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Love without wish Chapter-3

Love without wish Chapter-3

क्यों छिछोरो कोई और काम नहीं है। महादेव की नगरी मे ये काम करते तुम्हको नहीं लगता है,"बाबा भैरोव नाथ के दर्शन हो जायेगें, कहती हुई आरध्या उन चार लडको के सामने आती है।

कुछ देर पहले ज़ब लड़के धनवी और अयानी को कुछ ना कुछ बोल रहे होते है। तब धनवी डरती हुई कहती है अयानी दीदी, भाई कोई फोन करो। अयानी जैसे ही अपना फोन निकलती है करने के लिए, तब तक वो चारों लड़के उनके आगे आ जाते है। जिसे देख दोनों पीछे हटती हुई घबराने लगती है।

आरध्या, दीप्ती और तानिया के साथ चप्पल के दुकान मे बैठी बहुत देर से उन चारों की हरकत देख रही होती है। ज़ब उसे लगता है की लड़के हद से ज्यादा बढ़ रहे है तब जा कर उनके बोलती हुई, धनवी के आगे आकर खड़ी हो जाती है।

क्यों मुझे नहीं कुछ कहोगे। चारों उसकी बात सुनकर रुक जाते है और कहते है, आज हमारा दिल इन पर आया है तुमको फिर कभी देख लेगे, चलो हटो सामने से। आरध्या कहती है, अरे छोटकी जरा अगल बगल देख दिमाग़ ठीक करने का कोई औजार ढूंढ ला।

उन चारों मे से एक लड़का कहता है, हमारे सामने हट नहीं तो. बहुत बुरा हो. जायेगा। धनवी आरध्या को पीछे से पकड़ती हुई कहती है, प्लीज यहाँ हमे अकेला छोड़ कर मत जाईये। आराध्या उसके हाथों पर अपने हाथों कोई. रखती हुई कहती है, "परेशान मत हो!!! मै हूँ यहाँ!!

तानिया कहती है,"अरे इनसे डायलॉग बाजी क्यों कर रही है जरा ठोक इनको बकलोल कहीं के पढ़ाई लिखाई की उम्र मे लगे है लफन्द्र बाजी करने के लिए।"अरे तानी सारी हेकरी तो इन चारों की अम्मा निकलेगी। पहले दीदी से पीट ले।

उनकी बातें सुनकर एक लड़का कहता है, अरे यार अगर इसे जलन हो. रही है की हमने इसे नहीं प्यार से देखा तो वो ना सही यही सही। देख तो ये तो पीछे वाली से भी बवाल लग रही है। दूसरा कहता है, हाँ यार तूने ठीक कहा!! फिर चारों आरध्या की तरफ देखने लगते है।उसकी तरफ हाथ बढ़ाते है।

तब तक दीप्ती एक डंडा उसके हाथों की तरफ फेंकती हुई कहती है, ये लो जीजी माथा ठीक करने का औजार!!!आरध्या मुस्कुरा कर डंडा ले लेती है।
वो चारों कहते है, तुम हमे डंडे से डराओगीं।
आरध्या बिना बोले उन सभी कोई लगातार 8-10 डंडे मारने लगती है। मारती हुई कहती है,"हमारी ललिता पवार कहती है, लात के भूत बात से नहीं मानते है।"

उन्ही चारों मे एक लड़का कहीं से लोहे की रोड लाता है और आरध्या के पीछे से उसे मारने आता है। दीप्ती के साथ सभी चिल्ला कर कहती है, बचो पीछे। लेकिन आराध्या सम्भलती उससे पहले किसी की हाथ उस लोहे की रोड कोई रोक लेती है। आरध्या उसके पीछे थी। सामने खड़े इंसान की लाल आखों को देख कर वो चारों वही डर कर खड़े हो. जाते है।धनंजय आयन कोई कहता है इन चारों के अक्ल ठिकाने लगाओ। उसका साथ देती हुई दीप्ती कहती है, अक्ल नहीं साथ साथ पैर -हाथ -मुँह सब ठिकाने लगाना। धनवी और आयानी भागती उनसे लिपट जाती है..... भाई!!!!।

