Love without wish Chapter-52
- 29 June, 2026
मयंक उसकी बात सुनकर बोखला जाता है और कुर्सी से उठ कर सीधे आराध्या का गला पकड़ने के लिये हाथ बढ़ा देता है। आरध्या सीधे उसके हाथों को पकड़ कर घुमा देती है। अपने दाँत को किचती हुई, " मेरे से होशियारी नहीं बेबकुफ़ गधे ! ठाकुर की आदत है बीना हाथ लगाये मौत देने की लेकिन मेरी आदत है, हाथ भी लगाने की और उसे तोड़ने की भी। तो मेरे से तो ज्यादा होशियार दिखाना मत। वरना सावधानी हटी और दुर्घटना घटी तेरे साथ। मै नहीं चाहती की चांडाल वसुधा अपने बेटे की टूटी फूटी हालत देखे। क्योंकि कुछ देर बाद तो तुम लोगों खुद ही एक दूसरे को मार डालोगे। कह कर उस धक्का दे देती है। वो सीधे जमीन पर गिर जाता है।
मयंक गुस्से मे आरध्या को घूरता हुआ, " मेरा मुँह क्या देख रहे हो पकड़ो इस को बहुत गर्मी है। अभी इसकी गर्मी उतारुगा। " लेकिन वहाँ मौजूद आदमी एक भी अपनी जगह से नहीं हिलते है। एक बार फिर वो चीखता है, तुम लोग बहरे हो गए हो, सुन क्यों नहीं रहे। "
" वो नहीं सुनेगे तुम्हारी बात ! क्योंकि ये सब मेरे आदमी है। ये आवाज़ सुनकर आरध्या के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। सामने खड़ा धनंजय अपनी बाहें फेला देता है। आराध्या आ कर उसके सीने से लग जाती है। तुम ठीक हो ठकुराइन ! वो अपने सर को हा मे हिला देती है। अब हैरानी से मयंक, वसुधा और महेंद्र उन दोनों को देख रहे थे। धनंजय एक नजर उन तीनों को देखता है, " प्रथम ! दादू दादी को लेकर हॉस्पिटल पहुँचो। मै और ठकुराइन आखिरी काम कर के आएंगे।" प्रथम तेजी से अंदर आता है और उसकी टीम दीप्ती के साथ हॉस्पिटल निकल जाते है। अब अयान, धनंजय और आराध्या उन तीनों के सामने होते है। वो तीनों अपने चारों तरफ खड़े आदमियों को देखते है। क्योंकि उन्हें अब तक यकीन नहीं था की वहाँ मौजूद आदमी उनके नहीं है।
धनंजय जब उनके चेहरे को हैरानी से देखता है तो आराध्या की तरफ देख कर, " ठकुराइन तुम कुछ कहोगी या मुझे बोलना है !" आज तुम ही बोलो ठाकुर ! पूरी कहानी मे सिर्फ मेरे ही डायलॉग चल रहे है। कभी तुम भी कुछ बोल दो। " धनंजय अपने सर को ना मे हिलाते हुए कहा, " मुझे अपनी बोलती पत्नी पसंद है। "फिर वसुधा की तरफ उसकी नजर गयी।
" तुम दोनों को क्या लगा की मेरी नजरों से बच कर निकल जाओगे मुझे मालूम नहीं चलेगा। शक तो मुझे मेटल हॉस्पिटल मे ही हो गया था। लेकिन बच्चा हूँ ना ! अपनी माँ बाप के प्यार के मोहब्बत मे हर चीज नजरअंदाज करता गया। क्योंकि मुझे भी इक्छा थी की अपनी माँ की गोद मे कभी सर रख कर ये अहसास करुं की माँ की गोद मे सुकून कैसे मिलता है। लेकिन किस्मत मे हर किसी को सब कुछ नहीं मिलता।
जब तुम लोगों ने जेल मे मौजूद सिंह परिवार को मरवाने की चाल चली। तब मुझे अहसास हो गया की तुम सब को ज्यादा देर तक छोड़ना मेरी सबसे बड़ी गलती थी। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दू की सिंह परिवार और वरुण - अंतरा दोनों सही सलामत है।
अब बचे तुम तीनों तो बात को ज्यादा नहीं बढ़ाते हुए, " तुम तीनों को ऑप्शन देता हूँ...। जितनी गुनाह तुम तीनों ने किये है, उसके सारे सबूत मेरे पास है। इसलिये तुम तीनों मे से, कोई एक गुनाह कुबूल कर लो और दो लोगों को बचा लो। या खुद को बचाने के लिए दूसरे को खत्म कर दो। जो आखिरी बचेगा। उसे मै भारत से बाहर भेज दूँगा और ये मै अपनी ठकुराइन की कसम खा कर कहता हूँ.....! जब मुझे जानते हो तो इतना जानते होंगे की मै अपनी ठकुराइन की कसम झूठी नहीं खाता। अब देखो कौन कर सकते हो !! तुम लोगों के पास तीस मिनट का वक़्त है !"
