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Love without wish Chapter-47

Love without wish Chapter-47

रात का वक़्त ठाकुर हवेली ! पूरा परिवार इक्क्ठा था रात के खाने पर, सिवाय दीप्ती के। आराध्या की तरफ तानिया ने चिंता मे देखा क्योंकि उन लोगों को छोड़ किसी को नहीं मालूम था की दीप्ती कहाँ है? घर वालों के पूछने से पहले दीप्ती का आना जरूरी था। आराध्या ने अयान से पूछा तो उसने निराशा मे कहा, वो मेरे फोन का कोई जबाब नहीं दें रही है भाभी !"
आराध्या ने गुस्से मे उसे फोन लगाया। कुछ ही रिंग के बाद दीप्ती फोन उठाने के साथ कहती है, " हाँ जीजी बोलो !" आराध्या सबसे एकांत होकर अपनी दबी जुबान से कहा, " जीजी की बच्ची अगले दुइ मिनट मे तुम हमको ठाकुर हवेली की अंदर नाही दिखी तो हम बता रहे है की तुमरे साथ हम क्या करेंगे !" दीप्ती तुरंत फोन काट देती है।

"अरे बड़की ! अब आबो खाना नहीं खायके है का तुमका और छुटकी कहाँ है ! जब से हम इहा आये है, वो हमको दिखी नहीं अब तक !" दीपा जी की बात सुनकर आराध्या उनके पास आती है। फिर उनकी खाना लगाने मे मदद करती हुई कहा, वो चाची ! छुटकी !हम यहाँ है अम्मा ! आराध्या के साथ साथ दीपा जी भी पीछे मुड़ कर देखती है तो दीप्ती खड़ी थी। उसको ऊपर से निचे देखते हुए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन रिंकू और दीपा जी दोनों अपने मुँह पर हाथ रखती हुई कहा, " हाई मोरे भोलेबाबा ! इका पहन लियो है तूने मौरी ! सब संस्कार शिप्रा नदी मे बहा दियो है काई तूने ! तनिक लाज नहीं है इस मौरी को !" वसुंधरा जी ने उन दोनों को टोकते हुए कहा, " अरे आप दोनों नाराज मत हो। हमें कोई आपत्ति नहीं है और अभी इस उम्र मे ये नहीं पहनेगी तो कौन पहनेगा। "जाओ दीप्ती बेटा कपड़े बदल कर जल्दी खाने पर आ। दीप्ती मुस्कुराते हुए वसुंधरा को देखती है और अंदर चली जाती है।
दरअसल, आज कल दीप्ती वेस्टर्न ड्रेस ज्यादा पहने लगी थी। अब भी उसने वन पीस पहन रखी थी। जो किसी को पसंद नहीं आया था क्योंकि दीप्ती मे ये अचानक बदलाव आया था। आराध्या की नजर दीप्ती पर थी लेकिन अभी उसने कुछ नहीं कहा।

कुछ देर बाद पूरा परिवार खाने पर बैठा था। खाना खाते हुए, धनंजय ने कहा," दीप्ती आज कल तुम घर मे बैठे बोर हो जाती होगी क्यों ना फिर से ऑफिस ज्वाइन कर लो। " दीप्ती कुछ कहती उससे पहले वसुंधरा जी ने कहा, " नहीं धनंजय ! बड़ी बहु तो ऑफिस जाती ही है। घर को छोटी बहु तानिया ने संभाल लिया तो मेरे पास दीप्ती रहती है। उसे मेरे पास ही रहने दो, मेरा मन लगता है। क्यों दीप्ती बेटा !" वसुंधरा जी की बात पर धनंजय ने कहा, जैसा आपको ठीक लगे माँ ! अगर दीप्ती को भी आप के साथ अच्छा लगता है तो मुझे कोई परेशानी नहीं है।तभी दीप्ती ने मुस्कुराते हुए कहा, मुझे मोम के साथ रहना पसंद है भाई ! मोम के साथ रहती हूँ तो मुझे सुकून महसूस होता है। "

आराध्या ने उसकी बात सुन कर उसे घूरते हुए कहा, " ध्यान रखना छोटी कही खुद के सुकून के लिये तू किसी और का सुकून ना छीन ले !" ये कैसी बात कर रही हो तुम आराध्या, बीच मे वसुंधरा जी बोल उठी। आराध्या ने एक नजर वसुंधरा जी को देखा और फिर दीप्ती की तरफ देखते हुए, बेहद गंभीर आवाज़ मे कहा, " जब बच्चे गलती करने के बाद बड़ो की पीठ के पीछे छिपने लगे तो इसका मतलब ये नहीं होता की बच्चे की गलती माफ़ी के लायक है। इसलिये माँ ! माना की आप दीप्ती से बहुत प्यार करती है लेकिन जब दीप्ती से गलती हो तो उसे छिपाने की कोशिश नहीं करे !"

