Love without wish Chapter-25
- 29 June, 2026
वसुधा अपनी नफ़रत भरी नजर से देखती है। उसे इस तरह से गिरा देख रणवीर, वरुण और उसके माँ बाप उसे उठाने झुकते है। तब आरध्या उनके बीच मे खड़ी होती हुई कहती है, " अरे रुको !! हमरे ना होने वाले एक्स वाइय ससुर जी और उनकी साथ साथ वाले प्राणी !! तुम सब अगर हमी दुनो सास और बहु के बीच मे आयी गए तो ठीक ना होवेगो। तो तनिक एक तरफ हो जाओ!!"
उसकी बात सुनकर रणवीर गुस्से मे कहता है, "लगता है अब धमकी नहीं.... जो कहा है वो करना पड़ेगा। बहुत जुबान चल रही है तुम्हारी। तब तक वसुधा उठ जाती है और आरध्या कों घूरती हुई, उंगली दिखा कर कहती है," बहुत बड़ी गलती कर दी तुमने वसुधा कों छेड़ कर, इसकी कीमत ये सारा ठाकुर परिवार चुकायेगा। ये वसुधा सिंह का वादा है तुमसे !!" कह कर जाने लगती है कि तभी आराध्या उसके हाथ कों पकड़ती हुई कहती है, " हे महाकाल !! कैसी औरत है तुम वसुधा सासु !! ये धमकी देने के चक्कर मे तुम कामचोरी करके नहीं जा सकती !!"
वसुधा उसे घूरती हुई कहती है, " क्या मतलब है तुम्हारा!!"आरध्या उसे घूरते हुए कहती है, " तो ध्यान से सुनो !! सासु जो हो नहीं तुम !! हमरे आने से पहले तुमने जो रायता फैलाया है। उसे समेटो !! ये चाय का कप जो तुमने भेंका है,जैसे ये तुम्हारा घर है.....क्या सोच कर !! तुम कहीं कि महरानी हो !! हमरे घर आयी और हमारे परिवार के ऊपर, तब से अपनी त्रिया चरित्र दिखाएं जा रही हो। क्या यहाँ किसी ने नाटक मंडली बुलाई थी कि तुम खुद के साथ साथ अपने सभी नमूनो कों लेती आयी हो। सुबह से जो तमाशा किया है, अब खत्म करो और अभी के अभी चाय कि प्याली उठाओ और वहाँ चाय कों साफ करो फिर दफा होना !!"
वसुधा हँसते हुए कहती है, " और अगर मै तुम्हारी बात नहीं मानु तो!!"" ये कह कर वसुधा अपनी कुटिल मुस्कान के साथ अपनी भोवों कों उठा लेती है !!"
आरध्या मुस्कुरा कर कहती है, " बात तो तुमको हमरी माननी पड़ेगी सासु मईया नहीं तो हम तुमको पुरे सीन करवायेगे... ता.. ता.. थैया !! और जो हम तुमसे बात ना मनवाये तो. हम आरध्या महाकाल कि भक्त नहीं !! कहती हुई उसके हाथों कों पकड़ कर मरोड़ देती है। आह्हः.... चीखते हुए वसुधा अपने हाथों कों छुड़ाने लगती है। रणवीर और वरुण उसकी तरफ बढ़ते है। तभी आरध्या अपनी आँखे गहरी कर के कहती है, " सासु मईया के पति और बेटे, जहाँ हो वही रुक जाओ !! क्योंकि अगर तुम. दोनों, इस बिनबोली सास बहु के बीच अपनी नाक घुसाई तो महाकाल कि कसम पहले तुम दोनों का नाक तोड़ देंगे और यकीन ना आये तो. आजमा लो !!"