उन्दोनो के सिर पर हाथों कोई फेरते हुए धनंजय कहता है, "तुमदोनों ठीक हो "।हाँ भाई हमें ठीक, हमे इस दीदी ने बचा लिया था, ये अगर नहीं आयी होती वक़्त पर तो पता नहीं क्या होता।"उनकी बातें सुनकर धनंजय कहता है, कुछ नहीं होता।
ध्यान और प्रथम कहते है अब ठीक हो. तुम दोनों। दोनों कहती है, जी  हमदोनों ठीक है।
आईये भाई हमें मिलवाते है उनसे। ज़ब वो दोनों पीछे मुड़ कर देखती है तो तीनों नहीं दिखती। अरे अयानी दी ये सब कहाँ गयी अभी तो यही थी। मुझे भी नहीं मालूम धनवी।
ध्यान कहता है, ओह्ह्ह शुक्रिया कहना तो बनता था हमारा। धनंजय कहता है, छोड़ो शायद कोई जरूरी काम याद आ गया होगा। अब चलो रात की आरती मे शामिल होने है।

तन्वी कहती है, आरध्या तू वहाँ से हमें सबको क्यों ले आयी। कम से कम उस इंसान क़ो शुक्रिया तो कहती, जो अगर बीच मे नहीं आता तो तेरा सर फुटना तय था।
आरध्या जो आगे आगे चल रही थी उसकी बात सुनकर रुक जाती है और कहती है, हाँ!! हम उसे शुक्रिया कहते वो हमे शुक्रिया कहता। बस बातों का आदान -प्रदान शुरु हो जाता और हम ना वक़्त पर घर पहुंचते और ना ही अपनी ललिता पवार की डांट से बचने के लिए सही समय पर काम खत्म कर पाते और ना ही शाम की आरती मे शामिल हो पाते।
फिर कमर पर हाथ रखती हुई कहती है, क्यों यही चाहती हो तुम!!!

उसकी बातें सुनकर दोनों हाथ जोड़ कर कहती है, माफ कर दो ज्ञान की देवी। हम्म्म्म। ठीक है अब चलो।


धनंजय पूछता है अक्ल ठिकाने पर लगाया। बिल्कुल यार ये भी कोई पूछने की बात है। फिर अयान पूछता है ध्यान से,"छोटे ये बता ज़ब उस सभी लफन्द्रो क़ो ले जा रहा था, अक्ल ठिकाने लगाने तो पीछे से कौन बोल रही थी की,"अक्ल के साथ हाथ -पैर -मुँह क़ो भी ठिकाना लगाने। अरे मँझले भैया ये मुझे कैसे मालूम होगा!! मेरा ध्यान तो अयानी और धनवी पर था कोई होगी मुझे क्या???अयान मन मे सोचता है, पता नहीं कौन थी?

धनवी और अयानी धनंजय के साथ मुँह लटकाये हुए जा रही थी। जिसे देख कर धनंजय कहता है क्या हुआ तुम दोनों क़ो।
कुछ नहीं भाई बस हम ये सोच रहे थे की जिसने हमारी मदद की हमे उसका नाम तक नहीं मालूम।
अच्छा होता है कभी कभी की कोई इंसान मदद कर जाता है और अपना नाम तक नहीं. बताता। चलो अब तुम. दोनों अपना मन ठीक करो।

शाम की आरती महाकाल की मंदिर मे आपार भीड़ जिसमे सभी क़ो. आरती देखने की. होड़ लगी थी। ठाकुर परिवार के लिए खास पूजा आरती रखवाई गयी थी। इसलिय धनंजय ने सफेद धोती पहन, कंधे पर गुलाबी दुप्पटा लिए हुए महादेव की आरती कर रहा होता है। वो अपनी जादुई आवाज़ से महादेव की आरती गा रहा था।उसके साथ साथसभी ने धोती पहन रखी थी और धनवी और अयानी ने साड़ी।

