तेरे लिए जानम
- 24 October, 2026
इस समय न तो रात पूरी तरह विदा हुई थी, न ही दिन का प्रकाश धरती पर उतरा था। दोनों के बीच का वह शांत, धुंधला पहर अवंतिका विला पर अपनी निस्तब्ध चादर बिछाए हुए था।
उस विशाल कक्ष में इस समय केवल चार रिश्ते उपस्थित थे...राम, अभिमन्यु, विवान और अथर्व।
विवान मौन था। राम ने जब उसे पलट कर जबाब नही दिया तो वह बाहर जाने के लिए अपने कदम बढ़ा दिए थे कि पीछे से राम की आवाज़ आई, "छोटे... इधर आओ।"
विवान के कदम रुक गए। उसके आँखो मे नमी की लहर आ गई थी। वह अपने बड़े भाई की आवाज़ पर मुड़ा तो उसने देखा की राम घूम चुका था। दोनों भाई एक दूसरे क़ो सालों बाद देख रहे थे। जहाँ विवान के चेहरे पर खुशी और जुदाई का अहसास भर आया था। वही राम के होठो पर हलकी स्नेह भरी मुस्कान आ गयी थी।
राम ने बिना कुछ कहे अपनी दोनों बाँहें फैला दीं। वह निमंत्रण शब्दों का नहीं, अपनत्व का था।
विवान एक क्षण तक उसे देखता रहा। फिर जैसे भीतर बँधा हुआ सारा संकोच - दर्द एकाएक टूट गया। वह तेज़ी से बढ़ा और राम के सीने से आ लगा।उसने राम को कसकर बाँहों में भर लिया।
किन्तु उसके होंठ अब भी मौन थे।
राम ने भी कस कर अपने भाई क़ो गले लगा लिया। उसने स्नेह से उसकी पीठ पर हाथ फेरा। कुछ क्षण उसे वैसे ही अपने सीने से लगाए रखा, फिर धीमे, किंतु दृढ़ स्वर में बोला, "कितनी बार कहा है तुझसे... अपने आप को दोष मत दिया कर।"
राम की बात सुनकर विवान के चेहरे पर हैरानी आ गया था। उसने खुद क़ो अलग किया और राम की आँखो मे देखने लगा। राम फिर अपने छोटे भाई की मन की बात समझ चुका था।उसने क्षण-भर रुककर विवान के कंधों को थामा और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, " तू मेरा भाई था... है... और हमेशा रहेगा और मैं ईश्वर से हर जन्म में बस यही माँगूँगा कि तू ही मेरा छोटा भाई बनकर मेरे जीवन में आए।"
राम के स्वर में अटूट विश्वास था।विवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह फिर से एक बच्चे की तरह राम से लिपट गया। उसने इस बार अपनी पकड़ और दृढ़ कर ली, मानो उस एक आलिंगन में वर्षों से भीतर दबे असंख्य भावों को आश्रय मिल गया हो।
अभिमन्यु और अथर्व शांत भाव से यह दृश्य देखते रहे। उस समय किसी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और केवल अपनापन बोलता है।
विवान कुछ क्षण तक उसी तरह राम से लिपटा रहा। जैसे बरसों से भीतर दबा हुआ सारा अपनापन उस एक आलिंगन में सिमट आया हो। उसकी उँगलियाँ राम की पीठ को कसकर थामे थीं, मानो एक बार फिर उसे खो देने का भय अभी भी उसके भीतर कहीं जीवित हो।
भर्राए हुए स्वर में उसके होंठ काँपे, "हाँ... और मेरी मॉम... सिर्फ़ अवंतिका माँ होंगी।"
इतना कहना था कि उसका संयम टूट गया। उसने अपना चेहरा राम के कंधे में छिपा लिया। आँखों से बहते आँसू वर्षों का संचित अपराधबोध, बिछोह और प्रेम अपने साथ बहाए जा रहे थे।
"आई मिस यू, भाई..."
