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Love without wish Chapter-2

Love without wish Chapter-2

भोपाल ठाकुर हवेली,

महादेव की मंदिर मे सुबह सुबह घंटीयो की ध्वनि के साथ धनंजय जिसने गले मे रुद्राक्ष की माला, माथे पर त्रिपुण्ड टिका,शरीर पर जनेऊ, कंधे पर सफेद दुप्पटा रेशमी सफेद धोती  पहने हुए महादेव की स्तुति गाते हुए आरती कर रहा था। पूरा मंदिर उसकी कंठ से गए स्तुति मे भावभोर हो चला था।अभी उसके चेहरे पर गजब की तेज थी। जिसे हर स्त्री और पुरुष निहार रहे होते है.।

कुछ लडकियाँ कहती है, कितना सुंदर है देखो तो उसका गठिला बंद। उनमे से कुछ कहती है, मै तो आज भोले भंडारी से इसे अपना दूल्हा बनाने की अर्जी लगा रही हूँ, अगर ये मेरा हो गया तो हर सोमवार शुद्ध दूध के पेड़े का भोग लगाऊंगीं। दूसरी कहती है अपनी शक्ल देखी है तुमने और ये कौन है तुम्हें मालूम भी है? दूसरी कहती है, ठाकुर परिवार के बड़े पोते, "धनंजय ठाकुर "। सभी सुन कर कहती ये तो बाहर चले गए थे ना!कब आये ये भोपाल वापस ? और तुम कैसे कह सकती हो की ये वही है!
दूसरी कहती है, ये मंदिर की पहली पूजा और ये आवाज़, ये स्तुति सिवाय इनके कोई नहीं गाता है।कुछ और लोगो जो मंदिर मे पूजा मे ध्यान लगाये बैठे स्तुति सुन रहे थे, वो सभी उनको डांट कर कहते है, बातें करनी बाहर करो। पूजा करनी है तो शांत होकर ध्यान लगाओ।

अयान और प्रथम जो धनंजय के पीछे खड़े  होते है धीरे से कहते है,"लो आ गए सबके किशन कनेहया और अब हमसे सभी करवायेगे ता ता थैया!! प्रथम की बात सुनकर अयान कहता है मै कुछ समझा नहीं। समझ जाओगे कुछ देर रुक जाओ। चलो आरती पर ध्यान देते है।


बहुत दिनों बाद ठाकुर हवेली मे रौनक लगी थी।सुमति जी पूजा करके अपने घर के सबसे नौकर से कहती है, "हरी, मालती कहाँ है!! बोल देना उसे की बड़े बाबू लौट आये है तो आज उनकी पसंद के सारी चीजे बनी। जी जी मालकिन मे बोल दूँगा, चम्पा की माँ को (ये है हरी और इनकी पत्नी मालती जो बहुत सालों से ठाकुर परिवार के घर मे काम करते है )।

भाग्यवान जरा इधर आईये, कहते हुए गोपीकांत जी, अपनी पत्नी को आवाज़ देते है। क्या बात आपको कुछ काम था!हाँ मै कह रहा था की धन कहाँ है दिख नहीं रहा है। आप भूल रहे है वो भोपाल आया हुआ तो सबसे पहले मंदिर जायेगा।


निचे उतरते हुए ध्यान कहता है,"दादू -दादी माँ!भाई आ गए है क्या मंदिर से। दोनों कहते है नहीं। फिर ध्यान कहता है,"भाई अकेले गए है क्या? सुमति जी कहती है नहीं,"उनके साथ सीता और गीता भी गयी है।"
ध्यान सुन कर मुस्कुराते हुए कहता है, "क्या दादी!याद रखिये गलती से भी अगर सीता और गीता ने सुन लिया तो आपको बसंती बनाने मे वक़्त नहीं लगाएगें।

तभी अंदर धनंजय आता है,  ज़ब अंदर आता है तो सबकी निगाहेँ उस पर रुक जाती है। उसके चेहरे का तेज उसके व्यक्तित्व को सबसे अलग करता है।