पीछे आरध्या, दीप्ती और तानिया के साथ थी।आरध्या ने आज गुलाबी साड़ी पहन रखी थी और तानिया ने हरी और दीप्ती ने हल्की हरी रंग की साड़ी पहन रखी थी।
दीप्ती कहती है, जीजी ये किसकी आवाज़ है, रोज तो नहीं सुनने क़ो मिलती है। तानिया कहती है, "हाँ और सुनो तो. आवाज़ कितनी मधुर है। उन्दोनो की बातें सुनकर आरध्या कहती है, इस आवाज़ मे महादेव की भक्ति और उनसे शिकायत दोनों ही घुली हुई है, जैसे अमृत के साथ विष।

दोनों उसकी बातें सुनकर कर कहती है, पता नहीं क्या बोल रही है तू। दिमाग़ हो तब तो समझोगे हमारी बात क़ो। चलो महाकाल पर ध्यान दो। हाथों क़ो जोड़ी हुई आरध्या अपने मन मे कहती है, महादेव तुम तो दुख अभिनाशी हो।मुझे नहीं मालूम जो शख्स तुम्हारी आरती गा रहे है, उनकी क्या तकलीफ है लेकिन सब कुछ तो तुम पर है भोलेनाथ।सब ठीक कर देना। जय शिव शम्भु।

आरती खत्म होती है तो तीनों मंदिर परिसर मे चली आती है। तानिया कहती है कितनी शांति है यहाँ।आरध्या कहती है, मै आती हूँ कुछ देर के बाद, कहती हुई सीधी वहाँ से मंदिर के एक ओर की तरफ निकल जाती है।

दीप्ती कहती है, चाहे पूरी दुनिया क़ो कुछ भी दिखा ले लेकिन जीजी कभी नहीं भूल पायेगी वो दिन। कितनी भी मजबूती से ये शिवरात्रि का त्यौहार मना ले लेकिन टूट जाती है। तानिया उसका साथ देती हुई कहती है, हाँ वक़्त कितना बीत गया लेकिन ये बिना किसी क़ो दिखाए अब तक वही है।

तभी पीछे से आवाज़ आती है अरे आप दोनों यहाँ। आवाज़ सुनकर दीप्ती ओर तानिया पीछे मुड़ कर देखती है तो धनवी और अयानी खड़ी थी उनके साथ ध्यान और अयान भी खड़े थे।
उन्दोनो क़ो देख कर धनवी और आयानी तेजी से उनके पास आती है और दोनों के गले लगती हुई कहती है, कहाँ चली गयी थी आप सब। हमदोनों क़ो शुक्रिया कहने का मौका तक नहीं दिया कहती हुई दोनों उनदोनों क़ो देखने लगती है।धनवी कहती है वो कहाँ हमारी सेवियर। तानिया ने कहा अभी तो हमारे साथ थी लेकिन अभी किसी काम से उधर गयी है।

तभी अयानी कहती है, भाई इनसे मिलये। फिर उन्दोनो की तरफ देखती हुई कहती है, माफ कीजिये हमदोनों क़ो अभी तक आपका नाम नहीं मालूम है। जिसे सुनकर दोनों कहती है वैसे तो हमे भी तुम्हारा नाम नहीं. मालूम है।

चारों क़ो बात करते देख अयान और ध्यान वही खड़े थे। ध्यान कहता है, मँझले भैया, छोटके भैया तो निकल लिए दादा -दादी क़ो पहुंचनाने और बड़के भैया ना जाने कहाँ चले गए है और हमे छोड़ दिया है, इन बंदरियो के साथ। आयन कहता है, चुप हो जा छोटे!!!सुन लिया तो यही शुरु हो जाएगी।सामने देख।

मुस्कुराते हुए कहती है, मै धनवी ठाकुर और मै अयानी चतुर्वेदी, हमदोनों भोपाल से अपने परिवार के साथ आये है खास महाशिवरात्रि की पूजा के लिए। उसकी बातें सुनकर कर कहती है,मै दीप्ती चौधरी और ये है हमारी दोस्त तानिया मिश्रा और हम यही के रहने वाले है।

