Love without wish Chapter-50
- 29 June, 2026
रात का वक़्त आराध्या और धनंजय जब घर वापस आते है और उनके पीछे पीछे तानिया और ध्यान भी होते है। तानिया को ध्यान के साथ देख कर वसुंधरा जो कब से परेशान हॉल मे घूम रही थी। वो आगे बढ़ कर सामने उन चारों के खड़ी हो जाती है। उसे यू सामने खड़े होते देख वो लोग भी खड़े हो जाते है। वसुंधरा ने अपनी तेज आवाज़ मे पूछा, " इस महरानी का पता है की ये अपने बॉयफ्रेंड से मिलने गयी थी। " धनंजय वसुंधरा को अपनी आँखे दिखता है, लेकिन मुँह से एक लब्ज नहीं कहता है। उसकी आँखे देख वो बातों को संभालती हुई कहा, " "हाँ ! हाँ ! नहीं कह रही हूँ कुछ तेरी बीबी को लेकिन छोटी बहु तुम मन्दिर सुबह गयी और शाम को लौटी हो। तुम कहाँ थी। वसुंधरा की बात पर ध्यान ने गंभीरता से कहा," उसे मैंने बुलाया था ऑफिस मे।
वो अपनी बात आगे बढाती हुई कहा, " ये दीप्ती और अयान भी नहीं दिख रहे है । " उसकी इस बात पर चिंता देख धनंजय ने बेहद कटाक्ष मे कहा, आपको बेहद फ़िक्र हो रही है। समझ मे नहीं आ रहा आपकी फ़िक्र देख कर क्योंकि इससे पहले तो ऐसी फ़िक्र देखी नहीं !"
क्या मतलब है तुम्हारा ? वसुंधरा ने हैरानी जता कर कहा। बीच मे महेंद्र जी ने भी कहा, ये क्या तरीका है बात करने का तुम्हारी अपनी माँ से। आप देख रहे है माँ बाबूजी। ये कैसी बातें करने लगा है। गोपी और सुमती जी कुछ महीनो से अपने परिवार को बिखड़ता देख अब चुप हो थे। साथ मे बीमार भी रहने लगे थे। धनंजय उनके पास आते हुए कहा, " दादू -दादी माँ ! कल तानिया और ध्यान आप को लेकर दिल्ली निकल जायेगे। दो महीने से देख रहा हूँ आपकी तभी ठीक नहीं हो रही है, बल्कि बढ़ती जा रही है। "उसकी बात पर दोनों पति पत्नी अपने सर को हिला देते है।
धनंजय की बात पर वसुंधरा और महेंद्र का खुन ख़ौल जाता है। महेंद्र जी ने चीख कर कहा," किसके कहने पर तुमने इतना बड़ा फैसला लिया है। क्या तुम भूल गए हो की तुम्हारा बाप जिन्दा है और वो अपने माता पिता की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। " वसुंधरा ने भी हल्की तेज मे कहा, "आखिर इस घर हमारी कोई हैसियत नहीं है। जब जिसका जो मन करता है, हमे सुना देता है। अपनी मर्जी का करने लग जाता है। अपने बूढ़े माता पिता के साथ ऐसी हरकत करते हुए, तुम लोगों को जरा सा शरम नहीं आती है। देख रहे है ना आप महेंद्र, कैसे बेटा हो गया है हमारा। इस से अच्छा होता की हम जिन्दा ही नहीं रहते और मर चुके होते। " कह कर रोने लगती है।