सुमती और गोपी जी तो बस आराध्या कि बातें सुन रहे थे और उनको बेहद हैरानी हो रही थी। इधर अयान, ध्यान दोनों दीप्ती और तानिया के बगल मे खड़े थे और उनकी पीछे प्रथम खड़ा था। अयान दीप्ती से कहता है, " क्या भाभी ऐसे हीं धोती है सबको !!" हाँ !! जब जीजी का सटकता है तो इससे भी बुरी हो जाती है !! प्रथम कहता है, अरे मै तो वीडियो बना रहा हूँ, सच पूछो तो मजा आ गया !! उस कि बातों पड़ ध्यान कहता है, " सालों बाद इस दिल. कों ठंडक मिली है। कोई तो जो इस बेहूदा औरत कों उसकी औकात दिखा पाया। "
ध्यान कि नफ़रत से भरी दर्द भरी बातें सुनकर अयान और प्रथम चुप हो जाते है। भला कौन बच्चा अपनी माँ का ऐसा घिनोना रूप देख कर खुद कों शांत कर सकता है। ध्यान का दर्द सभी उसकी आखों और आवाज़ मे महसूस कर सकते थे। तानिया उसके कंधे पड़ हाथ रखती हुई कहती है, " अभी तो आप आरू कि सटके दिमाग़ कि कलाबाजी देखिये। बाद कि बात बाद मे !!" फिर पांचो कि नजर सामने होती है।
आरध्या कि बातें सुनकर दोनों बाप बेटे पीछे हो. जाते है। अब आरध्या वसुधा के हाथों कों पकड़ कर घुमा देती है, जिससे वसुधा एक चक्कर घूम जाती है। आरध्या कहती है, " बहुत साल कर लीं तुमने मन मानी अगर खुद कों आरध्या के प्रकोप से बचाना चाहती हो तो जो कहा है, उसे पूरा करो !!" इस समय आराध्या कि आवाज़ और आँखे बेहद कठोर लग रही थी। वसुधा डरती हुई अपना सर हाँ मे हिलाती है और जल्दी से टूटी हुई कप और गिरी हुई चाय कों साफ करने लगती है।
साफ करने के बाद सीधे वहाँ से निकलने लगती है।तभी आराध्या फिर कहती है, " वसुधा रणवीर सिंह !! ये सुनते हीं वसुधा के साथ उसका परिवार सभी मुड़ कर आरध्या कों देखने लगते है। "
आरध्या इस वक़्त बेहद अलग और गंभीर लग रही थी। वो उन सभी के पास आती है और कहती है, " अभी सब मैंने सिर्फ मजाक मजाक मे किया तो आप सभी कों मेरा मजाक भारी पड़ गया। जरा घर पर जा कर सोचना अगर मै गंभीर हुई तो क्या करुँगी !! और एक बात तुम मेरी सास नहीं हो। मेरी सास का नाम वसुंधरा महेंद्र ठाकुर था। वसुधा सिंह नहीं !! आगे ये बात दोहराना मत !!"
आरध्या के बोलने के साथ धनंजय अपनी गंभीर और बेहद ठंडी आवाज़ मे कहता है, " इस बार कहीं आपकी धमकी आपको ना भारी पड़ जाये वसुधा सिंह और आइंदा से कभी भी मेरे घर कि तरफ आना तो. दूर नजर डालने कि कोशिश नहीं कीजियेगा !! अब आप जा सकती है। "
वसुधा बेहद अपमानित होकर और नफ़रत भरी नजर और क्रोध से भरी हुई आवाज़ मे कहती है, " तुम्हारी बीबी ने मेरा आज जो अपमान किया और तुमने और तुम्हारे पुरे परिवार ने उसके इस हरकत पड़ साथ दिया। इसकी कीमत सबसे ज्यादा तुम भुगतोगे धनंजय ठाकुर और ये वादा करती हूँ मै वसुधा सिंह !! इस अपमान कों ना खुद भूलूँगी और ना तुम्हें भूलने दूँगी !!"
