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Love without wish Chapter-48

Love without wish Chapter-48

अयान बस दीप्ती कि ख़ामोशी महसूस कर रहा था। उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे दीप्ती अंदर ही अंदर टूट रही है। लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहा था। आराध्या अब भी गुस्से मे थी। चुप क्यों गयी छुटकी ! मेरे एक थप्पड़ से ही तुझे नानी याद आ गयी। कर ना बकैती। बोल क्या बोल रही थी। बहुत पाठ पढ़ा रही थी मेरी ललिता पवार को। जरा मुझे जबाब तो दे। क्यों छिपी है उसकी बाहों मे जिसे तू ना जाने क्या क्या बोली जा रही थी। अब जुबान क्यों बंद है तेरी खोल ना ! आराध्या बार बार दीप्ती को बोली जा रही थी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था क्यों कि आज वाकई बात बेहद बढ़ चुकी थी। इसे किसी अंजाम पर पहुंचा कर सभी खत्म करना चाहते थे। इसलिये सभी चुप थे।

तभी वसुंधरा आगे बढ़ कर आराध्या कि बाजु पकड़ लेती है।उसे इस तरह से बाजु पकड़ते देख धनंजय के. साथ साथ सभी हैरान हो. जाते है। सिवाय आराध्या को छोड़ कर। क्या हुआ सासु माँ ! अब और कुछ कहना है आपको ! आरध्या कि बात पर एक बार फिर वसुंधरा ने गुस्से मे कहा, " उसे क्यों परेशान कर रही हो, वो तो बच्ची है । मुझ से बात करो ना ! सारा दोष तुम दोनों पति पत्नी ने मुझ पर डाल दिया है कि मै इसे शय देती हूँ। मैंने भड़काया है इसे। मै इस घर को संभालने कि क्षमता नहीं रखती हूँ।" तो क्या गलत कहा मैंने सासु माँ ! अभी आप कर क्या रही है और पिछले कुछ दिनों से आप क्या कर रही थी। क्या लगता है आपको कि किसी कि नजर आप पर नहीं थी। आप कि हर हरकत पर नजर थी हमारी। लेकिन अभी नाराजगी आपसे नहीं है क्योंकि ये लड़की (दीप्ती कि तरफ हाथ दिखाते हुए ) कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी कि किसी के कहने पर आ जाती। महाकाल ने बुद्धि दी है उसे इस्तेमाल करने के लिये ना कि उसे तिजोरी मे रखने के लिये। इसलिये आज जो कुछ भी इसने किया। चाहे कोई जो समझे लेकिन मै आपको दोष नहीं दूँगी। क्योंकि सारी कि सारी गलती इस बैल बुद्धि लड़की कि है। कहती हुई एक बार फिर दीप्ती कि तरफ बढ़ती है। जिसे देख धनंजय उसे अपनी तरफ खींच लेता है और दीप्ती चिहुक कर अयान को कस के पकड़ लेती है।

वसुंधरा ने हँसते हुए कहा, " ओह्हो देखो तो ये बातें कौन कह रहा है ! जो खुद बात बात पर मेरे बेटे कि ओट मे छिप जाती है। क्योंकि मेरा बेटा तो है एक नंबर का जोरू का गुलाम है। महरानी जो कहती है, वो ये करते है। " माँ क्या फालतू कि बातें कर रही है और आप बार बार क्यों घुस रही है इस मामले मे। आपकी बातें सुन कर इतना तो यकीन हो गया है कि आप इस मामले को सुलझा कम और उलझा ज्यादा रही है। दीप्ती ने गलत किया तो उसे उसका जबाब देना होगा। चाहे आप जितना चीखे लेकिन आराध्या ने जो पूछा वो तो उसे बताना होगा। धनंजय ने भी अपनी दो टुक बात रखी।

वसुंधरा ने इस बार चीखते हुए कहा, " क्यों ? क्या गलत कहा दीप्ती ने ! अयान के पास अपना क्या है। एक पत्नी होने के नाते उसका सोचना कहाँ गलत है।आज इसकी वही हालत होगी जो मेरी हो गयी है। अगर इतना ही प्यार है तुम्हें अपनी बहन से और धनंजय को अपने दोस्त से तो क्यों नहीं वसुंधरा इम्पायर उस के नाम कर देती हो।वसुंधरा कि बात सुन कर सब के सब हैरान हो गए। धनंजय भी बेहद हैरानी से अपनी माँ को देख रहा था। ये आप कैसी बात कर रही है माँ ! इस बात को कहाँ संभालना चाहिये आपको और कहाँ आप  इसे तूल दे रही है।

