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Love without wish Chapter-24

Love without wish Chapter-24

आराध्या धनंजय की बातें  सुन कर उसे समझा रही होती है.। लेकिन कुछ देर बाद उसे अहसास होता है की धनंजय की गरम सांसे उसे महसूस होने लगी। क्योंकि धनंजय उसके पेट मे अपना सर घुसा कर लेटा हुआ था और उसकी बातें सुनते सुनते वो सो चुका था।

आराध्या मुस्कुरा कर उसके बालों कों सहलाती है और आराम से उसके सर कों ठीक से बिस्तर पर सुला देती है और उठने कों होती है। तो उसके हाथ आराध्या के कमर कों पकड़ लेटा है और उसे अपनी करीब खींच लेता है। उसकी ऐसी हरकत पर आराध्या उसे घूरती हुई कहती है, " ठाकुर !! आप सो रहे थे ना !!"

धनंजय बिना उसकी तरफ देखे उसे अपने करीब खींच लेता है और उस के सर कों पीछे से पकड़ कर अपने सीने लगाते हुए कहता है, " बीबी :!! मुझे सोना है और सालों से एक सुकून की नींद नहीं मिली। तुम्हारे करीब मुझे सुकून मिल रहा है। तुम यू हीं मेरे सीने से लगी रही और मुझे सोने दो !!"ये कह कर वो चुप हो जाता है और आखे सुकून से बंद कर लेता है। "

आराध्या जबरदस्ती अपना सर उसके सीने से निकालने लगती है और कुछ कहने के लिए मुँह खोलती है की धनंजय उसके कानों के करीब अपने होठो कों रखते हुए.... सरजोशी से भरी धीमी आवाज़ मे कहता है... शशश.... एक आवाज़ और नहीं ठकुराइन.... सो जाओ मेरा सुकून बन कर। उसकी गहरी आवाज़ और गरम सांसों कों अपने इतने करीब महसूस कर के आरध्या की धड़कन तेज हो गयी थी और उसके हाथ धनंजय के टीशर्ट पर कस गए। धनंजय उसके हाथों के कसाव कों महसूस करते हुए  उसके कानों मे कहता है, " सो जाओ बीबी !! अभी ऐसा कुछ नहीं करुँगा, जब तक तुम दिल से तैयार नहीं होती..... ये कह कर उसके कानों कों चूम लेता है और उसे अपने सीने मे पूरी तरह से छिपा लेता है। आरध्या भी अपनी आँखे बंद कर उसकी सीने मे छिप जाती है।दोनों आज सुकून की नींद मे सो चुके थे।

अगली सुबह

ठाकुर हवेली मे सब उठ चुके थे। तभी एक तेज आवाज़ के साथ चीखती हुई वसुधा, रणवीर, और वरुण सिंह के साथ साथ रमन और सुलोचना चौबे भी अंदर आते है। सबको कों ऐसे अंदर आते देख हॉल मे मौजूद सभी लोग आश्चर्य होता है। ध्यान गुस्से आगे बढ़ कर कहता है, " आप यहाँ कैसे आयी है? "

वसुधा सबके साथ सोफे पर बैठती हुई कहती है,' क्या तुम्हें अपनी माँ से बात करने की तमीज नहीं है ध्यान !!ऐसे कैसे तुम अपने माँ से बात कर सकते हो!!"

ध्यान गुस्से मे फिर कुछ कहता है, उससे पहले  पीछे से भाग कर आते हुए गार्ड अपने सर कों झुकाते हुए कहते है, " छोटे बाबू !! ये लोग जबरदस्ती अंदर आ गए। हमने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन ये माने नहीं। "

अयान उन गार्ड कों कहता है, " आप सब जाईये काका !! हम देख लेगे!!" उसकी बात सुनकर सभी गार्ड चले जाते है।

पीछे खड़ी दीप्ती और तानिया भी हैरानी से देख रही होती है। अयान गुस्से मे सबको घूरते हुए कहता है, " आप लोग यहाँ क्यों आयी है !! क्या आप लोग ऐसे हीं किसी के घरो मे घुस जाती है।

