Love without wish Chapter-23
- 29 June, 2026
आराध्या धनंजय कि ऑफिस कि तरफ बढ़ रही होती है। धनंजय इस बात से बेखबर वसुधा कि चाल कों रोकने के लिए कुछ प्लानिंग कर रहा होता है और खुद मे कुछ सोच रहा होता है, " उसके मन मे बहुत सारी बातें चल रही होती है।आज वो बेहद परेशान था क्योंकि उसका वजूद हीं अस्तित्व हीन था। वसुधा जो खुद कि आपत्तिजनक फोटो लगवा कर ठाकुर परिवार और उसे पूरी तरीके से बर्बाद करना चाहती थी। इस बात कि ढाल बना कर वो पिछले आठ सालों से धनंजय कों ब्लैकमेल कर रही थी। अब उसे उसकी खुद कि बनाई गयी कम्पनी वसुंधरा एम्पायर पर मालिकाना हक चाहिए था। लेकिन ये हक वो उसे कैसे दें सकता था और अगर नहीं देता तो वो अपनी आपत्तिजनक तस्वीरें अपने पति रणवीर के साथ पुरे भोपाल शहर मे डाल देगी। सब ये नहीं कहेंगे कि वो वसुधा सिंह है। सब कहेंगे कि धनंजय ठाकुर कि माँ वसुंधरा ठाकुर कितनी निर्लज्ज है। ये सब सोचते हुए.......♥️
वो अपने बालों कों पकड़ कर ज़ोर से चीखता है..... आअह्ह्ह्हह्ह....... इसके साथ हीं टेबल पर रखे सारे सामने कों निचे फ़ेंकने लगता है।ऑफिस के अंदर धनंजय गुस्से मे, सभी चीजों और सामानो कों तोड़ते हुए चीख चीख कर कहता है, " नहीं!!नहीं.... वसुधा सिंह तुम्हें मै अपने परिवार कि इज्जत के साथ नहीं खेलने दूँगा। बिल्कुल नहीं !! बहुत बतमीजीयाँ बर्दास्त कर लीं मैंने। मेरी ख़ामोशी कों तुमने मेरी कमजोरी समझ लीं लेकिन ये खेल अब तुम्हारा ज्यादा देर नहीं. चलेगा। ये कहते ब
हुए वो निचे बैठ जाता है और ऊपर कि तरफ देखते हुए.... कहता है क्यों? क्यों? डैड क्यों?.... चले गए मुझे छोड़ कर!!"
तभी आरध्या ऑफिस के दरवाजे कों खोलती है और पुरे ऑफिस का हाल देख कर वो अपने सीने पर हाथ रख लेती है। हर जगह कांच बिखड़े हुए थे। सब कुछ टुटा हुए था। वो आराम से एक जगह लंच बॉक्स रखती है और आराम से धनंजय कि तरफ जाती है। धनंजय इन सब से बेखर बस खुद मे खोया हुआ था।
आराध्या आराम से उसके कंधे पर हाथ रख कर कहती है, "मिस्टर ठाकुर!!" धनंजय के कानों मे आरध्या कि मीठी आवाज़ इस तरह से पड़ती है जैसे बंजर जमीन पर हल्की बारिश कि बुँदे !! वो उसकी आवाज़ सुनकर तेजी से उसकी तरफ मुड़ जाता है और उसकी कमर कों पकड़ कर उसके पेट मे अपना मुँह छुपा लेता है!! उसका चेहरा पूरी तरह से आरध्या कि पेट मे दब जाता है।
आरध्या अचानक इस तरह से धनंजय के करीब होने पर खुद कों संभाल नहीं पाती। उसकी धड़कन बेहद तेज धड़कने लगती है।लेकिन उससे ऑफिस और धनंजय कि हालत देख परिस्थितियों का भान होता है। इसलिये वो आराम से धनंजय कि बालों कों सहलाती हुई खुद निचे उसके पास बैठ जाती है।
