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Love without wish Chapter-46

Love without wish Chapter-46

बीते छः महीने मे बहुत कुछ बदल चुका था। जहाँ धनंजय -आराध्या, तानिया -ध्यान, संकल्प -धनवी, अयानी - प्रथम का रिश्ता बेहतर बनता जा रहा था। वही अयान और दीप्ती के रिश्ते अच्छे नहीं चल रहे थे। दीपक और दीपा चौधरी के साथ साथ रिंकू और मुकेश मिश्रा अब उज्जैन रहने लगे थे। महेंद्र और वसुंधरा ने अपनी पुरानी गलती से सबको लेते हुए, गोपी और सुमती जी से माफ़ी मांग लिए थी। सब कुछ धीरे धीरे ठीक हो रहा था और कही ना कही एक नए तूफान आने की तैयारी हो रही थी।

धनंजय ने अपने पुख्ता सबूत दें कर वसुधा और उसकी टोली को जेल भेज दिया था। उम्र कैद वसुधा, रणवीर, वसुधा के माता पिता, को मिली और गैर कानूनी अपराध के लिये कृष्ण राठौर और उनके दोनों बेटे को तीस साल की सजा मिलिए। वरुण, अंतरा और बिजलानी परिवार को दस दस साल की सजा मिली। धनंजय ने अपने दुश्मनों से जंगल जीत लिए थी। अब पूरा ठाकुर परिवार सामान्य रूप से जिंदगी जी रहे थे।

सिंह परिवार अब भोपाल सिफ्ट कर चुके थे क्योंकि संकल्प को बिजनेस के सिलसिले मे बार बार उज्जैन से भोपाल आना जाना होता था।धनवी ने अब पूरी तरह से घर संभाल लिया था। लेकिन संकल्प और उसके सास ससुर उसे कोई काम नहीं करने देते थे। धनवी की तीन महीने की प्रेग्नेंसी थी इसलिये संकल्प उसका ज्यादा ख्याल रखा करता था। धनवी ने संकल्प के हाथों मे जब उसकी घड़ी दी तो उसके उसके हाथों को थाम अपने करीब कर लिया। धनवी शर्माने लगी तो संकल्प ने उसे छेड़ते हुए कहा, " अब क्यों शरमा रही है मिसेस सिंह। हम दोनों की बेशर्मी भरी प्यार की निशानी है आपके पेट मे !" धत संकल्प जी ! आ बेहद बेशर्म होते जा रहे है। संकल्प एक बार उसके माथे को चुमता है और बारी बारी से उसके पुरे चेहरे को चूमते हुए कहा, " अरे बेगम साहिबा ! जिसने किया शरम उसके फूटे कर्म ! मै क्यों शर्माने लगा। क्यों है ना मेरी प्यारी गुड़िया, कहते हुए उसके पेट पड़ हाथ को घुमा देता है। " आपको कैसे मालूम की ये आपकी गुड़िया है। हो सकता है ये मेरा राजकुमार हो। धनवी की बात पड़ संकल्प ने कहा, बिल्कुल नहीं बेबी डॉल ! ये मेरी गुड़िया ही होगी। कहते है पहली संतान बेटी हो तो बिल्कुल बाप की परछाई होती है। अब चलो तुम तैयार हो जाओ। तुम्हें तुम्हारे मायका छोड़ दू। अयानी और प्रथम के घर भी जाना है।


प्रथम और अयानी ठाकुर हवेली के पास घर लेकर रहने लगे। धनंजय और पुरे ठाकुर परिवार ने मना भी किया लेकिन प्रथम ने आराध्या को अपनी बात समझाया और आरध्या ने पुरे परिवार को समझाया। लड़की को शादी के बाद कम से कम इतना जरूर आना चाहिए की वो अपना घर कैसे संभाले। धनवी ने भी अपना घर संभाल लिया तो अयानी को भी अपना घर संभालना चाहिए। सब उसकी बात मान गए और अयानी और प्रथम ने ठाकुर हवेली से पंद्रह मिनट की दुरी पर एक घर ले लिया। उन्ही के आस पास संकल्प ने भी घर खरीद लिया।

