजय पहले तो थोड़ा हैरान हो जाता है लेकिन फिर मुस्कुराने लगता है। आरध्या कहती है, गुडनाइट मिस्टर ठाकुर!!!
सुबह के चार बजे आरध्या अपनी आदत अनुसार शिव शम्भु करते हुए आँखे खोलती है तो उसकी नजर अपने बगल मे खाली बिस्तर पर जाती है। आरध्या कहती है, हे उमापति !! क्या मेरी शादी तुमने किसी नर पिशाच से करवा दिया है !! अभी अभी ये सुबह सुबह कहाँ गए !!" याँ फिर रात मे निकल लिए शिकार करने किसी का खुन पीने !! हे शिव शंभू तुम कौन से जन्म का बदला ले रहे हो हमें से !! मानते है की हम तुम्हरे भक्त है लेकिन इसका मतलब क्या की तुम हमको अपने भूत पिचास चेला दें दोगें !! प्रभु जान बचा लो हमारी। तभी सोमवार कों पेड़ा का प्रसाद चढ़ायेगे और आज सोमवार तुम भूल तो नहीं गए !!"
तभी वाशरूम से धनंजय नहा कर निकलता है। इस वक़्त वो टॉवेल लेपेटे हुए। आरध्या की बातें सुनकर मन हीं मन उसकी हरकत पर हँस रहा था लेकिन अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दें रहा था। वो उसके पीछे खड़ा होकर कहता है, " नर पिशाच कों शंभू नाथ नर पिशाचनि हीं देंगे !!" ये सुनते हीं आरध्या ज़ब मुड़ कर देखती है तो तेज आवाज़ मे चीखती हुई कहती है, निहायती बेशर्म इंसान क्या तुम अपनी बॉडी दिखा कर मुझे सिडूस करने की कोशिश कर रहे है। तो कान खोल कर सुन लो मै नहीं होने वाली तुम्हारी इस मुस्कुलर बॉडी पर फ़िदा.... हुँह !! कहती हुई वाशरूम चली जाती है।
धनंजय उसकी कहीं हुई बातों कों समझने की कोशिश मे लगा होता है। वो खुद से कहता है, ये क्या कहना चाह रही थी की मै इसे सिड़ूस कर रहा हूँ !! ये समझते हीं गुस्से से वाशरूम की दरवाजे कों देखता है जैसे आखों से उस दरवाजे कों जला डालेगा !! और खुद मे उबलते हुए कहता है, पूजा करना नहीं जाना होता तो इस पूँछ कटी छिपकली कों बताता !!ओह्ह्ह धनंजय ये कैसी अजीबोगरीब भाषा बोलने लगा है तु !! सब इस की वजह से हो रहा है। कहते हुए तैयार होता है।
आरध्या मे वाशरूम से तैयार होकर पीली सारी पहन कर बाहर आती है। उसके बाल भींगे होते है वो अपने गीले बालों कों पोंछती हुई तैयार हो रही होती है। धनंजय की नजर ज़ब आराध्या पर जाती है तो एक पल कों वो उसकी खूबसूरती निहारने लगता है। पीली मे उसका गोरा रंग खिल कर आ रहा था। ऊपर से हाथों मे मेहंदी और भरी भरी चुड़ीयाँ किसी का दिल चुराने के लिए काफ़ी थी। ज़ब आरध्या माथे मे सिंदूर लगा रही होती है। तभी धनंजय उसका हाथ पकड़ लेता है। आरध्या ना समझी से उसकी तरफ देखती है। धनंजय खुद उसके मांग मे सिंदूर भर देता है। जिसे महसूस करती हुई आरध्या की आँखे बंद हो जाती है। धनंजय उसके पीछे खड़े होकर कहता है, क्या तुम मुझे सिड़ूस कर रही हो !!
