Love without wish Chapter-38
- 29 June, 2026
पुरे भोपाल शहर से लेकर बिजनेस की दुनिया मे, हर जगह धनंजय और अंतरा की खबरें और वो सारी तस्वीरे वाइरल हो रही थी। बार बार सभी के फोन कॉल ने, पुरे परिवार को परेशान कर दिया था।
आराध्या जो ऑफिस से निकली नहीं थी। बस केबिन मे बैठी किसी सोच मे डूबी हुई थी। तभी अयान, ध्यान और प्रथम उसके पास आते है। केबिन मे, उनको कदमों की आहट सुनकर वो आँखे खोल देती है।
सबके चेहरे पर परेशानी दिख रही थी।लेकिन आराध्या बेहद शांत आँखे बंद किये हुए, अपने दोनों हाथों को आपस मे क्रॉस किये, कुर्सी पर सर टिका कर बैठी हुई थी। ध्यान ने अधीर होते हुए कहा, " माफ कर दीजिये भाभी ! हमने तो सपनो मे भी नहीं सोचा था की ऐसा कुछ हो जायेगा। इस बार तो उन्होंने हर मर्यादा लाँघ दि !" अयान और प्रथम ने गुस्से मे कहा, आप घर चलिए। हम उससे पूछेंगे की आखिर ऐसा करने की उसे हिम्मत कैसे हुई। आराध्या किसी की बातों का कोई जबाब नहीं देती है। फिर खुद को ठीक कर, लैंडलाइन से फोन कर के कहा, " नरेश चार कप कॉफी लाना। " ये कह कर वो उन तीनों को देखने लगती है। उसे इतना शांत देख कर अयान ने हैरानी से पूछा, " इतना कुछ होने के बाद कोई औरत शांत नहीं बैठती और ना चुप रहती। वो तो समाज, पुलिस और ना जाने क्या क्या कर लेती है। अगर अपने पति को ऐसे किसी औरत के देख ले तो, बिल्कुल शांत नहीं बैठती है। लेकिन आप इतनी शांत कैसे है? "
आराध्या जो खड़ी होकर खिड़की से बाहर की तरफ देख रही थी। अयान की बात सुनकर, उसकी तरफ मुड़ जाती है। उसके चेहरे पर इस वक़्त बेहद गंभीरता थी।
" अयान भाई ! मै उन औरतों को मुर्ख नहीं कह रही हूँ। लेकिन आपने जो बातें कही, वो सिर्फ मुर्ख औरते करती है। हम खुद मौका देता है की, " हमारे पति! हमारे साथ धोखा करे और हम उसे माफ कर के, उस दूसरी औरत को दोष दें देते है की मेरा पति तो भोलाभाला है और उसे दूसरी औरत ने फंसा लिया। क्यों पति, पांच साल का छोटा बच्चा है, जिसे किसी दूसरी औरत ने फंसा लिया और ऐसे पति को माफ कर देते है।
ये समझना और सोचना गलत है की एक औरत दूसरी औरत का घर तोड़ती है। घर मजबूत हमारा नहीं होता तो दोष हम आंधी -तूफान को नहीं दें सकते। की आंधी आयी और हमारा घर टूट गया। हमारा घर मजबूत नहीं था, इसलिये टूट गया, ये बात हम कभी नहीं मानते है। शादी मर्द और औरत दोनों की होती है। फिर पति, बॉयफ्रेंड धोखा देता है तो हम उसे माफ कर देते है। लेकिन वही धोखा अगर हम दें, हम पत्नी और गर्लफ्रेंड दें.... तो क्या वो मर्द, हम पत्नीयों के लिये लड़ने आएगा।