खाने के टेबल का माहौल थोड़ा गर्म हो गया था। जिसे देख धनंजय ने धीरे से कहा, " बाद मे बात करते है ठकुराइन ! " आराध्या ने दीप्ती को घूरते हुए कहा, ठीक है ठाकुर, लेकिन बात अभी होगी और दीप्ती को मेरे सवाल के जबाब देने होंगे।आराध्या ने अपने रुख को साफ किया। उसके रुख पर दीप्ती खाने के प्लेट को आगे बढ़ा देती है और उठ कर खड़ी हो जाती है। उसके तेवर देख कर आराध्या के साथ साथ अयान, और धनंजय की मुठियाँ कस जाती है। गोपी जी ने कहा, दीप्ती बच्चे ! खाने के टेबल से ऐसे क्यों उठ गए। क्योंकि बड़ो को उसकी हरकत कुछ समझ मे नहीं आया। दीपा जी ने भी कहा, " ए मौरी ऐसे काहे उठ गयी तुम ! बैठ और अन्न माता को हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग। ऐसे अपमान नहीं करते है अन्नपूर्णा का। ये संस्कार तू कैसे भूल गयी।
तभी फिर से वसुंधरा ने कहा, धनंजय ! तुम आराध्या बहु को मना क्यों नहीं कर रहे हो की जब सब खाना खा रहे हों। तब ऐसी बाते ना करे। बच्ची से जो भी पूछने थे खाना खाने के बाद पूछे जा सकते थे।वसुंधरा की बातों पर धनंजय और आराध्या किसी ने नहीं जबाब दिया।

दीप्ती ने मौका मिलते ही कहा, मोम आप किसे समझा रही है। जीजी तो खुद को भगवान समझती है। जब इनकी कोई बात जीजा जी नहीं काटते तो कोई और क्या ही काटेगा। लेकिन जीजी ! जब तक मोम नहीं आयी थी तो तुम्हारा हक था की मुझ से सवाल करो। लेकिन अब मोम आ चुकी है और अब जो भी मै करती हूँ वो मोम से पूछ कर करती हूँ। आज भी मै बाहर मोम से पूछ कर गयी तो। चाहो तो पूछ लो। खुद को बड़की बड़की कहलाते कहलाते तुमको घमंड नहीं हो गया है। " छुटकी ऐसे कैसे तुम बात कर सकती हो बड़की से , दीपा जी हल्की तेज आवाज़ मे चीखती है। दीप्ती की बातें सुन कर सभी सन्न हो गए थे क्योंकि किसी को उम्मीद नहीं थी की दीप्ती ऐसी बातें करेगी। खाना तकरीबन सब का खत्म हो चुका था लेकिन ऐसे माहौल मे, किसी से और खाया नहीं गया।

तानिया ने हल्की आवाज़ मे कहा, दीप्ती क्या हो गया है तुम्हें। ये कैसी बात कर रही हो। आज तक कभी तुमने ऐसी बात नहीं की !"

ठाकुर हवेली मे हॉल का माहौल बेहद गर्म हो चुका था। तानिया और दीप्ती आमने सामने थी। दीप्ती ने उसे घूरते हुए कहा, " तुम को क्या फर्क पड़ने वाला है तानी। तुम और जीजी तो ठाकुर परिवार की बहु हो। ठकुराइन हो और मै क्या हूँ। पता नहीं कौन और कैसे चतुर्वेदी परिवार है। जो ठाकुर परिवार के टुकड़े पर पल रहा है। वो तो मोम मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती है तो मै हूँ नहीं तो... आगे कुछ कहती तब तक दीपा जी उसके गाल पर एक थप्पड़ मार देती है। वसुंधरा आगे बढ़ कर कुछ कहना चाहती है लेकिन महेंद्र जी उनका हाथ पकड़ लेते है।

