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तेरे लिए जानम Chapter-1

तेरे लिए जानम Chapter-1

मुंबई... सपनों का शहर, मायानगरी और रसूखदार लोगों की पहचान। यह वह शहर है जहाँ हर दिन नई कहानियाँ जन्म लेती हैं। बड़े-बड़े उद्योगपति, नामी हस्तियाँ, फिल्मी सितारे और प्रभावशाली लोग इसी शहर की शान हैं। लेकिन इन सभी नामों के बीच एक ऐसा परिवार भी है, जिसका नाम सम्मान और रुतबे के साथ लिया जाता है—रघुवंशी परिवार।

रघुवंशी परिवार केवल अपनी दौलत के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्रभाव, प्रतिष्ठा और वर्षों से कायम सम्मान के लिए पूरे शहर में प्रसिद्ध था। उनके नाम का इतना प्रभाव था कि बड़े-बड़े लोग भी उनसे संबंध बनाने को अपना सौभाग्य समझते थे। शहर में उनके कई उद्योग, व्यवसाय और सामाजिक संस्थाएँ थीं, जिनकी वजह से उनका नाम हर जगह आदर के साथ लिया जाता था।

आज उसी रघुवंशी परिवार की आलीशान हवेली में सुबह से ही असामान्य चहल-पहल थी। पूरे घर में नौकर-चाकर इधर-उधर भाग रहे थे। कोई मुख्य द्वार की सजावट में लगा था, कोई बैठक को व्यवस्थित कर रहा था, तो कोई रसोई में विशेष पकवानों की तैयारी कर रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो घर में कोई बहुत बड़ा उत्सव होने वाला हो।

इसी बीच पूरे घर में एक तेज़ और अधिकारपूर्ण आवाज़ गूँजी, "अरे... विशम्भर कहाँ है?"
आवाज़ सुनते ही सभी नौकर एक पल के लिए ठिठक गए।"जल्दी-जल्दी सारे काम निपटा लो। किसी भी चीज़ में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। आज... पूरे पंद्रह साल बाद मेरा पोता घर लौट रहा है।"

उनकी आवाज़ में उत्साह भी था, अपनापन भी और वर्षों की प्रतीक्षा की कसक भी। पंद्रह वर्षों का लंबा इंतज़ार अब समाप्त होने वाला था। यही कारण था कि वे बार-बार हर व्यवस्था स्वयं देख रही थीं। उनके मन में बस एक ही बात थी। जब उनका पोता इस हवेली में कदम रखे, तो उसके स्वागत में कोई कमी न रह जाए।

तभी किसी ने उन्हें समझाते हुए कहा, "जानकी जी, आप इतनी क्यों परेशान हो रही हैं? शमशेर, विवान और अथर्व तो उसे लेने गए हैं न। फिर आप इतनी चिंता क्यों कर रही हैं?"

यह थे रघुवंशी परिवार के मुखिया पंचदेव रघुवंशी। उम्र भले ही ढल चुकी थी, लेकिन उनके व्यक्तित्व का तेज आज भी वैसा ही था। उनके एक फैसले की अहमियत पूरे परिवार में सबसे ऊपर मानी जाती थी।

तभी उनके पीछे से उनकी छोटी बहू केतकी की आवाज़ सुनाई दी।
"वही तो, बाबूजी। तब से मैं माँजी को समझा रही हूँ कि ज़्यादा परेशान मत होइए। आपका बीपी हाई हो जाएगा। सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। हवेली का हर कोना सज चुका है, रसोई का सारा इंतज़ाम भी हो गया है। अब बस उसके आने का इंतज़ार है।"

केतकी ने प्यार से जानकी जी का हाथ थाम लिया, लेकिन जानकी जी की बेचैनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी।उन्होंने गहरी साँस ली और भरी हुई आवाज़ में कहा—
"अरे... मैं कैसे परेशान न होऊँ? मैं उसकी दादी हूँ। तुम सब जानते हो ना... वह किस वजह से और किन हालात में हम सबको छोड़कर गया था। उस दिन को याद करके आज भी दिल काँप उठता है।"
कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। किसी के पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

जानकी जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने काँपती आवाज़ में आगे कहा—
"इतनी-सी उम्र में उसने अपने दम पर ऐसा मुकाम हासिल किया है कि आज उसका बिज़नेस दुनिया का नंबर वन बिज़नेस बन चुका है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। हर जगह उसी का नाम है, उसी की कामयाबी के चर्चे हैं।"