फिर धनंजय का चेहरा हाथ मे भर्ती है। पूरी तरह बिखरा और उदास चेहरा देख, उसके दिल मे दर्द हो जाता है। वो उसके माथे कों चूम कर कहती है, पहले यहाँ से उठिये। कांच लग जाएगी आपके हाथों मे। धनंजय भी जैसे उसका सानिध्य पाकर शांत हो जाता है और चुप चाप उसकी बात अच्छे बच्चों कि तरह मान कर सोफ पर बैठ जाता है।
आरध्या उसको चारों तरफ ध्यान से देखने लगती है कि कहीं उसे चोट तो नहीं लगी। जब उसे तस्सली हो. जाता है तो अपने दिल पर हाथ रख कर कहती है, " शुक्र है उमापति का कि आपको कहीं चोट नहीं लगी !!"आप रुकिए हम आते है। ये कह कर वो जाने लगती है कि धनंजय उसका हाथ पकड़ लेता है और उसकी तरफ देख कर,बिना किसी भाव के कहता है, " तुम इतनी रात कों यहाँ क्या कर रही हो? "
आराध्या उसके हाथों पर अपने हाथों कों रखती हुई कहती है, " पत्नी हूँ मै आपकी !!" प्यार करके आपसे शादी नहीं हुई है लेकिन शादी जैसे हीं हुई। मै खुद आपके साथ पत्नीधर्म मे बंध गयी हूँ। इसलिये यहाँ आयी क्योंकि आप नहीं आये थे। अगर मेरी जगह आप होते तो आप भी वही करते जो मैंने किया है !! अब हाथ छोड़िये। देखिये आपने अपने गुस्से मे ऑफिस कि क्या दुर्गति कर दी है और अभि कोई है भी नहीं जिससे ऑफिस साफ करवाऊ !!" इसलिये आराम से बैठिये मै आती हूँ !!"
वो जाने लगती है तो धनंजय सीधे उठ कर उसे गोद मे उठा लेता है। उसे इस तरह गोद मे उठाने से आरध्या चिढ कर कहती है, " देखो ठाकुर !! मैंने बहुत आराम से बात कि है लेकिन तुमने अगर हमे ऑफिस के सामानो कि तरह उठा कर भेंका ना तो हम बता रहे है। हम भी कोई सती सावित्री है। हम भी तुमको इस बिसवें तले से निचे भेंक देंगे और हमारी बातों कों हल्के मे मत लेना !!" ये कह कर उसे अपनी बड़ी बड़ी आखों से घूरती है।'
जिसे देख धनंजय अपना सर ना मे हिलाते हुए मन मे कहता है, " बड़ बोली इसका कुछ नहीं हो सकता फिर गहरी सांस भरते हुए, थोड़ा आगे बढ़ता है और एक तरफ आकर हल्का सा एक बटन प्रेस करता है, जिससे सामने वाली दीवाल हल्की आवाज़ के साथ खुल जाती है। जिसे देख कर आरध्या कि आँखे बड़ी हो जाती है और उसका दिमाग़ फिर से गलत दिशा मे दौड़ना शुरू हो जाता है। "
धनंजय उसे अपने गोद मे लिए, ऑफिस मे बने सीक्रेट कमरे मे ले जाता है !!" जिस देख आरध्या कहती है, " देखो ठाकुर !! मै कोई गब्बर नहीं हूँ कि तुम्हारा हाथ मांग लूँ लेकिन तुम तो मुझे कमरे मे कैद कर रहे हो। आखिर मुझ जैसी मजबूर, कमजोर लड़की के साथ तुम ऐसे कैसे कर सकते हो !! मै तुम्हारे लिए खाना लायी। इतनी दूर से और तुम मुझे इस भूतिया कमरे मे बंद कर के दीवाल मे चुनावा दोगे !! इतने निर्दयी कैसे हो गए तुम ठाकुर !! कुछ तो रहम करो मुझ बिचारि पर अरे अभी तो मेरे बच्चे भी नहीं. हुए.... मै दादी -नानी और सास भी नहीं बनी। ये उमर है मेरे मरने कि.......
