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Love without wish Chapter-42

Love without wish Chapter-42

उज्जैन..

सुबह की शुरुआत सबकी मोहब्बत भरी थी। रात की कहानी सबकी आखों से बयां हो रहा था। प्रथम की बाहों सोई अयानी को देख प्रथम मुस्कुराते हुए उसके माथे को चूम लेता है। अयानी उठ जाओ जान ! अयानी मुस्कुराते हुए आँखे खोलती है।
चलो साथ मे नहाते है फिर तुम दवा लेकर आराम करना क्योंकि अब मुझे निकलना होगा। सात दिन बाद जब सबकुछ ठीक होगा तब फिर हम साथ रहेंगे। " तो क्या आप जानते है की साथ दिन बाद सब ठीक हो जायेगा  "? आयानी ने उसकी बात पर सवाल किया।" नहीं ! लेकिन मुझे यकीन है बड़ी भाभी पर की सब ठीक हो जायेगा। इसलिये चलो। नहीं आप जाओ मै खुद चलु जाउंगी। हम्म्म ! मुझे ऐसा क्यों लग रहा की मेरी बीबी शर्मा रही है। तुम्हे मालूम है ना ! हमारे बीच शर्म का पर्दा कल रात को ही हट गया था, " उसने शरारत से अयानी को छेड़ा !" अयानी ने उसके खुले सीने मे फिर से खुद को छिपा लिया। दिल तो कर रहा है की तुम्हें छोड़ कर ना जाऊ और तुम्हें फिर से प्यार करुं लेकिन अभी जाना जरूरी है, कहते हुए उसे बाहों मे भर लेता है और वाशरूम की तरफ चला जाता है।


धनवी सोये हुए संकल्प को देख कर मुस्कुरा रही थी। प्रिंसेस अगर तुम मुझे युहीं देख कर मुस्कुराती रही तो देखना कही फिर से मोहब्बत ना हो जाये तुम्हें मुझसे। क्योंकि मेरा दिल फिर से मोहब्बत करने का कर रहा है। धनवी ने उसके सीने पड़ हाथ रखते हुए कहा, बिल्कुल नहीं ! अब उठिये और मुझे भी उठने दीजिये। देखिए सुबह हो गयी है, मोम डैड इंतजार कर रहे होंगे। क्या तुम उठ पाओगी। बिल्कुल क्योंकि रात मे ही आपने मुझे दर्द की दवा खिला दि थी। संकल्प ने हँसते हुए कहा, वो इसलिये क्योंकि मैं नहीं चाहता था की मेरे ना होने पर मेरी बीबी को परेशानी हो। क्या मतलब आपका संकल्प जी ! धनवी ने चौंकते हुए कहा। मेरा मतलब है धनवी जी की, मैं और प्रथम आज भोपाल निकल रहे है। वहाँ सब कुछ ठीक करने के बाद लौटेंगे। आराध्या को अकेले नहीं छोड़ सकते है। इसलिये चलिए निचे।


कुछ देर बाद चारों एक एक करके मिस्टर और मिसेस सिंह के पैर को छूते है। संकल्प ने नाश्ता करते हुए कहा, " 
आज से दादी और दादू के  साथ चाचा- चाची भी यही आकर रहेंगे। तुम दोनों इस बात का ख्याल रखना की बीना सुरक्षा के बाहर मत निकलना। जब तक वहाँ का मामला ठीक नहीं हो जाता है। तब तक आप सभी को सावधान रहने की जरूरत है। " मिस्टर सिंह ने कहा, तुम लोग फ़िक्र मत करो। उज्जैन हमारा शहर है और हमने कमीशनर से बात कर ली है। ड्राइवर भेज दिया है, अम्मा और बाबूजी के साथ साथ चौधरी और मिश्रा परिवार को भी लाने।

कुछ देर मे, पूरा परिवार आ जाता है। संकल्प और प्रथम ने कहा, " दादू ! आप फ़िक्र मत कीजिये। कोई ना कोई रास्ता जरूर निकल आएगा। तब तक आप सब यहाँ रुकिए और महाकाल की पूजा रोज कीजिये। अब हमें आशीर्वाद दीजिये। " दोनों पुरे परिवार से आज्ञा लेते है और निकल जाते है उज्जैन के लिये।

भोपाल..