दोनों पति पत्नी की बातें सुनकर धनंजय अपनी तेज और गुस्से से भरी आवाज़ मे कहा, " ये क्या ड्रामा लगा रखा है आप दोनों ने। किस बात की परेशानी है आप दोनों को। जब से हमारी जिंदगी मे लौटे है, रोज नए तमाशे कर रहे है। आपके माता पिता है, लेकिन आपसे ज्यादा वक़्त मैंने अपने दादा दादी के साथ बिताया है। उनकी तबियत को लेकर मैंने जो फैसला लिया है, उसे कोई नहीं बदल सकता है। आप भी नहीं। अयान और दीप्ती को हमने बाहर भेज दिया है। ताकि घर से दूर रह कर वो एक दूसरे को वक़्त दे सके और उनके रिश्ते फिर से सुधर सके। "
धनंजय बहुत कम गुस्सा होता है और अपनी बातें कहता है। आज वो बेहद गुस्से मे था लेकिन महेंद्र जी भी चुप नहीं हुए। उन्होंने उसे घूरते हुए कहा, " तुम होते कौन हो ये फैसला लेने वाले। भूलो मत तुम्हारा बाप अभी भी जिन्दा है। मै फैसला लूँगा की घर मे क्या होगा और क्या नहीं। ये मेरे माता पिता है और इनकी जिम्मेदारी मुझ पर है। इनका इलाज यही होगा और ये कहीं नहीं जायेगे। मै कल से ऑफिस आ रहा हूँ और वसुंधरा की तरह अब ठाकुर इंडस्ट्री को भी खुद ही देखूँगा। बहुत उड़ लिये तुम धनंजय और बहुत कर चुके मनमनियाँ अब बस। "
धनंजय ने हल्की कटाक्ष मुस्कान से अपने पिता को देखा और कहा, " वसुधरा और ठाकुर दोनों कम्पनी मेरी है और मैंने खुशी से आप को दिया था। ताकि आपको बता सकूँ की आपके बेटे ने आपके ना होने पर भी सब कुछ कितनी अच्छी तरह संभाला है। लेकिन.. लेकिन.. आप आ गए अपनी हरकत पर तो पूजनीय पिता जी... आपके चीखने और चिल्लाने से मै अपने फैसले नहीं बदलूगा। इसलिये खुद की बीपी को सम्भालिये। " ध्यान दिल्ली जाने की तैयारी करो। एक बार फिर अपने माता पिता की तरफ देखते हुए, उसने एक शब्द मे कहा, " आप दोनों को देख कर ऐसा महसूस होता है की कुछ लोग कभी नहीं बदल सकते है। उनकी आदते और फितरत उनके मरने के बाद ही खत्म होती है।
तभी गोपी जी ने खाँसते हुए कहा, " महेंद्र ! तुम मेरे बेटे जरूर हो लेकिन बेटे के सारे फर्ज धन ने निभाए है। आज तुम्हारी बातें सुनकर अहसास हुआ की किसी बहुत बुरे कर्म का फल है, जो तुम जैसा बेटा मुझे मिला है। इस घर और कम्पनी को मैंने बहुत पहले काबिल हाथों मे सौंप दिया था। मैंने इसे मना किया था की वसुंधरा कम्पनी तुम्हें फिर से ना दे लेकिन इसने मेरी बात नहीं मानी। तुम दोनों मानो या नहीं मानो ! तुम दोनों से कहीं काबिल मेरे पोते और बहुएँ है। "
गोपी जी की बात पर वसुंधरा ने गुस्से मे कहा, " वाह बाबू जी। दो दिन की आयी नई लड़की के लिये आप मुझे भूल गयी। ये लड़की आराध्या की तरफ देखते हुए। इसने अपने मायाजाल मे मेरे पुरे परिवार और मेरे बेटे को बस मे कर लिया है। ये कुछ भी करे, लेकिन आप सब को कभी बुरी नहीं लगती है। ये उल्टी बातें करे, बतमीजी करे लेकिन इसे ना मेरा बेटा बस मे रख पाता है और ना आप लोग। मै कुछ कहती हूँ तो मुझे भी सौतेली बना कर आप लोगों ने खड़ा कर दिया। ये घर मेरा है और मै अपने घर का अहित क्यों चाहूँगी। आखिर हम भी तो आप दोनों का ध्यान रख रहे है। क्या आप को भी हम पर भरोसा नहीं है। "