धनंजय अपनी बात कह कर आरध्या को लेकर सामने मौजूद सोफे पर बैठ जाता है। आरध्या उसे घूर रही थी। " ऐसे क्यों घूर रही हो ठकुराइन !" तो कैसे घुरू तुम्हें ठाकुर ! तुमने मेरी झूठी कसम क्यों खायी। देखो ठाकुर ! अगर मुझे कुछ हो गया ना तो महादेव की सोगंध मै तुम्हें उस लोक से भी इस लोक मे जीने नहीं दूँगी। तुम्हारा दिन रात का जीना मुहाल कर दूँगी !" धनंजय अपनी बीबी की बहकी बहकी बातें सुनकर उसे गर्दन से पकड़ कर खुद के करीब करते हुए कहा, " जानता हूँ ठकुराइन ! तुम जिस लोक मे जाओगी। वहाँ तांडव मचाओगी। तुम्हें मेरे सिवा ना यमराज, ना इंद्र और ना ब्रह्मा, विष्णु, महेश संभाल सकते है। इसलिये घबराओ नहीं तुम इसी लोक मे रहोगी। तांडव करते हुए।
अब सामने देखो। आराध्या सामने देखती है।
जहाँ वसुंधरा और मयंक दोनों एक साथ महेंद्र को घूरते है।महेंद्र उन दोनों को देख कर बेहद दुख भरी मुस्कान से देखता है। वसुधा अपनी बात को संभालती हुई कहा, देखो महेंद्र मुझे गलत मत समझना लेकिन तुम भी चाहते हो की मै और हमारा बेटा जिन्दा रहे। इसलिये तुम्हारा मरना जरूरी है। मयंक ने कहा, नहीं मोम ! डैड को क्यों मार रही है। इससे अच्छा होगा की मुझे मार दो। लेकिन वसुधा ने उसे धकेल दिया और बंदूक महेंद्र की तरफ घुमा दिया। तुम दूर रहो मयंक '! वैसे भी महेंद्र अपनी जिंदगी जी चुके है। बात खत्म हुई। सालों बाद सब कुछ हमारे नाम आया है और मै इसे ऐसे नहीं खत्म होने दूँगी।
वसुंधरा की बात सुनकर धनंजय की मुट्ठीयाँ आराध्या पर कस जाती है। आराध्या ने महेंद्र की तरफ देखा और बेहद अफ़सोस से कहा, " कैसी मोहब्बत है आपकी ठाकुर साहब ! जिस मोहब्बत के लिए आपने अपनी धर्मपत्नी और अपने तीनों बच्चों को धोखा दिया और अपनी पत्नी को मौत दे दी। आज आपकी वही मोहब्बत को जब दो लोगों मे से किसी एक को चुनने की बारी है तो उसने आपको चुना। यही मोहब्बत है आपकी ठाकुर साहब और आपके कर्मो का फल। "
महेंद्र ने एक नजर आराध्या की तरफ देखा और हाथ जोड़ कर धनंजय की तरफ देखा, " माफ़ी नहीं मांगूगा क्योंकि उसका हक नहीं है मुझे। लेकिन आज मुझे अपने कर्म पर अफ़सोस है की मै एक अंधपन मे क्या से क्या करता गया। सच कहते है लोग, जब इंसान को गलत चीजों की लत लगती है तो तब तक नहीं छूट जाती, जब तक की मौत ना हो जाये। आज मुझे मेरी मौत स्वीकार है क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी मे वसुधा नामक की जहरीली लत के कारण, अपना सब कुछ बर्बाद कर दिया। ना अच्छा बेटा बना, ना पति और ना पिता बना। जिसके लिए सब कुछ छोड़ा। उसने आज मुझे छोड़ने मे एक पल भी नहीं लगाया। "