आरध्या जैसे हीं उसकी बातें सुनती है, आँखे खोल कर उसे घूरती हुई देखती है। धनंजय बिना किसी भाव के उससे कहता है, चलो मंदिर चलना है तो देर हो जाएगी। वैसे भी मै पहली पूजा करता हूँ। आरध्या भी बिना सवाल किये उसके साथ मंदिर निकल जाती है। दोनों कों आदत थी प्रत्येक सोमवार कों भोलेनाथ की मंदिर जाने की !! आज शादी के बाद पहली सोमवार थी जिस मे दोनों पति पत्नी के तौर पर जा रहे थे।
जब आराध्या और धनंजय महादेव के मंदिर में पहुंचते हैं तो वहां सुबह-सुबह पुजारी जी पूजा कर चुके होते हैं। उसके बाद वह दोनों एक साथ पूजा करते हैं। पुजारी जी उन दोनों को देखते हुए कहते हैं, " तुम दोनों का साथ हमेशा बना रहे सदा सौभाग्यवती भव। यह सुनकर आराध्या मुस्कुरा देती है और पूजा करके दोनों साथ घर के लिए निकलने लगते हैं। सीढ़ियों से उतरती हुई आराध्या का पैर फिसलने लगता है। जिससे आराध्या करने वाली होती है कि धनंजय उसको पीछे से पकड़ लेता। उसके हाथ आराध्या के खुले पेट पर आते हैं और उसे खींचते हुए वह अपने सीने से लगा लेता है जिससे आराध्या का पीठ उसके सीने से लग जाता है। आराध्या उसके छूने से अपनी आँखे बंद कर लेती है और गहरी सांस लेते हुए कहती है, " बच गई शंभूनाथ नहीं तो आज तो मेरे एक के दो और दो के चार हो जाते हैं।
धनंजय उसके उटपटांग बातें सुनकर अपना सर ना में हिलाते हुए कहता है, " तुम कभी नहीं सुधरोगी चलो आराम से नहीं तो फिर गिर जाओगी । आराध्या उसकी बात सुनकर मुंह बनाते हुए कहती है, " साड़ी पहली बार पहनी हूँ तभी तो.ये ऊट -पटांग हरकतें करूंगी ही ना!! पहले से आदत नहीं है साड़ी पहन के ठुमक ठुमक पर चलने की। धनंजय उसकी बात सुनकर कहता है तुम और ठुमक ठुमक के चलोगी। पता नहीं खुद को मोरनी समझ रखी हो।
आराध्या मुंह बनाती हुई उसकी तरफ देखती है, जहाँ धनंजय बिना एक्सप्रेशन के उसे देख रहा होता है। उसे देखती हुई कहती है, " खुद को मै मोरनी समझू याँ नहीं समझू लेकिन आपको कौआ जरूर समझ रखी हूँ, कहती हुई गाड़ी के पास आ जाती है।। धनंजय उसके पास आता है और गुस्सै मे गाड़ी के अंदर बैठ जाता है और कहता है अगर एक मिनट के अंदर तुम गाड़ी मे नहीं बैठी तो यही छोड़ कर चला जाऊंगा !!
ये सुनते हुए आराध्या घूरती हुई कहती है, " अकरु ठाकुर कहीं का और कहती हुई गाड़ी मे बैठ जाती है । दोनों मंदिर से सुबह-सुबह ठाकुर निवास आते हैं तो सभी बाहर बैठे होते हैं। उन दोनों को मंदिर से आते देख। सुमति जी कहती है अच्छा दोनों पति-पत्नी को आदत है सोमवार को मंदिर जाने कि । आराध्या सबसे पहले उन्दोनो के पैर छुति है और फिर सबको प्रसाद देती हुई कहती है, " हां दादी मां!! मुझे आदत है सोमवार को सोमवार मंदिर जाने कि ।
यह सुनकर दादी मां उसे आशीर्वाद देती हुई कहती है चलो अच्छा है। धनंजय कहता है, " दादी मां!! आज मेरी इंपॉर्टेंट मीटिंग है तो मै जल्दी ऑफिस निकलूंगा ।ये कहते हुए वो अपने कमरे मे चला जाता है। सुमति जी कहती है ठीक है। फिर आराध्या दीप्ति और तान्या को देखती हुई कहती है आज तुम्हारी पहली रसोई है तो तुम लोग जल्दी से कुछ मीठा बना लो। आरध्या उनकी बात सुनकर कहती है, ठीक है दादी माँ !!