रात का वक़्त ठाकुर परिवार का माहौल बेहद गर्म था। आज वसुंधरा और महेंद्र किसी की बात सुनने समझने के मूड मे नहीं थे। तानिया आते के साथ किचन की तरफ चली गयी थी क्योंकि आज दिन भर नहीं रहने के कारण उसे नहीं मालूम था की क्या बना है। आराध्या ने उसे इशारे मे कहा की वो कुछ भी खुद बना ले। बहुत देर से वो सबकी बातें सुन रही थी और उसका चेहरा भी गंभीर था। धनंजय के चेहरे पर दर्द, दुख, बेबसी सब दिख रहा था। लेकिन उसने किसी को जताया नहीं था।
बहुत देर से वसुंधरा बोखलाहट मे बोली जा रही थी। जिसे सुनकर धनंजय ने अपनी तेज आवाज़ मे कहा, बस चुप कर जाइये आप दोनों। आखिर इतना तमाशा किस लिए। तभी आराध्या उसके हाथों को पकड़ लेती है और ना बोलने का इशारा करती है। उसके ऐसा करते ही धनंजय चुप हो जाता है।
ये देख वसुंधरा ने फिर कुछ कहना चाहा की आराध्या ने कहा, मुझे ये समझ मे नहीं आ रहा की दादी -दादू का इलाज अगर भोपाल से बाहर हो तो आप दोनों को क्या परेशानी। कहीं कुछ ऐसा तो नहीं, जो आप हम सभी से छिपा रही हो। आराध्या की बात सुनकर जैसे वो दोनों बोखला गए और महेंद्र जी ने चीखते हुए कहा," बहु ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बातें करनी की।तुम हम पर इल्जाम लगा रही हो !"
आराध्या कुछ कहती लेकिन धनंजय ने उसके हाथ को पकड़ लिया और बेहद सख्त आवाज़ मे कहा, " आज नहीं ठकुराइन ! बहुत हो गया तमाशा। बस। " ये कहते हुए धनंजय कमरे की तरफ चला जाता है। आराध्या भी उसके पीछे पीछे जाती है। इधर ध्यान ने दादा और दादी को अपने कमरे मे ले जाता है। फिर उन दोनों को बिठा कर कहा, ये परेशानी भी बीत जाएगी। आप दोनों बस दिल्ली जाने की तैयारी कीजिये। तानिया तभी दो कटोरी मे खिचड़ी ले कर आती है। क्योंकि ऑफिस मे ही आराध्या ने कहा था की खाना खुद से पका हुआ ही सबको खिलाना।
उसके हाथों मे खिचड़ी देख कर दोनों पति पत्नी उसका मुँह देखने लगते है। तानी बेटा ! खाना बन चुका था फिर ये। दादी की बात पर तानिया ने कहा, वो दादी ! आपकी तबियत खराब है और हम लोगों को भी आज खिचड़ी खाने का मन था। इसलिये बना दिया ऊपर से घर का माहौल देख कर। ये उम्मीद नहीं कर सकते है की सब साथ मे मिल कर खायेंगे।