वसुधा फिर अयान कों घूरती हुई कहती है, " तुम चुप रहो नौकर के बेटे। मै नौकरो कों मुँह नहीं लगती। "

गोपी और सुमती जी गुस्से मे कहते है, " खबरदार जो कुछ भी हमारे बच्चे के लिए कहा तो!! और तुम हो कौन जो ये बात कह रही हो। भूल गयी तुम की तुमसे हमारा रिश्ता सालों पहले टूट गया था। जब तुम अपने यार के साथ चली गयी थी। "

सुमती जी बेहद घृणा और क्रोध से भरी हुई नजरों से देखती हुई कहती है, " तुम अभी के अभी दफा हो जाओ यहाँ से !! तुम जैसी घटिया औरत के कदम भी मेरे घर कों अपवित्र कर रही है। निकलो यहाँ से !!"

सुमती और गोपी जी कों इतने गुस्से मे होते है की हिल रहे होते है। तभी पीछे से तानिया और दीप्ती उनको संभाल लेती है और सोफे पर बिठा देती है। वो दोनों कुछ बोलती नहीं है क्योंकि उनको नहीं मालूम था की बात क्या है ? इसलिये दोनों चुप होकर बातें सुन रही होती है।

सुलोचना चौबे उन दोनों कों देखती हुई कहती है, " अरे वसुं !! जरा मिल अपनी बहुओं से !! ए तुम दोनों कों तमीज नहीं है की अपनी सास के पैर छू लो !!"

वसुधा अपनी माँ की बात सुनकर उन दोनों कों घूरती हुई देखती है और पूछती है, " क्या यही. वो है, जिन्होंने आप दोनों का अपमान किया था !!" वसुधा की बात सुनकर सुलोचना बेहद बेबस होती नजरों से कहती है, " ये दोनों तो थी हीं वसुं, इनके साथ तुम्हारी बड़ी वाली बहु थी। लेकिन अभी नजर नहीं आ रही है !!"
तभी रणवीर और रमन दोनों कहते है, शायद वो अपने पति के. साथ कहीं छिप गयी होगी।


वसुधा तानिया और दीप्ती कों घूरती हुई, ध्यान और अयान से कहती है, " तुम इन भिखारी जैसे लड़कियों मे क्या दिखा जो मेरी बहु बना कर ले आये। क्या तुम्हें इतनी भी अक्ल नहीं थी की कुछ तो मेरे मान मर्यादा का ख्याल किया होता। और तुम दोनों क्या नाम है तुम्हारा ? क्या तुम्हारे माँ बाप ने तुम्हें कोई संस्कार नहीं सिखाये की अपने से बड़ो के पैर छूते है और उनको चाय पानी पूछते है !!"

वसुधा की बात पर वो दोनों कुछ कहती लेकिन ध्यान और अयान उन दोनों कों इशारे से चुप करवा देते है और वसुधा की तरफ देख कर कहते है, " ये हमारी पत्नी है, आपकी कुछ नहीं लगती है। फिर भी आपको अगर अपनी बहु का इतना शौख है तो अपने बेटे की शादी करवा लीजिये और बहु ले आईये। हमें तो ये समझ मे नहीं. आता की आप मे शरम और लिहाज कुछ बची भी है या नहीं !!"


तभी प्रथम जो अयानी और धनवी कों कॉलेज छोड़ कर अंदर आता है और अयान और ध्यान की बातें सुनकर सारा माजरा समझ जाता है। वो अंदर आते के साथ कहता है, " क्या बात कह रहे हो तुम दोनों !! इनको शरम और लिहाज कब से आने लगी। इन दोनों चीजों से यहाँ मौजूद इन पांचो सदस्यों मे से किसी का कोई वास्ता नहीं है। कल बेटा बेज्जत होकर निकला हमारे ऑफिस से तो कल हीं ये दोनों के साथ साथ चौबे पति पत्नी भी बेज्जत हुई। लेकिन देखो तो जरा इन सभी कों इतनी बेज्जती के बाद भी ये आज मुँह उठाये चले आये !!"