फिर सुमति जी कहती है, " आज तुम लोग को ऑफिस नहीं जाने दूंगी। तीनों मुस्कुराते हुए कहती हैं ठीक। तीनों किचन में चली जाती हैं कुछ देर में सभी तरह का खाना नाश्ता बनाकर हो सब डाइनिंग टेबल पर लगा देती हैं। धनंजय अयान और ध्यान तीनों तैयार होकर नीचे आते हैं तो उनकी नजर डाइनिंग टेबल पर लगी सभी तरह के खाने पर जाती है। धनंजय आराध्या को घूरते हुए बैठ जाता है। तभी धनवी, और अयानी कहती है, " वाव भाभी !! आज तो नाश्ता देख कर हीं मुँह मे पानी आ गया !! पीछे से प्रथम आते हुए कहता है, क्या बात है भाभीयाँ !! खाने कि खुशबु बाहर तक आ रही है। वो भी जल्दी जल्दी टेबल पर बैठ जाता है खाने के लिए।
सुमति जी कहती है, तुम तीनों भी बैठ जाओ हमारे साथ खाने के लिए !! उनकी बात मान कर वह तीनों भी सबके साथ बैठ जाती हैं। गोपी जी कहते हैं आज खाना बहुत अच्छा बना है क्या स्वाद है!! वाह मजा आ गया खा कर क्यों सुमती '!! वो भी खाते हुए कहती है," हां बिल्कुल !! हमारी तीनों बहूओ के हाथ में माँ अन्नपूर्णा का वास है।धनवी कहती है भाभी !! आप ना रोज ऐसा हीं नाश्ता बना दिया करो मजा आ जायेगा। आरध्या जबाब देती उससे पहले धनंजय कहता है, नाश्ता करने के बाद तुम दोनों कॉलेज जाओगी और प्रथम तुम दोनों कों छोड़ आएगा।
ये सुनकर दोनों कहती है, लेकिन भाई आज हम भाभियों के साथ वक़्त बिताना चाहते थे '!! धनंजय कहता है, तुम्हारी भाभियाँ भागी नहीं जा रही है यही है और शादी के चक्कर मे बहुत पढ़ाई मे परेशानी आयी है। इसलिये कोई बहाना नहीं चलेगा कॉलेज जाओ।
इधर सबका नाश्ता खत्म होता है तो गोपी और सुमती जी दोनों, तीनों बहुओं को गिफ्ट देते है। आरध्या कहती है, लेकिन इसकी क्या जरूरत थी दादी माँ !! गोपी जी कहते है, ये रस्म है बच्चे '!! फिर प्रथम भी उनकी हाँ मे हाँ मिलते हुए कहता है, " हाँ!! भाभी ये रस्म है फिर अपनी तरफ से कुछ गिफ्ट देता है।
अयान और ध्यान भी दीप्ती और तानिया को गिफ्ट देते हैं फिर आराध्या को भी गिफ्ट देते। धनंजय जो काफी आराम से नाश्ता कर रहा होता है सब उसकी तरफ देखते हैं। धनंजय सबको यूं घूरता देख पूछता है, " आप लोग मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?
प्रथम कहता है क्या तुझे पता नहीं की आज पहली रसोई के बाद भाभी को कुछ गिफ्ट देना बनता है? धनंजय कहता है मुझे मालूम नहीं था लेकिन शाम को लेकर चला आऊंगा । आराध्या उसकी बात सुनकर धीरे से कहती है, " हुँह !! मालूम नहीं था इनको !! इनको तो सिर्फ जहर उगलना आता है। यह बात उसकी कोई नहीं सुनता लेकिन धनंजय सुन लेता। वह भी धीरे से कहता है, " रात में बताता हूं जहर उगलना किसे कहते। फिर मुस्कुरा कर। सभी ऑफिस निकल जाते हैं।आरध्या वही कुर्सी पर धनंजय कि बातों कों सोचे जा रही थी। "
ऑफिस मे धनंजय के आते हीं सारे स्टॉफ खामोश हो चुके थे। क्योंकि उसका औरा हीं सबको चुप करवाने के लिए काफ़ी था। तीनों अपने अपने ऑफिस मे चले जाते है। ऑफिस मे आने के साथ धनंजय अपने कामों मे व्यस्त हो जाता है। कुछ देर बाद मिश्रा जी नॉक करते हुए उसके केबिन मै आते है। धनंजय सर झुकाये हुए अपने लेपटॉप पर उंगलियां चलाये जा रहा था।
इधर अयान अपने केबिन मे आता है और सीधे दीप्ती कों फोन लगा देता है। लेकिन दीप्ती मेडम अपना फोन कमरे मे छोड़ कर सबसे गप्पे लड़ा रही थी निचे !! अयान फोन कों घूरते हुए कहता है, फोन कों जब खुद के पास रखना नहीं है तो फ़ेंक दो !! हुँह पता नहीं कहाँ है!!फिर वो अपने काम कों करने लगता है।