"क्या गलत कह रही हूँ मै! क्या है अयान के पास के पास कुछ भी तो नहीं और पत्नी होने के नाते दीप्ती का हक है उससे सब कुछ मांगना। शादी करते वक़्त माँ बाप ये देख सुन कर बेटी कि शादी करते है कि लड़के का खानदान क्या है ? माँ बाप कौन है ? घर द्वार जमीन जतथा क्या क्या है ? वो बेटी को ख़ुश रख पायेगा या नहीं ! पता नहीं दीप्ती के माँ बाप ने अयान मे क्या देखा था।सगी माँ होकर भी अपनी सगी बेइज्जती को कुंवा मै थकेल दिया और जेठानी कि बेटी को महलो कि महरानी बना दिया। ऐसा कौन सा सगा माँ बाप करता है। " वसुंधरा आगे कुछ बोलती इससे पहले दीपा जी ने अपनी आँखे बड़ी बड़ी कि सर पर पल्लो को ठीक किया और उनके सामने आ कर खड़ी होती हुई कहा, "

"चुप '! एक दमे चुप हो जाओ। हम उतनी देर से चुप रही क्योंकि हमको मालूम था कि बड़की सब संभाल लिहे। हमार दीप्तीयाँ को उतना बुद्धि नहीं है। काहे कि बड़की हमेशा उका लाड प्यार से पाले पोषे रही है। आज पहली बार बड़की उस पर हाथ उठाये रही। उस समय हमार बड़की के हाथ काँपत रहे और आखियो मे आंसू आ गेल रहे। जो कोनो नाही देख लस। हम देखे रही। हम चुप थे क्योंकि हमको लगा कि बिटिया के ससुराल का मामला है, वहाँ चुप रहने मे भलाई है।
लेकिन आप तो हमरी ममता पर सवाल उठा दिए हो। का जी ! हमने अयान बिटवा मे सिर्फ लड़का देखा। लड़का अगर अच्छा रहता है तो जंगल मे भी मेरी बेटी को सुखी रखेगा। उसके संस्कार देखे। माता पिता का नाम नाही। और बहुत पैसा वाला लड़का और माई बाबू लड़का का कोई गरंटी है कि वो हमरी बिटिया को खुश रखता। हमने तीनों बेटियों कि शादी उस के मुताबिक वैसे लड़के से कि जो हमरी तीनों बेटियों के गुण और अवगुण दोनों के साथ अपनाये। अरे जरा देखो वसुंधरा बहन जी ! मेरी बुरबक बेटी ने कितनी ओझी बात कही हमरे हीरा दामाद को,फिर भी हमरा दामाद उसको समेटे बैठा है।
मेरा दामाद अपने बदौलत अपने मुकाम पर खड़ा है। अरे आज के वक़्त मे ऐसा दोस्त, ऐसा भाई कहाँ मिलेगा। महादेव करे... मेरे सात घर क्षत्रु को भी ऐसा दामाद मिले। हर जन्म मे, मै अपनी बेटी को ऐसे लड़के से ही शादी करवाउंगी।"

वसुंधरा उसकी बात पर हँसती हुई कहा, " आपके ये बड़े बड़े प्रवचन से सच नहीं बदल जायेगा कि आपने अपनी बेटी को किसी अनाथ के पल्ले बांध दिया। "
बस कीजिये समधन जी ! बहुत बोल ली आप। इस बार दीपक जी ने अपनी बात बेहद गुस्से मे कही। "आप बार बार किसे अनाथ कह रही है। इन्हें तो आप अपने बेटे कि तरह प्यार करती थी ना। अरे समधन जी ! हम उन माता पिता मे कि तरह नहीं सोचते है कि लड़के के पास पैसा, गाड़ी बंगला होगा तभी लड़की कि शादी करगे। हम लड़के कि हुनर देखते है। लड़का काबिल होगा तो पैसा कमा लेगा। नहीं तो नालायक लड़के अपने सात पुश्तो के धन को खर्च करने मे सात महीना नहीं लगाते है। तो बार बार हमारे बेटे के लिये कुछ ना कहे। बहुत बोल चुकी आप।"