चुप ड्राइवर के बेटे !! तेरी इतनी औकात नहीं की तू मेरे मोम डैड कों कुछ कह सके। उनके टुकरो पर पला है  और बात करता है मेरे परिवार की..... मै कुछ भी हूँ तो इस घर का और इनका सौतेला हीं सहीं भाई हूँ। लेकिन तू कौन है? ये कहते हुए वरुण प्रथम कों घूरता है !!

वरुण की बतमीजी भरी बातें सुनकर गोपी जी गुस्से मे कहते है, " वसुधा !! बहुत देर से तुम सब की बकवास सुन रहा हूँ। अभी के अभी दफा हो जाओ तुम सब '!! और हमें मजबूर मत करो की. मै कुछ ऐसा कर जाऊ। जो तुम सबको मुश्किल मे डाल दें। सालों पहले तुमने इस घर से, हम से और हमारे बच्चों से रिश्ता तोड़ लिया था और तोड़ कर चली गयी थी। तो अब यहाँ आकर खुद की बेज्जती और हमारा वक़्त क्यों खराब कर रही हो ? हमारे लिए तुम भी मर चुकी हो !!"

वसुधा गुस्से मे खड़ी होती है और गोपी जी आखों मे देखती हुई  कहती है, " आप के कुछ भी कहने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और आप. क्या कर लेगे बाबू जी !! ना पुलिस, ना समाज आप किसी कों नहीं बुला सकते। क्योंकि सबकी नजर मे आप लोगों ने खुद अपनी बहु कों मरा हुआ बता दिया था !! फिर अचानक क्या कहेंगे आप !!"

ये कह कर जहाँ वहाँ मौजूद ठाकुर परिवार के चेहरों पर सीकन आ जाती है। वही वसुधा के साथ मौजूद उन पांचो के चेहरे पर जीत वाली मुस्कान आ जाती है।

सुबह जब आराध्या की आँखे खुलती है और खुद कों धनंजय की बाहों मे पाती है। जब चेहरा हल्का उठा कर उसका चेहरा देखती है तो अभी नींद मे वो बेहद प्यारा और मासूम लग रहा होता है। उसे देख कर मुस्कुरा देती है और प्यार से उसे निहारने लगती है।वो उसे निहारने मे इस तरह खो जाती है की उसे मालूम नहीं चलता है की धनंजय की आँखे खुल गयी है।

कुछ देर बाद, अपनी आँखे बंद किये हुए धनंजय कहता है, " इतनी मोहब्बत से मत देखो बीबी !! मै खुद कों रोक नहीं पाऊंगा तुमसे प्यार करने कों!!" उसकी बातें सुनकर आराध्या अपनी आँखे बड़ी करती हुई कहती है, " आप जाग रहे थे और ये कहते हुए वो उठने लगती है !!"

धनंजय उसकी कमर पकड़ उसे रोक लेता है उठने से और उसकी आखों मे देखते हुए कहता है, " कोई इतनी मोहब्बत से देखे तो नींद किस कमबख्त कों आएगी भला !!"

वो अपनी आँखे छोटी करती हुई कहती है, " लेकिन अब जब नींद टूट गयी है तो उठिये। हमें हवेली भी जाना है। कह कर फिर उठने की कोशिश करने लगती है। "

वो उसे करीब करते हुए कहता है, " पहले मुँह तो मिठा करवा दो। फिर चली जाना। ये कहते हुए उसके होठो पर अपने होठो कों रख कर रब करने लगता है। जिससे आराध्या के बदन मे सीहरन होने लगती है।उसके होंठ काँप रहे होते है। धनंजय उसके होठो कों चूम नहीं रहा होता है बल्कि सिर्फ अपनी होठो की तपीश कों उसकी होठो की तपीश से महसूस करवा रहा होता है। "
आराध्या उसको हल्का खुद से अलग करती हुई, अपनी शिकायती लहजे मे कहती है, " कल से देख रही हूँ ठाकुर !! आप दोस्ती के नियम नहीं निभा रहे है। दोस्ती मे कौन बार बार अपनी दोस्त के होठो कों यू किश करता है। बताईये। ये तो गलत बात है। "