सुमति जी और गोपीकांत जी ज़ब धनंजय को देखते है तो एक दूसरे से कहते है। हमारे बच्चे  मे आज भी वही तेज। तभी नीची आती हुई धनवी और आयानी आकर सीधे धनंजय के कंधे को पकड़ कर झूलती हुई कहती है। क्या भाई आप सुबह आये और हमसे मिले बिना चल दिए अपने शिव शंभू के पास। धनंजय अपनी पूजा की थाली देते हुए कहता है, "आप दोनों सो रही थी और आप दोनों के तोफे आपके कमरे मे है। दोनों एक साथ ख़ुशी से उछलती हुई कहती है, थैंक यु भाई!उनकी बात सुन कर धनंजय उन्दोनो के गालों को थपकी देते हुए कहता है, भाई को थैंक्यू और सॉरी नहीं बोलते।

ध्यान कहता है,"लालची कही की!दोनों उसे जीभ चिढ़ाती हुई भाग जाती है।
तभी पीछे से अयान और प्रथम अपनी अपनी धोती संभालते हुए आते है और कहते है, कमीना मुझे उन सभी के बीच अकेला छोड़ कर भाग है। सभी उसकी हालत देख हंसने लगते है। तब प्रथम और अयान की नजरो सभी पर जाती है और धनंजय अपनी भोंन्हो को ऊपर कर के उसे देखता है।
दोनों घूरते हुए धनंजय को देखते है और आगे बढ़ कर गोपीकांत और सुमति जी से गले लग कर कहते है,"दादी!दादू!दोनों नौटकी से रोते हुए कहते है।दोनों को ऐसे देख गोपीकांत है क्या तुमदोनों को और ऐसी हालत किसने बना दी। 

दोनों को ऐसे करते देख धनंजय धीरे से कहता है, "नौटंकी कमीने!!! जिसे ध्यान सुन लेता है और जोड़ से कहता है, मँझले भैया और छोटे भैया आप दोनों को बड़े भैया ने कहा है, नौटंकी!धनंजय उसे घूरता है तो वो भी उन सभी साथ आकर खड़ा हो जाता है।

धनंजय सभी को देखते हुए कहता है,"दादू मै ऑफिस जा रहा हूँ " कहते हुए जाने लगता है।
तभी उसकी बात सुन कर अयान और प्रथम दोनों घूमते हुए उसे घूरते है और उसके पास आकर उसके गठिले शरीर पर हाथ फेरते है। जिससे चिढ कर धनंजय कहता है,"ये क्या कर रहे हो तुम दोनों!
अरे हमदोनो क्या कर रहे, तेरा ये गठिला बदन दादा -दादी को दिखा रहे है फिर सबकी तरफ देखते हुए कहते है, सुनो दादी आज की सबसे हॉट न्यूज़, तो महाराज तो कर रहे थे पूजा और इनके बदन की रखवाली कर रहे थे हम। क्योंकि वहाँ की सभी नार -नवली  महिलेये ऐसे देख रही थी जैसे अगर ये उनके हाथों मे आ जाये तो बस  जाएगी।

दादी कहती है, चुप कर बदमाश क्यों मेरे बच्चे को परेशान कर रहे हो. अरे मालती जरा नजर उतारने का सामान लाना, ना जाने किन किन मेरे बच्चे को देखा है कहती हुई, धनंजय के पास आने लगती है।

उससे पहले अयान और प्रथम कहते है पहले हमें तो देख लो ये तो निकला आये क्योंकि कोई इनके आस पास आ जाये ये तो सम्भव नहीं लेकिन वो सभी ज़ब हमें पकड़ लेती है तो पूछो हमारी क्या हालात हो जाती है। बस नजरो उतारो अपने लाडले की।

धनंजय कहता है, दादी माँ आप इनदोनो की बातें सुनिये मुझे ऑफिस जाना है कह कर जाने लगता है।तभी गोपीकांत जी कहते है, "बेटा धन हमे आपसे कुछ बात करनी है तो आप कुछ देर हमारे पास आएंगे। उनकी बातें सुनकर धनंजय कहता है,"जी दादू! मैंने आपकी बात कभी टाली है कहते हुए उनके साथ सोफे पर बैठा जाता है।