जिस तरह, जब हम अपने पति या बॉयफ्रेंड को किसी और औरत या लड़की के साथ देखते है। तो क्या करते है , अयान भाई !! हम पहुंच जाते है, झाड़ू, डंडा, थाना, समाज, परिवार, दोस्त यारों को ले कर। अपने पति को पाने के लिये और दूसरी औरत से उसको हमेशा छुड़ाने के लिये। आप आये दिन सुनते है। अमुक जगह एक पत्नी ने अपने पति को दूसरी औरत के साथ पकड़ा। दूसरी औरत को पीटा... रोई.. गायी... मुहल्ला थाना किया और पति को ले गयी। फिर अपने आप को, तरह तरह, अच्छी अच्छी व्यवहार कर के पति को रिझाने लगती है। ताकी उसका पति, फिर किसी दूसरी औरत के पास ना जाये। परिवार और समाज वाले भी उस औरत को यही समझा कर जाते है, " दो बच्चा है, परिवार है, अपने व्यहार को बदलो और अपने पति को वश मे करो। ताकि वो कही और मुँह ना मारे। जैसे पति ना हो गया... पालतू जानवर हो गया। यही देखते और सुनते आये है ना! आप भाई।
उसकी बात पर तीनों सर हाँ मे हिला देते है। जिसे देख कर एक बार फिर से वो मुस्कुरा देती है। तब तक पियून कॉफी ले आता है। चारों कॉफी पीते है। आराध्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "
भैया ! हमारी सभ्यता, धर्म और इतिहास मे, स्त्री को पाने के लिये पुरुष को परिश्रम करना होता था। उनको खुद को इतना निपुण करना होता था की स्त्री उनका चुनाव कर ले। इसलिये स्वयंवर किया जाता था। जहाँ एक स्त्री के लिये कम से कम बीस पुरुष होते थे और उसमें वो. चुनाव करती थी। लेकिन अब देखिए हालात की हम पति का चुनाव नहीं कर सकती। और जो मिलता है, उसके साथ रहते हुए, हम इस डर मे जीती है, की कब कोई दूसरा आ कर उसका घर उजाड़ दें। बस घर ना उजड़े, उसके लिये स्त्रियों ने ही अपने ही सम्मान को खत्म कर दिया।
एक बात बताईये।अगर आज आपकी भाई की जगह मै होती और मुझे किसी और मर्द के साथ देखा जाता और मै भी यही कहती की, मै अपने पति के. साथ खुश नहीं हूँ। इसलिये मैंने ये कदम उठाया है। दिल पड़ हाथ रख कर बताइये की, " मेरी इस बात पर, क्या मेरा पति आकर ये कहता की, " मेरी पत्नी भोली है और उसे दूसरे ने फंसाया है। या मेरे पति को, परिवार और समाज, ये समझता की, " वो अपना व्यहार बदले। अपने पत्नी को वश मे करे और परिवार बिखरने से बचा ले। "
बताओ ध्यान तुम या कोई ऐसा करता।ध्यान सर झुकाये उसकी बात पर अपना सर हिला देता है। क्योंकि आराध्या की बात एक करवी हकीकत थी। जिसे कोई स्वीकार नहीं कर सकता।
आराध्या ने फिर कहा, " अगर पति को मैंने किसी दूसरी महिला के साथ, ऐसी परिस्थिति मे देख लिया ! पकड़ लिया। तो उस को फिर से पाने के लिये, मै क्यों लड़ाई करुं । वो जब धोखेबाज निकल गया।