अयान और ध्यान नाश्ते के टेबल पर बैठे हुए मुस्कुरा रहे थे। दीप्ती और तानिया ने उन दोनों के लिये नाश्ता बनाया और चारों एक. साथ नाश्ता करने लगे। तभी वसुधा और उसकी टोली बाहर आती है। उन चारों को नाश्ता करते देख मिसेस बिजलानी ने कहा, " आखिर दिखा ही दि इन लोगों ने अपनी औकात। अपने बड़े भाई को उस कल की आयी लड़की के लिये मक्खी की तरह निकाल कर भेंक दिया। एक बार भी अपने भाई को ना नाश्ता के लिये कहा और कॉफी पूछी।" वसुधा ने कहा, अरे छोड़िये मिसेस बिजलानी ! ये सब तो कल भी वैसे थे और आज भी वैसे ही है। वैसे बूढा बूढी और तुम्हारे माँ बाप नहीं. दिख रहे है। कही डर के मारे मर तो नहीं गए। या भाग गए।

वसुधा की बात पर दीप्ती कुछ कहती लेकिन अयान ने कहा, नाश्ता करो। कुत्तो का काम है भुकना। वैसे भी साथ दिन का सर दर्द है। इसलिये जस्ट इग्नोर करो।

अयान की बात पर धनंजय और रणवीर ने कहा, " तुम्हें नहीं लगता है की तुम ज्यादा बतमीजी कर रहे हो। " ध्यान ने नाश्ता करते हुए कहा, " बतमीजी अभी हमने की नहीं है और अगर ज्यादा शौख है की हम बतमीजी करे तो भी कर ही लेते है क्यों मझले भैया !" नहीं छोटे ! अभी वक़्त नहीं आया है। चलो मेरा नाश्ता हो गया है। अब तुम सब भी तैयार हो जाओ। इनदोनो की शादी की तैयारी के साथ साथ ऑफिस भी देखना है। क्योंकि जिस तरह से इन लोगों ने डेरा जमाया है हमारे घर मे , इनको देख कर कही से नहीं लगता है की इन्हें कोई काम धाम भी करना है।

वसुधा उसे कुछ कहती लेकिन कृष्ण राठौर ने हाथ पकड़ लिया और कहा, " आप को अपने बेटे की शादी पर ध्यान देना चाहिए। " उन चारों के जाने के बाद वसुधा ने उसे घूरते हुए कहा, "आपने मुझे क्यों रोका मिस्टर राठौर !" कृष्ण राठौर ने उसकी बाजु को पकड़ा और कमरे की तरफ ले गया। सभी उसके पीछे पीछे चले आये थे। वसुधा अब भीं गुस्से मे थी।

कृष्ण राठौर ने कहा, " आपने ध्यान दिया कुछ !" उसकी बात पर वसुधा का चेहरा सामान्य हो गया। क्या ध्यान देनी की बात आप कर रहे है। जिस दिन से आप और धनंजय आये है। सबसे ज्यादा अजनबी व्यवहार आराध्या का रहा है और जो लड़की एक पल भी अपने पति के बीना नहीं रह सकती थी। वो अपने ही पति की शादी करवा रही है।

उसकी बात पर रणवीर ने कहा, " हाँ ! तो इसमें कौन सी बड़ी बात है। एक साधारण स्त्री भी अगर अपने पति को किसी परायी स्त्री के साथ देख लेती है तो उसे बेहद तकलीफ होती है और वो अपने पति का साथ छोड़ देती है। ये तो. आरध्या ठाकुर ! इसने भी जब धनंजय को अंतरा के साथ देखा तो छोड़ दिया।"

वसुधा ने कुछ सोचते हुए कहा, " नहीं रणवीर ! मिस्टर ठाकुर ने सही बात कह रहे है। देखा नहीं इनलोगो ने दादा दादी और दोनों बहनो को यहाँ से कही भेज दिया। किसी दिन भी, एक सदस्य ने मेरे बेटे से अच्छे से बात नहीं की और वो. आराध्या ने तो हर वक़्त मेरे बेटे को ताना मारा और तो और कल उसने हाथ तक उठा दिया !"