आरध्या उसी वक़्त कहती है, " मै आराध्या धनंजय ठाकुर !! तुमसे ये वादा करती हूँ वसुधा सिंह। तुम्हारी हर चाल का जबाब सबसे पहले मै दूँगी। इसलिये अपने तरकश के जितनी तीर है ना !! वो चला लेना। बस इंतजार करना जिस दिन मैंने तांडव किया, उस दिन तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे परिवार पड़ प्रलय ना ला दूँ !! अब जाओ !!"आरध्या इस वक़्त बेहद क्रोध मे थी।
वो सब चले जाते है।
उनके जाते हीं धनंजय, आरध्या कों अपने बाहों मे भर लेता है। आराध्या कुछ समझती, उससे पहले पूरा परिवार अभी एक सदमे से उभरा नहीं था कि तैतिस हजार वोल्ट का झटका धनंजय ने दिया था।क्योंकि धनंजय इस तरह आराध्या कों सबके सामने बाहों मे भर लेगा, ये तो किसी ने उम्मीद नहीं कि थी।
जहाँ गोपी और सुमती जी धनंजय के बदलते व्यवहार पड़ मुस्कुरा रही थी। वही ध्यान, अयान और प्रथम मुँह खोले हुए उनको देख रहा था। ध्यान कहता है, " कोई मुझे जोर से पिंच करो क्या ये सपना है याँ हकीकत "!! उसकी बात सुनकर दोनों तरफ से दीप्ती और तानिया उसे पिंच करती है। ध्यान चीखते हुए कहता है,"आअह्ह्ह !! समझ गया!! ये सच है!!"
गोपी और सुमती जी उन दोनों के पास आते है और उनकी माथे पड़ हाथ फेर देते है। आरध्या जल्दी से खुद कों. धनंजय से अलग करती हुई उसे घूरती है। लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। गोपी जी कहते है, " आज जो आपने किया बड़ी बहु !! हमें यकीन हो गया कि आप हमारे घर कों जोड़े रखेगी !!"
उसके बाद ध्यान, अयान, प्रथम, दीप्ती और तानिया आ कर उन दोनों से लिपट जाते है। कुछ देर बाद आरध्या गोपी और सुमती जी से कहती है, " आप फ़िक्र मत कीजिये दादू -दादी माँ :!! मुसीबत कों जितना टालने कि कोशिश करेंगे। वो उतनी हीं ताकत से हम कों प्रभावित करेगी। इसलिये मुसीबत कों आने दीजिये। उसके बाद हीं हम अपनी क्षमता कों समझ पाएंगे कि हम कितने काबिल है। "
अब चलिए हमारे नाश्ते का वक़्त तो बीत गया तो लंच हीं कर लेते है। सभी मुस्कुरा कर कहते है, " पहले चाय तुम्हारे हाथों कि !! वो जाने लगती है तो धनंजय कहता है और मुझे कॉफी !! सिर्फ तुम्हारे हाथों कि !!"
ये दूसरा झटका घर परिवार मे सबको लगता है और आरध्या मुस्कुरा कर किचन चली जाती है।
आरध्या कों किचने मे देख कर धनंजय सीधे किचेन मे आता है और उसके पीछे कंधे पड़ हल्का झुक जाता है। उसकी गरम सांसे अपने गर्दन और कंधे पड़ महसूस करती हुई, आरध्या अपनी आँखे बंद कर लेती है और मन मे कहती है, " नो!! नो!! आरध्या भटक मत ये आदमी फिर से तुझे सममोहन मे बांध रहा है और तू बिल्कुल सममोहित नहीं होगी !!"
धनंजय के होठो आरध्या के. कानों कों हल्का हल्का छू रहे थे और वो अपनी लबों कों खोलते हुए धीमी और अपनी भारी आवाज़ मे कहता है, " ठकुराइन!! तुम सममोहित हो रही हो !! इसलिये जल्दी से अपने हाथ की कॉफी लेकर कमरे मे आओ !!" ये कह कर उसके गालों और उड़ रही लटों कों पीछे करता है और उसके गालों कों. चूम कर किचेन से सीधे अपने कमरे मे चला जाता है।
इधर आराध्या बदहवाश सी अपने गालों पड़ हाथ रखती हुई कहती है, " उमा पति !! ये क्या? ठाकुर कों हमारे मन की बात भी मालूम हो जाती है। हे !!शम्भुनाथ हमें इस तांत्रिक जाल से बचा लो प्रभु '!! अगले सोमवार कों सवा किलो सुध दूध का पेड़ा का भोग लगाएंगे !! सुन रहे हो ना उमा पति। हमरी बात जो तुमने नहीं मानी तो समझ लेना गौरी मईया से तुम्हरी शिकायत लगा देंगे !!" फिर अपने सर पड़ हाथ मारती हुई कहती है, हे शम्भु नाथ !! कॉफी बनाना था उस ठाकुर के लिए। हम तो भूल गयी गए!! का गजब का सममोहन कियो है हम पे !!"