तानिया ने भी गुस्से मे कहा, " आप घर क्यों तोड़ रही है माँ ! आप से ऐसी बात कि उम्मीद नहीं थी। " धनंजय ने गुस्से मे कहा, आज के बाद आपने अयान के लिये कुछ भी कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आप घर जोड़ने कि बजाय कैसी बातें कि जा रही है। वसुंधरा जी धनंजय कि बात पर रोने लगती है। उनको रोता देख कर धनंजय का दिमाग़ खराब हो जाता है और उसने गुस्से मे एक बार फिर चीखते हुए कहा, " ठकुराइन ! ये मामला जल्दी सुलझाओ। मै अपने भाई के साथ कुछ गलत होते नहीं देख सकता। वरना अगर मै अपने पर आया तो ये सारे ड्रामे अपने तरीके से खत्म करुँगा।  रात बहुत हो चुकी है। सब अपने अपने कमरे मे जाइये और माँ आप ! अगर शांति नहीं ला सकती है तो भूचाल मत लाईये और ये रोना धोना करके, मुझे या किसी को गलत साबित करने कि कोशिश मत कीजिये। क्योंकि आप को भी मालूम है कि अभी आपने गलत बातें कि है तो प्लीज माँ ये इमोशनल कार्ड मत खेलिए। ये परेशानी अयान और दीप्ती कि है। तो उनके तक ही रहने दीजिये।कह कर सीधे कमरे कि तरफ चला जाता है।

आराध्या और वसुंधरा को छोड़ कर एक एक करके सभी अपने कमरों मे चले जाते है। अयान बहुत पहले दीप्ती को लेकर कमरे मे चला गया था। अब हॉल मे सिर्फ वसुंधरा और आराध्या रह गयी थी। आराध्या अपने हाथों को बांधे बांधे वसुंधरा को घूर रही थी तो वही वसुंधरा भी अपने आंसू को पोंछ कर उसके सामने ऐसे खड़ी होती है, जैसे अभी कुछ हुआ ही नहीं था। उसकी बदलती रंगत को देख कर आराध्या अपनी आईबरों उठा लेती है। वसुंधरा ने कहा, " क्या हुआ ! तुमने अपनी सास से ये उम्मीद नहीं कि थी। लेकिन तुम भी याद रखो कि इस घर कि मालकिन मे हूँ और मेरा इस घर पर तुम से ज्यादा अधिकार है। देखती जाओ इस घर को कितने हिस्से मे बाँटुगी और फिर हर हिस्से पर सिर्फ और सिर्फ मेरा अधिकार होगा। आज धनंजय तुम्हारी बात बहुत सुनता और मानता है लेकिन बहुत जल्द वो मेरी बात सुनेगा भी और मानेगा भी।तब तुम्हें तुम्हारी औकात दिखाती हूँ। "

आराध्या ने उसके कंधे पर दोनों हाथों को रखा और धीरे से कहा, " वसुधा !" मेरा मतलब है सासु माँ, आप तो बिल्कुल वसुधा कि तरह बन गयी है। फिर आप दोनों बहन मे अंतर क्या है। आप मे बिल्कुल सब्र नहीं है, बहुत जल्दी नहीं मच गयी आपको सब कुछ खुद के नाम करने कि। " आराध्या बातें करती हुई अपनी नजर बिल्कुल वसुंधरा पर बनाये हुए थी। वसुंधरा ने उसे घूरते हुए कहा तो क्या तुम मुझे वसुधा के नाम पर डरा रही हो। मुझे वसुधा समझने कि गलती मत करना।

"अरे सासु माँ ! छः महीने से आप इस घर मे रह रही है लेकिन आपने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि आपकी बहु आपको चुड़ैल मिली है, सती सावत्री तो बिल्कुल नहीं। वो क्या है ना ! मुझे मेरे पति के आलावा कोई भी बहुत अच्छा कहता है तो मुझे चिढ मच जाती है। क्योंकि मुझे तारीफ हजम नहीं होती। वैसे खेल तो आप बहुत अच्छा रही है सासु माँ लेकिन देख लीजिये। आपके सामने वाले खिलाड़ी ने अपनी चाल पहले तो नहीं चल दी।"

"नहीं आराध्या ! चाहे बहु कितनी तेज क्यों ना हो ! सास से नहीं जीत सकती है। क्योंकि सास तो सास होती है। मुझे वसुधा समझने कि भूल तो बिल्कुल मत करना। क्योंकि मै वसुधा नहीं हूँ।"
"ये आप मुझे बता रही है या खुद को सासु माँ ! आपको क्या लगता है मुझे कुछ नहीं मालूम है। आराध्या कि बातें सुन कर वसुंधरा ने हकलाते हुए कहा," क्या ! क्या मतलब है तुम्हारा ! ये गोल गोल बातें क्यों कर रही हो।"
"सासु माँ, मैंने तो कभी गोल गोल बातें कि ही नहीं। मैंने तो सीधा और स्पष्ट कहा कि आप अपनी बहन कि तरह बन कर खुद का नुकसान करेगी। कही सब कुछ पाने कि लालच मे सब कुछ खो ना दे। बात समझ रही है ना।"जाइये रात ज्यादा हो गयी है, सो जाइये।