आगे कुछ कहती उससे पहले धनंजय जो उसकी बक बक से परेशान हो गया था। उसे अपनी गोद मे हल्का ऊपर उठा कर उसके होठों पर अपने होठों कों रख देता है। वैसे उसने उसे चुप करवाने कि लिए ये किया था लेकिन आरध्या के. होठों का स्वाद चखते हीं, उसका ईमान डोल गया और वो उसे चूमते हुए उसे बिस्तर पर सुला देता है और उसके ऊपर झुक कर उसे चूमने लगता है।
आरध्या अचानक उसके ऐसा करने से चौंक जाती है और अपनी आँखे बड़ी बड़ी करती हुई उसके सीने पर हाथ रख कर पीछे कि तरफ धक्का देने लगती है। लेकिन धनंजय उसकी किश मे इस तरह खो गया कि उसके हाथों कों पकड़ कर ऊपर कि तरफ उठा कर दबा देता है और उसे किश करने लगता है। जब उसे अहसास होता है कि आरध्या कों सांस लेने मे दिक्कत हो रही है तो उसे किश करना छोड़ देता है।
आरध्या अपनी सांसों कों काबू करने लगती है तो धनंजय उसे अपनी सीने से लगा कर बगल मे लेट जाता है और धीरे धीरे उसकी पीठ कों सहलाने लगता है !! वो खुद बेहद शांत हो चुका था जब से आरध्या उसके करीब आयी थी। कुछ पहले से लेकर अब तक जो भी कुछ आरध्या के साथ उसका बिता। वो पल सिर्फ सुकून से भरा हुआ था उसके लिए। आरध्या का करीब होना उसे सुकून पहुँचता है।
आरध्या जब शांत हो जाती है तो अचानक धनंजय कि चीख निकल जाती है। जब वो मुड़ कर देखता है तो आरध्या उस पर झुकी हुई किसी जंगली बिल्ली कि तरह घूर रही होती है। धनंजय का हाथ गर्दन पर चला जाता है।
कुछ देर पहले जब धनंजय आरध्या के खूबसूरत ख्यालों मे था। तब तक आरध्या खुद कि सांसों कों शांत कर चुकी होती है। चुकी धनंजय ने हमारी आरध्या कि मर्जी के बगैर उसे किश किया तो हमारी आराध्या कैसे चुप रहती। बस उसका चेहरा धनंजय के गर्दन के पास था। उसने भी अपने दाँत इस तरह उसके गर्दन पर गराये कि धनंजय कि चीख निकल गयी।
आरध्या घूरती हुई धनंजय से कहती है, दोबारा पंगा मत लेना मुझसे ठाकुर !! धनंजय अपने दाँत कों कीचते हुए कहता है, " ठकुराइन !! तुम्हें तो मै.....!!
आरध्या भी कहती है, " तुम्हें तो मै!! क्या ठाकुर !! कोई बदमाशी नहीं। उठो और बाहर जा कर टेबल पर लंच बॉक्स रखा हुआ है उसे लेकर आओ !! मुझे भूख लगी है !!"
धनंजय उसकी ये धमकी भरी बातें सुन कर मन हीं मन मुस्कुरा देता है। लेकिन उसे अपने चेहरे पर आने नहीं देता है। लेकिन उसकी आँखे शरारती जरूर हो चुकी थी। वो इस पल अपने सारे अंदर गम और घुटन कों भूल चुका था। आरध्या की बात सुनकर,उसे खुद पर खींच लेता है, जिससे एक बार फिर वो दोनों बेहद करीब आ जाते है। धनंजय उसके चेहरे पर आयी जुल्फों कों कान के पीछे करते हुए कहता है, " मेरी जंगली बिल्ली !! तुम्हारी इस धमकी पर तो मै कुछ भी कर जाऊ !!"ये कह कर उसके नाक कों काट लेता है और उठ कर बाहर चला जाता है। "
आरध्या अपने मन मे कहती है, इसे जरूर सममोहन आता है। इसके सामने आते हीं मेरी बोलती बंद हो जाती है और मै सममोहित हो जाती हूँ। इससे बच कर रहना होगा। वो खुद मे इस तरह खोयी हुई बातें कर रही होती है कि धनंजय उसके पास आकर खड़ा होकर उसकी बातें सुनता रहता है लेकिन आरध्या कों पता नहीं चलता है।
फिर खाना का बॉक्स टेबल पर रख कर हल्का उसकी ऊपर झुक जाता है। आराध्या कों अपने गर्दन पर गरम सांसे महसूस होने लगती है। वो मन मे कहती है, "आ गया सममोहित ठाकुर !! आँखे बंद रखना आराध्या नहीं तो फिर इसकी संममोहन मे आ जाएगी!!" वो अपने मन के ख्यालों मे खोयी हुई थी की धनंजय की कठोर और कशिश से भरी आवाज़ उसकी कानों मे आती है, " क्या तुम अब भी सममोहित हो रही हो !! मेरी ठकुराइन!!"!!