तो अपने सम्मान को खत्म कर के, उसे माफ़ी क्यों दू ! सिर्फ इसलिये क्योंकि घर टूटने की जिम्मेदारी हम औरतों पर होती है। मैंने देखा है, की कुछ औरते तलाक का केस खुद की मुक्ति के लिये नहीं बल्कि पति को सबक सिखाने के लिये करती है। क्यों? सवाल ये है क्यों उसे वही पति चाहिए... जिसने उसके रहते हुए ही किसी दूसरे के साथ अपने संबंध बनाये।अरे वो कोई बच्चा नहीं था। जब तक उसने मौका दिया नहीं, तब तक कोई तीसरी कैसे आ गयी हमारे बीच। हम दोनों अभी एक रिश्ते मे थे और एक रिश्ते मे रहने के बाबजूद दूसरे रिस्ते को जोड़ना और उसमें रहना। ये चाहे मर्द करे या औरत दोनों ही गलत है।अगर पति अपनी पत्नी से खुश नहीं है तो उसे तलाक दें दें और पत्नी भी ये समझे की रिश्ता मोहब्बत पर टिकती है। मजबूरी पर नहीं।इसलिये सीधे खुद को उस मर्द से अलग कर ले। जो उसके रहने पर भी किसी और के साथ अपने रिश्ते को बनाया।
लेकिन औरते ,ये कहाँ सोचती की... उन्हें तो बस दूसरी औरत डायन लगती है। जब औरते खुद अपने पति को उसकी गलती पर उसे दोष नहीं देती और उसे सजा नहीं देती तो पति क्यों नहीं बार बार ये गलती करे। ये पति हमारी जिंदिगी मे, उस पार्टी की तरह है, जो 70 साल से वादे करते आये है लेकिन हमारी हालत वैसी की वैसी है। महिला आरक्षण आये या कुछ भी मिले। हम इस सामाजिक सोच से कैसे खुद को निकाल सकते है। इसका रास्ता तो नजर ही नहीं आता है।
अरे दुनिया मे, और काम है... क्या एक मर्द के. पीछे जीवन बर्बाद करना वो भी तब जब उसने आपकी जिंदगी खराब कर चुका है ! . क्या अक्लमंदी है की हम भी वही करे। अरे कीचड़ से निकल कर ! फिर कोई नया आसमां ढूढ़ने मे वक़्त क्यों ना दें।
लेकिन हमारे समाज की परेशानी ये है की हम औरते इतना हौसला ही नहीं कर पाती। इसलिये बार बार पति द्वारा धोखा देने के. बाद भी... हम उन्ही के. साथ रहने की जिद्द करते है। इसलिये वो भी हमे उसी तरह इस्तेमाल करते है। हम ये कहा सोचते है की अगर उनको कोई मिल सकता है तो हमे भी कोई मिल सकता है। लेकिन लोग क्या कहेंगे, बच्चे, परिवार ! तो सम्मान को खत्म कर लेते है। उसके बाद सिर्फ रोना और रो रो कर अपना दुखरा सुनना। ये काम करते है।
आपको मालूम है भाई ! जब पति आवेश मे भी आप पर थप्पड़ उठाये.. तो आप लड़े बेशक नहीं। लेकिन सावधान हो जाये। नजरअंदाज और माफ ना करे। सिर्फ एक मौका सतर्क हो कर दें, " की दोबारा ऐसा ना हो...। जब तक एक बार फिर से वो इंसान भरोसे के लायक ना हो जाये.....।
लेकिन.. लेकिन... हम औरते, जब एक थप्पड़ मार खाती है तो ये सोच कर भूल जाती है की गलती से, गुस्से मे हुआ होगा। भाई दहेज की आग मे, वैसी ही लड़की जला कर मार डाली जाती है। जो छोटी और बड़ी घटना को इसलिये नजरअंदाज कर देती है.... सब ठीक हो जायेगा। परिवार ही तो है । हमारे समाज मे दो तरह की लड़ाई होती है... या तो घर से बाहर कोर्ट और थाने नहीं तो घर के अंदर आग लगा कर, या इतना मार मार कर...उसे मार या जला दिया जाता है। अगर किसी लड़की की मौत के जिम्मेदार अगर माता पिता , ससुराल वाले है तो उसके साथ साथ वो लड़की भी है। जब इधर भी मौत है और उधर भी मौत है... तो औरते वो मौत क्यों नहीं चुनती। जिसमे उनकी मर्जी शामिल हो। कम से कम मौत होगी तो ये सुकून होगा की ये मौत मैंने खुद चुनी है। किसी ने जबरदस्ती और धोखे से नहीं मारा है।