प्रथम ने नाश्ता लगाते हुए कहा, बीबी ! जल्दी आओ यार ! तुम्हारे आलो के परांठे ठन्डे हो जायेगे। जब से तुम दोनों बहन प्रेग्नेंट हुई हो। तब से मेरी और संकल्प की बेंड बजा रखी है। धनवी के तीन और तुम्हारे ये चार महीने की प्रेग्नेंसी मे, हमारा ये हाल है तो महाकाल ही जाने नौ महीने तक हमारा क्या हाल करोगी। लाल रंग की कुर्ती मे, अयानी मुस्कुराते हुए आयी और प्रथम के होठो को चूमते हुए कहा, " चाहे जितना परेशान करुं लेकिन ये बात हम दोनों बहने जानते है की आप और संकल्प जीजू, हमारा हमेशा ख्याल रखेंगे। " अरे ये बात तो आपने बिल्कुल ठीक कहा साली साहिबा। संकल्प और धनवी ये कहते हुए  अंदर आ जाते है। प्रथम और अयानी दोनों ने मुस्कुराते हुए कहा, आओ ! आज आलू पराठा बना है। नहीं मै तो नाश्ता करके आया हूँ। आप लोग धनवी से पूछ लो। क्या संकल्प जी ! मैंने भी अभी अभी नाश्ता किया है। मोम - डैड, मुझे वैसे आने नहीं देते। आप दोनों नाश्ता करो। फिर चलते है। रात को सब एक साथ डिनर करेंगे। धनवी की बात पर अयानी ने कहा, हाँ ! ये एक काम भाभी ने बिलकुल ठीक किया की महीने मे दो बार ठाकुर हवेली मे पूरा परिवार एक साथ मिल कर डिनर करते है। संकल्प ने कहा, आरू की बात ही अलग है। वो कुछ अलग ही सोचती है। प्रथम ने भी उसकी बात पर हाँ मे हाँ मिलाते हुए कहा, " हाँ ! ये बात तुमने ठीक कहा संकल्प क्योंकि मेरी भी बात सबसे पहले उन्हें ही समझ आया था।आज तो उज्जैन से मिसिर चाची और चौधरी चाचा चाची भी आने वाले है। प्रथम की बात पड़ संकल्प ने कहा हाँ क्योंकि महीने मे एक दिन वो भी दादू दादी से मिलने आते है। चारों मुस्कुराते हुए ठाकुर हवेली निकल जाते है।


आराध्या आज ऑफिस मे खोयी खोयी थी। क्योंकि दीप्ती और तानिया ने ऑफिस आना छोड़ दिया था। उन दोनों को शुरु से ही घर परिवार पसंद था इसलिये उन्होंने ऑफिस छोड़ घर संभालने का फैसला लिया। लेकिन आराध्या को धनंजय ने काम नहीं छोड़ने दिया। जब वसुधा का मामला हुआ था। तब धनंजय ने बेहद करीबी से आराध्या के काम करने के तरीके को देखा था। उसे महसूस हुआ की थोड़ी और मेहनत करने से आराध्या बेहतरीन बिजनेस वीमेन बन जाएगी क्योंकि उसके आईडीया और किसी भी चीज को समझने की शक्ति बेहतरीन थी। जिसका कायल धनंजय था। उसने अपने ही केबिन मे उसके भी केबिन बनवा दी। आज आराध्या को बार बार किसी सोच मे डूबा देख, धनंजय ने कुछ पूछना चाहा लेकिन काम और एक के बाद एक मीटिंग के कारण वो पूछ नहीं पाया।

लंच के वक़्त जब ध्यान उनके केबिन मे आया क्योंकि लंच के वक़्त अयान, ध्यान, प्रथम, संकल्प चारों उन दोनों के साथ लंच करते है। जब चारों कमरे मे आये तो धनंजय के साथ साथ वो भी आराध्या को देख रहे थे। जो एक नोट बुक पर काफ़ी देर से सिर्फ गोल गोल आकृति बना रही थी।
अयान ने इशारे मे धनंजय से पूछा की भाभी को क्या हुआ है? धनंजय ने अपने कंधे उचका दिए। तभी ध्यान ने कहा, भाभी ! भाभी ! ध्यान की आवाज़ सुन कर आराध्या अपने होश मे आया। अचानक ध्यान की आवाज़ से उसे ऐसे जगाया की वो चिहुक उठी और उसके हाथों से कलम छूट गया।

" अरे रे ! ठकुराइन ! ऐसा क्या हुआ जो तुम अपना सुद बुद खोयी हुई हो। " धनंजय की बात पर आराध्या ने कहा, ये बात तुम अयान से क्यों नहीं पूछते। आराध्या की बात पर धनंजय ने हैरानी से अयान को देखा। लेकिन आराध्या की नजर जब सबकी तरफ गयी तो उसने बात घुमाते हुए कहा ! कुछ नहीं। चलो। "