धनंजय उसकी शिकयत भरी बातें सुनकर मुस्कुरा देता है और बिना जबाब दिए। उसके नाक से अपने नाक कों रब करते हुए, बिना रुके सीधे उसके होठो पर अपनी होठो कों रख देता है और उसे चूमने लगता है। जब तक आराध्या समझती तब तक देर हो चुकी थी। धनंजय ने उसे पूरी तरह से अपने बस मे कर लिया था।

वो बस ख़ामोशी से उसे वो करने दें रही थी जो वो चाहता था। ना उसे रोका और ना उसका साथ दिया। बस अपनी आखों कों बंद किये उसके अहसास कों महसूस करने लगी। करीब पंद्रह मिनट उसके होठो कों चूमने के बाद, धनंजय उसके होठो कों छोड़ देता है और अपने गीले होंठ उसके गाल से लगाते हुए कानों तक जाता है और कहता है, " दोस्त सिर्फ दोस्त होता है लेकिन ये दोस्त मेरी दोस्त के साथ बीबी भी है। जो बेहद खूबसूरत है और सिर्फ और सिर्फ मेरी है। इसलिये ये गुस्ताखी तो तुम्हें माफ करनी होगी मेरी !! ठकुराइन !! जाओ जल्दी से नहा लो। इससे पहले तुम्हारी करीबी मेरी नियत बेईमान कर दें. कह कर उसके माथे कों चूम लेता है। "


आराध्या उसकी बात सुनकर उसे जोर से धका देती है और तेजी से उठ कर, वाशरूम की तरफ भागती हुई कहती है, " हुँह !! बेईमान ठाकुर !!"ये कह कर सीधे वाशरूम मे चली जाती है।

धनंजय उसे इस तरह भागते देख हल्का हँस देता है और कहता है, सिर्फ तुम्हारा ठाकुर !! तभी उसकी मोबाइल पर एक मेसेज आता है। जिसे देख कर धनंजय के. चेहरे के भाव गंभीर हो जाते है। फिर उसके दरवाजे पर नॉक होता है। वो दरवाजा खोलता है तो उसका असिस्टेंट मिश्रा जी खड़े थे। उन्दोनो के. कपड़े ले कर।

धनंजय उनसे कपड़े लेते हुए कहता है, " मिश्रा जी !! गाड़ी तैयार रखिये। हम कुछ देर मे आते है। ठाकुर हवेली जाना है!!"फिर वो दरवाजा बंद करके वो वाशरूम की तरफ आता है और दरवाजा नॉक करता हुआ कहता है, " ठकुराइन !! ये कपड़े ले लो !! "

आराध्या जो नहा रही थी उसे उसकी आवाज़ नहीं सुनाई देती है। धनंजय अपना सर ना मे हिलाते हुए। उसके बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था क्योंकि एक हीं वाशरूम था।

वाशरूम मे आराध्या जब नहा चुकी थी। तब उसे अहसास हुआ की उसके पास तो कपड़े नहीं है। अब वो परेशान हो गयी। फिर उसने बाथरौब पहना और हल्का दरवाजा खोल. कर अपना सर निकलते हुए, धनंजय कों आवाज़ देती है, " ठाकुर !! मेरे पास कपड़े नहीं है !!लेकिन धनंजय उसकी बातों का कोई जबाब नहीं देता है। वो अपने मन मे सोचती है, ये कहाँ चले गए और मेरी बात भी नहीं सुन रहे है !!" एक बार फिर वो पुकारती है, " मिस्टर ठाकुर !! आप कहाँ हो? " लेकिन इस बार भी कोई जबाब नहीं आता है।

आराध्या मन मे, इस डायनाशोर कों इज्जत रास हीं नहीं आती है। देखूँ कहाँ गया ये। कहती हुई सब कुछ भूल कर कमरे मे आती है। जहाँ उसकी नजर बाहर की तरफ देख रहे धनंजय पर जाती है। वो अपनी कमर पर हाथ रख कर कहती है, " आप कों मेरी आवाज़ सुनाई नहीं दें रही थी। कब से आवाज़ दें रही हूँ !!"