इधर तीन लोग गाँधी जी की तीन बंदर की तरह बस मुँह फाड़े किचन की तरफ देखे जा रहे थे। जहाँ से धनंजय अभी अभी गया था। दीप्ती और तानिया कभी उन तीनों कों तो कभी किचन की तरफ देख रही होती है। फिर तीनों कों हिलाती हुई कहती है, सामने खाली किचन कों आप तीनों ऐसे क्यों घूर रहे हो? उन दोनों के सवाल पड़ ध्यान कहता है, " लेकिन अभी तो भाभी वहाँ थी और कुछ देर पहले बड़े भैया कों देखा था। वो तो बिल्कुल दुनिया का आठवां अजूबा ही था!!'
उसकी बात पर अयान और प्रथम कहते है, " यार !! हमने तो कभी सोचा नहीं था की हमारे एंग्री मान की फ्रेम मे हमारा यार रोमेंटिक मेन कब बन गया। भाभी कों देख कर इसकी परसनलिटी ऐसे बदलती है की इतनी तेजी से तो हमारे राजनीती पार्टियां भी अपने रंग नहीं बदलती है!!"
दोनों उन तीनों की बात से चिढ कर कहती है, "तो आप सब क्या चाहते है, हमारे जीजू / मतलब जेठ जी हमारी बहन के साथ प्यार की नैया कों पार ना लगाये!!"
दोनों की बातें सुनकर अयान और ध्यान कहते है, " अरे हमारी प्यारी बीबी !! हम तो दिल से चाहते है की हमारे भैया!! अर्थात तुम्हारे जीजू या जेठ जी !! हमारी भाभी के साथ बागो मे.... बहार है.... गाये और नाचे !!"
प्रथम उन दोनों की बात सुनकर कहता है, " आहा!! जरा सोचो !! फूलों से भरे बागो मे आराध्या भाभी नखरे दिखाती हुई आगे आगे जा रही हो और हमारे प्यार मे डूबा हुआ धनंजय उनके पीछे पीछे..... गाना गाता हुआ.... उनको मना रहा हो। सभी प्रथम की दिन मे दिखाएं सपनो मे खो जाते है। "
इधर कमरे मे, आरध्या कॉफी लेकर आती है। तो उसकी नजर सोफे पर बैठे हुए धनंजय पर जाता है, जो लेपटॉप पर काम कर रहा होता है। आरध्या अपनी आँखे छोटी कर उसे घूरती हुई मन मे कहती है, " देखो तो इस ठाकुर कों मुझे सममोहित कर के कॉफी बनवा लीं और कमरे तक मे बुला लिया और खुद लेपटॉप के साथ कबड्डी कबड्डी खेल रहा है !! इसे तो मै चाय मे बिस्कुट समझ कर डूबो कर खा जाउंगी !!" हुँह !!"
धनंजय उसकी तरफ बिना देखे हुए कहता है, "अगर मुझे अपने चाय मे डूबो चुकी हो तो कॉफी दो और मेरे करीब आओ !!" आरध्या मुँह फाड़े हुए देखने लगती है फिर से उसको !! धनंजय अपना सर ना मे हिलता है और लैपटॉप कों एक तरफ टेबल पर रख कर उसके करीब आता है और उसके हाथ से कॉफी लेकर, उसे भी टेबल पर रखता है। और उसकी कमर कों पकड़ कर अपने करीब करता है।
जिससे दोनों की नजर आपस मे मिल जाती है। आरध्या उसके सीने तक. आती थी। वो जहाँ उसे झुक कर देख रहा था, वही आराध्या का सर ऊपर की तरफ था। जैसे समझने की कोशिश कर रही थी की क्या हो रहा है।
धनंजय उसकी आखों मे देखते हुए कहता है, " क्या हुआ ठकुराइन!! किस के ख्यालों मे हो!! मेरे !!" आरध्या ये सुनते ही उस से खुद कों अलग करने लगती है। छोड़ो मुझे ठाकुर :!! हर बार तुम्हारी तांत्रिकगिरी नहीं चलेगी। वाहट !! क्या तांत्रिक गिरी !! धनंजय अजीब से भाव के साथ आरध्या से पूछता है।
आरध्या अपने कमर पर हाथ रखती हुई कहती है, " तांत्रिक, सममोहन ये सारी विधा तुम्हें आती है ठाकुर !! जिससे हर बार मै प्यारी मासूम, भोली सी लड़की फंस जाती है और तो और मन मे जो बातें कहती हूँ। वो भी तुम सुन लेते हो। बताओं तो क्या कहुँ तुमसे !!"