आराध्या उसकी ये बातें सुनकर झट से अपनी आँखे खोलती है और सीधे उसकी तरफ मुड़ जाती है। उसके मुड़ते हीं उसके होंठ धनंजय के होठो से मिल जाते है। क्योंकि धनंजय अब भी उसकी गर्दन के पास झुका हुआ था और उसे अंदाजा नहीं था की आराध्या उसकी बात पर इस तरह से प्रतिक्रिया करेगी।
दोनों के होठो आपस मे मिले हुए थे और दोनों मे से कोई प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था। ना वो अलग हीं हो रहे थे... ना उससे आगे हीं बढ़ रहे थे। आरध्या अपनी बड़ी बड़ी पलकों कों बार बार झपका रही थी और धनंजय उसकी बड़ी बड़ी खूबसूरत आखों मे खोया हुआ था।
तभी आराध्या खुद कों उससे अलग कर पीछे हटती है। जो धनंजय कों पसंद नहीं आता है। और वो उसे घूरते हुए, उसके पीछे किये हुए सर कों अपने हाथों मे थाम कर उसके होठो पर झुक जाता है और अपनी आँखे बंद किये हुए उसके होठो कों बेहद गहराइयों से चूमने लगता है।
वो चूमते हुए आराध्या कों बिस्तर सुला देता है। वो उसे चूमने मे इस तरह खो जाता है की ज़ब आराध्या उसके सीने पर मारने लगती है। तब उसे अहसास होता है की उसे सांस लेने मे दिक्कत आने लगी है। धनंजय उसके होठो कों छोड़ देता है और अपने चेहरे कों उसके गर्दन मे छिपा लेता है।
आरध्या खुद की सांसों कों संभालने लगती है और अब वो धनंजय कों खुद से अलग होने कों कहती..... की उससे पहले हीं धनंजय उसकी गर्दन मे अपने चेहरे कों छीपाये हुए कहता है, " थैंक यू !! ठकुराइन इस वक़्त मेरे पास आने के लिए!!"
धनंजय की बातें सुनकर आराध्या अपना मन बदल देती है और उसके हाथ धनंजय के बालों पर चले जाते है। जिसे वो आराम से सहला रही थी। उसने धनंजय कों रोका नहीं। शायद वो भी चाहती थी की वो उससे अपने दिल की बातें बताएं।
धनंजय कहता है, " जानती हो आठ साल का था ज़ब मालूम हुआ की अचानक एक रात मेरी माँ गायब हो गयी। लेकिन मेरे पिता कों उनके गायब होने से कोई फर्क नहीं पड़ा !! वो किसी औरत कों घर ले आये। आये दिन उनकी दादू और दादी से झगड़े होने लगे। उस समय मै अपने दोस्त अयान के साथ हमारे तीनों छोटे भाई बहन का ख्याल रखने लगे। ज़ब दस साल का हुआ तो मेरे पिता गायब हो गए और बच गयी वो औरत जिसने हमारी जिंदगी नर्क बना दी और ज़ब मै पंद्रह साल का हुआ तो उसने हमारी जान छोड़ दी और अचानक चली गयी !! फिर आठ साल पहले वो हुआ जिसने मेरे वजूद कों हीं हिला दिया!!"
ये कह कर वो चुप हो गया। आरध्या की गर्दन, कंधा उसके आखों से गिर रहे आंसू से भींग रहे थे !! आराध्या आराम से उसके चेहरे कों अपने हाथों मे भर्ती है। दोनों की नजरें एक दूसरे से मिल रही होती है। लेकिन धनंजय की नजर झुकी होती है!!"
आराध्या उसकी झुकी पलकों कों हल्का उठ कर बेहद सिद्द्त से चूम लेती है और प्यार से कहती है, " इस ठाकुर की नजरें मुझे हमेसा गुरूर मे उठी हुई पसंद है। उसकी बिना बोले अपनी बातों की कहने की अदा पसंद है!!और सबसे बड़ी बात ज़ब अपनी दिल की गहराइयों मे मुझे शामिल किया है। अपने दिल का हालत बता कर मुझे अपने दिल के करीब किया तो पूरी बात बता दीजिये। इससे आपका दिल और मन दोनों हल्का हो जायेगा!!"
धनंजय उसकी आखों मे देखते हुए कहता है, " तो क्या तुम मेरी बात समझोगी!! क्या तुम मेरी सच्चाई जान कर मुझसे नफ़रत नहीं करोगी या मजाक नहीं उड़ाओगीं !!"