तभी धनवी अयान और ध्यान क़ो अपने पास खींचते हुए लाती है और कहती है, भाई इनसे मिलो ये है तानिया मिश्रा और दीप्ती चौधरी इन्होंने  ही हमारी मदद की थी बाजार मे और इनके साथ एक और थी लेकिन वो है नहीं। फिर उन्दोनो की तरफ देखती हुई कहती है, ये है हमारे भाई ध्यान ठाकुर और ये है अयान चतुर्वेदी।
सभी एक दूसरे से मिलते है तो दीप्ती कहती है, आपने उन चारों के सिर्फ अक्ल ठिकाने लगाये या कुछ और भी, " कहती हुई अपनी भौओ क़ो चढ़ा लेती है।

अयान अपनी एक ऊँगली अपने होठों के निचे रब करते हुए, थोड़ा तिरछा होकर कहता है, "ओओ तो वो आप थी "। उसकी बातें सुनकर दीप्ती उसकी तरफ देखती हुई कहती है, कुछ ज्यादा ही तिरछा होकर आप नहीं बोल रहे है। ये बात आप सीधे होकर भी कह सकते थे। उसकी बातें सुनकर कर जहाँ ध्यान मुस्कुरा रहा था वही तानिया उसके बाजु क़ो पकड़ कर कहती है, तुझे इतनी सीधी बात हर वक़्त करनी जरूरी है।फिर तानिया कहती है, माफ कीजिये इसके कहने का वो मतलब नहीं था।

अयान दीप्ती की तरफ घूरते हुए कहता है, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। वैसे आप दोनों का और उनका भी जो यहाँ नहीं है,बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने हमारी बहन क़ो उन लडको से बचाया।

तानिया कहती है ऐसी कोई बात नहीं। हुम् नहीं होते तो. कोई और होता। दीप्ती उसे कहती है, अगर हम नहीं होते तो कोई नहीं होता है। देखा नहीं तूने सब वहाँ खड़े होकर तमाशा देख रहे थे। यहाँ सब तमाशा देखते है, ज़ब कुछ गलत होता है तो लेकिन बचाने के लिए कुछ ही लोगो जाते है।
अयान उसकी बात सुनकर मन मे कहता है, नोट बेड!!!लड़की सीधी और साफ बोलती है और आज कल किसी क़ो सीधी बातें अच्छी नहीं लगती। लेकिन मुझे अच्छी लगी।

बात कहीं से कहीं जाते देख अयानी कहती है क्यों ना आप दोनों हमे मंदिर घुमा दे। हम तो यहाँ  नए है तो आप दोनों हमे मंदिर घुमा दे। ऐसे मे हमारी बातें भी हो. जाएगी और हम. घूम भी लेगे। अयानी की बात सुनकर दीप्ती कुछ कहना चाहती है तो तानिया उसका हाथ पकड़ कर कहती है,"हाँ चलिए!! तब तक हमारी दोस्त भी आ जाएगी।
सभी आगे निकल जाते है। दीप्ती गुस्से मे तानिया क़ो आगे जाते हुई देखती है और कहती है, ये लड़की किसी भी अजनबी से कैसे घुल मिल जाती है। अक्ल की दुश्मन।
अयान उसकी बात सुनकर धीरे से उसके पीछे खड़ा हो जाता है और हल्की आवाज़ मे उसके कानों के पास आकर कहता है, हम उतने बुरे नहीं!!!कहते हुए आगे बढ़ जाता है।
दीप्ती अभी तक समझ नहीं पायी की किसने क्या कहा लेकिन ज़ब सामने आयन क़ो मुस्कुराते हुए देखा तो उसके पास आयी और उसके पैरों जोड़ से मारती हुई निकल गयी।
अयान अपनी आँख बंद करके कहता है, उफ्फ्फ अयान चतुर्वेदी!!!आगे चला जाता है।