इधर ध्यान भी काम करते हुए कहता है, अरे देखूँ जरा मेरी शर्मीली क्या कर रही होगी!! खुश होते हुए वो तानिया कों फोन लगा रहा होता है। लेकिन तानिया भी निचे सबके साथ थी।
तभी अयान कुछ फाइल्स लेकर उसके केबिन मे आता है तो देखता है वो परेशान होकर बार बार फोन लगाये जा रहा। फाइल्स रखते हुए अयान कहता है, नहीं उठाएगी फोन चाहे तु जीतनी कोशिश कर ले। अयान की बात सुनकर ध्यान कहता है, " ऐसा क्यों कह रहे हो मँझले भैया !! वो इसलिये छोटे क्योंकि मै इससे पहले अपनी वाली यानी तेरी भाभी कों कई दफा फोन कर चुका हूँ। लेकिन मजाल है की देवी जी ने फोन उठाया हो। "
ध्यान कहता है, बताओं कहाँ ये हमारा इंतजार करती की हम उन्हें फोन करेंगे और कहाँ ये हमें भूले बैठी है। लगता हीं नहीं है की कल हीं हमारी शादी हुई है।
अयान अफसोस से सर हिलाते हुए कहता है, "लगता है शादी सालों पहले हो चुकी है। नई नई शादी की तो कोई फीलिंग हीं नहीं आ रही है। "
"वैसे मँझले भैया हमारी वालियों के पास वैसे भी दिमाग़ कम है।" अरे!! धीरे बोल छोटे अगर उन लोगों नई सुन लिया तो मायके ना चली जाये!! क्या यार भाई आप भी इतना डरने लगे है। आप भूल रहे है की हम अभी ऑफिस मे है, घर पर नहीं '!!"
!!"अच्छा छोड़िये ये बात चलिए भाई के केबिन मे जाते है। शायद उनकी बात भाभी से हुई हो!!" अच्छा विचार है छोटे !! फिर चलो !!"
इधर ठाकुर हवेली मे अलग रौनक लगी थी। गोपी जी और सुमती अपनी तीनों बहुओं और पोतीयों की बदमाशीयाँ देख रही थी। आज पूरी हवेली मै शोर था। आरध्या हंसती हुई कहती है, अब बस रुक जाओ !! हम आते है। कहाँ जा रही है आप भाभी !! धनवी ये कह कर उसे चिढ़ाती है। तभी अयानी कहती है, अभी तो भाई कों गए दो घंटे हीं हुए है और आपको अभी से याद आने लगी उनकी !!
आरध्या हंसती हुई कहती है, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। अभी तक हमने पूरी हवेली नहीं देखी है तो सोचा क्यों ना घूम ले। क्योंकि ये दोनों तो यहाँ रुक गयी थी तो इन्होंने देख रखी है लेकिन हम तो चले गए थे। इसलिये सोच रहे है, जरा घूम ले।
सुमती जी कहती है, इसमें पूछने की क्या बात है, ये पूरा घर तुम्हारा है, जहाँ मर्जी हो वहाँ घूम लो !!
तभी आरध्या कहती है, जी दादी माँ !! और वो घर के. हर हिस्से कों बेहद खूबसूरती और संजीदगी से देखती है। घर देखते हुए उसके मन मे अलग तरह से सवाल आते है और वो अपने मन मे कहती है, " इस पूरी हवेली मे,सबकी तस्वीरे है लेकिन इनके माँ पापा की एक भी तस्वीरे नहीं है। बात क्या है? सोचती हुई वो एक कमरे के आगे रूकती है। फिर सोचने लगती है, ये पूरी हवेली तो बिल्कुल खुली हुई है लेकिन इस कमरे मे ताला क्यों है?
तभी एक मैड आकर कहती है, " मालकिन !! आपको बड़ी मालकिन बुला रही है। " आरध्या उसके पास आकर कहती है, काकी आपसे मै बहुत छोटी हूँ याँ तो बहुरानी याँ बिटिया बुलाया कीजिये। ये मालकिन नहीं !!"
वो मैड मुस्कुराते हुए कहती है, " जी बहुरानी "!!
आरध्या उस के साथ साथ निचे चली आती है। सभी उसका इंतजार कर रहे होते है। आरध्या मुस्कुराते हुए सुमती जी से कहती है," दादी माँ !! एक बात पुछु !!"हाँ बच्चे पूछो!!
तब तक बाहर से सिक्योरिटी गॉर्ड आता है और कहता है, बड़ी मालकिन !! बाहर वो वो...... उसे इस तरह से हकलाते देख कर गोपी जी समझ जाते है की क्या हुआ होगा!! वो अपने कठोर शब्दों मे कहते है, अंदर आने दो :!!