उसकी बातें सुनकर सुमती जी बेहद अफ़सोस से कहा, महीनो से तो हमारा घर, घर कहाँ लगता है। सोचा था बिछड़ा हुआ बेटा वापस आ गया और हमारा घर फिर से पूरा हो गया। लेकिन हमारे सोचने से अगर सब अच्छा होने लगे तो फिर बात ही क्या थी। " ध्यान और तानिया ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा, सब ठीक हो जायेगा। आप खाना खा लीजिए।
कमरे मे, धनंजय गुस्से मे अपने कपड़े उतार रहा था। कोट उसने पहले हीफेंक दिया था और अब टाई को खींच खींच कर खोल रहा था। आराध्या तेजी से उसके हाथों को पकड़ लेती है और आराम से टाई को खोल देती है। फिर उसे सोफे पर बिठा कर, उसके शर्ट के बटन को खोलने लगती है। उसके शर्ट को उतार कर निचे झुक जाती है और उसके मोज़े को निकलने लगती है की धनंजय उसके हाथ को पकड़ लेता है। नहीं ठकुराइन! तुम ये क्या कर रही हो। छोड़ दो मै कर लूँगा !" वो मुस्कुराते हुए उसके मोज़े को निकाल कर उसके पेंट के बटन पर हाथ लगाते हुए कहा, " कभी कभी अपने पति का बच्चों की तरह ख्याल रखना भी अच्छा लगता है। मै कभी तो करती नहीं हूँ। लेकिन आज मेरे ठाकुर को इसकी जरूरत थी। कहते हुए उसके बेल्ट के साथ साथ उसके कपड़े खोल देती है। फिर तौलिया देती हुई कहा, " जाओ पहले फ्रेश हो जाओ। नहीं तो मै कर दूँगी। " धनंजय उसकी कमर पकड़ लेता है और अपने सर को उसके पेट से लगा देता है। आज उसकी ख़ामोशी आराध्या को भी चुभ रही थी। वो महसूस कर सकती थी की उसके अंदर क्या भूचाल मचा हुआ है लेकिन सिवाय सब्र के कुछ नहीं कर सकती है। वो उसके बालो को सहला रही थी। दोनों खामोश थे। धनंजय के आंसू उसके पेट को भींगो रहे थे। जब उसे अहसास हुआ तो उसने उसके चेहरे को ऊपर उठा लिया।
धनंजय अपनी नम पलकों से उसे देखते हुए कहा, " क्या तुम्हें भी लगता है की वसुधा और रणवीर की बातें सच है। अभी तो मै वसुंधरा कम्पनी कौन तीसरा घुस आया। उस का अभी मालूम भी नहीं हुआ है की ये परेशानी। मुझे डर लग रहा ठकुराइन ! कहीं उनकी बात सच हुई तो। आराध्या उसके होठो को हल्का चूम लेती है और उसके चेहरे को पोंछते हुए कहा, " ठाकुर ! इस दर्द से हम दोनों वाकिफ है। अगर उनकी बात सच भी है तो भी हमे स्वीकार करना होगा। हम इस बार बुरी तरह से फंस चुके है। इससे निकलने के लिये, हमे अयान भाई और प्रथम भाई का इंतजार करना होगा। तब तक जो जैसा चल रहा चलने देना होगा। जानती हूँ एक बच्चे के लिये उसके माता पिता बहुत महत्व रखते है। लेकिन अगर सच यही है तो सच करवा होता है। आपको ये सच स्वीकार करना होगा और हमे सबूतों के साथ तह तक पहुंचना होगा। "