" का री मौरी ! बोराई गयी हो क्या तुम। अरे आज तक हम कभी तुम मे और बड़की मे कोनो फर्क नाही किये रहे और तो और तानी को भी हम अपनी बेटी मानत रहे। जहर उगलते उगलते तुम तो आज जमाई बाबू को भी नहीं छौड़ी। अरी तुम जैसी बेटी से अच्छा हम बाँझ रहते। " दीपा जी रोती हुई अयान की तरफ मुड़ गयी जो उसकी बात से लड़खड़ा कर गिरने लगा था। जिसे धनंजय और प्रथम ने थाम लिया था। उसके आगे दीपा जी हाथ जोड़ कर कहा, " हम नाही जानत है बिटवा की हमरी मौरी पर कौन प्रेत चढ़ गवां है लेकिन हम एक बेटी के माई तुमसे इतना कहेंगे की तुम जेईसन जमाई, भोलेनाथ सात घर क्षत्रु को भी दें। कहती हुई फ़फ़क कर रोने लगती है। अयान उनके हाथ को थाम लेता है और अपना सर ना मे हिला कर उनको रोने से मना करता है।

दीप्ती कुढ़ कर आराध्या के पास आती है जो अब तक उसकी बातों से सदमे मे खड़ी थी।"  आ गया तुमको मजा ! मिल गयी तुम्हारे कलेज़े को ठंडक ! आज हमरी माई को भी हम नहीं चाहिए। सब को सिर्फ तुम चाहिए जीजी। माई के घर मे, माई तुमको लाख बुरा भला कह ले। लेकिन उसकी चिंता मे, तुम्हरी फ़िक्र सबसे ज्यादा रहती है। हम तो कभी ऊ को दिखे नहीं। इस घर मे भी तुमरे चर्चे है। जब तक मोम नहीं थी तब भी और अब वो आ गयी है तब भी। घर की चाभी से लेकर, हर एक फैसला तक बीना तुम्हारी मर्जी के नहीं हो सकता है।
अरे और तो और मोम सिर्फ कहने के लिये घर की बड़ी है। सास के रहने के बाद भी, सब कुछ तुम्हारे हाथ मे है। तुम कहोगी तो उठेंगे और तुम कहोगी तो बैठेंगे। तानिया तो वैसे भी ठाकुर परिवार की बहु है तो उसकी बात तो रखी जाएगी।लेकिन मै तो बाहर वाली हूँ। जब तक तुम्हारा मन होगा तब तक रहने दोगी नहीं तो निकाल दोगी और अयान के पास अपना कुछ है ही नहीं तो ! हम तो आ गए ना सड़क पर।
जीजी तुम तो अपनी सास को सम्मान नहीं देती हो और तुम्हारा साथ जीजा जी देते है। लगता ही नहीं है इस घर मे की सालों बाद इस घर - परिवार को माता पिता मिला है। छः महीने बीत गए है। अब भी वसुंधरा मोम सब कुछ तुमसे पूछ कर करती है। फिर मेरी क्या औकात है। जिसे जो मन करता है, मुझे ही सुना देता है। और माई तुम ! कैसे लड़का ढूढ़ा है तुमने मेरे लिये जिसके पास एक अपना घर तक नहीं है। फिर वो अयान की तरफ शिकायत से देखने लगती है।"

वसुंधरा जी अपने आखों से बहती हुई आंसुओ को पोंछती है और दीप्ती के पास आ कर उसे गले लगा लेती है। जहाँ सभी क्षुब्ध मे खड़े थे क्योंकि दीप्ती से किसी ने ऐसी बातों की उम्मीद नहीं की थी। सबको मालूम था की उसमें बचपना सबसे अधिक है और वो किसी भी बात पर गहराई से विचार नहीं करती है। जब जैसी हवा बहती है, उसी दिशा मे वो घूम जाती है। उसे कहाँ जाना है, ये वो खुद नहीं डिसाइड नहीं करती बल्कि हवा के रुख पर छोड़ देती है। इसलिये तानिया और आराध्या उसे हर कदम पर थामे रहते थे। सभी मानसिक तोड़ पर उलझें हुए थे की वसुंधरा जी ने रोते हुए उसके गालो पर हाथ रख कर कहा, "पगली मेरे बारे इतना सोचने की क्या जरूरत है। मै तो अपने बच्चों की ख़ुशी मे खुश हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए। हाँ ! छोटी छोटी जरूरत के लिये मुझे थोड़ा आराध्या के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। लेकिन मुझे उससे दिक्कत नहीं होती है। इतने सालों बाद लौटी हूँ तो अचानक से सब कुछ मेरे हाथ मे तो नहीं आ सकता है । मै समझती हूँ ये बातें।अगर मै कभी कही गयी नहीं होती तो आज जो जगह आराध्या की वही मेरी होती और वो मेरी बहु होती।
मै समझती हुई की मेरे बच्चे अब बड़े हो गए है और उनको वक़्त नहीं मिलता है मेरे लिये, लेकिन क्या करुं माँ हूँ और मेरा मन होता है की धनंजय मेरे पास बैठे और मुझसे कुछ बातें करे।"