गोपीकांत जी कहते है दो दिन बाद महाशिवरात्रि है और इसलिए हम चाहते है की हम सब उज्जैन जाये और महकाल की मंदिर मे आपके हाथों रुद्राभिषेक करवाए।आपको तो मालूम है की
उज्जयिनी स्थित महाकाल शिव द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अन्यतम हैं। यहां वे दक्षिणमूर्ति हैं। दक्षिणमूर्ति शिव का महत्व केवल यहीं दिखाई देता है। 

सुना है शिप्रा नदी मे स्नान करने के बहुत पुण्य होते है.
महानदी शिप्रा में स्नान करने के पश्चात शिव का दर्शन तथा पूजन करने पर मृत्यु-भय नहीं रहता। यहां मृत कीट-पतंग तक रुद्र के अनुचर बन जाने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। 
शिप्रा नदी में स्नान करने लायक 5 घाट हैं।  रामघाट सबसे विशाल घाट है। शेष घाटों के नाम हैं- नरसिंह घाट, गऊ घाट, त्रिवेणी घाट और मंगल घाट।
हमारी इक्क्षा है की हम सभी शिप्रा नदी के किसी एक घाट पर स्नान करे और महाकाल की पूजा करे।

कहिये आपका क्या विचार है। अपने दादा की बात सुनकर धनंजय कहता है मुझे कोई एतराज नहीं है कहिये कब चलना है उज्जैन के लिए। मै सारी तैयारी करवा देता हूँ। उसकी बात सुनकर गोपीकांत जी कहते है, "आज शाम को चलते है, हमारे कुलगुरु ने भी बुलाया है और वहाँ के महापंडित से मिलकर पूजा की तैयारी कर लेगे। लेकिन दादू इसके लिए आज जाने की जरूरत क्या है? हम कल भी चल सकते है? बात ये है बेटा की हम चाहते है की शाम की महाआरती भी देख लेते।
उनकी बात सुनकर धनंजय कहता है,"ठीक है दादू चलते है लेकिन अभी मुझे ऑफिस जाना!!तो शाम को मिलते है.
ठीक बेटा।

धनंजय कहता है, ध्यान कुछ रेक्विरेमेंट थी वो पूरी हो गयी। जी भाई हो गयी और सभी को फाइनल इंटरव्यू के लिए महाशिवरात्रि के बाद बुलाया है। हम्म्म्म ठीक है।

उज्जैन.....

आराध्या ओओ आरध्या....!!! अरे क्या हुआ दीपा जी ऐसे क्यों चिल्ला रही है। दीपक जी आराध्या के चाचा अखवार पढ़ते हुए कहते है। उनकी पत्नी दीपा जी उनके पास आती है और उनके हाथों से अखवार छीनती हुई कहती है। आप को पोस्टऑफिस और ये अखवार से छुट्टी मिल जाये तो जरा घर भी देख लो। दो जवान जवान बेटियाँ है, जिनकी उम्र बियाहने की हो गयी है लेकिन इनके कान मे जुँ तक नहीं रेंगति। पूरा घर कर्जे मे डूबा हुआ है और सर पर बेटी का बियाह है।

मै चिंता मे आधी हो गयी हूँ लेकिन इनको देखो जैसे कोई फ़िक्र ही नहीं है।दीपक जी अपने चश्मे को थोड़ा निचे कहते अपनी पत्नी को देखते हुए कहते है," अरे दीपा जी यदि आप आधी हो गयी तो पूरी किसे कहते है।उनकी बातें सुनकर कुढ़ती हुई कहती है, "देखो जी तुम ना ऐसे मुझे नजर मत लगाया करो ठीक है और देखो तुम्हारी दोनों लाड़ली अभी तक घर नहीं आयी है। ना जाने कहाँ गयी है।