कही ऐसा तो नहीं की उसे हम पर शक है। उसकी बात पर सभी गंभीर चिंतन की अवस्था मे आ जाते है।

आराध्या के गर्दन मे अपने चेहरे को घुसा कर धनंजय सो रहा रहा था। दोनों की आँखे नहीं खुली थी। लेकिन इनकी सुकून और मोहब्बत के दुश्मन बहुत थे। इसलिये धनंजय का मोबाइल बजने लगा। अपने मोबाइल की रिंगटोन सुन कर उसने नींद मे कहा, " ठकुराइन अपना फोन बंद करो !" आराध्या भी गहरी नींद मे थी क्योंकि रात मे धनंजय ने उसे बेहद थका दिया था। उसने कसमसाते हुए कहा, " नहीं ! तुम बंद करो ! मै नहीं उठुगी!" अरे वाइफी मे भी नहीं उठुगा! तो बजने दो हब्बी ! दोनों नींद मे एक दूसरे पर बॉल पास पास कर रहे थे और मोबाइल ने बार बार बज़ कर उनके नींद को तोड़ने की कसम खा रखी थी। धनंजय ने चिढ कर अपने हाथों को टेबल पर टटोलते हुए मोबाइल लिया और सर घुमा कर उनिंद मे, नंबर देखा। नंबर देखने के साथ ही उसकी आँखे बड़ी हो गयी और पूरी चादर खींच कर लपेटते हुए, जल्दी से फोन उठा लिया।

आराध्या को अहसास हुआ की उसके ऊपर कोई चादर नहीं है तो झटके मे आँखे खोलती है। एक बार खुद पर नजर देती हुई, बात कर रहे धनंजय को घूरती है। फिर पीछे से उसे पकड़ कर निचे बिस्तर पर गिरा देती है। अचानक उसके ऐसे करने से धनंजय हैरान रह जाता है। दूसरी तरफ आवाज़ आती है लेकिन इधर से उसने कह दिया, " टॉक टू लेटर  "!! आराध्या ने उस पर से चादर जैसे ही खींचा उसने चादर पकड़ ली और खुद के उसे भी चादर मे लपेट लिया।

अब आराध्या उसके ऊपर थी और वो उसके निचे। आराध्या उसे घूर रही थी और वो मुस्कुरा रहा था। " तनिक शर्म नाई है तुमको ठाकुर ! ईय का किये हो तुम। अब क्या हमरी जान लोगे। देखो हमारी का दुर्गति कर दि है। हमको मालूम होता है की नौकरी के नाम पर पहले डायनाशोर मिलेगा और उसके वो हमको की चटपट डकार लेगा तो हम कबहुँ ना आते। "

"अच्छा ! धनंजय ने मुस्कुराते हुए उसे थोड़ा और खुद के ऊपर दबा दिया। दोनों के बदन की छुवन उन्हें लुभा भी रही थी और गुदगुदा भी रही थी। ठकुराइन तुम जब शर्माती हो तो तुम्हारे मुँह से यही अंट शंट निकलता है। क्यों ? और वैसे तुम शर्मा क्यों रही हो। कहते हुए उसकी कमर के निचे अपने हाथ को घुमाने लगता है। " उसकी आखों की शरारत देख कर आराध्या ने चिढ कर कहा, " क्योंकि तुमको शर्म आती नहीं और हमें तुम अपनी तरह बेशर्म समझ लिये हो। अब हठो। ऑफिस का वक़्त हो रहा है और जनाब को बदमाशी सूझ रही है। "

"अच्छा जी ! उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। अगर हमने अपने आपको आईने मे देखा तो जीतनी हमारी बीबी ने अपनी हिंसकता का प्रमाण हमारी बदन पर दिया है। उतना अधिक तो हमने प्यार भी नहीं किया। " आराध्या ने उस की बात पर अपनी आँखे बड़ी कर ली। हे ! उमापति ! तुमको कोनो और नहीं मिला था, जो पूरी दुनिया मे हमरे लिये। इह नमूना भेज दियो हो। तनिक सुनो इनकी बातें। कोनो मरद अपनी मेहरारू को इस तरह से कहता है। हाय मेरी किस्मत !"