उसकी आवाज़ सुनकर वो सीधे मुड़ जाता है और जब उसकी नजर घुटने तक लिपटी बाथरौब मे आराध्या पर जाती है तो बस उसकी नजर वही रुक जाती है और कदम खुद ब खुद उसकी तरफ बढ़ने लगते है। गुलाबी गौरी रंगत, भींगे बाल, सादा और बेहद मासूम चेहरा काफ़ी था, धनंजय कों बहकाने के लिए।

आराध्या जब धनंजय कों यू अपने करीब आते देखती है तो उसके चेहरे इस समय घबराहट और परेशानियों से भर जाता है और वो बाथरौब कों निचे की तरफ खींचते हुए, अपने कदमों कों पीछे लेने लगती है। उसका दिल अजीब दहशत मे भर गया था।

धनंजय जो बेहद मोहब्बत से उसके करीब आ रहा था। अचानक आराध्या के चेहरे की रंगत देख, उसकी भी चेहरे की भाव भंगीमा बदल गयी थी। वो आराध्या के करीब आ जाता है और आराध्या दीवाल मे सट जाती है।

वो आराध्या के डरे हुए चेहरे कों प्यार से अपने हाथों मे भरते हुए कहता है, " क्या मेरी ठकुराइन कों अपने ठाकुर पर भरोसा नहीं है की वो ऐसा कुछ भी नहीं करेगा। जिस मे उसकी ठकुराइन की मर्जी शामिल नहीं होगी !! क्या मैंने तुम्हें बिना इज्जाजत किश किया और अपनी करीब सुलाया इसलिये तुम मेरे लिए ऐसा सोच रही हो। हम्म्म्म बोलो बीबी !!"

आराध्या कों अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी आँखे नम हो गयी और वो अपनी आंसू से भरी आखों कों उठा कर धनंजय की तरफ देखती है और अपना सर ना मे हिला देती है। लेकिन धनंजय कों कहीं ना कहीं आराध्या की ऐसी सोच पर अंदर हीं अंदर चोट पहुंची थी। लेकिन वो आराध्या कों जताता नहीं है और उसके माथे कों. चूमते हुए कहता है, " परेशान मत हो आराध्या !! जो मै कर चुका हूँ, उसे मै बदल नहीं सकता। लेकिन आगे से तुम्हारे करीब नहीं आऊंगा। जल्दी तैयार हो जाओ ठाकुर हवेली जाना है। ये कह कर वो वाशरूम की तरफ जाने लगता है।

आराध्या उसकी बातें सुनकर समझ गयी थी की बिना कहे उसने धनंजय के दिल कों चोट पहुंचा दिया है। वो तेजी से जाते हुए धनंजय के आगे आकर खड़ी हो जाती है। उसे इस तरह खड़े होने से धनंजय उससे पूछता है, क्या हुआ ? कोई बात है क्या? "

वो बिना कुछ कहे आगे बढ़ कर धनंजय के होठो पर अपने होठो कों रख देती है।अचानक उसके इस तरह करने धनंजय हैरान हो जाता है और आराध्या उसके होठो कों चॉक्लेट की तरह चूस और काट रही थी। उसे किश करना नहीं आ रहा था। वो पूरी तरह से धनंजय से लता की तरह लिपट गयी थी।

धनंजय मुस्कुरा कर उसकी कमर कों पकड़ लेता है और उसे हल्का ऊपर उठा कर उसके किश मे उसे साथ देने लगता है। आज आराध्या भी उसके किश मे साथ देने लगती है। दोनों एक दूसरे कों पूरी मोहब्बत से चूमने लगता है। कुछ देर बाद दोनों एक दूसरे कों छोड़ देते है। आराध्या की सांस भारी होने लगती है तो. धनंजय उसे सीने से लगा कर उसकी पीठ कों सहलाने लगता है।

आराध्या जब कुछ कों शांत करती है तो उसके सीने से लगे हुए कहती है, " मुझे माफ कर दो ठाकुर !! तुम्हारी ठकुराइन थोड़ी बेबकुफ़ है। मुझे तुम आराध्या कहते हो तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है। और तुम्हारा मुझसे यू दूर जाना तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है !!"