आरध्या उसकी आखों मे देखती हुई कहती है, " मै ऐसा कुछ भी नहीं करुँगी!!" लेकिन तुम ऐसा क्यों नहीं करोगी ठकुराइन?!!!"
आराध्या उसके इस सवाल पर कुछ देर ख़ामोश हो जाती है। ज़ब धनंजय कों लगता है की वो उसके सवाल पर खामोश हो चुकी है और अब जबाब नहीं देगी तो उदास होकर कहता है, " चलो खाना खाते है ! ये कह कर उस पर से उठने लगता है। तभी आराध्या उसे पकड़ लेती है।
धनंजय उसकी तरफ सवाल. भरी नजरों से देखता है। आराध्या कहती है, " बिना जबाब सुने हीं जाओगे ठाकुर !!"
वो भी हल्का मुस्कुराते हुए कहता है, " मुझे लगा की मेरी ठकुराइन का मन नहीं है जबाब देने का तो सोचा छोड़ दूँ!!" लेकिन तुम्हारी ठकुराइन का मन है जबाब देने का तो सुनोगे नहीं ठाकुर !!" अगर वो चाहती है की मै सुनु तो तैयार हूँ !!"
आरध्या उसकी निचे गिराती हुई उठ जाती है और कहती है, पहले खाना खा लो। फिर आज तुम्हारी ठकुराइन भी तुम्हें जबाब देगी अपने दिल से और तुम्हारे भी बातें सुननेगी !!
धनंजय कहता है, जो हुकुम मेरी ठकुराइन !! फिर वार्डोरोब से एक टीशर्ट और ट्रैक पेंट खुद के लिए और एक आरध्या कों निकाल कर देता है। आरध्या कहती है ये किसलिए!!
धनंजय उसकी कमर पकड़ कर खुद के करीब खींच लेता है और कहता है, " आज मै तुम्हें अपने जिंदगी के हर अच्छे और बुरे पल मे शामिल करुँगा !! उसके बाद तुम्हारी मर्जी की उसे कैसे रखती हो !!"
आरध्या कहती है, " मै समझ गयी, अब मुझे छोड़ो!!" धनंजय उसकी चेहरे के तरफ झुक कर कहता है, मन तो बिल्कुल नहीं ठकुराइन!! लेकिन क्या करुं !! भूख लगी है और तुम्हारे हाथ का खाना लाजबाब है !! कपड़े बदल लो !! आज हम यही रुकेंगे क्योंकि रात ज्यादा हो गयी। कल इस वार्डोरोब मे, मेरी ठकुराइन के कपड़े भी आ जायेगे !! और उस तरफ छोटा सा किचेन है तो पहले तुम कपड़े बदल लो। फिर खाना गरम करो। तब तक मै भी चेंज कर कर लूँगा !!"
आरध्या बिना कुछ बोले उसकी बात सिर्फ सुन रही थी। धनंजय उसे कुछ भी प्रतिक्रिया करते नहीं देखता है तो उसकी नाक कों खींच कर कहता है, "क्या हुआ तुम्हें !!ऐसे स्टेचू बन कर क्यों खड़ी हो !!"
आराध्या जल्दी से कपड़े लेती है और कहती है, " ओह्ह फिर से सममोहन !!" भाग आराध्या भाग!!"
धनंजय उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देता है।
आरध्या धनंजय के कपड़ो मै बेहद प्यारी लग रही थी। उसके टीशर्ट आराध्या एक कंधे से एक तरफ से गिरे हुए थे। जिससे उसके कंधे की तिल दिख रही थी। धनंजय उसे बेहद प्यार से देख रहा होता है। उसका दिल कर रहा था की उसके कंधे पर दिख रहे तिल कों जा कर चूम ले। लेकिन वो ऐसा कर नहीं सकता था।
आराध्या खाना गरम कर चुकी होती है और मुड़ कर देखती है तो उसे खड़ा पाती है। उसे घूरती हुई कहती है, " अगर मुझे ताड़ना हो गया हो तो चलो मेरी मदद करो!!"
वाहट ताड़ना !! धनंजय उसकी बातों पर जबाब देता है और उसकी मदद करने लगता है। आरध्या कहती है, " वाहट ताड़ना नहीं ठाकुर !! तड़ाना मतलब किसी कों लगातार देखना !!"