उन्होंने एक पल रुककर गहरी साँस ली। उनके चेहरे पर खुशी से ज़्यादा डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
"...और डर तो मुझे इस बात का है कि कहीं फिर से... कुछ ऐसा न हो जाए, जो पंद्रह साल पहले हुआ था। मैं दोबारा उसे खोने की हिम्मत नहीं रखती।"यह कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपना चेहरा घुमाया और गंभीर नज़रों से अपने पति पंचदेव रघुवंशी की ओर देखते हुए पूछा—
"आपने... मृत्युंजय को रोक दिया है ना? वह उसके सामने नहीं आएगा... है ना?"
जानकी जी के इस प्रश्न के साथ ही वहाँ मौजूद सभी लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया। माहौल एकाएक भारी हो गया।

पंचदेव जी ने हल्की-सी खिन्नता के साथ उनकी ओर देखा और शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोले, 
"कैसी बातें कर रही हो, जानकी जी? हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? वह उसका पिता है। चाहे बेटा उससे कितना भी नाराज़ क्यों न हो, चाहे उसके मन में कितनी भी शिकायतें क्यों न हों... लेकिन इस सच को कोई नहीं बदल सकता कि मृत्युंजय रघुवंशी उसका पिता है।"

उन्होंने आगे कहा, "बाप-बेटे के रिश्ते में दूरियाँ आ सकती हैं, नाराज़गी आ सकती है... मगर रिश्ता कभी खत्म नहीं होता। आज पंद्रह साल बाद बेटा इस घर लौट रहा है। ऐसे समय में हम एक पिता को उसके बेटे से मिलने से कैसे रोक सकते हैं?"

सुबह के ठीक चार बजे उनका प्राइवेट जेट भारत की धरती पर उतरा। रनवे पर पहिए छूते ही जहाज़ धीरे-धीरे रफ्तार कम करने लगा।करीब पंद्रह साल बाद राम भारत लौटा था।

जेट का दरवाज़ा खुला। सबसे पहले ब्लैक थ्री-पीस सूट पहने राम बाहर आया। उसके चेहरे पर वही गंभीरता, वही ठंडापन और वही रौब था, जिसकी चर्चा आज पूरी दुनिया में होती थी। उसकी तेज़ निगाहें सामने टिकी थीं, लेकिन जैसे ही उसने भारत की मिट्टी पर पहला कदम रखा, उसके भीतर वर्षों से दबा अतीत अचानक यादों बनकर आँखों में उतर आया।

पंद्रह साल पहले इसी देश से वह किन हालात में गया था... यह याद उसके सीने में दबी हुई आग की तरह आज भी ज़िंदा थी। उन यादों का दर्द एक पल के लिए उसकी आँखों में साफ़ झलक उठा, लेकिन अगले ही क्षण उसने अपने चेहरे के भावों को पहले की तरह कठोर बना लिया।
उसके पीछे खड़ा अभिमन्यु बिना कुछ कहे उसे देख रहा था।

राम ने अपने मन की बात कभी किसी से नहीं कही थी, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभिमन्यु उन रिश्तों में से एक था। बचपन से लेकर आज तक वह राम का सबसे सच्चा और सबसे करीबी दोस्त था। राम के चेहरे पर आई ज़रा-सी खामोशी भी वह बिना उसकी ओर देखे महसूस कर लेता था।

शायद इसी वजह से कहा जाता है कि ज़िंदगी में एक ऐसा दोस्त ज़रूर होना चाहिए, जो आपकी ख़ामोशी भी पढ़ सके।

अभिमन्यु धीरे-धीरे उसके पास आया और बिना कुछ कहे पीछे से अपना हाथ राम के कंधे पर रख दिया। उस एक स्पर्श में दिलासा भी था, अपनापन भी और यह भरोसा भी कि वह हर हाल में उसके साथ खड़ा है।

राम ने एक गहरी साँस ली। फिर बिना कुछ बोले अपनी आँखों में उतर आई नमी को वहीं रोक लिया। उसने जेब से अपना काला चश्मा निकाला और आँखों पर लगा लिया, ताकि उसके चेहरे पर उभरते भाव किसी की नज़र में न आएँ।इसके बाद वह बिना पीछे मुड़े आगे बढ़ गया।उसने न अभिमन्यु की ओर देखा, न ही उससे कुछ कहा।

अभिमन्यु उसकी इस ख़ामोशी और बेरुख़ी का आदी था। वह हल्का-सा मुस्कुराया, फिर बेबसी में सिर हिलाकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। उसे मालूम था कि राम बोलता कम है, लेकिन जब भी उसे किसी अपने की ज़रूरत होगी, वह हमेशा उसकी परछाईं बनकर उसके साथ रहेगा।