उसकी नौटकी देख कर धनंजय उसे घुमा कर निचे कर देता है। अचानक ऐसे करने से आराध्या चौंक जाती है। धनंजय ने उसे घूरते हुए देख कर कहा, " बहुते पकऱ - पकऱ करती हो तुम ठकुराइन ! रुको तुमको हमी बताय देते है। कहते हुए उस पर झुकने लगता है। " आरध्या उसके मुँह पर हाथ रख देती है। उसे ऐसे करते देख धनंजय चिढ कर उसे घूरता है। इशारे मे कहता है, हाथ हटाने को। आराध्या ना मे अपना सर हिलाती है। धनंजय ने अपने हाथों को उसके सीने पर रख कर हल्का दबा दिया। आराध्या ने जल्दी से हाथ उसके मुँह से हटा लिया और उसे घूरा। धनंजय अपने चेहरे उसके गर्दन मे छिपा लिया और अपनी मदहोश भरी आवाज़ मे कहा, " वाइफी ! महसूस करो ना ! तुम्हारे ठाकुर तुम्हारा प्यार चाहिए। महसूस नहीं कर रही हो !" आराध्या ने उस की बात सुनकर मुस्कुराते हुए, उस के होठो पर अपने होठो को रख दिया। एक बार फिर से दोनों अपनी मोहब्बत मे खो चुके थे।

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इधर कृष्ण राठौर की बात ने वसुधा को सोचने पर मजबूर कर दिया था।अंतरा के साथ वरुण ( अब मे वरुण को धनंजय नहीं वरुण बुलाऊंगी, ताकि समझने मे कोई परेशानी ना हो ) ने भी कहा, " हम ने तो इस पर ध्यान नहीं दिया।'क्योंकि एक दिन भी उस आराध्या ने पति समझ कर बात नहीं की हमसे। अब तो उन सभी ने अपने दादा दादी को भी यहाँ से भेज दिया। लेकिन अगर उन्हें सच्चाई मालूम हो गयी तो भी वो शांत कैसे है ? असली धनंजय को ढूढ़ ही नहीं रहे है। एक पत्नी हो कर वो आराध्या इतनी शांत कैसे हो सकती है।

वसुधा ने कहा, " नहीं मिस्टर राठौर मुझे नहीं लगता की ठाकुर परिवार के किसी भी सदस्य को हम पर शक है। अगर शक होता तो अपने घर के बड़े बेटे और सबसे चेहते बेटे को ढूढ़ने के लिये। सभी रात -दिन एक कर लेते। लेकिन एक करना तो छोड़ दो आप सब। किसी के चेहरे पर सीकन तक नहीं। सबसे जरूरी बात की हम सब को मालूम है की " उस दिन हमने जब धोखे से धनंजय को बुलाया था तो उसकी गाड़ी के ब्रेक फेल करवा दिया था। उन दिनों मेरे कहने पर वो हमेशा अकेले घुमा करता था। क्योंकि मैंने उस पार्टी के दिन ही तय कर लिया था की इसको मार डालूँगी। सबसे बड़ा कांटा धनंजय ठाकुर है। " फिर अपने एक हाथ की मुठ्ठी बना कर दूसरे हाथ की हथेली पर मारती हुई कहा, " सोचा नहीं था की उससे ज्यादा खतरनाक उसकी बीबी निकलेगी। अगर इसका अहसास होता तो पहले इसे ही खत्म कर देती। "

उसकी बात पर कृष्ण राठौर ने कहा, " तो आपको लगता है की ठाकुर परिवार को नहीं मालूम है की धनंजय मर चुका है और जो धनंजय बन कर रह रहा है, वो धनंजय नहीं आपका बेटा वरुण है !" आप ही सोच कर देखिए ना ! राठौर साहब :! मुझे तो जो दिखा वही मैंने आपको बताया। हम्म्म ! आपकी बातों मे दम तो है मिसेस सिंह, लेकिन ये भी बात सच है की हमने उसकी बीबी को बहुत हल्के मे ले लिया। यही हमसे चूक हो गयी। कुछ ऐसा सोचना होगा जिससे आराध्या हमारी मुठ्ठी मे आ जाये। "