मै उन औरतों मे शामिल नहीं हूँ भाई :! कोई धोखेबाज है, तो उसे इसलिये माफ़ी नहीं दें सकती क्योंकि वो मेरा परिवार है और मेरा पति है। परिवार टूटने का जिम्मा, मुझ अकेली पर क्यों ? अगर आप मर्दो को मालूम हो की आप जिस महिला के साथ है। उसका संबंध किसी पर पुरुष से तो आप माफ़ी तो छोड़िये.... जलील करने का एक मौका नहीं छोड़ते है। फिर मै क्यों माफ करुं।
अगर मेरे पति को लगता है की वो मुझसे ज्यादा दूसरे के साथ खुश है। तो मै उसके पीछे नहीं भागूगी। बल्कि उसे ये कह कर छोड़ दूँगी की " कुत्ते को घी नहीं पचता है "!! अगर बेहतरीन हूँ तो अपनी काबिलियत पर बीना एक शब्द बोले, बीना चीखे चिल्लाये...... उसे उसकी औकात दिखाउंगी की उसने क्या छोड़ा है। लेकिन उसको कभी खुद की जिंदगी मे शामिल नहीं करुँगी।
अगर काबिलियत नहीं है, तो भी उससे खुद को अलग कर के, खुद को काबिल बनाउंगी। अगर ना भी बना सकी तो भी उसकी जिंदगी मे दोबारा नहीं जाउंगी। भाई ! पति है तो मै भी उसकी पत्नी हूँ। अगर मेरे ऊपर परिवार की जिम्मेदार है तो उसकी भी है। अगर उसे बेहतर मुझसे मिल गयी है तो रहे उसके साथ। लेकिन मेरे लिये अब वो अच्छा नहीं रहा, इसलिये मै नहीं रहुँगी और नहीं करुँगी माफ।
क्योंकि एक मर्द अपनी पहली पत्नी को मार सकता है, धोखा दें सकता है। उसकी जरूरत को अगर पूरा भी नहीं करता तो भी पहली पत्नी शिकायत नहीं करती।
लेकिन जब दूसरी वाली आती है तो आपके हर रग -रग से वाकिफ होती है। आप वो काम कभी नहीं कर सकते है, जो आपने अपनी पहली पत्नी के साथ किया था। आपकी दूसरी पत्नी, आपके लिये भींगी बिल्ली है तभी तक, जब तक पहली वाली पत्नी शेरनी की नजर है आप पर है । एक बार पहली पत्नी ने आपको छोड़ दिया तो याद रखिये... दूसरी वाली.... उस गलती की भी भरपाई करवां लेगी, जो आपने पहली वाली के साथ किया था। आपकी हालत... धोबी की कुत्ते वाली ना घर की ना घाट की.... दूसरी वाली आपके गले की वो हड्डी होगी, जिसे आप ना निगल पाएंगे और ना उगल पाएंगे। लेकिन ये होता तब है, जब पहली वाली आपको छोड़ कर चली जाये।
बस यही काम एक औरत नहीं कर पाती है। अगर धनंजय को अंतरा अच्छी लगी तो उनको मुबारक हो। मै जूठी चीज को ना हाथ लगाती हूँ और ना उसे खाती हूँ। धनंजय अब मेरे लिये ऐसे इंसान है, जो धोखेबाज है और उसे मै माफ नहीं करुँगी। "
तीनों आराध्या की बातें हैरानी से सुन रहे थे। ध्यान ने कहा, भाभी :! आपकी तरह अगर हर लड़की सोचने लगे तो हम मर्दो की दुर्गति तय है। फिर उनको मालूम होगा की औरत कमजोर नहीं होती।