इधर कमरे मे, धनंजय बेचैनी से इधर से उधर घूम रहा था। जब आराध्या कॉफी लेकर कमरे मे आती है तो उसे यू बेचैनी से घूमते देख कर, कप को टेबल पर रख देती है और उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा, ठाकुर ! धनंजय उसकी आवाज़ सुनकर पलट जाता है और उस के सीने से लग जाता है। आराध्या उसकी बेचैनी महसूस कर रही थी। उस ने उसके पीठ को सहलाते हुए कहा," ठाकुर शांत हो जाओ। सब ठीक होगा। " नहीं ! नहीं ! ठकुराइन ! इस बार बात हमारे हाथ मे नहीं है। दो महीने से हम दोनों कोशिश कर रहे है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है।"
पहली बार खुद को इतना कमजोर और बेबस महसूस कर रहा हूँ।


धनंजय की बेचैनी देख कर आराध्या भी परेशान थी। आराध्या ने उसके रिलैक्स करने के लिये उस से बात करनी चाही।आराध्या उसके बाहों मे थी और उसके पीठ को सहला रही थी। धनंजय को सामने बिठा कर कॉफी का कप देती है और उसके बालो को सहलाने लगती है। धनंजय उसकी आखों मे देखता है। इतना बेबस कभी नहीं हुआ ठकुराइन! कहाँ चूक रह गयी मुझ से !" 
आराध्या ने कहा,"  हम कोशिश तो कर रहे है ना ठाकुर ! इस बार मामला इतना उलझा हुआ है कि समझ मे नहीं आ रहा है कि उसे सुलझाए तो कैसे। सीधे तरीके पर इस बार तो मै भी वार नहीं कर पा रही हूँ ठाकुर। डर लग रहा है की एक बार फिर से कोई गलती ना हो जाये। " धनंजय उसकी कमर को पकड़ते हुए कहा, " बहुत जल्दी ये मामला सुलझाना होगा। " हम्म्म ठीक है अब चलो तुम्हें सुला दू। मै कपड़े बदल कर आती हूँ। आराध्या ख़ामोशी से कपड़े बदलने चली जाती है। धनंजय के मोबाइल पर मेसेज आता है। जिसे देख वो एक बार फिर सोच मे पड़ जाता है। आराध्या जब उसे मोबाइल लिये देखती है तो उसके पास बैठ जाती है। धनंजय उसे मोबाइल को दिखा देता है। मोबाइल पड़ आये मेसेज को देख कर आराध्या ने कहा, मुझे भी इसी बात पड़ शक है। आप फ़िक्र मत करो इस मामले को मुझे देखने दो और आप दूसरे मामले पड़ ध्यान दो। आओ तुम्हें सुला दू।कल सुबह सुबह मन्दिर जाना है।

धनंजय बीना कुछ कहे चुप चाप उसके सीने से लग जाता है। आराध्या उसे बाहों मे ली हुई उसके बालो को सहलाती हुई धनंजय को चेहरे को देखती है, जो आँखे बंद किये उसके सीने से लगा हुआ था। आज पहली बार वो अपने ठाकुर को इतना कमजोर देख रही थी। सच कहते है लोग ! बाहरी दुनिया से लड़ना जितना ही आसान है उतना ही मुश्किल है अपनों ने से लड़ना। आराध्या की आखों मे नींद नहीं थी। ना जाने कब वो सोचते सोचते, नींद की आगोश मे चली गयी।