महेंद्र ने कह कर वसुधा से बंदूक छीनने की कोशिश, " मुझे बंदूक दो वसुधा ! कम से कम तुम्हारी ये आखिरी ख्वाहिश पूरी कर दू। लेकिन ये बता दू की ये मै तुम्हारे लिए नहीं मयंक के लिये कर रहा हूँ। तुम मेरी तरह मेरे बेटे का साथ मत छोड़ना। " वसुधा उसे बंदूक नहीं देती है और महेंद्र को दिखाती हुई कहा, " मुझे पागल समझ रखा है तुम ने जो तुम्हें बंदूक दू और तुम मुझे मार दो। मयंक तो पागल हो गया है। तुम्हें मै मारुंगी और रही बात प्यार की तो महेंद्र ठाकुर मैंने तुमसे कभी प्यार नहीं किया था। मुझे सिर्फ तुम्हारे पैसे से प्यार था लेकिन तुम्हारे जीते जी मै कभी सुखी नहीं हुई। तुम्हारे मरने के बाद मै जरूर सुखी हो जाउंगी। कहती हुई वो गोली चला देती है। मयंक गुस्से मे उसकी तरफ बढ़ता है। लेकिन तब तक दो गोली महेंद्र के सीने पर लग जाती है ।
आराध्या चिहुक कर धनंजय को पकड़ लेती है। लेकिन धनंजय की आँखे कठोर थी और वो कुछ नहीं कह रहा था। अब वसुंधा ने तेजी से बंदूक उठा लिया। फिर धनंजय की तरफ तानते हुए कहा, अब तू मरेगा धनंजय ठाकुर ! क्योंकि अब मुझे कोई परेशानी नहीं चाहिए। आराध्या घबरा कर धनंजय को देखती है। लेकिन धनंजय खामोश था। आराध्या ने धनंजय को बाहों मे छिपाने की कोशिश की.. ठाकुर !' धनंजय ने उसे अपने सीने से लगा लिया, " शांत ठकुराइन ! मृत्यु अंतिम सत्य है। इसलिये अगर आज मौत निश्चित है तो घबराना कैसा !"
मयंक चीखते हुए, " मोम ! आपने ये क्या किया ! क्यों मारा आपने डैड को। हमने ये नहीं चाहा था। " चुप बिल्कुल चुप :! बेबकुफ़ बाप की औलाद। ये सब तेरे लिये किया है लेकिन उससे पहले इस धनंजय ठकुर का ख्याल खत्म करुँगी। कहती हुई फिर एक गोली चलती है और फिर दूसरी गोली चलती है। आराध्या बेहोश हो जाती है। अयान भागता है धनंजय की तरफ क्योंकि धनंजय ने सबको मना किया था की कोई गोली नहीं चलाएगा।
धनंजय अपनी बाहों मे बेहोश आराध्या को देखता है और उसे ठीक से सोफे पर बिठा देता है। अयान और धनंजय वसुधा, महेंद्र और मयंक के पास जाते है। वसुधा हैरानी से अपने बेटे को देख रही थी जिसे दो गोली लगी थी। वही उसके सीने मे भी एक गोली लग गयी थी। महेंद्र ठाकुर ने मरती हुई वसुधा को देखा। वो रोती हुई मुश्किल से मयंक के पास आती है, खुद उसे गोली लगी थी लेकिन मुश्किल से अपने बेटे को देख, " मयंक मेरा बच्चा ! " लेकिन मयंक की आँखे बंद हो गयी थी। वो चीखती हुई महेंद्र को देखती है।क्यों चलाई तुमने गोली मुझ पर। अगर तुम मुझ पर गोली नहीं चलाते तो मेरी बंदूक की गोली मेरे बच्चे को नहीं लगती। मरते मरते तुमने सब कुछ खत्म कर दिया।