" ये इतना आसान नहीं है ठकुराइन ! सालों पुरानी बात है और फिर हम कैसे उन लोगों पर भरोसा कर ले। अगर सच्चाई ये है तो सामने वाला दुश्मन हमसे बहुत चालाक है और हमसे दो कदम आगे है। " धनंजय की बात सुनकर आराध्या ने कहा, " ठाकुर ! उन पर ना सही लेकिन खुद पर भरोसा कर सकते है ना। माना दुश्मन हमसे दो कदम आगे है लेकिन तब तक, जब तक हम नहीं जानते थे। अब हम जानते है। रही बात सबूतों की तो सालों पहले का सबूत तो नहीं मिल सकता है लेकिन हम गुनाह करने वाले के मुँह से उनका गुनाह तो कुबूल करवा सकते है। बस थोड़ा सब्र और एक बड़ी चाल चलनी होगी। "
ये कहते हुए वो धनंजय की तरफ मुस्कुरा कर देखने लगती है। धनंजय भी उसके पेट को चूमते हुए कहा, हाँ ! जब यही सच है तो यही सही। "
भौर का समय भोपाल शहर जहाँ अपनी सामान्य जिंदगी मे जी रही थी। वही कोई था जो बेहद परेशान हो चुका था। पंद्रह दिन बीत गए थे। अब ठाकुर हवेली मे सिर्फ चार लोग रह गए थे। महेंद्र वसुंधरा और धनंजय आराध्या। वो दोनों शाम को ऑफिस से आते थे और अपने कमरे मे चले जाते थे। उन दोनों ने वसुंधरा और महेंद्र जी से बात करनी बंद कर दी थी।
आज जब वो दोनो ऑफिस जाने लगे तो वसुंधरा को आज बर्दास्त नहीं हुआ और उसने चीखते हुए उन दोनों से कहा, " क्या लगा रखा है तुम दोनों ! पुरे परिवार को भेज दिए हो शहर से बाहर और तो और हम लोगों को भी तुमने घर मे कैद कर लिया। हम कहीं बाहर नहीं जा सकते है। किसी से बात नहीं कर सकते है। कहीं बाहर जा नहीं सकते। आखिर तुम लोग कर क्या रहे हो। " धनंजय ने गुस्से मे कहा, वही जो आप दोनों ने किया है।
धनंजय की बात सुनकर दोनों पति पत्नी के चेहरे के रंग उतर जाते है। धनंजय ने मुस्कुराते हुए कहा, क्या लगा आप लोगों की हमे मालूम नहीं चलेगा। फिलहाल तो आप ने जो मेरी कम्पनी के साथ किया है। उसका हिसाब उस शख्स से लेना बाक़ी है। जिसे आपने मेरी जगह पर बिठा रखा है... मयंक ठाकुर !" आगे आप सब सोचिये की क्या करना है। मै फिर मिलुंगा। कहते हुए धनंजय ने आराध्या के हाथों को थामा और उसे लेकर निकल गया।
इस समय वो बेहद गुस्से मे था। आराध्या उसके हाथों को थाम लेती है। ठकुराइन गाड़ी मे बैठो। मेरा दिमाग़ अभी बेहद खराब है। दोनों गाड़ी मे बैठ जाते है। आराध्या और धनंजय दोनों तीन महीने पहले की बात सोचने लगती है।
तीन महीने पहले.....
आराध्या अपने कमरे मे धनंजय की बाहों मे सोई हुई थी। तभी उसके मोबाइल मे मेसेज आया। आराध्या सोई हुई थी इसलिये धनंजय ने उसके मोबाइल को खोल कर देखा। उसमें मेसेज आया था, " मुझे लगता है की हम लोगों को मार दिया जायेगा। इससे पहले हमारी मौत हो जाये। अपने बेटे और बहु के बदले तुम्हें वो सच बताना चाहती हूँ, जो तुम्हारा जानना बहुत जरूरी। यकीन करना नहीं करना ये बाद मे सोचना लेकिन मुझ से आ कर मिलो। मैंने बहुत मुश्किल से ये मेसेज भेजा है। वसुधा !"