ठाकुर हवेली मे सबके जाने के बाद दीप्ती अपने कमरे मे मौजूद थी।
दीप्ती जो अयान के जाने के बाद अपने कमरे मे सोई हुई मोबाइल देख रही थी। उसे किसी से कोई मतलब नहीं था। वो बस आज कल खुद मे घूम रहती थी। ये बात तानिया और अयान ने गौर किया था। बाक़ी किसी के नजर मे ये बात नहीं आयी थी।तानिया अकेले किचने मे काम कर रही थी, नौकरो की मदद से क्योंकि आज पूरा परिवार इकठा हुआ था। शाम को सब का साथ मे डिनर था। इसलिये वो सब कुछ सबकी पसंद के हिसाब से बना भी रही थी और बनवा भी रही थी। तभी वसुंधरा जी आयी और उसे अकेले देख कर उन्होंने कहा, तानी बिटिया ! अकेले अकेले क्यों करने लगी मुझे बुला लेती। नहीं माँ ! नौकर तो थे ही फिर किसी की जरूरत नहीं पड़ी मुझे। वही तो मोम हम भी कह रहे है छोटी भाभी से, लेकिन ये माने तब ना। अयानी और धनवी भी किचने मे खड़ी होकर तानिया से बात कर रही थी। वसुंधरा जी ने कहा, दीप्ती कहाँ है ? दिख नहीं रही। उनकी बात पर तानिया ने जल्दी मे कहा, वो माँ उसकी तबियत ठीक नहीं है इसलिये वो आराम कर रही है।

अच्छा क्या हुआ दीप्ती को। मै देख कर आती हूँ। तानिया की बात पर वसुंधरा दीप्ती के कमरे की तरफ जाने लगती है। अयानी और धनवी भी फ़िक्र के साथ बढ़ने लगती है। तानिया उन तीनों को ऐसे जाते देख। उनको रोक देती है। नहीं माँ ! अभी आप जा कर क्या करेगी। मै गयी थी उसे देखने और उसे दवाई दें कर आराम करने के लिए कहा है। आप सब बाहर बैठिये ना ! मै सबके लिये चाय बना कर लाती हूँ। तीनों उसकी बात सुनकर रुक जाते है और वसुंधरा जी ने कहा, चाय हमारी साथ साथ अपनी भी लेती आना। नौकर सारे काम संभाल लेगे। तुम आओ। तानिया ने मुस्कुराते हुए कहा, हाँ अभी आती हूँ माँ ! जैसे ही वो तीनों जाती है। तानिया एक गहरी आह भर्ती है। जैसे उसकी बहुत बड़ी चोरी पकड़ती हुई बच गयी हो।

तानिया चाय बनाते हुए, कुछ देर पहले की घटना याद कर रही थी। जब वो दीप्ती से मिलने गयी थी। दीपि यहाँ क्या कर रही चल। आज पूरा परिवार इकठा होने वाले है। तू अपनी हाथ की खीर बना दें। तानिया ने ये कहते हुए दीप्ती का हाथ पकड़ा तो दीप्ती ने उससे अपनी हाथ को छुड़ा लिया।तानिया एक बार उसे तो एक बार अपने हाथ को देख रही थी। उसे समझ मे नहीं आ या की दीप्ती ने ऐसा क्यों किया? तानिया ने उसकी बाजु को पकड़ा और कहा, क्या हुआ तुझे ! देख रही हूँ कुछ समय से तेरे तेवर ही बदले हुए है। हुआ क्या है तुम्हें !"
दीप्ती ने एक बार फिर उससे खुद का हाथ छुड़वा और कहा, ऐसा क्या किया है जो तुम ऐसे बात कर रही हो। मेरी तबियत ठीक नहीं है इसलिये मुझे नहीं जाना है तुम्हारे साथ और वैसे भी आज सबको मालूम है की पूरा एक साथ डिनर करने वाले है तो जीजी को जरूरी था ऑफिस जाना। आज वो रुक नहीं सकती थी। पुरे घर को संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ हम दोनों की है। उसकी नहीं है। वो तो बड़ी बहु है इस घर की।
ये क्या फालतू के बकवास किये जा रही है तू। और ऐसा कौन सा पहाड़ टूट रहा है तुझ पर, जिसके लिये आरू का रहना जरूरी है। घर मे इतने नौकर चाकर है। हम जो भी काम करते है ख़ुशी से करते है। अगर ना भी करे तो कोई कुछ कहेगा नहीं और हमारे नहीं करने से घर के काम रुकेंगे नहीं। तो जब इतने नौकर होने के बाद आरू का रहना क्यों जरूरी है। ज्यादा टीवी सीरीयल देखने लगी हो तुम।
दीप्ती भी उस पड़ खींझते हुए कहा, " अच्छा ! जब ये बात है तो मुझे क्यों खींच कर ले जा रही हो। जब ऐसी बात है तो खुद जाओ और मुझे परेशान ना करो। वैसे भी तुम ठाकुर परिवार की बहू हो। मै नहीं हूँ। मुझे किसी से जरूरी बात करनी है। अब तुम जाओ। " तानिया का मुँह अपनी तरह का बन जाता है। उसे दीप्ती के दिए जबाब की ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसके कमरे से जाते जाते तानिया ने कहा, " ये मेरा तुम्हरा, ठाकुर परिवार, ये सब किसने सिखाया है तुमको। " ये तू सहीं नहीं जा रही दीप्ती। रोक ले अपनी सोच के घोड़े को। समय रहते घोड़े की लगाम खींच लेनी चाहिए नहीं तो वो ना जाने कहाँ लेकर चला जाये। ये कहती हुई तानिया उसके कमरे से निकल जाती है।