आरध्या मंदिर की ओर आकर सुबकती हुई अपनी मुँह पर हाथ रखे सिर्फ रो रही थी। धनंजय भी अपनी बेचैनी क़ो कम करने के लिए उसी तरफ एक ओर खड़ा था।आरध्या की सुबकने की आवाज़ सुनकर उस ओर चला जाता है। आरध्या एक किनारे बैठी हुई थी, जैसे कोई पीछे देखें उसको तो लगे की वो वहाँ से कूद रही है। धनंजय क़ो भी ऐसा लगा। वो तेजी से उसकी पास पहुंचा ओर पीछे से उसे अपनी तरफ खींच लिया। आरध्या जो रही थी अचनाक उसके खींचने से वो सीधे उसके खुले सीने से जा लगी और धनंजय का एक हाथ उसके खुले कमर पर चला जाता है । आरध्या का उसके इतने करीब लगते ही धनंजय की धड़कन तेज हो गयी थी जिसे चिढ़ कर अपनी दबी लेकिन कठोर आवाज़ मे कहता है, "मरने का बहुत शौख है तो भगवान का मंदिर क्यों चुना। मरना है तो कहीं बाहर जाकर मरो।"लेकिन उसे अभी तक उसी तरह पकड़ रखा होता है। दोनों एक दूसरे की सांसों क़ो खुद के ऊपर महसूस कर पा रहे थे।

अँधेरे की वजह से दोनों एक दूसरे क़ो देख नहीं पा रहे थे सिर्फ दोनों के बीच अहसास थी, छुवन थी ओर दोनों की आवाज़। आरध्या उसे बहुत मासूम. सी आवाज़ मे कहती है," मै मर नहीं रही थी बस किसी क़ो याद कर रही थी। मुझे छोड़िये कहती हुई उससे हाथों क़ो छुड़ा कर जाने लगी।
तभी उसे जाते हुए देख पीछे पकड़ लेता है। आराध्या की पीठ उसके सीने से लग जाती और उसका हाथ आरध्या की पेट पर पहुंच जाती है। जिसे महसूस करती हुई आरध्या घबराट भरी आवाज़ के साथ कहती है, "छोड़ीये मुझे, मैंने कहा ना मै कोई मरने की कोशिश नहीं कर रही थी "।
धनंजय ना जाने क्यों उसे पकड़ रखा था। लेकिन उसे इस तरह से कहने से उसे अचनाक छोड़ देता है। खुद क़ो छूटती हुई देखा आराध्या बिना पीछे मुड़े तेजी से भागती है।
उसके जाने के साथ धनंजय खुद से कहता है, मरती तो मरती!!!मै क्यों इतनी फ़िक्र दिखा रहा था। ना जाने कौन थी।

आरध्या अपनी धड़कन क़ो काबू करती हुई कहती है, शिव शम्भु किसे भेज दिया था तुमने। और दीप्ती क़ो मेसेज करती है।

शिप्रा नदी सुबह के चार बजे.....
धनंजय के साथ उसके सभी भाई -बहन और दोस्त थे। साथ मे, दादी दादा  भी। धनंजय कहता है दादू आप सब राम घाट पर स्नान कर ले। क्यों तु कहाँ जा रहा है। दादू आपको मालूम है ना मुझे भीड़ पसंद नहीं है। मै त्रिवेणी घाट जा रहा आप सब स्नान करके मंदिर निकल जाईयेगा। यहाँ से वक़्त लगेगा हमे मंदिर पहुंचने मे। मै आ जाऊंगा वक़्त पर है। ठीक है बेटा।
अयान कहता है, या तो मै तेरे साथ चलता हूँ या प्रथम क़ो ले जा।
नहीं तुम दोनों यही रहोगे क्योंकि बच्चे भी है और दादू -दादी भी, इसलिए तुमदोनों का रहना जरूरी है। मै आ जाऊंगा तुम फ़िक्र मत करो कहते हुए निकल जाता है।