धनंजय उसके चेहरे कों हाथों भर कर शरारत से कहता है, तो मेरी ठकुराइन कों अपने ठाकुर का किश करना पसंद है !!" आराध्या उसके सीने पर मारती हुई कहती है, बातों मे फ़साना बंद करो ठाकुर और जल्दी से तैयार हो जाओ, ये कह कर वो उससे दूर होने लगती है !!

धनंजय उसके हाथ कों पकड़ कर, बिना उसके तरफ मुड़े हुए कहता है, " लेकिन आज मुझे अपनी ठकुराइन का किश करना..... बेहद पसंद आया और अगली बार इंतजार रहेगा की फिर से मेरी ठकुराइन कब मेरे होठो कों चूमेगी !!"

बेशर्म कहीं के !! हाथ छोड़ो ठाकुर !! मुझे तैयार होना है !! वो मुस्कुरा कर कहता है, अभी छोड़ रहा हूँ कहते हुए वाशरूम चला जाता है और आराध्या शर्माती हुई तैयार होने चली जाती है।


ठाकुर हवेली मे हंगामा बढ़ रहा था और वसुधा बेशर्मो की तरह सबको सुनाई जा रही थी। ध्यान उसे गुस्से मे कहता है, अभी के. अभी निकलो यहाँ से नहीं तो अंजाम अच्छा नहीं होगा।

वसुधा बेहद बेशर्मी से सोफे पर पैर चढ़ा कर बैठती है और कहती है, " सासु जी !! जरा समझा दो अपने इस छोटे पोते कों की अपनी माँ से ज्यादा उलझें नहीं!! नहीं तो. अंजाम बेहद बुरा होगा। और वो क्या होगा ये मुझे बताने की जरूरत नहीं। तो जरा मेरे एक्स ससुर जी और सासु जी समझाइये इसे। "

फिर दीप्ती और तानिया कों देखते हुए कहती है, " सुनो बहुरानी !! जाओ हमारे लिए चाय नाश्ता का प्रबंध करो !!" दोनों दादा दादी की तरफ देखती है। गोपी और सुमती जी ध्यान के साथ साथ सबको चुप रहने कों कहते है। " उनकी इशारे समझ कर दोनों चाय लेने चली जाती है।

अयान, ध्यान और प्रथम गुस्से मे सभी कों घूर रहे होते है। तभी गोपी जी अपनी कठोर आवाज़ मे पूछते है, " बताओं यहाँ क्या करने आयी हो? बार बार बेशर्म की तरह मुँह उठा कर क्यों चली आती हो !!"

तब तक दीप्ती और तानिया चाय और नाश्ते की प्लेट ला कर वहाँ रख देती है। वसुधा चाय का कप उठा कर एक घुट पीती है और वो चाय मुँह से भेंकती हुई कहती है, " छीं!! कैसी घटिया चाय बनाई है और ये कह कर चाय का कप दीप्ती और तानिया की तरफ भेंक देती है। "

चाय का कप सीधे उन दोनो के पैर की तरफ गिरता है। लेकिन तब तक तेजी से ध्यान और अयान दोनों कों पीछे की तरफ खींच लेते है।इस बार अयान चीखते हुए कहता है, " दुनिया मे लाखो बेशर्म देखे है लेकिन तुम जैसी घटिया औरत जैसी नहीं देखी है। " क्या अयान भाई !! आप. भी किस औरत के मुँह लग रहे है। इससे अच्छी तो बाजारू औरते होती है। जिनका भी ईमान होता है। इनका तो कोई ईमान हीं नहीं है।

ध्यान की बातें सुन कर वसुधा और रणवीर गुस्से मे उठ जाते है और चीखते हुए वसुधा कहती है, " घटिया बाप की घटिया औलाद !!!""