ये पढ़ते ही धनंजय का दिमाग़ खराब हो गया और वो मेसेज जैसे ही डिलीट करने को हुआ की आराध्या ने पूछा किसका मेसेज है। धनंजय ने उसे बता दिया।आराध्या जल्दी से उठ कर बैठ जाती है। वो ऐसे उठती है की उसके बदन से चादर निचे गिर जाता है और उसे होश नहीं रहता है। वो धनंजय की तरफ घूमती है। लेकिन धनंजय की नजर को जब देखती हुई खुद पर नजर डालती है... तो उसे हाथों से मारती हुई कहा, गंदे, बेशर्म इंसान ... मै तुम्हें छोरुँगी नहीं। मुझ पर गंदी नजर कैसे डाला तुमने। " खुद को बचाते हुए धनंजय ने कहा, रुक जाओ मेरी लड़ाकू विमान... कहते हुए उसके हाथों को एक हाथ से पकड़ लेता है और दूसरा हाथ उसके सीने पर रख देता है। आराध्या उसे घूरती है लेकिन धनंजय अपनी हाथों से छेड़खानी करते हुए, उसे अपने ऊपर खींच लेता है।
अब आराध्या पूरी तरह उसके खुले सीने पर आ गयी थी। उसकी पीठ को हाथों से फेरने लगता है।उसकी हरकत देख कर वो चिढ जाती है, " ठाकुर ! बहुत परेशान कर लिया है तुमने मुझे। अब अगर थोड़ा सा भी मुझे तंग किया तो देख लेना। "अच्छा मै कहाँ तंग कर रहा हूँ । जरा मुझे देखो, कोई भी देख ले तो कह दे की मै कितना अपनी पत्नी का सताया हुआ हूँ। " आराध्या मुँह बनाती हुई कहा, " चुप हो जाओ बेशर्म आदमी। अगर मैंने बेशर्मी दिखाई तो तुम छिपाते फ़िरोगे। " धनंजय भी अपने हाथों के उसकी कमर के निचे ले जाते हुए, आखों से शरारती इशारे किये और कहा, " बताओं क्या करोगी ठकुराइन !" प्लीज ठाकुर ! अभी नहीं ना ! अभी जरूरी बात कर रहे थे और तुम कहाँ पहुंच गए। "
धनंजय ने उसकी बात पर कहा, मुझे भरोसा है नहीं है इसलिये तुम नहीं जाओगी। बेहद सावधानी से सब को मैंने बचाया था। " मै समझती हूँ ठाकुर ! तुम्हारे डर को, लेकिन अगर हम दोनों साथ चले तो। देखो मेरा मानना है की हमे चलना चाहिए। " आराध्या की बात पर धनंजय ने उसे घूरते हुए कहा, " ऐसा क्यों कह रही हो जान ! क्या कुछ ऐसा है जो मुझे नहीं मालूम है। " आराध्या ने उसकी आखों मे देखती हुए कहा, " देखो ठाकुर ! ये ऐसा नहीं है की बहु को अपना ससुराल पसंद नहीं है, इसलिये वो शिकायत कर रही है। लेकिन सच कहु तो माँ और पापा की कुछ हरकत देख मुझे शंका होने लगी है। वो हर इंसान से अलग अलग बातें करती है। धनवी के साथ उनका व्यवहार अलग है तो अयानी के साथ अलग और नतीजा ये है की दोनों अहलब खुल कर बात नहीं कर रही है। इसलिये मैंने दोनों को अलग घर मे रहने के लिये कहा। करीब होने पर उनकी बीच कटुता बढ़ रही थी। "
आराध्या की बात पर धनंजय ने कहा," मै तुम्हें गलत नहीं कह रहा हूँ। लेकिन रिश्ते और रिस्तेदार की परख वक़्त पर ही होती है। इसलिये समय से पहले हम सिर्फ राय बना सकते है लेकिन उसे अमल मे लाने और निर्णय करने के लिये वक़्त देना पड़ता है। और यहाँ तो रिश्ता ही ऐसा है, जिसके बारे मे गलत सोचना ही गलत होगा। माता पिता है मेरे और तुम पत्नी हो मेरी। इसलिये एक तरफा नहीं हो सकता हूँ। वक़्त दो और देखो। अगर वो गलत है तो वक़्त साबित कर देगा और अगर वो. सहीं है तो वो भी वक़्त साबित कर देगा।"
अब बताओं तुम चाहती हो मिलना उन लोगों से। आराध्या अपना सर हिला देती है। तो चलो तैयार हो जाओ। दोनों तैयार होकर बाहर निकल जाते है। औपचारिकता पूरी करने के बाद और स्पेशल ऑडर लेने के बाद, दोनों जेल के एक कमरे मे बैठे हुए थे। उसके सामने वसुधा, रणवीर, वरुण, अंतरा के साथ साथ बिजलानी और वसुधा के माता पिता मौजूद थे। कृष्ण राठौर और उनके बेटों पर देश द्रोह का केस लगा था वो सब भोपाल नहीं तिहार मे सिफ्ट हो गए थे।
आराध्या और धनंजय के सामने सभी मौजूद थे। सबकी स्तिथि देख कर लग रहा था की वो सब जेल मे रह रहे थे। धनंजय ने अपने कठोर शब्दों मे कहा," बोलो जो बोलना है। लेकिन इतना याद रखो की तुम हमे ब्लेक मेल नहीं कर सकती। मुझे दुख होता है, लोग कहते है मासी यानी माँ जैसी। लेकिन तुम तो हमारी माँ क्या एक अच्छी औरत भी नहीं बन पायी।"
"मै तुम्हारी मासी नहीं हूँ।" वसुधा ने बीच मे अपनी गंभीर आवाज़ मे कहा। धनंजय की मुट्ठीयां कस गयी और कुछ कहने को हुआ की आराध्या ने उसे रोक दिया और गंभीरता से कहा, " जो कहना इतनी ईमानदारी से कहना ताकि तुम्हारे कुछ पाप कम हो जाये। अब बोलो !"