महेंद्र ने अपने मरे हुए बेटे को देखा, " मैंने तो तुम पर गोली चलाई वसुधा क्योंकि मुझे दर था की कहीं तुम मेरी तरह मेरे बेटे को भी ना मार दो। लेकिन किस्मत देखो तुमने अपना सुहाग और कोख दोनों को अपने हाथों मौत दी। यही हमारे पापो का कर्म है ! फिर उसने धनंजय की तरफ देखा और कहा, हो सके तो..... आगे वो बोल नहीं पाया और उसकी आखिरी सांस भी खत्म हो गयी। वसुधा एक तरफ अपने मरे बेटे और दूसरी तरफ मरे हुए पति को देख बेहद नफ़रत से धनंजय को देखती है। अपने सीने पर बहते हुए खुन पर हाथ रख कर कहा, मै तुम्हें बद्दुआ देती हूँ.... की फिर एक गोली चलती है और वसुधा की सांसे वही थम जाती है।
धनंजय और अयान पीछे मुड़ कर देखते है। आराध्या ने वसुधा को आगे बोलने से पहले गोली मार दी। " ठकुराइन ! ये क्या किया तुमने। कुछ नहीं किया ठकुर ! कहते है मरने वाले की बद्दुआ कभी खाली नहीं जाती और मै नहीं चाहती थी की कोई दुष्ट आत्मा जाते जाते मेरे पति और परिवार के लिए कुछ बुरा भला कहे। " अयान ने अपने आदमियों से कह कर सब कुछ क्लियर करने को कहा।
धनंजय उसकी तरफ बढ़ता है की आराध्या को अपनी बाहों मे भर लेता है, मै बेहद किस्मत वाला हूँ की मुझे तुम जैसी जीवनसाथी मिली है। "आराध्या एक बार फिर उसकी बाहों मे बेहोश हो जाती है। धनंजय परेशान होते हुए उसे बाहों मे उठा लेता है," अयान पीछे दस दिनों ने बार बार ठकुराइन बेहोश हो रही। " तो तू सोच क्या रहा हॉस्पिटल चलते है। मै ध्यान को फोन करके सब कुछ बता देता हूँ।
कुछ देर बाद ध्यान सब कुछ पुरे परिवार को एक एक कर के बता देता है। कैसे इतने दिनों मे महेंद्र और वसुधा ने किया और पहले क्या किया था। उसकी बात सुनकर सभी दुखी थे। गोपी जी ने बेहद अफ़सोस से कहा, " सुमती जी ! पूरा जीवन हम पैसे और सुख सुविधा के पीछे भागने मे लगा देते है। लेकिन अगर पैसे से जीवन सुखी होता तो हमारा जीवन कभी दुखी नहीं होता। पैसा जीवन मे उतना ही हो जितना जीवन जीने के लिए पर्याप्त हो। जीवन मे पैसे से ज्यादातर रिश्ते और अपने बच्चे पर ध्यान दिया होता तो वो मनुष्य के भेष मे राक्षस नहीं बनता। "
सुमती जी ने रोते हुए कहा, आप ऐसा क्यों कह रहे जी ! क्या हमे मालूम था की हमारे कोख मे राम नहीं रावण ने जन्म लिया है। ये सब हमारे पूर्व जन्म का कर्म है। आप दिल को मत दुखाईये। अंत भला तो सब भला।
तानिया और दीप्ती ने भी कहा, अब ये चिंता छोड़िये दादी -दादू ! अब सब ठीक है।
हॉस्पिटल मे, डॉक्टर आराध्या को चेक कर रही थी। उसके बाद बाहर वो धनंजय से मिलती है। धनंजय के चेहरे पर परेशानी साफ दिख रही थी। आयान ने उसे शांत रहने के लिये बार बार उसके पीठ को सहला रहा था।
"क्या हुआ डॉक्टर मेरी वाइफ को !"