"खबरदार " ये कठोर आवाज़ सुनकर सब पीछे मुड़ कर देखने लगते है। धनंजय और आराध्या खड़े थे। धनंजय गुस्से मे उन सभी कों देख रहा था। लेकिन आराध्या बेहद शांत थी। वो धीरे से धनंजय के कंधे पर हाथ रखती है। धनंजय उसकी तरफ मुड़ कर देखता है और कुछ कहना चाहता है। तभी आराध्या धीमी आवाज़ मे कहती है, " अरे ठाकुर !! थोड़ा अपने त्रिकाल नेत्र कों आराम दो आप !!और मुझे जरा सासु माँ के. साथ छय छपा छय करने दो। ये कहती हुई वो अपनी आँखे विंक कर लेती है।

धनंजय हल्का मुस्कुरा कर उसके माथे कों चूमते हुए कहता है, " ठीक है मेरी बड़बोली !! कर लो अपनी मर्जी फिर मै करुँगा !!" वो मुस्कुरा देती है और सीधे वसुधा की तरफ जाती है।

वसुधा के साथ सभी उन दोनों कों देख रहे होते है। ध्यान कहता है, मिलिए हमारे घर की बड़ी बहु से !!"

आराध्या वसुधा के साथ साथ रणवीर, वरुण और चौबे जी के चारों तरफ घूमती है। तभी उसकी हरकत पर वसुधा गुस्से मे कहती है,, " ये क्या बतमीजी है। लगता है ठाकुर परिवार कों कोई लड़की नहीं मिल रही थी इसलिये ऐसी ऐसी घटिया लड़की कों उठा लाये है। ए लड़की,!!"

आराध्या उसकी बातें सुनकर अपने दोनों हाथो कों जोड़ कर कहती है.... ए सासु !! कह कर कुछ इस तरह से उसके पैरों की तरफ झुकती है की वसुधा कों लगता है की वो उस के पैरों कों खींच कर गिराने की कोशिश कर रही है। इसलिये वो अपने पैरों कों डर के मारे पीछे करते हुए कहती है, " ए लड़की !! पागल वागल हो गयी है क्या? मुझे गिराना चाहती  हो। "


आराध्या वसुधा की तरफ मुस्कुराते हुए कहती है, " ए सासु !! आप तो पहले से गिरी है तो मुझे क्यों कह रही है। और एक बात बताईये एक्स सासु !! हमारे घर मे आकर ये जो मंथरा बन कर इधर उधर घूम घूम कर बोले जा रही है। तनको लाज बिचार नहीं है आपके पास !! उसकी बात पर कोई कुछ कहता की तभी आराध्या ऊपर की तरफ देखती हुई, कहती है, " 

" होह भोलेनाथ !!कैसे कैसे प्राणी बनाये तुमने प्रभु और इनको इस धरती पर भेज दिए हो !! अरे इनको तनिक अपने पास कुछु दिन रख कर देखते। तुम्हरे कैलाश कों ये अपने प्रपंच से कैसे कैसे सराबोर कर देती। लेकिन ना हीं !! तुमको तो उमा मैया इस हरकत पर छोड़ कर मायके चली जाती। इसलिये तुम ने खुद ये बोझ कों कैलाश पर ना रख कर  भेज डाला  और वू भी कहाँ तो हमरे मासूम से माथे पर !! अब तो. हमको हीं इसे समझाना होगा की कुकर्म की सजा कुकर्म हीं होती है !!"