तभी दरवाजे पर नोक होता है। वसुधा ने अंतरा को इशारा की। दरवाजा खुलते ही कृष्ण राठौर का  बेटा मेहुल. और उसके साथ अवनी दरवाजे पर खड़े थे। उन दोनों को देख कर, वसुधा अंदर आने को कहती है। एक बार फिर दरवाजा बंद हो. जाता है। अंतरा ने कहा, " एक मिनट मोम ! क्या आपने इस कमरे को चेक किया। कही यहाँ कोई कैमरा या फोन ना फिट हो और वो सब हमारी बात ना सुन रहे हो। "
वसुधा ने उसकी बात पर कहा, " नहीं मै इतनी पागल नहीं हूँ अंतरा। मैंने अच्छी तरह से चेक कर लिया.। " उसी बीच अवनी ने कहा और हाँ हर कमरा साउंड प्रूव है। इसलिये इस कमरे की आवाज़ दरवाजा बंद होने के बाद बाहर तक नहीं जाती है।

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धनंजय और आराध्या अपनी मोहब्बत के बाद बिल्कुल तैयार हो चुके थे अगली लड़ाई के लिये। धनंजय ने आराध्या से कहा, " अब तुम जरा इधर ध्यान देना वैसे तो तुम्हारे साथ अयान, ध्यान सब रहेंगे ही लेकिन खुद भी सावधान रहना। जब सभी इधर उलझें होंगे शादी मे, तब तक मै वसुधा के हर कर्मो के हिसाब का सबूत इक्क्ठा कर लूँगा और माँ पापा को भी निकाल लूँगा। "

" एक बात समझ नहीं आयी ठाकुर ! अब तक आपने माँ पापा को क्यों नहीं निकाला वहाँ से !" वो इसलिये ठकुराइन क्योंकि अगर मे ऐसा करता तो उनलोगों को यकीन हो जाता की मै जिन्दा हूँ या तुम सबको उनकी सच्चाई मालूम हो गयी है। अगर ऐसा होता तो माँ पापा को तो बचा लेता लेकिन दुश्मन हाथ से निकल जाते और धनंजय ठाकुर वार बेहद धीमे करता है। दुश्मन को अपनी मौत तक इस बात की खबर नहीं होती की उसकी मौत कैसे हुई। इसलिये मेरी ठकुराइन। यहाँ तुम शादी मे उन सभी को उलझा कर रखोगी। वहाँ मै माँ पापा को निकलने के साथ इनकी आखिरी कहानी खत्म करुँगा।

हालांकि ये मेरी प्लानिंग ह, हो सकता है कुछ और भी हो जाये। क्योंकि दुश्मन को कमजोर कभी नहीं समझना चाहिए। इसलिये प्लान बि भी साथ ले कर चल रहा हूँ और वो अभी बताऊंगा नहीं। कभी कभी सुना है ना तुमने की कुछ बातें बतायी नहीं जाती है।

वैसे मुझे एक बात मालूम हुई। आराध्या ने बेहद गंभीरता से पूछा, क्या मालूम हुआ ! उसकी गंभीरता को देख धनंजय ने भी बेहद गंभीरता से कहा, " यही की ! यही की.....!! " यही की क्या ठाकुर ! बताओं ना !आराध्या को चिढ़ता देख कर धनंजय ने तिरछी मुस्कान के. साथ कहा, " यही की तुम मुझसे भी ज्यादा खुंखार हो। पंद्रह दिन की दुरी मे, तुमने इस तरह से मुझे नोचा पटका है की सोच रहा हूँ अगर कभी छः महीना दूर रहा तो तुम क्या करोगी ! मुझे तो कच्चा चबा जाओगी !"