"रिलेक्स मिस्टर ठकुर ! सबसे पहले आपकी पत्नी बिल्कुल ठीक है और बधाई हो आप पापा बनने वाले है। आपकी पत्नी टू मंथ प्रेग्नेंट है।"
"क्या ! धनंजय ने ख़ुश होकर कहा। मुबारक हो यारा ! बाप बन गया। धनंजय के गले अयान लग जाता है। धनंजय अंदर आराध्या के पास आता है। जो अब भी बेहोशी थी। उसके माथे को चूम कर कहा, डॉक्टर मेरी वाइफ को होश नहीं आया है!
आ जायेगा कुछ देर मे, मैंने कुछ विटामिन और मेडिसिन लिख दी है। आप बस थोड़ा ध्यान रखियेगा।
कुछ देर बाद आराध्या को होश आता है। अपने सामने धनंजय को देख उसने घबरा कर कहा, ठाकुर ! वो सब मैंने !" स्स्स्स... कुछ नहीं हुए ठकुराइन। आराध्या उसे देखती है। धनंजय मुस्कुरा कर उसके होठो पर अपने होठो को लगाते हुए कहा, " थैंक यू ! ठकुराइन मुझे पापा बनाने के लिए। "क्या कहा ठकुर ! धनंजय उसके हाथों को थाम कर उसके पेट पर रख देता है। दोनों मुस्कुराते हुए एक दूसरे के होठो पर अपने होठो को चूम लिया।
*************************
छः महीने बाद,
ठकुर परिवार की खुशियाँ लौट आयी थी। धनवी और संकल्प ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम सब ने संविका सिंह रखा। वही प्रथम और अयानी को एक बेटा हुआ जिसका नाम सब ने प्रज्ञान रखा।
आराध्या की प्रेग्नेंसी का आठवा महीना चल रहा था और उसके साथ साथ दीप्ती और तानिया भी प्रेग्नेंट थी। दीप्ती का छठा महीना था तो तानिया का चौथा।
मिश्रा और चौधरी परिवार एक बार फिर से ठाकुर हवेली मे रहने लगे थे। गोपी जी और सुमती जी ने जब से ये खुशी सुनी। इस उम्र मे भी वो अधिक जवान हो गए थे।
कहते खुशियाँ से उम्र बढ़ जाती है। अयानी और प्रथम फिर से ठाकुर हवेली मे पहले की तरह रहने लगे थे। सिंघ परिवार भी भोपाल सिफ्ट हो चुका था।
दीपा, रिंकू, दीपक और मुकेश जी ये चारों एक आदर्श बेटे बहु की तरह गोपी और सुमती जी का ख्याल रखने लगे थे। साथ ही साथ अयानी के बच्चे और दीप्ती और तानिया का भी ध्यान रखने लगी थी।
आराध्या का ध्यान खुद धनंजय रखा करता था। इसलिये किसी को उसका ख्याल रखने की जरूरत नहीं थी। आराध्या का इन दिनों मूड स्विंग ज्यादा होने लगा था। वो काफ़ी अपने ठाकुर से लड़ती, अजीबोगरीब फरमाइश करती। इस चक्कर मे एक दूसरा फ्रिज लाकर धनंजय ने रखवा दी थी क्योंकि आधी रात मे उसे कभी किसी तो कभी किसी फ्लेवर की आइसक्रीम खानी होती थी। उसके साथ साथ तानिया और दीप्ती के नखरे भी थे। इसलिये धनंजय, अयान और ध्यान ने एक आइसक्रीम फ्रिजर ला कर रख दिया। उसमें जितनी फ्लेवर आइसक्रीम के होते, सब रखवा दिया था। फ्रिज मे सभी तरह की मिठाई रोज आती और रोज ताजी मिठाई रखी जाती थी। चॉक्लेट भी रखे जाते थे। उसके साथ साथ तीनों भाई पापड़ी और भेलपूरी के सभी आइटम दीपा जी कह कर बनवा कर रखवा दिया था। जब जिसे जो खाने की इक्छा होती, उसे बना कर दिया करते थे।