इधर ऑफिस मे, आराध्या के मुँह से ये सुनकर सभी अयान को देखते है। अयान सबसे अपनी नजरें चुराने लगता है। धनंजय ने कहा, कोई कुछ बताएगा की हुआ क्या है। आराध्या ने कहा, " ये तो तुम्हें अयान भाई ही बतायेगे। " अयान ने बात को बदलते हुए कहा, किस बारे मे, मुझे बताना है भाभी ! मुझे तो मालूम नहीं है और शाम को दत्ता एंड सन के साथ हमारी बेहद जरूरी मीटिंग है तो पहले खाना खा ले बहुत तेज भूख लगी है। वो बैठ जाता है, लंच टेबल पड़। आराध्या फिर कुछ कहना चाहती है लेकिन धनंजय उसके हाथों को दबा देता है। सभी एक साथ लंच करने लग जाते है।

तभी प्रथम के मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन की आवाज़ आती है। खाते हुए उसकी नजर मोबाइल पर आये उस तस्वीर पर जाती है, जो उसके बॉडीगार्ड ने भेजा था। उस तस्वीर को देखते हुए प्रथम ने कहा, " आरू भाभी ! क्या ये लोग आपकी जान पहचान वाली है। " ये कहते हुए, वो मोबाइल बढ़ा देता है आराध्या की तरफ। अपनी उंगलियों को चाटते हुए, आराध्या उसके मोबाइल मे तस्वीर देखने लगती है। ये तो रॉयल होटल है ना हमारे शहर का फाइव स्टार होटल। इसमें दीप्ती किसके साथ बैठी हुई है। वसुधा की घटना के बाद, धनंजय के कहने पर प्रथम ने पुरे परिवार के पीछे सुरक्षा के लिहाज से कुछ आदमियों को लगा दिया था। उस तस्वीर को अयान ने भी देखा और कहा मुझे नहीं मालूम की दीप्ती किन लोगों के साथ आज कल मिलती जुलती है। तभी आराध्या ने तानिया को फोन किया।"  तानी ! तुझे मालूम है की दीप्ती की आज कल किन किन लोगों से मिल रही है. उसकी कुछ नई दोस्त बनी है। तुझे मालूम है। उधर से तानिया ने आराध्या के. सवाल पर कहा, " नहीं मालूम मुझे आरू। आज कल वो मेरे साथ ना रहती और ना सीधे मुँह बात करती है। हम्म्म !  अच्छा ठीक है। धनवी और अयानी आ गए है क्या ! हाँ सभी आ चुकी है। ठीक है फिर मै आती हूँ। ध्यान रखना ! बाय ! बाय !"