वसुधा ने कहा, " पहली मेरी बात सुन लेना फिर तुम्हें लगे की मेरी बातों मे कोई सच्चाई है तो मेरी नहीं लेकिन मेरे बेटे और बहु को यहाँ से निकाल देना। अंतरा माँ बनने वाली है। बस हम नहीं चाहते की हमारे पापो का फल इस अजनमे बच्चे को मिले। ये दोनों बहुत दूर चले जायेगे। कुछ भी नहीं लेगे बस जिंदगी दे दो मेरे बच्चों को। " आराध्या ने अपने सर को हाँ मे हिलाया।
वसुधा ने अपनी बातें कहनी शुरु की, " आज तक तुम लोगों को जो भी सच मालूम थी वो. आधा सच है। मै वसुधा नहीं हूँ। मै और वसुधा कॉलेज के समय की पक्की दोस्त थी। मेरा नाम वैशाली है। रणवीर से हम दोनों प्यार करते थे। लेकिन वसुधा मुझसे ज्यादा सुंदर थी और रणवीर पैसे वाले परिवार से था। वसुधा बेहद महत्वकांक्षी थी शुरुआत से ही। उसे सुख सुविधा वाली जिंदगी पसंद थी। मै गरीब परिवार से और मेरी हिम्मत नहीं थी उसे जो चीज पसंद आ जाये। वो मै मांग सकूँ। रणवीर को भी उससे बेहद प्यार था।
इसी बीच तुम्हारे पिता की नजर वसुधा पर गयी। और वो गलतफहमी मे वसुंधरा को वसुधा समझ कर, अपने माता पिता से शादी का प्रस्ताव भिजवा दिया। उस समय वसुधा भोपाल मे नहीं थी। हमारी कॉलेज की ट्रिप बनारस गयी थी। तुम्हारा इतना बड़ा नाम और तुम्हारे पिता की जल्दी शादी करने की ख्वाहिश मे। चाचा चाची ने दस दिनों के अंदर शादी करवा दी। वसुधा को खबर थी लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था क्योंकि उसकी जरूरत को पूरा करने के लिए रणवीर मौजूद थे।
तुम्हारे पिता को शादी के तीन साल तक मालूम नहीं चला की वो जिससे प्यार करते थे, वो वसुधा थी और उनकी शादी उसकी जुड़वा बहन वसुंधरा से हुई थी। वसुधा जीतनी चतुर चालाक थी। तुम्हारी माँ उतनी ही सीधी और सच्ची।तुम शादी के साल भर के अंदर हो गए तो ध्यान तुम्हारी माँ के पेट मे था। यहाँ की पढ़ाई पूरी करने के बाद वसुधा रणवीर के साथ दिल्ली चली गयी। वहाँ उसने इनकी कम्पनी मे नौकरी कर ली और मुझे भी कुछ वक़्त बाद बुला लिया। मै रणवीर से प्यार तो करती थी लेकिन मेरी ग़रीबी और जरूरत ने मेरी इक्छा को खत्म कर दिया था। अब मै दोनों की दोस्त बन गयी थी।