ये सब तो ठीक था लेकिन आज आराध्या का गुस्सा सातवें आसमां था और वो धनंजय से नाराज थी। गुस्से मे वो बालकनी मे बैठी हुई थी। तभी धनंजय एक बाउल मे चटपटा फ्रूट सलाद ले कर आया और उसके पास आ कर बैठ गया।
"क्या बात है ठकुराइन ! आज इतने गुस्से मे क्यों हो?" तुम बदल गए ठाकुर अब तुम मुझ से प्यार नहीं करते। प्यार तो छोड़ो मुझे देखते भी नहीं। आराध्या उसकी तरफ मुँह फुला कर देखती है। पहले से वो बेहद गोल मटोल हो गयी थी। उसे इस तरह से देख धनंजय बीना कुछ कहे उसके होठो पर अपने होठो को रख देता है। आराम से उसे बाहों मे थाम कर बेहद पेशनेटली चूमने लगता है। जब आराध्या की सांसे भारी होने लगती है तो उसके होठो को चूमना छोड़ देता है। लेकिन उसे खुद से दूर नहीं करता और अपने होठो को उसके चेहरे पर घुमाते हुए अपनी कशिश भरी आवाज़ मे कहा, " तुम नहीं जानती मैंने खुद को कितना कंट्रोल मे रखा है ठकुराइन ! तुमसे मोहब्बत मेरी किसी जन्म मे नहीं खत्म होगी। " फिर उसकी आखों मे देखते हुए कहा, " तुम मेरी जिंदगी की पहली लड़की हो जिसने मेरे दिल और दिमाग़ पर सीधा वार किया और ऐसे समाई की फिर उससे मैंने तुम्हें कभी निकलने नहीं दिया। अगर हमारे जुड़वा बच्चे की बात नहीं होती तो ना जाने मै कब का तुम्हें फिर से अपनी दुनिया मे समां लेता है। "
"ठकुराइन !हम्म्म ! तुम मेरी जिंदगी की बेहद खूबसूरत ख्वाब हो जिसे मैंने हकीकत के रंग मे पाया है। "
" ठाकुर ! कभी सोचा नहीं था की जिंदगी इस कदर हसीन हो जाएगी। कभी ख्वाब मे भी ऐसे जीवनसाथी की कल्पना नहीं की तुम तो महादेव का दिया हुआ वरदान हो मेरे लिए। "धनंजय ने मुस्कुराते हुए कहा, सभी मोहब्बत की कहानी शादी से पहले शुरु होती है लेकिन हमारी मोहब्बत की कहानी शादी के बाद शुरु हुई। "
आराध्या ने मुँह बनाते हुए कहा, इसलिये तुमने कभी मुझे परपोज़ नहीं किया। हाय मेरे कितने अरमान थे। उसने चहकते हुए कहा। धनंजय उसके गालों को चूमते हुए, " मेरी बड़बोली ठकुराइन ! मोहब्बत के जो अहसास हमने जिये और जीतनी सिद्द्त, भरोसे और इंतजार से जिये है। उसके आगे ये परपोज़ तो कुछ भी नहीं है। फिर भी तुम चाहती हो तो मै तुम्हें परपोज़ कर दूँगा !"