मै तुम्हें नही देख रहा था!!वो बच्चों की तरह कहता है। आरध्या उसकी बातों पर हंसती हुई कहती है, " नहीं !! नहीं आप कहाँ देख रहे थे !! वो कोई भूत देख रहा था। चलो खाना खाओ !! वैसे मुझे नहीं मालूम था की ऑफिस के साथ इतना अच्छा रूम भी होगा आपका !! जिसमे जरूरत की सारी चीजे मौजूद है !!"
धनंजय खाते हुए कहता है, " हाँ !! वो कभी कभी काम करते हुए यही रुक जाता हूँ तो कॉफ़ी पीने की इक्छा होती है। इसलिये छोटा सा किचन भी रखा है। वैसे खाना बहुत अच्छा बना है !! अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो मेरे लिए कम से एक वक़्त का खाना तुम अपने हाथों से बनाओगी। वो भी रोज नहीं, लेकिन कभी कभी !! क्योंकि तुम भी तो. काम करोगी!!"
वो मुस्कुराते हुए कहती है, " ये वादा तो नहीं करुँगी की कब और किस वक़्त का खाना आपके लिए बनाउंगी। लेकिन ये वादा जरूर करुँगी की, जब मेरे पास थोड़ा सा भी वक़्त होगा तो आपके लिए जरूर बनाउंगी। और किसी दिन बॉस ने मेहरबानी की और मुझे शाम कों जल्दी छोड़ दिया तो डिनर आपको मेरे हाथों का हीं मिलेगा !!"
दोनों एक दूसरे के साथ बेहतरीन पल कों जी रहे थे। खाना खाने के बाद, धनंजय प्लेट उठाने लगता है। तो आराध्या कहती है, " नहीं रहने दो !! मै कर लुंगी !!" क्यों तुम करोगी? तुम मेरे लिए कॉफी बना दो। तब तक मै बर्तन डिशबार मे डाल कर धो देता हूँ !!"
दोनों किचने मे जाते है। धनंजय बर्तन धो कर रखता है और आरध्या कॉफ़ी बना लेती है और उसे टेबल पर रख देती है। धनंजय आ कर उसके करीब बैठ जाता है की फिर उसकी नजर उसके कंधे के तिल पर जाती है। जिसे देख कर अब उससे रह नहीं जाता है और वो आराध्या से कहता है, सॉरी!!"
वो उसकी बात समझती और उससे कुछ पूछती। तब तक उसकी आँखे बंद हो जाती है क्योंकि धनंजय ने अपने होंठ उसके कंधे के तिल पर रख दिया था !!"
आरध्या बेहद लरजती आवाज़ मे पूछती है, " ये क्या कर रहे है ठाकुर !!" धनंजय अपने होठो कों उसके कंधे पर घुमाते हुए कहता है, " तुम्हारे जबाब का इंतजार कर रहा हूँ ठकुराइन !!"
आराध्या एक गहरी सांस भर्ती हुई कहती है, " मै आपसे प्यार नहीं करती ठाकुर !!" उसकी ये बात सुनकर धनंजय के होंठ खुद रुक जाते है। जिसका अहसास आराध्या कों हो जाता है और वो अपनी आँखे बंद कर लेती है.....।
धनंजय खुद कों उससे अलग कर के कहता है, " चलो सो जाओ!!" तभी आराध्या उसका हाथ पकड़ लेती है और कहती है, " मेरी तरफ देखिये ठाकुर !!" वो उसकी तरफ देखता है।
फिर आराध्या उसकी तरफ देखती हुई कहती है, " मेरी पूरी बात सुने बिना हीं जाने लगे ठाकुर !!" धनंजय मुस्कुरा कर उसके हाथों कों थाम कर बैठ जाता है और कहता है, " मै नहीं चाहता की मेरी ठकुराइन किसी दबाब मे कोई बात कहे या सुने !!"
" मै दबाब मे नहीं हूँ ठाकुर !! बस मुझे साफ साफ बात करनी की आदत है !! मै तुमसे प्यार नहीं करती है। या कहुँ मुझे नहीं समझ मे आता है की प्यार क्या है? लेकिन जब से तुमने मेरी मांग मे सिंदूर भरा उसी वक़्त से तुम्हारे लिए मेरे दिल. मे खास अहसास है। जैसे मै तुम्हें कभी दुखी नहीं देखना चाहती हूँ। तुमसे बातें करना पसंद है। तुम्हारे लिए कुछ करना पसंद है। दादू दादी सभी मुझे मेरे खुद के. हिस्से लगने लगे है। जैसे मेरे चाचा चाची, दीप्ती, तानिया। उसी तरह यहाँ का परिवार भी !! मुझे अच्छा लगता है तुमसे बातें करनी और तुम्हारी बातें सुननी !! लेकिन ये प्यार है या शादी का अटूट हमारा बंधन। ये मुझे समझ मे नहीं आ रहा है !!"