अरे दीपा जी दोनों गयी है महाशिवरात्रि के लिए बाजार से सामान खरीदने। आपको तो पता है महाशिवरात्रि का दिन आरध्या के लिए कितना महत्वपूर्ण है। दीपक जी की बात सुनकर कहती है, पता नहीं किस मिट्टी की बनी है ये लड़की।जो उसके साथ हुआ वो किसी और के साथ होता तो कभी महादेव की पूजा नहीं करता लेकिन ये लड़की इसे तो उसमें भी उनका आशीर्वाद ही समझ आता है।
दीपक जी कहते है, उसका नाम ही आराध्या नहीं है उसकी हरकत भी वही है। आप बस परेशान मत हुआ करिये। महाकाल सब ठीक करेंगे

तब तक हंसती हुई सभी अंदर आ गयी लेकिन सामने खड़ी चाची को देख आरध्या के पीछे दीप्ती और उसकी सहेली तानिया छिप गयी।

दीपा जी कहती है,"आ गयी हँसी ठिठोली कर के!!अरे तार जीती लम्बी हो गयी हो लेकिन अक्ल तो उगूठे भर नहीं है तुम को!इते सी शरम नहीं है की घर पर चाची के ऊपर पूरा काम पड़ा है, तनिक हाथ बटा दे लेकिन नहीं!घुमाई -फिराई करे से फुरसत मिलहिये तभी तो। लोगो कहती है "बेटी की माँ रानी और बुढ़ापा मे भरे पानी "। लेकिन देखो हमार किस्मत दो दो जवान बिटिया है लेकिन हम रानी नहीं नौकरानी बन बैठी है.... इन सब का।
और  तू तानिया मिर्जा!!!
तभी पीछे से कहती है, चाची तानिया मिश्रा!! अरे हाँ हम समझ गए !! अरे तू क्यों इनदोनो के चक्कर मे बिगड़ रही है।

तभी आराध्या अपने हाथ दिखाती हुई कहती है..... बस !!! अब और नहीं!!!!
उसकी बातें सुनकर चाची के साथ साथ सभी उसकी तरफ देखते है।

उज्जैन
फिर हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाती है और कहती है, हे ललिता पवार आज कौन सी काली माई आप पर चढ़ गयी है। अरे जरा देखो तो. चारों और सब कुछ साफ सुधरा है।फिर चारों तरफ घूम घूम कर दिखाती हुई कहती है। क्यों रोज पुरानी सासों की तरफ बैठ जाती हो आप चाची। सब कुछ कर के गयी थी हमदोनों। हे शिव शंभू!!!आप ही समझाओ अपनी इस देवी को।
रोसोई घर मे देखो सब कुछ बना हुआ है, तब अब बताओं आपको कौन से देवता ने फोन करके ये मंग्रहनत चुगली की है..... बोलो माते। अपने दोनों हाथों जोड़े हुई आँखे मटकाती हुई, दीपा जी से पूछती है।पीछे खड़ी दोनों उसकी हरकत और बातें सुनकर हँस रही होती है। दीपा जी बस उसकी बातें आँखे बड़ी करती हुई सुन रही होती है। हे भोलेनाथ हमको समझ मे नहीं आता इसको बनाते वक़्त आपने कहाँ की मिट्टी इस्तेमाल की थी,गजब -अजब की बातें करती है।

फिर आगे बढ़ कर दीपा जी उसके सर पर मारती हुई कहती है, ये कौन सा रोज रोज परपंच और बातें तुम. सिख के आती हो। फिर दीपक जी की तरफ  देख कर कुछ कहती, " की उससे पहले तीनों एक साथ वही बातें कहती है जो दीपा जी बोलने वाली थी दीपक जी को।

"ओओओ दीप्ती के पापा देख रहे हो इन दोनों लड़कियों को कैसी कैसी बातें सिख कर आती है और मुझे सुनाती है। क्या तुम. कुछ बोलोगे या यु ही अखवार पढ़ते रहोगे। लडकियाँ जवान हो गयी है लेकिन इनको कोई फ़िक्र नहीं है।"