आराध्या उसके सीने से लग जाती है, " नहीं ठाकुर '! तुमने तो मुझे वो उड़ान दिया। जो दुनिया के बहुत कम मर्द अपनी पत्नी को दे पाते है। तुमने कभी मुझ से सवाल नहीं किया कोई जबाब नहीं पूछा। तुम्हारी मोहब्बत और प्यार जताने का तरीका हमेशा से मेरी रूह को छुवा है। "
"हम्म्म ! इसलिये करीब आने मै कितना वक़्त लगवा दिया ! धनंजय ने उसे छेड़ते हुए कहा।"
"अच्छा जी और ये जो पिछले छः महीने से मै मचल रही हूँ। तब तुम क्या करते हो मुझे थपकी दे कर सुला देते हो। तब कहाँ जाती है तुम्हारी मोहब्बत। एक बार भी नहीं देखते मेरी तरफ।"
"अच्छा ! मेरा हाल कभी देखा है तुमने जो इतनी खूबसूरत बीबी, अपने बच्चे की माँ के करीब होते हुए भी कुछ नहीं कर पाता है।"
अब चुप हो जाओ ठाकुर बहुत बेशर्मी कर ली तुमने। धनंजय उसे बाहों मे उठा कर कमरे के अंदर आता है, " तुमने मेरे अरमानो को जगाया है तो अब उसकी प्यास तो बुझाने दो। लेकिन ठाकुर '! शुशु.... भरोसा रखो मुझ पर लेकिन आज अब रुकुंगा नहीं।
धनंजय प्यार से उसे बिस्तर पर सुला देता है। दोनों धीरे धीरे एक दूसरे से प्यार जताने लगते है।
******************
अयान अपनी बाहों मे लिये दीप्ती को प्यार कर रहा था। पुरानी बीती बुरी करवाहट के बाद दोनों के रिश्तों मे मजबूती आयी थी। अब दीप्ती पहले से ज्यादा समझदार हो गयी थी। दोनों के कपड़े निचे गिरे हुए थे। अयान बेहद आराम से उससे मोहब्बत जता रहा था और दीप्ती भी उसका साथ दे रही थी।
कुछ देर बाद दीप्ती उसके सीने से लगी हुई थी। अयान उसके बालो को सहला रहा था। अयान जी ! थैंक यू मुझे अपनी जिंदगी मे शामिल करने के लिए। अयान दीप्ती की बात पर उसके होठो को चूम लेता है, मोहब्बत मे थैंक यू और सॉरी अच्छी नहीं लगती दीप्ती। मोहब्बत मे सिर्फ मोहब्बत अच्छी लगती है। तुमने मुझे पूरा किया। जब तक तुम नहीं मिलिए थी, जीवन अधूरा था। मेरी वीरान जिंदगी मे रौशनी बन कर आयी हो तुम। मुझे पूरा करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया। दोनों एक दूसरे को देख कर एक दूसरे की बाहों मे समां जाते है।
ध्यान आराम से तानिया के पैर मे तेल लगा कर उसे मालिश कर रहा था। तानिया मुस्कुराते हुए उसे देख रही थी।" ऐसे क्या देख रही हो बीबी। ये देख रही हूँ पति देव की मेरी किस्मत मुझ पर कितनी मेहरबान है जो मुझे अच्छा पति और परिवार सब कुछ मिल गया। "
"ये बात तो मै भी कह सकता हूँ की मुझे भी अच्छी पत्नी मिली है।आज कल के वक़्त मे जहाँ रिश्तों की गरंटी नहीं है। सब कुछ इंसान देख परख कर अपनी जीवन मे करता है लेकिन रिश्ते को परखने का कोई पैमाना नहीं होता है। कब, कहाँ और कैसे कौन धोखा दे दे। ये हमे मालूम नहीं होता है। वहाँ अगर मुझे इतना प्यारा रिश्ता मिला तो वो मेरी अच्छी किस्मत है।"
तानिया को अपने बाहों मे भरते हुए, " मुझे आज भी याद है की कैसे डरी सहमी तुम पहले दिन ऑफिस आयी थी और मेरे दिल मे समां गयी थी।" तानिया उसके बाहों मे लिपट जाती है। ध्यान उसके होठो पर अपने होठो को रख देता है।
संकल्प जी ! कहाँ है आप और संविका कहाँ है, कमरे मे आती हुई धनवी ने कहा। तभी पीछे से संकल्प उसे बाहों मे भर लेता है और अपने चेहरे को उसके गर्दन मे घुसा कर, " आज संवि को मोम डैड के साथ है क्योंकि आज उसके डैड को उसकी मोम से प्यार करना है। " संकल्प जी लेकिन ! लेकिन कुछ नहीं मेरी जान ! आज बस मै और तुम। संकल्प उसे सीधे बिस्तर पर सुला देता है और उसके होठो पर अपने होठो को रख देता है। दोनों एक दूसरे की मोहब्बत मे सब कुछ भूल जाते है।