अयान परेशान होकर बार बार दीप्ती को फोन कर रहा था। लेकिन दीप्ती उसके फोन को बार बार काट रही थी। उसे समझ मे नहीं आ रहा था की दीप्ती का व्यहार बीते तीन महीने मे बिल्कुल बदल गया था। प्रथम उसके केबिन मे आता है। प्रथम को देख अयान खुद को समान्य करते हुए कहा, " अरे यार :! आ.. ना.. क्या बात है ! कुछ काम था !" प्रथम उसे बीना कुछ कहे, उसे खींच कर गले लगा लेता है। अयान की आँखे बंद हो जाती है। उसे इस वक़्त अपने की बहुत जरूरत थी। प्रथम ने उसे गले लगाते हुए कहा, " क्या हम इतने दूर हो गए की तू अपनी समस्या भी हम तक नहीं पहुंचने देता।" नहीं यार ऐसा कुछ नहीं। जब मुझे नहीं मालूम की समस्या क्या है तो किसी और से क्या कहु। "
अयान की बात सुनकर प्रथम उसे खुद से अलग करता है। अयान को कुर्सी पर बिठा कर फिर खुद उसके सामने बैठ जाता है। अब बता बात क्या हुई ! प्रथम ने सवाल पूछा। अयान अपने एक हाथ को ना मे घुमाते हुए कहा, " क्या बताऊ की बात क्या है ? पांच महीने से दीप्ती के व्यहार मे बहुत बदलाव आने लगा है। शुरू मे तो मुझे लगा की ठीक है। इतना कुछ बिता है तो शायद उसकी वजह से वो थोड़ी परेशान हो गयी होगी। लेकिन अब तो ऐसे व्यवहार करती है जैसे, मै उसका दुश्मन हूँ।
अयान की बात सुनकर प्रथम ने कहा, तू परेशान मत हो। सब ठीक हो जायेगा। मै मालूम करता हूँ की आखिर दीप्ती भाभी किनसे आज कल मेल जोल बढ़ा रही है। कुछ तो जो हमारी नजरों से छूट चुकी है।


धनंजय जो शाम की मीटिंग को करने के बाद अपने केबिन मे आता है और आराध्या को सीधे अपनी गोद मे उठा लेता है। उसके अचानक ऐसा करने से आराध्या हैरान हो गयी। ठाकुर ! ये क्या तरीका है। हमें घर भी जाना है। तब तक धनंजय उसे कमरे मे ले आता है और उसे अपनी गोद मे लेकर बैठ जाता है। आराध्या उसे घूरती है। धनंजय अपने चेहरे को उसकी गर्दन मे घुसा देता है। ठाकुर ! अभी तुम्हारे अंदर कोई रोमांस का कीड़ा जगा ना तो मै तुम्हें बिल्डिंग से निचे फ़ेंक दूँगी । " ठकुराइन ऐसी धमकी कौन देता है यार ! तुम कभी बीना मार पीट के बात नहीं कर सकती हो। " तो क्या तुम कभी इल्लू इल्लू करना नहीं छोड़ सकते हो।
अच्छा छोड़ो और बताओं क्या बात है। आज पहली बार मैंने अपनी ठकुराइन को इस तरह विचलित देखा है। धनंजय ने गंभीरता से कहा। सुबह से वो आराध्या को नोटिस कर रहा था। उसे लगा घर जाने से पहले वो समझ ले की बात क्या है?
आराध्या ने बेहद गंभीरता से सुबह हुई अयान और दीप्ती के बीच की बात बतायी। मुझे नहीं समझ आया ठाकुर की दीप्ती ने इतनी बड़ी बात अयान भाई से कैसे कह दी। कह दिया तो कह दिया लेकिन उसे उसका अफ़सोस तक नहीं है। उनके जाते ही वो ऐसे सामान्य हो गयी जैसे अयान भाई उसके कुछ लगते ही नहीं। तुम्हें मालूम है की पांच महीने से दोनों के बीच प्यार का रिश्ता नहीं बना है। अगर अयान भाई कोशिश भी करते है तो वो बिन सिर पैर की बातें लेकर बोलना शुरु कर जाती है।फिर आराध्या ने चिढ कर कहा -