तीनों की बातें सुन कर दीपक जी मंद मंद मुस्कुरा देते है और दीपा जी गुस्से मे, झाड़ू उठाती हुई तीनों के पीछे दौड़ती है। जिसे देख कर तानिया कहती है, मै चली अपने घर। तुम्हारी मुसीबत तुम सम्भालो। जिसे सुनकर दीपा जी कहती है, तानिया मिर्जा रुक जा तू आज तेरी माँ से बोल कर तेरी टांगे तुड़वाती हूँ पहली इन दोनों की खबर लेती हूँ।वो दोनों चाची के हाथों देख तेजी से आँगन मे दौड़ती है। दीप्ती कहती है, "क्यों जीजी!हर बार आप खुद भी फंसती हो और मुझे भी फंसाती हो।"अरे चुप कर पगली यही तो चाची का प्यार है, क्यों चाची!!रुक जा तू अभी बताती हूँ, चाची की बच्ची, कहती हुई,"उन्दोनो की तरफ आती है तो आरध्या कहती है, "देखो चाची अगर मुझे झाड़ू से मारा ना तो देख लेना।

अच्छा क्या करेगी तू। क्या करुँगी जहाँ शादी करुँगी बता दूँगी की मेरी चाची मुझे रोज आँगन मे दोड़ा दोड़ा कर झाड़ू मारती थी।
उसकी बात सुन कर दीपा जी झाड़ू फ़ेंक कर गुस्से मे  तीनों को घूरती है।
क्योंकि वो दोनों दीपक जी के पीछे खड़ी हो. गयी थी और धीरे से आरध्या कहती है, अब देखना सीधे मम्मी पापा के पास टेलीफोन जायेगा।दीपक जी उसे घूरते हुए कहते तू उसे परेशान जान बुझ कर क्यों करती है? अरे चाचू!!अगर ये भी ना करुं तो चाची का खाना नहीं पचेगा। फिर तीनों ऊपर देखते है क्योंकि दीपा जी ऊपर देखती है।

दीपा जी ऊपर देखती हुई कहती है,"जीजी देख रही हो ना तुम !भैया!देख रहे है ना आप!! ये कैसी होती जा रही है। आप कहेगी की हमने बिगाड़ा है लेकिन हम तो इसके पीछे बाबले हो गए है और ये है की हमको ना जाने कौन सी ललिता पवार बनाये हुए है। देखो दीदी समझायी लो इनका। हाथ से निकलती जा रही है ये।"

आरध्या जोर से कहती है, "चाची टेलीफोन कट गया और ललिता पवार एक ही है।"दीपा जी कहती है, इसकी तो!!

तब तक दोनों अंदर भाग जाती है। दीपक जी उनका हाथ पकड़ कर रोक देते है और आवाज़ देते हुए कहते है, माहौल गरम है आरध्या तो अपनी हाथों की दो कप चाय लाना। अंदर से आवाज़ आती है, जो हुकुम आका अभी लायी!!!

दीपा जी बैठिये थक गयी होगी। आप मुझे बैठने को कह रहे है, जरा आरध्या को क्यों नहीं समझाते। पता नहीं किस मिट्टी की बनी है, कोई बात असर ही नहीं करती इस पर। क्योंकि दीपा जी वो समझती है आपके डांट को। क्यों जी आप भी बातें बनाने लगे अपनी बेटी के साथ साथ। ऐसी बात नहीं है दीपा जी,"अच्छा आप बताईये की ज़ब आपको मालूम था की वो अपना सब काम करके गयी थी तो भी आप हर बार बेवजह उसे क्यों सुनाती है "।

दीपा जी हंसती हुई कहती है,"क्योंकि मै माँ हूँ उसकी!! हमारी माँ कहती थी की अगर बेटी मायके मे, अपनी माँ की करवी और खड़ी -खोटी बातें बर्दास्त कर लेती है तो ससुराल मे सास ननद की बातें उसे बुरी नहीं लगती और वो अपने रिश्ते को उतने ही प्यार से निभाती है जितने प्यार से वो अपनी माँ के साथ रिश्ते निभाती है।"