वसुंधरा जी की बातें सुनकर धनंजय ने कहा, " माँ ! मै आपके पास बैठता तो हूँ फिर आपके मन मे ऐसी बातें क्यों आयी। अब मै छोटा बच्चा तो नहीं. की चौबीस घंटे आपके आस पास रहु। लेकिन मै अपने वक़्त मे से अपने माता पिता के लिये हर रोज वक़्त निकलता हूँ। फिर आपके मन मे ऐसे विचार क्यों आये माँ !" धनंजय ने ये सवाल वसुंधरा के पास आ कर उनकी हाथों को पकड़ते हुए कहा ! वसुंधरा ने हल्की लाचारगी से हँसते हुए कहा, " समझती हूँ बच्चे ! और मुझे उससे शिकायत नहीं है। दोष तो मेरे कर्म का है की मै सालों अपने परिवार से दूर रही और जब लौटी तो बहुत देर हो चुकी थी। बच्चे बड़े हो गए थे। उनकी शादिया हो चुकी थी। तो जो जगह मेरे लिए अब भी तुम्हारी दादी का है। वो जगह आराध्या के लिए मेरी नहीं है। क्योंकि वो पहले आयी थी और पहले आने वाले और बाद मे आने वाले मे फर्क तो हो ही जाता है। इसलिये आवेश आवेश मे दीप्ती ने मेरे लिये ऐसी बातें कह दी। वो ज्यादा वक़्त मेरे पास बिताती है ना।

" इसलिये उसे आपका दर्द ज्यादा दिख गया ! है ना सासु माँ !"

रात के दस बज़ रहे थे और ठाकुर हवेली का माहौल बेहद गर्म हो गया था। आराध्या जो कब से बातें सुनी जा रही थी। उसके अचानक वसुंधरा जी को टोकने पर, सभी उसकी तरफ देखने लगे थे। वसुंधरा भी घबरा कर चुप हो गयी थी। आराध्या अपने हाथों को बांध कर वसुंधरा की तरफ घूर कर देखती है।
"कहते है की बेटी की माँ जब बेटी के ससुराल मे घुसती है तो बेटी का घर उजड़ जाता है। जरा मिलवाओ उन सज्जन प्राणियों से की फ़िल्म और किताबों के अलावा असल जिंदगी मे किस बेटी की माँ ने अपनी बेटी का घर उजाड़ा है। और अगर ये बात सत्य भी है तो ये बात भी बोली चाहिए ना की एक बेटी माँ नहीं,अगर बेटे की माँ भी अपने बेटे और बहु की जिंदगी मे घुसती है तो घर उजाड़ देती है। ये किसी सज्जन पुरुष या महिलाओ ने किताबों और फिल्मो मे नहीं दिखाया होगा। लेकिन हकीकत मे जाओ तो दस मे से चार घर सिर्फ बेटे की माँ की वजह से टूट जाते है। क्यों ?

क्योंकि सारे नियम क़ानून सास को अपनी बहु से करवानी है। पांच बजे की जगह पैन बज़ कर पांच मिनट मे क्यों उठी ! खाना समय पर क्यों नहीं बना। चाय हाथ मे उठा कर क्यों नहीं दिया। माथे पर पल्लू क्यों नहीं है। ऊँची आवाज़ मे कैसे बात की। मेरे बेटे को तुम क्यों बुलाई। इतनी जोर जोर से हँस क्यों रही हो। आज दो घंटे मायके मे क्यों बात की। बेटा अगर पत्नी का पक्ष ले तो जोरू का गुलाम हो गया। अब बहु के कहने पर बूढ़े माँ बाप को निकाल दो। और ना जाने क्या क्या !"