धनंजय मुस्कुराते हुए अपनी गहरी नजर से उस देखते हुए, अपने कदम भी उसकी तरफ बढ़ाते हुए, अपनी कशिश भरी आवाज़ मे कहता है, " क्या कह रही थी तुम ठकुराइन !! भोली, मासूम, प्यारी हो तुम !! वो अपनी बड़ी बड़ी आँखे जल्दी जल्दी झपकाती हुई, आखों से हाँ मे इशारा करती है। "
धनंजय अब सीधे उसके करीब आ जाता है और उसकी कमर पकड़ कर अपनी तरफ खींचता है और वो बिना डोर की पतंग की तरह उसकी तरफ खींची चली आती है !! वो फिर उसकी बड़ी और गहरी आखों मे देखते हुए कहता है, " बताया नहीं ठकुराइन तुमने !! ये कह कर उसके नाक आरध्या के नाक से टकरा रहे थे।
आरध्या खुद कों काबू मे रखती हुई कहती है, " वो !! वो तुम जो ये... ये.... सममोहन कर रहे हो ठाकुर उसका क्या मतलब !!" मै कैसे सममोहन कर रहा हूँ ठकुराइन बताओगी, तभी तो जानूगा !!" वो जब जब.... ऐसे करीब आते हो तो..... तो......!! आगे..... क्या ठकुराइन!!... बोलो ना चुप क्यों हो!!"
आराध्या कुछ बोल नहीं पाती है और अपनी आँखे बंद कर लेती है। धनंजय अपने होठो कों उसके चेहरे पर चलाते हुए.... धीरे से गाता है, "तुम कमसिन हो, नादाँ हो, नाज़ुक हो, भोली हो.....सोचता हूँ मैं कि तुम्हें प्यार ना करूँ!!
मद्होश अदा ये अल्हड़पन, बचपन तो अभी बीता ही नहीं,.....एहसास है क्या और क्या है तड़प.....इस सोच में दिल डूबा ही नहीं............
तुम आहें भरो और शिकवे करो, ये बात हमें मंज़ूर नहीं......तुम तारे गिनो और नींद उड़े......वो रात हमें मंज़ूर नहीं.......!!!