चाय हमारे हाथों की चाय कहती हुई अपने चाचा -चाची के आगे चाय रख देती है।

भोपाल

धनंजय अपने सामने बैठे सारे जरूरी फ़ाइल देख रहा होता है और सामने बैठे हुए ध्यान और प्रथम से कहता है। हमारे सारे प्रोजेक्ट तो ठीक चल रहे है लेकिन ये रजावत वाली प्रोजेक्ट मे क्या समस्या आयी है। भाई दरअसल वो लोगो इंडिया मे नहीं है इसलिए हमारी बात अभी नहीं हो पायी है।हम्म्म्म ठीक है तुम कोशिश करते रहो। शाम की तैयारी हो गयी। हाँ हो गयी भाई। उसकी बातें सुनकर धनंजय कहता है, "तुम लोगो निकल जाना!  मै कल आ जाऊंगा और हाँ दादू को मत बताना। क्या यार ऐसे कैसे दादू से हम छिपा सकते है।प्रथम की बातें सुनकर,' धनंजय अपनी एक तरफ भोंए उठा कर देखता है, जैसे उससे पूछ रहा हो की, ये तू कह रहा है ;यकीन नहीं होता। उसे ऐसे देख प्रथम कहता है, अरे यार ऐसे तो लुक मत दे।

तब तक अयान भागते हुए अंदर आता है। उसे ऐसे अंदर आते देख तीनों उसकी तरफ देखते है। धनंजय आपनी आखों को छोटी करते हुए कहता है, ऐसे क्यों पागलो की तरह भागते आये हो। अयान उसकी बातें सुनकर उसे घूरता और कहता है आफत आ रही बस यही बताने आया था और अकेली नहीं अपनी साथ साथ दोनों आफत की पुड़िया भी साथ ला रही है।

धनंजय प्रथम से कहता है, गार्ड को बोल दो उन सभी को निचे फ्लोर पर रोक दे और वही से भेज दे। अभी मै कोई तमाशा नहीं चाहता। प्रथम निकल जाता है। अयान को देख कर कहता है, चलो चलते है उज्जैन के लिए, उसकी बातें सुन ध्यान कहता है लेकिन आपने तो. कहा था भाई की आप कल जायेगे।
हाँ ध्यान लेकिन अब मैंने अपना विचार बदल लिया है। चलो। तीनों साथ मे निकल जाते है।


ठाकुर परिवार की तैयारी हो जाती है और सब निकलने को तैयार होते है तो सुमति पूछती है, "ध्यान आपके बड़े भाई कहाँ है "?दादू वो पीछे से आ रहे है, मँझले और छोटे भाई के साथ। ठीक है!फिर चलिए। हर हर महादेव। सभी एक साथ कहते है और निकल जाते है।
ठाकुर परिवार अपने घर के कुलगुरु से मिलने उनके आश्रम पहुंचते है। ठाकुर परिवार को देख कुलगुरु सभी आशीर्वाद देते और अंदर आने को कहते है। उनसे बच्चे आशीर्वाद लेकर बाहर निकल जाते है। लेकिन सब कुछ जानने समझने के बाद भी गोपीकांत जी और सुमति जी बहुत उम्मीद भरी नजरों से कुलगुरु की तरफ देखते है। जिसे देख कर वो मुस्कुराते हुए कहते है,सब ठीक होगा परेशान मत हो।धनंजय के जीवन को नई दिशा मिलने वाली है, बस सब महादेव पर छोड़ दो। सब अच्छा होगा।
मैंने वहां के पंडित से बात कर ली है बस तुम जा कर मिल लो। जी गुरुदेव!आप नहीं जायेगे। जिसे सुनकर वो मुस्कान के साथ कहते है, गोपी अब मै बहुत बूढा हो चुका हूँ और अब मै इस आश्रम से बाहर नहीं जाता। तुम जाओ अब तुम्हारे परिवार का सिर्फ कल्याण होगा। दोनों आशीर्वाद लेकर चले जाते है।