ध्यान, अगर तुम मर्दो को साठ साल मे, लडकियाँ, औरत मिल सकती है तो हम औरतों को नहीं मिलेगा कोई। लेकिन हम ऐसा सोचती नहीं है। इसलिये भावुकता मे बंधी होती है।
आराध्या की बातों ने अंदर तक उन तीनों को झकझोड़ दिया था।आराध्या ने मुस्कुरा कर कहा, "
"सच ही तो है ये,बड़ी बड़ी बातें, समाज सुधारक सभी ने कुछ ना कुछ किया है, हम स्त्रियों के लिये। लेकिन क्या हम स्त्रियों ने खुद के लिये कुछ किया ? विचारणीय बातें है, विचार कीजिये ! एक जुटता पांच मर्दो मे दिख जाएगी आपको, लेकिन पांच स्त्रियों के बीच एक जुटता नहीं दिख सकती है। क्योंकि हमे जलन और ख़ुशी, बेहद उन फिजूल बातों पर होती है, जो वाकई अस्तित्व मे नहीं है। अगर जिंदगी की हकीकत को समझा जाये तो। हम दूसरी स्त्री की खूबसूरत से जलते है तो कोई हमारी झूठी तारीफ कर दें तो हम खुश हो जाते है। हकीकत है ये बातें। तस्वीरों मे , कलाकार,स्त्री के ख़ूबसूरत बनावट को बनाता है और उसकी तारीफ होती है। कभी तस्वीरों मे, स्त्री की शक्ति, उसकी बुद्धिमता को किसी ने दर्शाया !!नहीं ना ! क्योंकि एक तो हमें आदत नहीं ये देखने की, दूसरी हमने खुद को हमेशा शोपीस समझा है । फिर दूसरे से क्या अपेक्षा करना।
हम आदरणीय है तो उसे दूसरे से पहले हमें समझना होगा की हम आदरणीय है। हमे ये बताना होगा की हम भावना मे मुर्ख बनते है लेकिन होते नहीं है। मर्यादा हमारे बंधन अवश्य है, लेकिन बेड़िया नहीं है।"
'प्रथम भाई ! प्रेस कॉन्फ्रेंस को ठाकुर हवेली मे रखिये। अब तमाशा वसुधा ने शुरू की है तो खत्म मै करुँगी।' लेकिन भाभी ! भाई का क्या होगा ? आराध्या ने ध्यान की बात पर कहा, " वही होगा ! जो महाकाल ने तय किया होगा, ध्यान ! चलिए पता नहीं. घर पर क्या परेशानी खड़ी होगी। वहाँ दादी दादू है और उन लोगों से उलझना, उनके बस की बात नहीं है। आराध्या की बात सुनकर सभी घर की तरफ निकल जाते है।
इधर ठाकुर हवेली मे,
कृष्ण राठौर, अपने दोनों बेटों और अपनी गर्लफ्रेंड के साथ डेरा जमाये बैठा था तो. उसी के. साथ बिजलानी परिवार भी अपनी बेटी. के. साथ बैठा हुआ था। आज वसुधा के. तेवर ही कुछ अलग थे। सुबह से आज उसने एक काम नहीं किया था। आज सारे कामों की जिम्मेदार रिंकू, दीपा जी के साथ साथ बाद मे आयी दीप्ती, तानिया के ऊपर थी। उनहोने अयानी और धनवी को संकल्प के साथ उज्जैन जाने को कह दिया था । अयान ने कहा था की एक साथ सब कुछ नहीं संभाल सकते है, इसलिये जितना कम आदमी हो, उतनी सतर्कता होगी। लेकिन अयानी और धनवी नहीं मानी। वो भी ठाकुर हवेली मे ही मौजूद थी।
वसुधा और उसकी माँ ने हँसते हुए कहा, " अरे कहा गयी महरानी बहु ! घर मे मेहमान आये है। जल्दी जल्दी पकोड़े -समोसे के साथ साथ चाय और कॉफी लाओ। नहीं तो अभी टेलर ही दिखा है। पूरी पिक्चर जब टीवी पर दिखेगी तो क्या होगा। इन दोनों बूढ़े - बूढी का "!