" एक डायलॉग हो गया है सभी लड़कियों का, क्या तुम्हें प्यार मेरे जिस्म से है। अरे भाई ! ये डायलॉग तब मारो ना ! जब तुम अविवाहित हो और तुम्हारा प्रेमी तुम्हें संबंध बनाने के लिये फ़ोर्स कर रहा है। ये सवाल तुम तब करो ना जब तुम विवाहित हो और तुम्हारा और तुम्हारे पति के बीच प्रेम संबंध नहीं है। फिर भी वो तुम्हें भोग्य की चीज समझता है। तब करो सवाल ! तब चीखो उस पर ! लेकिन उस इंसान से सवाल कैसे कर सकती हो। जिस मे तुम दोनों को प्यार है और तुमदोनों ने पहली बार संबंध अपनी मर्जी से बनाया। ठीक है ! हम लडकियाँ कभी कभी चिढ जाती है और इन सबसे भागने लगती है। लेकिन इस मे बातें आराम से और प्यार से की जा सकती है। आपका जीवन साथी आपसे प्यार करता है तो आपकी बात समझेगा। नई शादी शुदा जीवन का यही भाव या कह लो रस होता है। उसके बाद धीरे धीरे अहसास साथ रहते है।"

"तो परेशानी क्या है ठकुराइन ! हो सकता है दीप्ती का मूड स्विंग होता हो। या वो परेशान होगी। मै अयान को समझाऊंगा।"आराध्या ने उसके गालों पर हाथ रखते हुए कहा," ओ भोले भंडारी ! जरा सब्र करो। यहाँ अयान भाई को क्यों समझाओगे। बात करुँगी मै इस छुटकी छिपकली से। पांच महीने एक कमरे और एक बिस्तर, दो प्यार करने वाले करीब ना आये। और ये काम एक पति करे तो बीबी कहेगी की बाहर मे कोई मिल गयी है और यही काम एक पत्नी करे तो पति को क्या सोचना चाहिए। उस पर पत्नी कह दें की तुम्हें तो जिस्म से मतलब है। बताओं कैसे लगेगा उस इंसान को, जो दिल से प्यार करता हो। "

धनंजय ने बेहद गंभीरता से बात सुनी और कहा, " लेकिन ठकुराइन ! क्या इस संवेदनशील मुद्दे पर तुम्हारा या मेरा बात करना शी होगा। ये तो पति पत्नी के बीच आंतरिक मसला है। " आराध्या चिढ गयी और कहा, " हेय प्राणनाथ :! मेरा भेजा वैसे ही फिरा हुआ है तुम तो हमको सनकाओ मती। अरे काहे का पति पत्नी का मसला। ये और लम्बा गया तो ये दोनों खुद ही इस मसले को सड़े बाजार कर देंगे। जब दो लोग साथ रहने के बाद भी अपने मन की बात नहीं बता पाते है तो वही बातें कचरे की तरह मन के एक हिस्से मे जमा होती जाती है और एक दिन वही कचरा पुरे घर मे बदबू फेला देता है।

हमको तो इह नहीं समझ मे आता है की ये मन की बात मन मे रखने से कौन सा महान काम करते है। दीप्ती को कुछ परेशानी है तो सीधे बात करे ना अयान से। पति है उसका कोई पड़ोसी नहीं है। अरे कौन सा इसको टीवी सीरियल की अनुपमा, तुलसी, या अक्षरा घुस गयी है इस छुटकी मे की छोटी से छोटी बात को अपने मन मे रख कर ना जाने, कौन सा टीआरपी बटोरेगी।

हम बता रहे है तुमको ठाकुर ! एक बार हमको सीरीयल वाले मिल जाये तो हम उनसे पूछे की मन मे बात रख कर कौन सी पानीपत की जंग, उनकी हीरोइन जीत जाती है और उससे क्या उखाड़ लेती है। अरे जिंदगी है ठाकुर। यहाँ रिटेक नहीं होता है। टीवी की दुनिया मे रिटेक होता है लेकिन ये दुनिया हकीकत की है। यहाँ बात बिगड़ने से पहले बोलना पड़ता है।मन मे छिपाने से रिस्ते बिगड़ जाते है और सब कुछ बिखड़ जाता है।

पता नहीं ये छुटकी बेल बुध्दि किसकी संगत मे पड़ गयी है और कौन सा खिचड़ी पका रही है। कम बुध्दि के लोग मे भटकाव की संभावना ज्यादा रहती है ठाकुर ! और दुख की बात ये है ऐसे बुद्धि के लोग खुद को बेहद काबिल समझते है। आराध्या अपनी बात कह कर। चुप हो जाती है। धनंजय उसे सीने से लगा लेता है। उसके माथे को सहलाते हुए, उसने कहा, " तुम कैसे बात करोगी ये तुम देखो ठकुराइन और मुझे कैसे इस बिगड़े हालत मे अपने दोस्त का घर बचाना है। ये मै देखता हूँ। अब चलो। घर पड़ सब इंतजार कर रहे होंगे।