इधर आर्म के बाहर खड़े,ध्यान, अयानी, धनवी सभी मन बनाते है की बाहर घूमने की तो धनंजय के पास जाकर कहते है, भाई आप चलो हमारे साथ। धनंजय कहता है, "नहीं तुम सब अयान और प्रथम के साथ जाओ। मुझे दादू -दादी को लेकर महा पंडित के पास जाना है कल की विशेष पूजा के लिए बात करने।सभी उसकी बात मान जाते है।

वो सब घूमने निकल जाते है और धनंजय अपने दादा -दादी को लेकर मंदिर की तरफ चला जाता है। मंदिर पहुंच कर, धनंजय कहता है,"दादू आप बात कर लीजिये मै यही आपका इंतजार करता हूँ। तुम नहीं चलोगे धन। नहीं दादू मै यही ठीक हूँ, आप जाइये।गोपीकांत जी अपनी पत्नी के साथ वहाँ खड़े होते है, तब वहाँ के पंडित उन्हे देख कर बड़े आदर के साथ अंदर लेकर चले जाते है।

इधर धनंजय गाड़ी मे बैठ जाता है।
आरध्या मंदिर से, पूजा करके निचे आती है और देखती उसकी चप्पल टूटी हुई है। उसके साथ दीप्ती और तानिया होती है। आरध्या अपने चप्पल को देख कर कहती है, हे शंभूनाथ!! मेरी चप्पल कैसे टूट गयी। उसकी बातें सुनकर तानिया कहती है, हद है आराध्या!इतनी पुरानी चप्पल कब तक चलती इसका शरीर छोड़ तूने आत्मा तक निकाल दी है। जिसे सुनकर आरध्या मुँह बनाती हुई कहती, मेरी प्यारी चप्पल थी, किसी दुष्ट ने मेरी चप्पल तोड़ दी। उसकी बातें सुनकर दोनों उसे ऐसे देखती है और कहती है, तेरी इस सुखी -मरी चप्पल से किसे दुश्मनी होगी।
रहने दो तुम दोनों। जलती हो तुम दोनों। किससे जलते है, हम दोनों? मेरी चप्पल से।हाआआ!!! दोनों कहती हुई अपना सर ना मे हिलाती हुई आरध्या को देख रही होती है।आरध्या अपने हाथों मे टूटे चप्पल उठा कर अफ़सोस से देखती हुई, दोनों के साथ आगे बढ़ जाती है।♥️

वो तीनों बातें  करती हुई धनंजय की गाड़ी के पास आ कर खड़ी हो जाती है और बात करती हुई आरध्या बार बार उसकी गाड़ी के बोनट हाथ मारती रहती है ।
अंदर से धनंजय उसे यु गाड़ी पर हाथ मारते देख,गुस्से मे उबल रहा होता है लेकिन वो निकलता नहीं है गाड़ी से।
आरध्या चिढ कर कहती है, तुम दोनों चलो। मै जरा जुगाड़ करके इसे ठीक करुं फिर तो किसी चप्पल दुकान मे जाकर दूसरी चप्पल लू। ठीक है तुम आओ हम आगे तब तक चप्पल की दुकान मे है, कहती हुई दीप्ती और तानिया जाने लगती है । ठीक है।

आरध्या ने आज नीले रंग की कुर्ती पहन रखी थी। बालों को एक सिम्पल जुड़ा बना रखा हुआ था, कानों झुमके पूरी तरह से सादगी भरी खूबसूरती की मूरत लग रही थी।ऊपर से धुप मे लाल हो रही उसकी गुलाबी रंगत, गजब का कहर ढा रही थी। साथ मे,अपने चप्पल को ठीक करती और शिकायत करते हुए उसके होंठ। सब कुछ बहुत गौर से धनंजय देख रहा होता है, लेकिन उसके मन मे क्या चल रहा होता है ये तो वही जाने।
सब ठीक था तब तक ज़ब तक. आरध्या ने अपना चप्पल उठा कर उसके कार के बोनट पर नहीं रख दिया और उसे ठीक करने लगी।