आराध्या ऊपर देख कर अपनी बात कहती है। उसकी बात से जहाँ पूरा ठाकुर परिवार मंद मंद मुस्कुरा रहा था, वही सिंह और चौबे परिवार गुस्से मे घूर रहा था। वरुण की नजर तो. बस आराध्या कों निहारे जा रही थी। वहाँ क्या हो रहा था इससे उसको कोई मतलब नहीं था।

वसुधा कहती है, तुम जो मुझसे जुबान लड़ा रही हो। तुम्हारी तो अभी बताती हूँ तुम्हें ये कह कर उस पर हाथ उठाती है। लेकिन तभी आराध्या उसके हाथों कों पकड़ लेती है। अभी तक उसके तेवर बिल्कुल हल्के फुल्के और मज़ाकिया थे। लेकिन इस वक़्त उसके चेहरे के भाव बेहद कठोर हो गए थे। वो वसुधा के हाथों कों बहुत कस कर पकड़ी हुई थी। वसुधा कोशिश भी कर रही थी लेकिन उससे अपने हाथों कों छुड़ा नहीं पा रही थी।

रणवीर उसे चीखते हुए कहता है, हाथ छोड़ो मेरी पत्नी का अभी !!" लेकिन आराध्या उस की किसी बात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और वो वैसे हीं उसे घूरती है।

वसुधा चीखते हुए कहती है, " धनंजय अपनी बीबी कों बोलो मेरा हाथ छोड़ दें !! नहीं तो. इसका अंजाम बेहद बुरा होगा। मै तुम्हारी और इस ठाकुर परिवार की इज्जत की धज्जियाँ उड़ा दूँगी और तुम जानते हो मै ऐसा कर सकती हूँ !!"


आराध्या जो कब से उसकी बात सुन रही थी। धनंजय के. अलावा सभी वसुधा की बात सुनकर परेशान हो गए थे। सुमती और गोपी जी कुछ कहने के लिए अपना मुँह खोलते है की धनंजय उन्हें इशारा दें देता है, चुप रहने कों !!"

आराध्या उसके हाथों कों अभी पकड़ी हुई थी और वसुधा और रणवीर फिर कुछ कहने के लिए मुँह खोलते है.... तभी आराध्या की ठंडी और कठोर आवाज़ गूंजती है।

" बिल्कुल चुप !! एक शब्द नहीं !! ना मेरा कोई इरादा है मजाक सुनने का और ना करने का ! और आप मेरी एक्स ना कोई नहीं जो भी आप है, बेहद इज्जत और आराम से आपको बता रही हूँ। यही हाथ आपने मेरे ध्यान पर उठाया था ना चाहती तो उसी वक़्त आपके हाथों कों तोड़ देती। लेकिन अभी पकड़ कर उसे मरोड़ रही हूँ। जानती है क्यों?

क्योंकि ये जो हमारे घर पर आपने चाय की प्याली फ़ेंकी है उसे साफ करेगी। वो भी अभी के अभी !!"

आराध्या की बात सुनकर वसुधा कुछ कहती.... उससे पहले हीं.... आराध्या अपनी दूसरे हाथ की इक उंगली दिखाती हुई कहती है, " अअअअअअअ..... नहीं वसुधा सिंह !! आप मेरी सास नहीं है। आपका रिश्ता हमारे घर से कभी नहीं था और ना रहेगा !! दोबारा यहाँ आने की और धमकी देने की कोशिश मत करना !! और ये जो धमकी देती रहती हो तुम मेरे पुरे परिवार कों...... तो एक बार वो जरूर करो। महाकाल की सौगंध !! अगर हमने तुम्हारी अगली पिछली सारी जन्मकुंडली का पोस्टर पुरे भोपाल से उज्जैन तक ना लगवाया ना तो आराध्या धनंजय ठाकुर नाम नहीं हमारा  और हमारी बातों कों हल्के मे लेने की सोचना भी मत !! तुम जैसे तिलचटो कों कैसे अपने घर की आँगन से बाहर भेंकना है अच्छी तरह से आता है मुझे !!"


ये कह कर उसे इस तरह से धक्का देती है की वसुधा सीधे जमीन के उसी हिस्से पर गिरती है, जहाँ उसने कप फ़ेंकी थी।