धनंजय उसकी बातों की गहराइयों कों समझते हुए कहता है, कोई बात नहीं की तुम्हें क्या समझ मे आ रहा है और क्या नहीं !! मेरी बात मानो तो इसे वक़्त पर छोड़ दो !! जिस दिन तुम्हें समझ मे आ जायेगा। उस दिन मुझे यकीन है की तुम किसी के कहे भी नहीं रुकोगी और मुझे बता दोगी !! अभी के लिए तुम इतना हीं मान लो की हमारा ये गहरा रिश्ता शादी की अटूट बंधन से जुड़ा है। जिसे तुम महसूस करती भी हो और उसे जीती भी हो !! मुझे मिल गया तुम्हारा जबाब !!"
आराध्या मुँह बनाती हुई कहती है, "लेकिन एक बात और कहनी है तुमसे ठाकुर !!" हाँ बोलो ठकुराइन! सुन रहा हूँ मै !!"
हम्म्म्म !! तुम्हारा मुझे यू बार बार किश करना मुझे अच्छा नहीं लगता तो तुम. अब नहीं करोगे !!"
धनंजय उसकी बात सुनकर कहता है, " कोशिश करुँगा लेकिन वादा नहीं करता !!" क्यों नहीं वादा करोगे !!" वो आराध्या की आखों मे देखते हुए कहता है, " क्योंकि जब तुम मुझे यू बड़ी बड़ी आखों से देखती हो और ये अपनी घनी पलकें बार बार झपकाती हो। साथ मे मेरे आगे शेरनी से बिल्ली बन जाती हो तो मुझसे रहा नहीं जाता और मै तुम्हें चूम लेता हूँ। जैसे की अभी करने वाला हूँ !!"
हहहहहह!! आराध्या कहती तब तक उसके होठो एक बार फिर धनंजय के कब्जे मे आ गए थे और फिर वो उसके होठो कों गहराईयों से तब तक चूमते रहा, जब तक उसे सांस लेने मे दिक्कत नहीं. होने लगी !!"
धनंजय उसके होठो कों छोड़ते हुए कहता है, " किश करते हुए सांस लो ठकुराइन !!"
कुछ देर बाद आराध्या खामोश धनंजय कों देखती है। वो खुद कों तैयार कर रहा होता है, अपना अतीत बताने कों !!" आराध्या उसकी बेचैनी देख कर उसका हाथ थाम लेती है और कहती है, " सोचो मत बस कह डालो !!"
धनंजय उसकी आखों मे देखते हूँ, वो सच बताता है, जिसने उसके वजूद कों छीन लिया था। जैसे जैसे वो अपनी बातें बताता जा रहा था। आराध्या की हैरानी बढ़ती जा रही थी। और इधर धनंजय का दर्द उसकी आखों से बयां होते जा रहा। ज़ब वो अपनी सारी बातें कह कर चुप होता है और आराध्या की तरफ देखता है।
आराध्या कहती है, कोई माँ इतनी गिरी हुई कैसे हो सकती है और कोई औरत खुद कों दुनिया के आगे गिराने के लिए इसलिये तैयार है क्योंकि उसे ठाकुर परिवार की इज्जत की धज्जियाँ उड़ानी है। क्योंकि उसने अपना चेहरा पुराना वाला बदल लिया है तो. उसे फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन चेहरा बदल लिया है। ये तो उसे मालूम है लेकिन तस्वीरे तो उसकी होगी। जिसको दुनिया देखेगी। उसे इस बात पर जरा भी संकोच नहीं है!! उफ्फ्फ ये औरत तो ना औरत है, ना माँ, ना पत्नी, ना बहन और...... क्या कहुँ शब्द कम पड़ गए मेरे तो।
मैंने तो आज तक किसी कहानियों मे भी ये सुना था की एक औरत सिर्फ बदला लेने के लिए खुद कों सरे बाजार लीनाम कर देगी। वो भी उस चीज के लिए जिस पड़ उसका कोई अधिकार किसी भी तरीके से नहीं है।
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