गार्ड यहाँ का सबसे पुराना था इसलिये उसे मालूम था की कौन आया है और इसलिये वो भागते हुए अंदर आया था।
सुमती जी और गोपी जी के चेहरे पर परेशानी के भाव आ गए थे। धनवी और अयानी अपनी दादी के पास आकर कहती है, "दादी माँ !! क्या भाई कों फोन कर दूँ !!"
नहीं!नहीं! बच्चे उसे मत बताना। मै नहीं चाहती हूँ की उसकी खुशियों कों कोई ग्रहण लगे। हम संभाल लेगे।' लेकिन दादी माँ, भाभी !! अयानी की बात सुनकर सुमती जी कों ख्याल आता है की आराध्या, दीप्ती और तानिया तीनों हाल मे मौजूद थी। अचानक वो उन तीनों कों जाने के लिए कहती तो भी ठीक नहीं होता इसलिये चुप रहना बेहतर समझा।
तभी अंदर दो अधेर उम्र के मर्द और औरत आते है और अपनी कुटिल हँसी हँसते हुए कहते है, " कैसी है बहन जी !! उम्मीद करती हुई अच्छी हीं होगी !!"
वो दोनों गुस्सै मे कहते है, " आप दोनों यहाँ क्यों आये है और आपको हमसे क्या लेना देना है!!"
फिर वो दोनों आदमी सोफे पर बड़ी बेशर्मी से बैठ जाते है और अपने पीछे आयी हुई टोकरीयों कों अपने आदमियों से कहते है, " रख दो "!! फिर सुमती और गोपी जी की तरफ देख कर कहते है," अरे अपने घर आये हुए मेहमान की स्वागत कुछ इस तरह से करते है, आप सब !!"फिर पीछे देखते हुए अरे मेरी धनवी बेटा तुम तो काफ़ी बड़ी हो गयी और खूबसूरत भी, ये कहते वो आदमी अपनी कुटिल नजर से देखते हुए हँसता है।फिर वो औरत कहती है और ये तो उस अनाथ अयान की बहन है ना !! अरे ये भी सुंदर हो गयी है।
जिसे देख धनवी और अयानी नजर झुका कर आरध्या के पीछे खड़ी हो जाती है।
उन दोनों की बात सुनकर गोपी जी गुस्सै मे कहते है, " अभी के अभी निकल जाओ यहाँ से और अपनी ओझी हरकत कों लगाम दो नहीं तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा !!"
वो आदमी बहुत रौब से कहता है, "आपको लगता है की हम युहीं चले जायेगे। बिल्कुल नहीं भाईसाहब :!! हमारा और आपका रिश्ता बहुत गहरा है और हमने सोचा की जब ठाकुर परिवार की पोते की शादी हो रही है तो उसकी दुल्हन की मुँह दिखाई तो बनती है।"
"गुस्सै मे सुमती जी कहती है," हर ऐरे गेरे से हम हमारी बहु कों नहीं मिलने देते है और फिर भी तुम दोनों कों तमाशा करने का शौख है तो बोलो। हम भी अच्छे से तमाशा कर सकते है !!"
सुमती जी कठोर बातें सुनकर वो औरत, तिलमिलाते हुए कहती है, " आप की इतनी हिम्मत नहीं होगी की आप हमें रोक सके क्योंकि इधर आपने हमें रोका नहीं की उधर हमने पुरे भोपाल मे आपकी इज्जत कों उतार दी। क्योंकि आपको तो पता है ना हमें यहाँ पर हमारी इज्जत से कोई फर्क नहीं पड़ता। "
उन सबकी बात सुनकर तानिया कहती है, कितने घटिया लोग है और जरा इनकी घटिया बातें तो सुनो !! आरध्या धनवी और आयानी दोनों का हाथ पकड़ कर कहती है, " रीलेक्स मै हूँ ना !!! इस बूढ़े की गंदी नजर तो तुम्हारी भाभी उतारेगी। तुम फ़िक्र मत करो!!" ये बोल कर आरध्या उन दोनों कों देखने लगती है।
इधर धनंजय बिल्कुल अपने काम मे उलझा हुआ था की उसे एक फोन आया। नंबर कों देख कर उसकी आँखे छोटी हो गयी। फोन उठा कर कहता है, आ जाओ।जब से उसकी फोन पर बात हुई तब से उसकी नजर दरव
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