त्रिवेणी घाट
धनंजय नदी मे अपनी एक डुबकी लेता है और सूर्य भगवान क़ो अर्घ देते हुए स्तुति करता है। उसकी आवाज़ के साथ उसे किसी और की भी आवाज़ आती है, वो मन मे कहता यहाँ तो कोई नहीं आता फिर ये किस लड़की की आवाज़। एक बार फिर नदी मे घूमते हुए  डुबकी लगता है। इस बार ज़ब डुबकी लगता है तो किसी का आँचल उसके चेहरे क़ो ढक देता है। फरवरी का महीना चार बजे सुबह का वक़्त, ज़ब हल्की रौशनी और हल्के अंधेरे जैसा समय होता है । धनंजय क़ो उस समय कुछ नजर नहीं आता सिवाय उस सफेद आँचल के जो उसके चेहरे पर आ गयी थी। वो अपने सर से आँचल हटाता उससे पहले किसी की मीठी आवाज़ उसके हाथों क़ो रोक देती है।

वो जल्दी से आकर अपना आँचल हटाती हुई खुद क़ो लपेट कर कहती है, माफ करना। मुझे नहीं मालूम था की यहाँ इस वक़्त कोई आयगे, कहती हुई वो जाने लगती है...। धनंजय तेजी से उसे जाता देख,उसका हाथ पकड़ अपनी तरफ खींच लेता है जिससे वो उसके सीने से लग जाती है। दोनों एक दूसरे क़ो देख नहीं पाते लेकिन दोनों क़ो एक दूसरे की सांसे और छुवन महसूस हो रही थी। उसका भीगा बदन और धनंजय का खुला सीना, दोनों एक दूसरे से चिपके हुए थे। जो उन्दोनो क़ो थोड़ा असहज कर रही थी। वो खुद क़ो उससे छुड़ाने की कोशिश कर रही थी लेकिन धनंजय उसे नहीं छोड़ता और थोड़ा झुक कर उसके बालों की खुशबू लेते हुए अपनी कठोर आवाज़ मे कहता है, तुम वही हो ना जो कल रात मंदिर मे खड़ी मरने जा रही थी।
आरध्या एक तो उसकी बाहों मे आकर असहज हो रही थी दूसरी उसकी आवाज़ सुनकर कहती है, आप मुझे ये बात छोड़ कर भी कह सकते थे और रही बात मै वो हूँ या नहीं ये आप कुत्ते की तरह सूंघ कर बता रहे है। हे शिव शम्भु आज महाशिवरात्रि है कम से कम महादेव का नाम लीजिये और मुझे छोड़िये। ऐसे कब तक पकड़े रहेंगे आप मुझे।

धनंजय उसकी अजीब बात सुनकर उसे जोर से धका देते हुए छोड़ देता है और आराध्या पानी मे उल्टी दिशा मे गिर जाती है। उस अँधेरे भरी सुबह मे, दोनों एक दूसरे क़ो देख नहीं पाते है। आरध्या उसके इस तरह से धका देने के कारण खुद क़ो संभाल लेती है और उठ कर उसे भी तेजी से धका दे देती है। धनंजय उसके इस तरह धका देने से पानी मे खुद क़ो संभाल नहीं पाता और आराध्या का हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींच लेता है। दोनों पानी मे एक साथ अंदर चले जाते है। धनंजय उसे बाहों मे भरे हुए दो बार पानी के अंदर घूमता है और वो डर के मारे उसे जोर से पकड़ लेती है। दोनों एक दूसरे क़ो पूरी तरह से पकड़ रखे थे। धनंजय उसे ऊपर करते हुए कहता है, आज तो छोड़ दिया अलगी बार कभी मुझसे टकराई तो मार डालूँगा।

आरध्या जी अब तक अपनी सांसों क़ो संभाल रही थी उसकी बात सुनकर कहती है, क्यों तुम क्या खुद क़ो यमराज समझते हो, ज़ब मिलते हो मरने मारने की बात करते हो!! हटो!! कहती हुई तेजी से नदी से निकल जाती है। धनंजय पानी मे खड़ा होकर खुद से कहता है, अगर युहीं बार बार मिलती रही तो किसी दिन मेरे हाथों तुम मारी जाओगी। हुँह और वो भी नदी से निकल जाता है।