आराध्या घूर कर वसुंधरा को देखती है। क्यों सासु माँ ! आपको भी इसी तरह का दुख है ना !"वसुंधरा भी उसकी बात सुनकर अपनी आवाज़ तेज करती हुए कहा, " तो तुम्हारे मुताबिक बहु भोलीभाली होती है। क्या वो ऐसी नहीं होती है, जो सास को मारती है और दुख देती है। " ओ कलयुग की सासु माँ ! आराध्या हाथ ऊपर उठा कर जोड़ लेती है।
"हमरी बात ध्यान से सुनो ! दुनिया मे अच्छी और बुरी दोनों तरह के इंसान होते है। कही सास अच्छी तो कही बहु अच्छी। बहुत सारी लडकियाँ होती है, जिनको समझ मे नहीं आता है की सास अपना पचीस साल का बेटा जब किसी लड़की के हाथों मे सौंपती है तो उस बेटा पर उनका अधिकार थोड़ा कम हो जाता है।
अपनी इस नासमझी मे, वो अपनी बहु को हर वक़्त ये जताते रहती है की पति उसका है लेकिन ये घर -परिवार सब कुछ अब भी मेरा है और उसका पति भी अब भी उसी का बेटा है। वो अपनी इनसिक्योरिटी मे भूल जाती है की पचपन मे उनकी अक्ल इतनी नहीं है की पोषा पाला बेटा किसी बीस साल की लड़की का पति है। अगर अभी से इतना अधिकार जताएगी तो वो बीस साल की लड़की उनको सास की जगह दुश्मन नहीं मान लेगी।

बात समझदारी की है सासु माँ ! एक सास को भी ये सोचना चाहिए की वो भी अपने पति -परिवार और बच्चे की मालकिन है और वही जो लड़की अपने बेटे के लिये बियाह कर लायी है। आगे जा कर वो भी उन्ही की जगह जाएगी, पति -परिवार बच्चा। लेकिन इतनी. छोटी सी बात ना सास समझती है पचपन की हो जाये तब तभी और बहु कैसे समझ लेगी जिसकी उम्र बीस बरस की है और अनुभव मे शून्य है ! सासु माँ बहु पांच बजे उठे तो इससे आपके घर लक्ष्मी आये लेकिन बेटी दस बजे उठे तो आपको तकलीफ नहीं होती। कहने के लिये सास कहती है की बहु को हमने बेटी माना है लेकिन बेटी की तरह वो कर नहीं पाती है। उसी तरह कोई बहु कहती है की सास को मैंने माँ माना है लेकिन तभी तक जब तक सास उसे अपनी माँ की तरह व्यवहार करे। नहीं तो वो भी उसे सास ही समझेगी।

"ये हमारे जीवन का सम्पूर्ण सत्य है। इसलिये प्रवचन नहीं दूँगी लेकिन इतना जरूर कहूँगी की आपको जिस बात का दर्द है। उस दर्द का कोई इलाज नहीं है। जब पौधा बच्चा होता है तो उस पर ध्यान दिया है की कही आंधी -तूफान मे पौधा मिट्टी ना छोड़ दे। गिर ना गया हो। लेकिन वही पौधा जब पेड़ बन जाता है तो हम उस पर ध्यान देना बंद कर देते है क्योंकि हमें मालूम होता है की हमारा पौधा अब मजबूत पेड़ बन चुका है और वो खुद आंधी, तूफान से खुद की रक्षा कर सकता है। एक माता पिता के लिये बच्चे भी वैसे ही होते है। आपकी परवरिश जीतनी अच्छी होगी, बच्चा उतना ही बेहतर बनेगा।अगर वो भागने वाला हुआ तो आपके पकड़ने से वो रुक नहीं जायेगा और अगर वो रुकने वाला हुआ तो आपके भगाने से भाग नहीं जायेगा।
जब कुछ सास ये कहती है, अरे हमर बिटवा ! जब से उसकी पत्नी आयी है, बदल गया है। तो कमी आपके बेटे मे है की उसे सही और गलत की पहचान नहीं करने आती है। उसे नहीं समझाया आपने की माँ और पत्नी दोनों की अपनी अपनी जगह है। जब कोई बहु कहती है, की मेरा पति सिर्फ अपनी माँ का सुनता है तो उस पत्नी को सोचना चाहिए की कही वो ऐसी गैर अनुचित बात तो नहीं कर रही है। जिसके कारण उसका पति उसकी बात नहीं मानता है।"