ये गाते हुए वो अपनी गोद मे आराध्या कों उठा लेता है। जहाँ वो बस धनंजय की आवाज़ की मदहोशी मे अपनी आँखे बंद की हुई, उसे महसूस कर रही होती है।वो उसकी बंद आँखे देख मुस्कुरा देता है और बिस्तर पर सुला कर उसके होठो पर अपने होठो कों रख देता है और बेहद मोहब्बत से उसे चूमने लगता है। उसकी सिद्द्त से भरी किश मे, आराध्या भी खो जाती है और बस मदहोश होती हुई उसके हाथ खुद भी खुद धनंजय के बालों मे चला जाता है। वो उसे किश नहीं कर रही होती है लेकिन वो उसके किश कों महसूस कर रही होती है। लगभग बीस मिनट की मोहब्बत भरी किश के बाद धनंजय ना चाहते हुए उसके होठो कों छोड़ देता है क्योंकि उसकी सांसे रुकने लगती है।
आराध्या की आँखे अब भी बंद थी। धनंजय उसकी दोनों पलकों कों चूमते हुए, कहता है, अगर यू ही आप हमारी आगोश मे रही तो हम खुद पर से अपना नियंत्रण खो देंगे। फिर आप हमें सममोहन कहे याँ तांत्रिक..... कुछ नहीं हो सकता है। इसलिये मेरी कमसिन, भोली ठकुराइन आँखे खोलो और तैयार हो जाओ। शॉपपिंग पर जाना है क्योंकि आज रात कृष्ण राठौर के यहाँ पार्टी मे जाना है।
आरध्या उसकी आखिरी लाइन सुनते ही अपनी मदहोशी भरे ख्वाब से बाहर आती है और आँखे खोल देती है। खुद कों धनंजय के करीब देख और कुछ देर पहले की अपनी हरकत याद करके वो अपनी आँखे छोटी करती हुई..... कहती है.... ठाकुर !! जब तक धनंजय कों समझ मे आता, तब तक आराध्या एक बार फिर उसके गर्दन कों काट चुकी होती है और उसे धक्का दें कर निचे गिरा देती है।
वसुधा आज गुस्से मे पुरे घर का सामान तोड़ने मे लगी हुई थी। उसके गुस्से कों शांत करने की सबने कोशिश की लेकिन उसका गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वसुधा चीखते हुए कहती है, उस दो टके की लड़की की इतनी. हिम्मत की वो मेरे साथ बतमीजी कर जाये और मै मजबूर होकर उसकी बतमीजीयो कों झेलती रहु। छोरुँगी नहीं उसे मे !! आज बहुत घमंड था ना ठाकुर परिवार कों उस लड़की पर। अगर उसकी इज्जत कों सरे बाजार नहीं. लिया तो मेरा नाम भी वसुधा सिंह नहीं।
इस समय वसुधा का चेहरा बेहद खतरनाक लग रहा था। जैसे बहुत कुछ गहरा सोच रही हो। रणवीर उसको पानी पिलाते हुए कहता है, " इस बार हम जो भी करेंगे बेहद सोच समझ और पूरी प्लानिंग के साथ। " उसकी बातों मे उसका बेटा भी साथ देते हुए कहता है, " हाँ मोम !! वैसे भी उस लड़की की नकेल आपका बेटा उसकी नाक मे डालेगा। आप खुद कों शांत कीजिये। हम उसे ऐसा मजबूर करेंगे की वो खुद घुटने के बल आ जाएगी। बस मौक़े का इंतजार करना है। अब आप शांत रहिएगा। वसुधा उन्दोनो की बात सुनकर कहती है, " तुम लोगों कों जो भी करना है वो करो। तुम लोग कामयाब होंगे तो मै आखिरी दाव खेलूंगी, उस धनंजय ठाकुर कों जमीन पर लाने के लिए। पहले उस की उस कुतिया बीबी कों तो नर्क दिखा दूँ और जो उसने किया है उसकी क़ीमत वसूल कर लूँ !!"