महाकाल मंदिर।
पूरा ठाकुर परिवार पूजा मे शामिल होता है आज धनंजय सफेद रेशम की धोती पहन रखी थी। उसे देख किसी का भी मन एक बार डोल जाये, इतना अच्छा लग रहा था । लगता है स्वयं महादेव उसके ऊपर अपनी कृपा बरसा रहे थे। पूजा शुरु होती है और रुद्राभिषेक उसके हाथों शुरू की जाती है। रुद्राभिषेक के बाद वहाँ के महा पंडित कहते है, सुना है आप शिवतांडव स्त्रोत्र बहुत अच्छी तरह करते है अभी बहुत ज्यादा भीड़ नहीं शुरू हुई है, सुबह की पहली पूजा है महादेव की इसलिए हमें चाहते है की आप ये गाये।आपके साथ हमारी बहुत प्यारी बच्ची है, वो भी आपका साथ देगी। जिसे सुनकर ध्यान कहता है कौन है वो?

पंडित जी कहते है, वो सामने नहीं आएगी लेकिन आज के दिन उसकी मधुर आवाज़ हम जरूर सुनते  है।पंडित जी की बात सुन कर सभी खड़े हो जाते है और ध्यान हाथों मे मंजीरा उठा लेता है,अयान और प्रथम मृदंग और शंख।

बाहर सभी हाथ जोर कर खड़े हो जाते है। एक तरफ धनंजय अपने हाथों मे डमरू उठा लेता है। दूसरी तरफ आरध्या जिसने आज सफेद साड़ी पहन रखी थी, सर पर पल्लू लेकर शंख हाथों मे ली होती है। पहले धनंजय स्तुति के साथ शिवतांडव स्त्रोत्र शुरु करता है।फिर एक साथ आरध्या देती है। उसकी आवाज़ सुन एक बार धनंजय के साथ साथ सभी का ध्यान उस ओर जाता है, जिस तरफ आरध्या सर पर पल्लू डाले खड़ी थी। दोनों के सुर, कंठ और साथ मे डमरू और शंख की ध्वनि के साथ पूरा मंदिर महादेव की भक्ति और स्तुति मे रम जाता है.। इस वक़्त धनंजय और आराध्या दोनों ही अपने इष्ट की भक्ति मे लीन भाव भभोर हो चुके थे दोनों की आवाज़ इतनी मधुर और लयबद्ध लग रही थी की वहाँ का माहौल बेहद अध्यत्मिक हो जाता है। सभी उनकी स्तुति मे खुद क़ो रमा चुके थे। लग रहा था स्वं महादेव उनकी स्तुति सुन मुग्ध मग्न हो रहे थे।

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद
वड्डमर्वयंचकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरी
विराजमानमूर्धनि ।धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेकिशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुर
द्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरा
पदिक्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥


पूजा समाप्त होने के बाद। ज़ब आरध्या और धनंजय चुप होते है तो एक साथ सभी हाथों क़ो उठा कर कहते है, हर हर महादेव। गोपीकांत जी पंडित जी से पूछते है की ये बच्ची कौन थी। पंडित जी मुस्कुराते हुए कहते है, अभी मिलवाता हूँ। सभी झुक कर पंडित जी प्रणाम करते है। ज़ब धनंजय झुकता है तो उसके साथ कोई और भी झुक कर पंडित जी क़ो प्रणाम करते है। पंडित जी हाथ उठा कर कहते है, तुम्हारा साथ महादेव पार्वती की तरह बना रहे। जिसे सुनकर दोनों उठ कर खड़े हो. जाते है ओर एक साथ कहते है, पंडित जी हम दोनों जोड़ा नहीं है। जिसे सुनकर पंडित जी कहते है, कोई बात नहीं शायद सरस्वती माँ जुबान पर गलती से बैठ गयी होगी। धनंजय की बगल मे एक खूबसूरत, मासूम प्यारी सी लड़की देख सभी मुस्कुराने लगते है।धनंजय की नजर ज़ब उस पर जाती है तो वो उसकी आधे चेहरे क़ो देख पाता है, जिससे खीझ कर वो अपना चेहरा फेर लेता है।