राम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखें भी भीग चुकी थीं, पर होंठों पर वही शांत मुस्कान थी, जो हमेशा अपने अपनों को संभालने के लिए मुस्कुरा उठती थी।
"आई मिस यू टू, छोटे।"
इतने में अथर्व की धीमी-सी आवाज़ सुनाई दी, "भाई... मैं भी..."राम ने गर्दन उठाकर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वही स्नेह था, जिसमें कोई भेद नहीं था। उसने बिना कुछ कहे हल्के से अपना हाथ बढ़ाया और इशारे से अथर्व को अपने पास बुला लिया।
अथर्व एक पल को मुस्कुराया, फिर तेज़ी से बढ़कर दोनों से आ लगा।अब राम की बाँहों में उसके दोनों छोटे भाई थे। एक दाहिनी ओर, दूसरा बाईं ओर। वर्षों की दूरियाँ, शिकायतें और अधूरे पल उस आलिंगन में जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगे थे। उस क्षण शब्दों का कोई महत्व नहीं था। तीनों की धड़कनें ही एक-दूसरे से संवाद कर रही थीं।
उसी समय पीछे खड़ा अभिमन्यु यह दृश्य देख रहा था। उसके होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में हल्की-सी नमी उतर आई थी। आखिरकार उसने वही किया, जो वह हमेशा करता था...गंभीर माहौल को अपनी शरारत से हल्का कर दिया।
"अरे कमीनो...!" उसने बनावटी नाराज़गी जताते हुए कहा, "एक भाई यहाँ भी खड़ा है तुम्हारा। उसे तो ऐसे भूल गए, जैसे मैं किराए का हूँ! पंद्रह साल बाद मै भी लौटा हु !!"
तीनों ने एक साथ उसकी ओर देखा। अगले ही पल वातावरण में हँसी गूँज उठी।राम ने अपनी एक बाँह अभिमन्यु की ओर बढ़ा दी।
"आ जा... तू भी कमीने ! तुझे तो एक्स्ट्रा अटेंसन चाहिए ।"
अभिमन्यु मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा और अगले ही पल चारों एक-दूसरे के आलिंगन में बँधे खड़े थे।
कुछ दूर खड़े शमशेर की दृष्टि अब भी उन चारों पर टिकी हुई थी। उनके चेहरे पर ऐसी तृप्ति थी, जैसी किसी अपने बिछड़े परिवार को फिर से एक साथ देखकर होती है। बरसों से सीने में दबी एक अभिलाषा आज जैसे उनके सामने साकार खड़ी थी। उनके दोनों हाथ अनायास ही आशीर्वाद की मुद्रा में उठ गए। भीगी आँखों में स्नेह था, गर्व था और एक अनकही राहत भी।
राम ने जब उन्हें देखा, तो बिना कुछ कहे उनकी ओर बढ़ गया।"कैसे हैं आप, काका?"अपनी आँखों की नमी छिपाते हुए शमशेर मुस्कुराए।"मैं ठीक हूँ... मालिक।"
'मालिक' शब्द सुनते ही राम के चेहरे की मुस्कान हल्की-सी फीकी पड़ गई। वह बिना एक क्षण गँवाए झुककर उनके चरण स्पर्श करने लगा।शमशेर घबरा उठे। उन्होंने तुरंत उसके दोनों हाथ पकड़ लिए और लगभग खींचते हुए उसे सीधा कर दिया।
"न... नहीं, मालिक! यह क्या कर रहे हैं आप?"राम ने स्नेहभरी दृष्टि से उनकी ओर देखा।"काका... मालिक नहीं। सिर्फ़ राम।"
शमशेर की पलकों में एक हल्का-सा कंपन दौड़ गया। उनके लिए यह संबोधन बदलना आसान नहीं था। जिन हाथों ने बचपन से उसे गोद में खिलाया था, उन्हीं हाथों ने वर्षों से उसे अपने मालिक के रूप में सम्मान दिया था। आदत और मर्यादा दोनों एक साथ उन्हें रोक रही थीं।
"लेकिन..."उन्होंने संकोच से कहा।राम ने कोई तर्क नहीं दिया। बस मुस्कुराकर उनकी आँखों में देखा और हल्के से सिर हिला दिया। उस मौन आग्रह में इतना अपनापन था कि शमशेर और कुछ कह ही न सके।
उन्होंने काँपते हाथों से राम के सिर पर स्नेह रखा," ठीक है... राम।"यह कहते ही उनके चेहरे पर ऐसी सहज मुस्कान लौट आई, मानो बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया हो।राम भी मुस्कुरा उठा।
"और बताइए, काका... शिवेन्द्र कैसा है?"शमशेर की आँखों में बेटे का नाम सुनते ही चमक लौट आई।
राम ने सर हिला दिया। बस काका वह भी कल तक मेरे साथ होगा। उसकी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है अब तो उसे अपने काम क़ो करना। शमशेर कुछ ना कह सके। सिर्फ सर हिला कर हां कह दिया। क्योंकि उनको मालूम था की शिवेंद्र की क्या अहमियत थी राम की जिंदगी मे।
"वह ठीक है, राम और तुम्हारा इंतजार कर रहा है। बस जब तुम उसे अपने पास बुला लो।"
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