धनंजय गुस्से मे कहता है, हद है जाहिल लड़की तब से हाथ मार रही थी ;ये कम था की अब मेरी गाड़ी पर अपनी अजीब सी फुटबीयर भी रख दी है।इसकी तो कहते हुए,वो गाड़ी से  गुस्से मे निकलता है और उसके पीछे आकर खड़ा हो जाता है। आराध्या बस शभू जी से शिकयत करती हुई, अपने चप्पल को ठीक कर रही होती है की पीछे से धनंजय उसकी बाजु पकड़ कर अपनी तरफ घूमता है, ऐसे अचानक करने से आरध्या के बाल खुल. जाते है और वो उसकी तरफ हैरानी से देखती है।धनंजय का ध्यान उसके खुले बालों पर चला जाता है, जिसमे वो बेहद खूबसूरत लग रही होती है। आराध्या चप्पल को अपने पैरों मे पहनती हुई उसकी तरफ अपनी घूरती आखों से देखती है और कहती है , "सनकी इंसान ये क्या पागलपन है!!छोड़ो मुझे!खुद को उससे छुड़ाती है और चली वहाँ से चली जाती है।"

धनंजय तो उसकी खूबसूरती मे खो गया था और उसकी इस हरकत से हैरान हो कर, ज़ब तक उसे कुछ कहता, तब तक उसे जाते हुए देख रहा होता है और गुस्से मे,अपने बोनट पर हाथ मारते हुए कहता है, जाहिल, बत्तमीज लड़की!!! दोबारा मत मिल जाना नहीं तो बहुत बुरा होगा।
तब तक पीछे से मंदिर के बड़े पुजारी जी के साथ उसके दादा -दादी आते है और उसे इतने गुस्से मे देख कर कहते है,"क्या हुआ धन तुम इतने गुस्से मे क्यों हो?

अपनी दादा की बात सुनकर धनंजय खुद को शांत करते हुए कहता है कुछ नहीं दादू। अच्छा!इनसे मिलो फिर पंडित जी से मिलवाते है। पंडित जी उसकी तरफ देखते हुए कहते है, ठाकुर साहब आपके पोते है नक्षत्र बहुत ऊँचा है इनका!! और खुद महादेव की असीम कृपा है इन पर। इस बार तो महादेव इनकी जिंदगी की सबसे कीमती चीज इन्हें देने वाले है।
फिर मुस्कुराते हुए कहते है,रात की महाआरती मे शामिल होने आईये और धनंजय के कंधे पर हाथ रखते हुए कहते है, कल की पूजा से पहले सुबह चार बजे शिप्रा नदी मे स्नान करके समय पर मंदिर पहुंच जाना आप सभी।

उनसे आशीर्वाद लेते हुए, सभी निकल जाते है। धनंजय उनको होटल मे छोड़ कर खुद निकल जाता है।


अयानी और धनवी बाजार मे दुप्पटे देख कर कहती है, कितना सुंदर है। दोनों वहाँ लड़कियाँ  सामान लेने रुक जाती है तो ध्यान कहता है, "तुम दोनों का हो जाये तो फोन कर देना और यही रहना हम यहाँ खुद आ जायेगे। आपसब कहाँ जा रहे भाई!!अरे बड़े भाई आये है लेकिन उनको इस बाजार मे हम कहाँ मिलेंगे इसलिए हम उनके पास जा रहे है।


दोनों दुपट्टे, चुड़ीयाँ देखती हुई, दुकानदार से पूछ रही थी भैया कितने की है ये। वो दोनों वहाँ की चीजों को देखने मे व्यस्त थी तब तक कुछ लडको की नजर उन पर पड़ती है। वो सभी उसके बगल वाले दुकान मे खड़े होकर उन्दोनो को देखते हुए कहते है, यार क्या चीज है बहुत मस्त लग रही है।