पंडित जी मै आरध्या हूँ और आपने ये कैसा आशीर्वाद दे दिया। सर पर रखे आँचल क़ो संभालती हुई कहती है। धनंजय आवाज़ सुनकर उसकी तरफ देखता है और मन मे कहता है कहीं तुम वो तो नहीं। लेकिन उसकी नजर कुछ पल के लिए आरध्या की आखों क़ो देख कर रुक जाती है। फिर पीछे से तानिया और दीप्ती उसे कहती है, जल्दी चलो जीजी घर पहुंचना है और खींचती हुई लेकर चली जाती है।

उसे जाते देख अयान कहता है, धनवी ये तो वही है ना जो हमे कल मिली थी। तब धनवी की नजर आरध्या के साथ जाती हुई दीप्ती ओर तानिया पर जाती है और कहती है, हाँ भाई ये तो वही है। ज़ब तक वो आवाज़ देती वो सभी निकल जाती है।

पंडित जी के साथ ठाकुर परिवार बाहर आ जाता है। फिर सुमति जी कहती है, आपने बताया नहीं पंडित जी कौन है थी ये बच्ची!जितनी दिखने मे सुंदर उतनी ही आवाज़ मे मधुरता। पंडित जी कहते है, ये हमारे बेटे की दोस्त की बेटी है। ये बिल्कुल हमारी पोती की तरह है और ये ज़ब भी मंदिर आती है इसे कोई रोक टोक नहीं करता क्योंकि यहाँ सभी जानते है की ये हमारी पोती है। इसलिये आपकी आज विशेष पूजा मे कोई शामिल नहीं था लेकिन इसे हम कभी रोकते नहीं इसलिये आज की पूजा मे ये भी शामिल थी और इसने भी गाया आपके पोते के साथ।
लेकिन इनके माता पिता कौन है? ये बात ध्यान पूछता है, क्योंकि ज़ब से सब ने आरध्या की आवाज़ सुनी है, सभी उत्सुक थे उसके बारे मे जानने के लिए।

जिस पर वो उदास होते हुए कहते है, क्या बताऊ ठाकुर साहब यही शिवरात्रि के दिन इस बच्ची की सारी दुनिया उजड़ गयी। आज के दिन ये हमेशा हमेशा के लिए अनाथ हो गयी। अब ये अपने चाचा चाची के साथ रहती है। लेकिन इस बच्ची की हिम्मत देखिये ये कभी उस चीज का दोष किसी क़ो नहीं देती और उसके बाद ही ये इस मंदिर की खास सदस्य हो गयी। ये कभी भी आये जाये कोई इसे नहीं रोकता।
गोपीकांत जी और उनकी पत्नी एक साथ कहते है, कुछ भी कहिये पंडित जी...!! बच्ची है!!बहुत प्यारी है और संस्कार तो उसके चेहरे पर झलकता है ;क्या तेज है उसके चेहरे पर। वैसे नाम क्या है उसका।
पंडित जी कहते है, ये तो सही कहा आपने बहुत प्यारी बच्ची है। सबकी झोली मे खुशियाँ बाँटती रहती है। अब तो महादेव से यही प्रार्थना रहेगी. की कोई उसकी झोली भी खुशियों से भर दे। नाम उसका है, आरध्या चौधरी।

धनंजय जो बहुत देर से पंडित जी की बात सुन रहा था और उसके दिमाग़ मे आरध्या की आँखे और आवाज़ घूम रही होती है। अपने मन मे कहता है... आरध्या चौधरी।

सभी फिर पंडित जी से आशीर्वाद लेकर भोपाल निकल जाते है।