तुम्हारी तो ! छिछोरे कही के ! मैंने नोचा है तुम्हें और तुमने तो जैसे मेरी आरती उतारी है। बेशर्म इंसान ! एक तो मुझे पकड़ लेते हो तो छोड़ते नहीं हो ऊपर से मुझे परेशान कर रहे हो। कहती हुई उस के सीने पर मुक्के मारने लगती है। अरे बस बस ! मेरी शेरनी ! मै तो बस तुम से थोड़ी शरारत कर रहा था क्योंकि शायद कुछ दिनों तक ये पल ना आये। इसलिये थोड़ी मोहब्बत  जता रहा था। ऐसा मत कहो ठाकुर ! मै तुम्हारे बीना एक पल भी नहीं रह सकती। मै भी कहाँ तुम्हारे बीना जी पाता हूँ ठकुराइन। कहते हुए उसे अपने सीने से लगा लेता है। दोनों की आँखे बंद थी।

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वसुधा ने गंभीरता से सोचा और कहा, " मेरे पास एक तरकीब है, उस तरकीब से मै आराध्या को अपने इशारो पर नचा सकती हूँ। सभी ने उससे पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए आराध्या के नंबर पर कुछ भेज दिया।

कृष्ण राठौर और रणवीर सिंह ने कहा, तुम्हारे दिमाग़ मे क्या चल रहा है। वसुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, " जो डील मै धनंजय के साथ करना चाहती वही डील मै आराध्या के साथ करना चाहती हूँ। साथ ही साथ आप दोनों अपने लोगों को तैयार कीजिये। इस घर के. दामाद उज्जैन से भोपाल अकेले आ रहे है तो क्यों ना उनकी. खातिरदारी की जाये।

वसुधा की बात पर रणवीर ने कहा, " नहीं वसुंधा :! अभी इनके घर के. सदस्यों को हाथ लगाना मतलब सीधे तरीके से लड़ाई मोल लेना। एक बार वरुण और अंतरा की शादी हो जाने दो। तब तक तुम इस तस्वीर के सहारे, उस आराध्या से जो चाहे करवाओ लेकिन अभी किसी को हाथ मत लगाना। वैसे भी हमारे पास तुरूप का इक्का वसुंधरा और महेंद्र है। जब लगेगा की हमारा दाव नहीं चल रहा है। तब हम उनका इस्तेमाल करेंगे।

वसुधा ने तिलमिलाते हुए कहा, " लेकिन पता नहीं क्यों ? मुझे लगता ही की हमें ये काम करना चाहिए। शादी के नाम पर कही हमें ही जाल मे ना फंसा दें वो लड़की। क्योंकि अब तक तो उसने जो भी किया है। वो हमारी सोच से बिल्कुल अलग किया है। इसलिये मै चाहती हूँ की उसे घुटने पर लाने के लिये ये तस्वीर काफी नहीं होगा। जहाँ तक उसे समझी हूँ। जरूर इसका भी कोई तोड़ वो निकाल लेगी। "

तभी मुकुल और अवनी ने कहा, " आंटी ! अगर आपको ये शक है की आराध्या कब क्या कर सकती है तो हम संकल्प और प्रथम की जगह किसी कमजोर कड़ी को उठा लेगे। वो क्या है ना ! आप संकल्प सिंह और प्रथम को कमजोर समझ रही है। इसलिये आपने ये कह दिया। अगर इधर आपकी बात नहीं बनती है तो हम वो काम करके आराध्या को कमजोर कर देंगे। वैसे भी इस तस्वीर से ज्यादा पावरफुल तो वो काम आराध्या को कमजोर करेंगे। पार्टी वाला दिन याद है ना आपको। "


अवनी की बात पर अंतरा ने कहा, लेकिन उसने तो अपनी कमजोर कड़ी को उज्जैन भेज दिया है। फिर कैसे करेंगे। उसकी बात पर राठौर और सिंह ने कहा उसकी फ़िक्र तुम मत करो। वो हम पर छोड़ दो। लेकिन ये काम हमें तब करना होगा। जब हमारी पहली चाल कामयाब नहीं होगी।

वसुधा ने कहा, फिर ठीक है मै आराध्या को फोन करती हूँ।


इधर आराध्या और धनंजय एक दूसरे की बाहों मे सुकून से आँखे बंद किये हुए थे की तभी आराध्या के फोन पर लगातार बिप का मेसेज आता है। आराध्या फोन टेबल से उठाती लेकिन धनंजय उसे खुद से अलग नहीं करता है और खुद फोन उठा लेता है। फोन देखते हुए उसकी आँखे छोटी और आराध्या पर पकड़ ढीली हो जाती है।