दस दिन बाद,
ठाकुर हवेली अब सब कुछ शांत हो चुका था। दीप्ती से सबने बात करनी छोड़ दी थी। अयान भी अब उससे बात नहीं करता था। सुबह जल्दी निकल जाता था और रात को देर से आने लगा था। उसे जैसे किसी से कोई मतलब नहीं था। वसुंधरा से भी अब सभी बच्चे बात कम करने लगे थे। ठाकुर हवेली मे एक ख़ामोशी छायी हुई थी।
ठकुराइन ! ठकुराइन ! धनंजय तैयार होते हुए आराध्या को आवाज़ देता है। कॉफी का कप लिये अंदर आती हुई आराध्या ने कहा, क्या सुबह सुबह आप चौकीदार की तरह आवाज़ देना बंद करेंगे। धनंजय उसकी कमर पकड़ कर अपने करीब करता है और उसके गालों को चूम कर कहा, " जब तक ऐसे तुम्हें पुकार ना लूँ। मुझे सुकून नहीं मिलता है। वैसे तुम अब तक तैयार क्यों नहीं हुई, क्या ऑफिस नहीं जाना है। " जाना है जनाब लेकिन हमें आज धनवी और अयानी के साथ डॉक्टर के पास जाने वाले है। संकल्प और प्रथम भाई वही सीधे अ जायेगे। जैसे ही वो आएंगे। हम आपके पास चले आएंगे। " आराध्या उसे टाई पहनाते हुए अपनी बातें कही। धनंजय ने उसके होठो पर अपने होठो को रख दिए। कुछ देर तक दोनों ने एक दूसरे के होठो को चूमा फिर अलग हुए। तुम्हें होठो को जब तक ना चूम लूँ, मुझे एनर्जी नहीं मिलती है। मिल गयी आपको एनर्जी। आराध्या ने कहा ! धनंजय ने मुस्कुराते हुए हाँ मे जबाब दिया। ठीक है फिर जल्दी आना। आराध्या ने मुस्कुराते हुए उसे विदा किया।

उसके जाते के साथ आराध्या ने जल्दी से फोन लगाया। हैलो तानी ! तू रेडी है। उधर से तानिया ने कहा, हाँ मै कब से तेरा वो दूसरी गली की राधा कृष्ण के मन्दिर मे इंतजार कर रही हूँ। अभी तक आयी क्यों नहीं ! आराध्या ने गहरी सांस ली और कहा, जब तक तुम्हारे जीजू को भेजती नहीं, तब तक कैसे आती। इस बार उनको मालूम हुआ ना की मै फिर से पंगे ले रही हूँ तो वो मुझे कच्चा चबा जायेगे। मै मिलती हूँ तुझसे। ठीक है। फोन रखने के साथ आराध्या के चेहरे पड़ जीत वाली मुस्कान थी। जैसे उसने मन ही मन कुछ तय कर लिया था।

जैसे ही वो घर से बाहर निकलने लगती है उसे वसुंधरा ने पीछे से आवाज़ दिया। कहाँ जा रही हो आराध्या ! आराध्या अपनी आँखे बंद कर के गहरी सांस भर्ती है। फिर मुड़ कर अपनी सास को देखते हुए कहा, "सासु माँ ! जाते वक़्त पीछे से आवाज़ नहीं देते है। आपको इतनी भी समझदारी नहीं है।" आराध्या क्या तुम तमीज से बात नहीं करना जानती हूँ। आराध्या ने हाथ जोड़ कर कहा, देखो माते ! मेरा कोई मन नहीं है आपसे मुका लात करने का। फिलहाल मुझे जाना है और मै रोज ऑफिस निकलती हूँ तो आज कोई खास बात है, जो आप मुझे टोक रही है।
तुम रोज धनंजय के साथ जाती थी। आज अकेले क्यों जा रही हूँ। वसुंधरा के सवाल पर आराध्या ने कहा, जरा करीब आइये।वसुधरा हल्की उसकी तरफ झुक जाती है। आराध्या उसके कान के पास आती है और थोड़ी धीमी आवाज़ मे कहा, " मैं ना ! धनंजय को धोखा दे रही हूँ। आज मै अपने दूसरे बॉयफ्रेंड से मिलने जा रही हूँ। ये राज की बात है सासु माँ ! आप को बता रही हूँ। किसी और को मत बताना ! अब मै चलती हूँ सासु माँ ! मेरा जानू मेरा इंतजार कर रहा होगा। कहती हुई उसे आँख मारती है और तेजी से, आखों मे गोगल लगाये हुए निकल जाती है।
पीछे छोड़ जाती है वसुंधरा को हैरान परेशान। वो खुद से बात करती हुई कहा, " ये लड़की क्या बोल कर गयी। कही सच मे तो नहीं ये....??? वसुंधरा तेजी मे धनंजय को फोन लगाती है।

आराध्या खुद मे बोलती हुई मन्दिर पहुँचती है। तानिया ने उस से कहा, किस पड़ भड़क रही है। अरे छोड़ ना यार तानी !