ध्यान दो साल का हो गया था और लेकिन कभी वसुधा की मुलाक़ात महेंद्र से नहीं हो पायी। वैसे भी तुम्हारे नाना नानी और वसुधा को तुम्हारी माँ ज्यादा पसंद नहीं थी। क्योंकि शादी के बाद बहुत बार चाची ने तुम्हारी माँ से, अपने ससुराल से पैसे लाने को कहा। लेकिन तुम्हारी माँ इन्कार कर देती थी। धीरे धीरे वसुंधरा खुद अपने मायके से मतलब खत्म कर दिया था और अपने पति और परिवार, बच्चों के साथ रम गयी। तुम्हारे पिता को सिर्फ वसुधरा की खूबसूरती और उसके शरीर से मतलब था, इसलिये उसे इन सब से कोई मतलब नहीं था।तुम्हारे माता पिता की भी जिंदगी अच्छी चल रही थी।
तभी किसी पार्टी मे, तुम्हारे पिता महेंद्र ने वसुधा को देखा। उसे बेहद हैरानी हुई।वो पार्टी मे ही वसुधा को वसुंधरा समझ कर उस के पास आता है। वसुधा जब उसके मुँह से वसुंधरा सुनती है तो बताती है की वो उसकी बहन है। तभी महेंद्र अपने बारे मे बताता। वसुधा महेंद्र की पर्सनालिटी और ठाकुर कम्पनी का नाम सुन कर बेहद प्रभावित हो गयी। मुझे आज भी याद है उसकी आखों की चमक। उसकी आखों मे बहुत कुछ था क्योंकि उसने महेंद्र की नजरों को भाँप लिया था। उस मुलकात के बाद वसुधा का व्यवहार थोड़ा अलग हो गया था रणवीर के साथ।
मुझे नहीं मालूम की उस पार्टी के बाद वो और महेंद्र एक दूसरे से दोबारा मिले या नहीं लेकिन एक महीने के अंदर वसुधा ने दिल्ली छोड़ दिया था। रणवीर अकेले हो गए थे और जिस समय वसुधा और महेंद्र एक दूसरे के करीब आ रहे थे। उसी दौरान मै और रणवीर भी करीब आ रहे थे। मुझे नहीं मालूम की भोपाल मे बीते एक सालों मे हुआ क्या था। एक साल बाद सुनने मे आया की वसुधरा की मौत हो गयी धनवी के जन्म के बाद। लेकिन वो कितना सच है मुझे नहीं मालूम।उस के माता पिता और वसुधरा की मौत हो गयी है। लेकिन दुनिया की नजर मे वसुधा की मौत हुई। ठाकुर परिवार वसुधा को वसुंधरा समझ रहे थे।
लेकिन वसुधा को देख तुम्हारे दादा दादी ने बच्चों के लिए माँ तलाश ली। मुझे ये नहीं मालूम चला की जब सब कुछ उनके मुताबिक चल रहा था तो अचानक उन्होंने मुझे वसुधा बना कर भेजा। अब तुम कहोगे की मैंने ये बात मानी क्यों, क्योंकि उस समय रणवीर की कम्पनी पूरी तरह से बर्बाद हो गयी थी। इसलिये मैंने उसकी बात मान ली।
मैंने जाते जाते तुम्हारे दिमाग़ मे वो सारी बातें डाली जो कहीं ना कहीं आधी सच थी। वरुण मेरे पेट मे आ चुका था और वसुधा ने मुझे जिस चीज के लिये भेजा उसमें मै कामयाब नहीं हो पायी। उस वक़्त मुझे मालूम हुआ की ये चाल इसलिये चली क्योंकि तुम्हारे दादा जी ने सब कुछ तुम्हारे नाम कर दिया था ।
आगे की कहानी तुम्हें मालूम है।
धनंजय ने बेहद मुश्किल से कहा, मेरी माँ के साथ क्या हुआ था।
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