रणवीर उसको शांत करते हुए कहता है, " अच्छा अब खुद कों शांत करो और पार्टी मे जाने की तैयारी करो. कृष्ण राठौर कों जानती हो ना और अगर तुम चाहो तो यही से अपने काम कों अंजाम दें सकती हो !!" रणवीर की बातों का मतलब समझती हुई वसुधा मुस्कुराते हुए कहती है, देखते है !! चाल चल कर कामयाबी मिली तो ठीक है और नाकामयाब हुए तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ने वाला है.।
इधर ठाकुर हवेली मे, इन सभी साजिश से अलग सभी अपनी अपनी मोहब्बत की दुनिया जी रहे थे। अयान दीप्ती कों बाहों मे लेकर कहता है, " जल्दी से तैयार हो जाओ। हम सभी शॉपपिंग के लिए जा रहे है। " उसकी बात सुनकर दीप्ती पूछती है, "अचानक शॉपिंग क्यों हमारे पास तो बहुत कपड़े है !! वो उसे पीछे से बाहों मे लेता है और उसके कंधे पर अपनी टोढ़ी टिका कर कहता है," जान मेरी !! आज पार्टी मे जाना है। पूजा मे नहीं इसलिये पार्टी वियर या तो ड्रेस लेना या साड़ी या जो तुम्हें पसंद हो। बिजनेस पार्टी है। समझ गयी। "वो मुस्कुराते हुए घूम जाती है और उसके होठो कों हल्का चूम कर कहती है," समझ गयी पति देव !!"ये कह कर जाने कों हुई तो अयान उसकी कमर पकड़ कर अपनी करीब करते हुए कहता है, " आग लगा कर बिना बुझाये कहाँ चली जान !!क्या मतलब आपका पतिदेव !! अयान आगे की बात उसके मुँह मे बंद कर देता है। उसके होठो कों चूमने लगता है।
ध्यान तानिया कों बिस्तर पर लिटा कर उससे प्यार कर रहा होता है। तानिया उसे रोकती हुई कहती है, " ध्यान अभी नहीं !! हमे बाहर जाना है। " वो उसकी गर्दन कों चूमते हुए कहता है, " जब सब तैयार हो जायेगे। तब हम चलेंगे, अभी मुझे प्यार करने दो। वो भी हार मान कर उस का साथ देने लगती है।
आरध्या जैसे ही गर्दन पर धनंजय कों काटती है और भाग जाती है। धनंजय उसे घूरते हुए, उसकी तरफ आने लगता है और कहता है, " ठीक है ठकुराइन!!इसका बदला, मै जरूर लूँगा !!" पहले पकड़ तो लो ठाकुर !!" दोनों पुरे कमरे मे आगे पीछे भागने लगते है। तभी उनके दरवाजे पर धनवी और अयानी आवाज़ देती है, " भाभी !!" उनकी आवाज़ सुनकर आराध्या रुक जाती है और धनंजय उसे पीछे से पकड़ लेता है और उसके कान कों हल्का काटते हुए कहता है, " अब कहाँ जाओगी!!" वो उसे से खुद छुड़ाते हुए कहती है, " ठाकुर छोड़ो मुझे, दरवाजे पर अयानी और धनवी है!!" होने दो बिना मेरी इज्जाजत के वो कमरे मे नहीं आएगी। इतना जो भगाया है, पहले उसकी सजा तो ले लो। ये कहते हुए, बिना उसे खुद से दूर किये, अपनी तरफ घुमा देते है। दोनों के नाक एक दूसरे से टकरा रहे थे। आराध्या धीरे से कहती है, " दरवाजे है धनवी और अयानी है.... अभी मुझे छोड़ो ठाकुर !!"बिल्कुल नहीं ठकुराइन!! वो दोनों नहीं आएगी अंदर, जब तक मै ना कहुँ !!" वो आरध्या के चिन कों ऊपर उठाने लगता है। आरध्या अपनी आँखे बंद कर लेती है की तभी दरवाजा खोलती हुई..... हमने कुछ नहीं देखा.... कह कर धनवी और अयानी पीछे घूम जाती है।
उन दोनों की बातें सुनकर आरध्या धनंजय कों धक्का देती हुई, उनके पास आ जाती है और कहती है, " ऐसा कुछ नहीं हो रहा था, जो तुम लोग ऐसे घूम जाओ। वो मेरी आखों मे कुछ चला गया था, तो तुम्हारे भैया देख रहे थे। ये कहती हुई धनंजय कों घूरती हुई इशारे मे कहती है, " तुम कुछ बोलोगे। " धनंजय कुछ नहीं कहता और सिर्फ ये कहता है, " तुम दोनों तैयार हो जाओ... हम दस मिनट मे निकलेंगे।!! दोनों उसकी बात सुनकर कहती है, " जी भाई और बिना मुड़े भागती है, कमरे से। जैसे कोई बहुत पड़ गया हो पीछे। "
आराध्या घूरती हुई.... उसे देखती है और वाशरूम चली जाती है। उसे यू जाते देख धनंजय अपना सर ना मे हिला देता है। कुछ देर बाद सभी शॉपिंग के लिए निकल जाते है। जहाँ धनवी और अयानी ने अपने लिए गाउन पसंद किया था। वही दीप्ती ने अपने लिए गोल्डन रंग की बेहद खूबसूरत कुर्ती और तानिया ने भी खुद के लिए रामा रंग की पार्टी वियर स्टालिस अनारकली कुर्ती लीं हुई थी। लेकिन हमारी आराध्या कों कुछ भी पसंद नहीं आ रहा थे। सभी उसे देख रहे थे की वो बार बार हर ड्रेस कों उठाती थी और आईने मे उसे लगा कर देखती और मुँह बनाती हुई रख देती थी। ऐसे करते हुए दो घंटे हो. चुके थे। सबकी शॉपिंग हो गयी थी लेकिन उसने कुछ लिया ही नहीं था। ध्यान, तब धनंजय के करीब आ कर कहता है, " बड़े भैया ! आप ही कुछ पसंद कर लो भाभी के लिए नहीं तो पार्टी खत्म हो जाएगी और भाभी कों तब तक कुछ नहीं पसंद आएगा!!"