अयानी और प्रथम अपने बेटे प्रज्ञान को बीच मे लिए मुस्कुरा रहे थे। आप ऐसे क्यों मुस्कुरा रहे है प्रथम। कुछ नहीं अयानी ! बस अपनी जिंदगी को देख रहा हूँ। कभी सोचा नहीं था की मुझ जैसे अनाथ का भी घर बसेगा और उसका भी परिवार होगा। तुम मेरी जिंदगी को सम्पूर्ण करती हो और जब मै अपने बच्चे को देखता हूँ तो ख्याल आता है की इसे हम दोनों माता पिता दोनों का प्यार देंगे। हमारा बच्चा कभी हमारी तरह बीना माता पिता के नहीं रहेगा।
बच्चे के जीवन मे उसके माता पिता का महत्व क्या है? ये उन बच्चों से पूछो जिनके माता पिता नहीं होते है। ये दर्द हम दोनों ने जिया है। इसलिये हम कभी हमारे बच्चे को ऐसा अहसास नहीं होने देंगे।
अयानी आ कर उसके सीने से लिपट जाती है और प्रथम मुस्कुरा कर उसे अपनी बाहों मे भर लेता है।
धनंजय बेहद आराम से आराध्या को प्यार कर उसे अपनी बाहों मे लिये सोया रहता है की आधी रात को आराध्या को दर्द होने लगता है और वो तेज आवाज़ मे चीखती है, " ठाकुर ! मै मर जाऊगी... आह... दर्द हो रहा है। " ठकुराइन.. ऐसा मत बोलो जान ! नहीं ठाकुर लगता है डिलीवरी होगी। लेकिन अभी तो.... अच्छा छोड़ो। भागते हुए धनंजय जल्दी से उसे गाउन पहना देता है। जल्दी से अयान को फोन करता है। अयान जो सो रहा था फोन की आवाज़ सुनकर उठ जाता है, हैलो ! अयान गाड़ी निकाल ठकुराइन को दर्द हो रहा है। ध्यान को बोल हॉस्पिटल मे सब तैयार रखे। "क्या लेकिन... अच्छा तू आ मै गाड़ी निकलता हूँ।
दीप्ती.. उठो भाभी को दर्द शुरु हो गया है। क्या लेकिन अभी तो आठवा महीना चल. रहा है। पता नहीं यार....! अभी चलो। कुछ देर मे पूरा घर हॉल मे इकट्ठा हो गया। धनंजय की गोद मे आराध्या चीख रही थी। सभी तेजी से हॉस्पिटल पहुंचते है। प्रथम और संकल्प पहले ही हॉस्पिटल पहुंच चुके थे।
आराध्या ने धनंजय के कोलर को पकड़ रखा था। धनंजय उसे संभालते हुए अंदर ले जाता है। शांत ठकुराइन। सब ठीक होगा। तुम्हें कुछ नहीं होगा। डॉक्टर की तरफ उसकी नजर जाती है। जो आराध्या को देख रही थी। ट्विन्स है इसलिये ऐसा हुआ। धनंजय लेबर रूम मे आराध्या के हाथों को थामे उसके माथे को सहला रहा था। डॉक्टर अपना काम करने लगे थे। आराध्या की चीख उसे भी घबराने के लिए मजबूर कर रही थी लेकिन वो आराध्या के साथ मजबूती से खड़ा रहा। नार्मल डिलीवरी हो रही थी तो दर्द उसे ज्यादा झेलना पर रहा था।
बाहर सभी परेशान होकर चक्कर काट रहे थे। अंदर धनंजय और आराध्या थे। कुछ देर बाद बच्चे की रोने की आवाज़ आयी तो धनंजय मुस्कुरा दिया। लेकिन आराध्या अब भी दर्द मे थी क्योंकि अभी पहला बच्चा निकला था। इसलिये धनंजय अब भी उसके साथ खड़ा था। कुछ देर मे आराध्या की एक तेज चीख के साथ दूसरे बच्चे की भी रोने की आवाज़ आयी।
डॉक्टर मुस्कुराते हुए उन दोनों के पास आती है, मुबारक हो एक बेटी हुई है और एक बेटा। बेटी पांच मिनट पहले हुई है। दोनों पति पत्नी बेहद सुकून और खुशी के साथ अपने प्यार के अंश को देखते है। कुछ देर बाद पूरा परिवार उन दोनों की खुशी मे शामिल हो जाता है।
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