सुबह - सुबह, जब सभी आराम से चाय पी रहे थे। तभी वसुधा ने टीवी चालू कर दिया। टीवी मे जैसे ही सभी ने धनंजय के साथ अंतरा को देखा तो सबकी आँखे बड़ी हो गयी।उसके बाद जो - जो बातें धनंजय ने कही, वो सुनकर तो पूरा परिवार टूट गया। दीपा जी तो भभक कर रो पड़ी। आखिरी उनकी बेटी का घर उजड़ गया था। वो बिल्कुल बेसुध हो गयी थी। जिसे दीपक जी संभाल रहे थे। सुमती और गोपी जी तो बस सोफे पर बैठे तो उठ ही नहीं पाए। उनकी समझ मे कुछ नहीं आ रहा था।
तभी वसुधा आकर सोफे पर पैर फेला कर बैठ जाती है और रोती हुई दीपा को देख कर मुस्कुराते हुए, कहा," रोना धोना बाद मे करना, अगर आप सब चाहते हो की, दुनिया को और ठाकुर परिवार का टेलिकास्ट ना दिखाया जा तो जो कहती हूँ, वो करो !" बात ज्यादा ना बिगड़ जाये, इसलिये दीपा और रिंकू जी ने उसकी बात मान ली।
उसके बाद जैसे ही धनंजय अपनी बाहों मे लिये अंतरा को लेकर घर आता है तो गोपी जी ने गुस्से मे कहा, " ये क्या है और इतनी ओझी हरकत करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आयी धनंजय। उस बच्ची को धोखा देने से पहले तुम्हारी आत्मा ने धिक्कारा नहीं। " ओह्ह दादा जी ! ये बात आप ने अपनी भोली भली बहु से क्यों नहीं कहा ! जब उसने मुझे पति मानने से इन्कार कर दिया। फिर मै कुछ भी करुं। इस पर सवाल कोई नहीं उठा सकता है।
"हाँ ! आपने ठीक कहा भैया, ये कहते हुए, पीछे खड़ी दीप्ती, तानिया, अयानी, धनवी और संकल्प मौजूद थे। आयानी और धनवी ने कहा," पता नहीं अचानक दस दिनों मे, ऐसा क्या हुआ की आप राम से रावण बन गए है !" धनवी के मुँह से ये सुनते ही, जब तक किसी को कुछ समझ मे आता, तब तक अंतरा ने उसे खींच कर एक थप्पड़ मार दिया।
अंतरा ! संकल्प ने चीखते हुए धनवी को पकड़ा और कहा, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी पत्नी पर हाथ उठाने की। वैसे ही जैसे तुम्हारी पत्नी की हिम्मत हुई मुझे रावण कहने की।धनंजय ने जैसे ही जबाब दिया।
संकल्प ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अपनी आंसू भरे आखों से, धनवी अपना सर ना मे हिला देती है।
धनंजय ने सबको घूरते हुए कहा, " अब आदत है डाल लो। रोज इस ठाकुर परिवार की धज्जियाँ उड़ेगीं और उसे कोई नहीं रोक पायेगा !" उसकी बात पर सुमती जी ने कहा, " लेकिन तुम ऐसा क्यों कर रहे हो !" वो इसलिये दादी ! जब तक आपकी लाडली बहु फिर से सब कुछ मेरे नाम नहीं कर देती। तब तक तो इसकी आदत आ सब डाल लो।
फिर दीप्ती और तानिया से कहा, जाओ और मेरे लिये और मेरी मोहब्बत के लिये कॉफी बना कर लाओ।
धनंजय की बात सुनकर सभी सन्न रह जाते है और किसी को कुछ नहीं समझ आता है की आगे क्या करना होगा। दीप्ती ने अयानी से कहा, तुम दोनों कमरे मे जाओ। जब तक भाभी नहीं आ जाती, तब तक शांत रहो। उसकी बात मान कर अयानी, संकल्प और धनवी सभी ऊपर के हिस्से मे चले जाते है।
किचन मे मौजूद तानिया जो अब तक चुप थी। उसे चुप देख कर दीप्ती ने कहा, क्या सोच रही है ? कुछ नहीं दीपि ! सोच रही हूँ की क्या ये वही जीजू है। लगता है उनकी शक्ल मे कोई दूसरा ही इंसान है। क्योंकि ऐसे कैसे इतने जल्दी लोग बदल जाते है। दोनों इन्ही सोचो मे गुम थी।
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