"और सासु माँ ! अगर पत्नी के कहने पर बेटा अपने माता पिता को घर से निकाल दे। उनका अपमान करे या उनको तकलीफ पहुचाये।
और अगर अपने माता पिता के कहने पर कोई पति अपनी पत्नी को घर से निकाल दे। उसे मारे पीटे या उसके साथ बुरा सुलूक करे।..... तो गलती किसकी... उस गधे बेटे की। जिसकी परवरिश अच्छी उसकी माँ ने नहीं की। जिसके पीते ने उसे ये नहीं सिखाया की माँ और पत्नी के बीच ताल मेल कैसे बिठाते है। जिसे इतनी समझ नहीं थी की कब कौन सही और कौन गलत बोल रहा है। "
इसलिये सासु माँ ! विक्टिम कार्ड मत खेलिए। चाहे ड्रामा हो या जिंदगी। आराध्या कभी भी गलत बातों पर खुद की राय नहीं रखती है और सही बातों पर चुप रहना नहीं सीखी है।♥️

आराध्या के तेवर और बातें सुनकर धनंजय ने कहा, " शांत हो जाओ ठकुराइन ! हम आराम से बात करते है। माँ से ज्यादा जरूरी है दीप्ती से बात करना। " ये कहते हुए उसे पानी का गिलास देता है। जिसे देख कर वसुंधरा के तन बदन मे आग लग जाती है। वो आगे बढ़ कर धनंजय के हाथों पर एक एक हाथ मार देती है। जिससे उसके हाथों से कांच का गिलास छूट जाता है। और निचे फर्श पर गिर कर टूट जाता है। "माँ ! ये क्या तरीका है ! आप ठीक तो है।" धनंजय हल्की ऊँची आवाज़ मे वसुंधरा से कहता है।

वसुंधरा ने भी चीखते हुए कहा, " तुझे मै पागल दिख रही हूँ और तब से जो तेरी बीबी उल्टी सीधी बातें कर रही थी। तब तुझे बुरा नहीं लगा।अब उसे चुप रहने को कह रहा है। उसे जहाँ डांटना चाहिए, वहाँ उसे पानी पीला रहा है। अगर मै इतने साल अपने बच्चों से अलग रही तो मेरी जगह खत्म हो गयी। " अरे बहु ! आराध्या ने ऐसा कुछ नहीं कहा !" सुमती जी बात को खत्म करने की कोशिश की । आप तो चुप रहिएगा ! आपके कारण ये छोटे घर की लड़की मेरे सर पर चढ़ कर नाच रही है। और आप कह रही है की इसके कहना का मतलब ये नहीं है। सुमती जी को वसुंधरा बोलती हुई आराध्या को देखती है, जो मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कुराहट देख कर वसुंधरा जी के तन बदन मे आग लग जाता है।
तभी वो भी महेंद्र जी की तरफ देखती है। उन्होंने आगे बढ़ कर धनंजय से कहा, "क्या तुम्हारे लिए अपनी माँ की इतनी इज्जत की तुम एक शब्द अपनी पत्नी को ना बोलो ! वो देखो कैसे हँस कर तुम्हारी माँ को चिढ़ा रही है।"आराध्या ने कहा, मै माँ को देख कर नहीं बल्कि उनकी हरकत देख कर मुस्कुरा रही हूँ !" तुम्हारे जैसी बतमीज लड़की हमने देखी नहीं ! बाबू जी क्या देख कर आपने ऐसी लड़की हमारे बेटे के लिए चुनी है। जिसमे कोई संस्कार नहीं है। महेंद्र जी ने आराध्या को घूरते हुए कहा।