धनंजय बिना उसकी तरफ देखे हुए कहता है, उसके लिए मैंने ड्रेस पहले ही ले रखी है। बस उसको देख रहा हूँ की आखिरी मे उसे कुछ पसंद आता भी है या नहीं !! अयान और प्रथम कहते है, तेरी इस बिन मांगी मोहब्बत मे दो घंटे से हम बोर हो रहे है। तू आ जाना फिर भाभी कों लेकर हम चलते है। तब तक आरध्या, धनंजय के पास आती हुई कहती है, " मुझे कुछ पसंद नहीं आया। इसलिये घर चलो। घर पड़ जो कपड़े है, उन्ही मे से कुछ पहन लुंगी।ये बात उसने इतनी मासूमियत से कहीं की सभी मुस्कुरा दिए।
धनंजय उसकी बात पर कहता है, " हम्म्म्म !! कहते हुए उसकी कमर पकड़ लेता है और कहता है, चलो। क्योंकि एक जरूरी काम आ गया है तो. ऑफिस जाना होगा। शाम कों तैयार रहना पार्टी मे साथ चलेंगे।आरध्या उसे छोटी आँख करती हुई घूरती है और मन मे कहती है, " कितना गंदा और खड़ूस है; ये डायनाशोर !! हुँह !! मुझे कुछ पसंद नहीं आया तो ये कुछ नहीं पसंद कर सकता था। बातें बनवालो इनसे बड़ी बड़ी। सबको सबने पसंद करके ड्रेस खरीद दी और ये हनुमान जी की तरह एक. जगह पैर कों टिकाये खड़े रहे की कोई इनको अपनी जगह से हिला ना दें। क्योंकि ये हिल गए तो इनकी जगह कोई लूट लेगा.... चंगेज खान का खानसामा हुहुँ !! वो अपनी अंतरंगी चेहरे कों बनाते हुए.... मन ही मन मे धनंजय कों सुनाये जा रही थी। इस बात से बेखबर की धनंजय उसे लगातार देख रहा था।
फिर अचानक आरध्या कों अहसास हुआ की वो हवा मे.... तब उसने ध्यान दिया की वो धनंजय की गोद मे है। ये क्या किया आपने !!" ठकुराइन मन ही मन मुझे खानशामा तक तुमने बना दिया तो मैंने सोचा तुम यही खड़ी खड़ी कितना कोसोगी मुझे।थक जाओगी।इसलिये गोद मे उठा लिया की अब कोसो जितना कोसना है। कह कर गाड़ी मे बैठ जाता है और वो अपनी आखों कों पटपटाती हुई, मुँह खोले उसे देखे जा रही थी।
आज धनंजय ने आराध्या कों घर पर रहने कों कहा था क्योंकि आज उसे बिजनेस मेन कृष्ण राठौर की पार्टी मे जाना था। उसने पहले ही आरध्या, दीप्ती और तानिया की शॉपपिंग करवां दी थी।
इस समय धनंजय ऑफिस मे किसी जरूरी काम पर बीजी था की प्रथम उसके केबिन मे आता है। उसे कहता है, चल पार्टी मे निकलना है और वहाँ वसुधा और उसका परिवार भी आने वाला है।
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