धनंजय जो काफ़ी देर से तमाशा देख रहा था। उसने हल्की तेज आवाज़ मे कहा, " क्या लगा रखा है आप सब ने सब के सब चुप हो जाइये । पापा आपने आराध्या के संस्कार पर कैसे बात कर दी। मैंने उसे पहली नजर पसंद किया था। जो बोलती है खड़े खड़े बोलती है। वो भी बीना लाग लपेट कर, ना लालच करती है और ना ही साजिश करने मे इसकी कोई दिलचस्पी है, बस सहीं और गलत बोलने आता है और गलत अगर उम्र और रिश्ते m कोई बड़ा भी करे तो ये बोलने से चुकती नहीं है और मै इसकी इस बात का सम्मान करता हूँ। मेरा मानना है कि समझदारी उम्र देख कर नहीं आती है। बड़े अगर अपनी बड़कप्पन मे गलत करे तो कम से छोटो को रोकने का अधिकार होना चाहिए ।

और माँ आप ! ये क्या रोने धोने का ड्रामा लगा रखा है आपने। कोई डेली एपिसोड चल रहा है, जो आप उल्टी सीधी बातें कि जा रही है। पहली बार दीप्ती ने इतनी बतमीजी से बात की उस पर से आप उस के मन को बढ़ाई जा रही है।एक बार भी आपने हम सबसे बात करने की कोशिश नहीं की कि क्यों दीप्ती का व्यवहार ऐसा बदला जा रहा है। यहाँ आपके बेटे का घर उजड़ रहा है और उसमें आप अपनी बातें कि जा रही है, जो बीना सर पैर कि बातें है।
आप से कब आराध्या ने बतमीजी कि है और किसने आपके आत्म सम्मान को चोट पहुंचाया माँ ! जो आप इतनी भड़क रही है। आपने अभी क्या बातें कही। यहाँ मौजूद सबको समझ मे आता है। आराध्या आपको सही बात के लिये टोक रही है माँ ! मुझे ना पत्नी और ना माँ मे से किसी एक को चुनना है। मुझे सही और गलत मे से चुनना है। और इस बात अगर आपने दीप्ती का सपोर्ट किया है तो आप गलत है। आपकी वजह से आज दीप्ती और अयान कि रिश्ते कि डोर कमजोर हो गयी है।
आज आप कि बात जरूरी है या दीप्ती और अयान कि। और दीप्ती तुम ने कैसे कह दिया कि अयान का कुछ नहीं है। तभी आराध्या उसकी बाजु पकड़ लेती है। इससे बात मै करुँगी ठाकुर। घर के मामले मे मर्द को तब तक नहीं बोलना चाहिए। जब तक कि उन्हें ये ना लगे कि घर टूटने के कगार पर जा रही है ।

धनंजय उसकी बात मान कर अयान के पास खड़ा हो जाता है जो बस एक टक दीप्ती को देखे जा रहा था। आराध्या दीप्ती के पास आती है और उसकी बाजु पकड़ कर झंझोर देती है।
" चल सामने देख छुटकी ! मेरी आखों मे देख और बोल। जो जहर तूने अभी अभी उगला है, वो अब मेरी आखों मे देख कर बोल। बोल छुटकी ! जरा मै भी तो देखूँ कि पचीस साल कि लड़की अचानक कैसे रंग बदलती है। क्योंकि मुझे भी नहीं पता कि इतनी जल्दी मेरी बहन रंग कैसे बदल लेती है।"

दीप्ती कुछ नहीं बोल पाती है और ना उससे नजरें मिला पाती है। आराध्या कि गहरी नजर उस पर थी।उसे कुछ ना बोलते देख आराध्या खींच कर उसे थप्पड़ मार देती है। सब अपने मुँह पर हाथ रख लेते है। ठकुराइन! धनंजय आगे बढ़ता है लेकिन आराध्या हाथ दिखा कर रोक देती है। लेकिन तब तक अयान दीप्ती को थाम लेता है। भाभी ! अयान कि दर्द भरी आवाज़ सुन कर आराध्या कि आँखे नम हो जाती है क्योंकि आज पहली बार उसने दीप्ती पर हाथ उठाया था। वो मुस्कुराते हुए धनंजय कि बाजु पकड़ कर कहा, " देखो ठाकुर ! ये है इस बेबकुफ़ लड़की का दीवाना पति। जो इसकी जली कटी बातों के बाबजूद भी मेरे एक थप्पड़ पर भागता चला आया और ये बेशर्म लड़की ना जाने इस इंसान को क्या क्या सुना बैठी। " दीप्ती अयान कि बाहों मे बस गुमसुम खड़ी थी।