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Love without wish Chapter-35

Love without wish Chapter-35

संकल्प -धनवी और प्रथम -अयानी चारों को एक साथ बिठाया जाता है। उन चारों को देख आराध्या ने मुस्कुराते हुए चारों की ब्लेईया लिया। फिर हल्दी की शुरुआत उसने संकल्प और प्रथम से किया की तभी कुछ रिश्तेदारो ने कहा, " अम्मा ! बड़का कहाँ है ? जोड़े मे हल्दी लगवाओ ना !! कोई कुछ जबाब देता, तब तक एक हाथ आराध्या के हाथों को पकड़ लेते है। सब सामने देख कर मुस्कुरा देते है। लेकिन आराध्या की आँखे बंद हो जाती है और खुद को संभालती हुई, वो हल्दी के रस्मो को पूरी करती है।

धनंजय उसके बगल मे खड़ा था और उससे पूछा, कहाँ गयी थी ठकुराइन? सामने सबको हल्दी मे ख़ुश होते देख कहाँ, " जहाँ तुम गए थे ठाकुर ? "धनंजय उसकी तरफ घूर कर देखता है लेकिन आराध्या उसके बगल से निकल जाती है।

आराध्या की बाजु पकड़ कर धनंजय ने उसे लेकर एक कोने की तरफ चला गया। आराध्या को दीवाल पर लगा देता है। कहाँ गयी थी ठकुराइन ! वो उसे घूरते हुए कहता है। आराध्या ने गुस्से मे कहा," कही भी गयी थी ! तुमको उससे क्या ठाकुर ? क्या मैंने पूछा तुम्हें की तुम कहाँ गए थे !!" आराध्या आज फिर से गुस्से मे थी। धनंजय उसके गुस्से को देख, उसके गालों पर हाथ रख कर कहा, " क्यों इतने गुस्से मे हो ठकुराइन ! बात क्या है ? "मै तो तुम्हें हल्दी लगाना चाहता था। उसकी बात पर आराध्या कुछ नहीं कहती और उसकी आखों से बेबसी के आंसू गिर रहे होते है। उसे समझ मे नहीं. आ रहा था की वो कैसे व्यवहार करे। तब तक उसकी कमर पर धनंजय के हल्दी लगे हाथ घूमने लगे। उसकी हाथों को महसूस करते हुए, आराध्या ने अधीर होकर अपने हाथ को जोड़ते हुए कहा,"प्लीज ! ठाकुर मुझे मत छुओ। मुझे अच्छा नहीं लग रहा तुम्हारा छूना !!"उसकी बाते और उसे यू रोता हुआ देख कर धनंजय के हाथ रुक जाते है। वो हैरानी से आराध्या की तरफ देखता है। आराध्या उसके बगल से जाने लगती है। तभी धनंजय जल्दी से आराध्या को पीछे से बाहों मे भर लेता है। आराध्या के आखों से आंसू गिरने लगते है।

" ठकुराइन ! कुछ भी सोचने से पहले,एक बार अपने दिल से जरूर पूछ लेना। दिल कभी गलत नहीं कहता है क्योंकि वो हमारी आत्मा से जुड़ा होता है। फिर उसे घुमा कर, उसके आखों से आंसूओ को पोछता है। ये आंसू बचा कर रखो ठकुराइन। कल को शायद ना रहु, तुम्हारे आंसू पोंछने को। इन आंसुओ मे, अपने दिल को मत बहकाओ और दिमाग़ के संतुलन को पहले की तरह बनाये रखना। बहुत जरूरत पड़ने वाली है तुम्हें। बस मजबूत रहना और खुद पर भरोसा रखना की आराध्या ठाकुर कभी गलत नहीं सोच सकती !! देखो मेरी तरफ ! आराध्या की नजरें धनंजय के ऊपर चली गयी। जहाँ उसकी नजरों मे ढेरो सवाल थे। वही धनंजय की नजर मे सिर्फ उसके लिये मोहब्बत थी। कुछ मत सोचो ठकुराइन ! ये पल अपने ठाकुर के साथ जी लो। मुस्कुरा दो ठकुराइन !! बातों और शिकयते फिर कभी फुरसत मे करेंगे।

फिर हाथ बढ़ाते हुए, अपनी हाथों की हल्दी दिखा कर कहा, अब हल्दी नहीं लगाओगी मुझे। आराध्या बस उसकी बात पर अपने हाथ बढ़ा कर उसके गालों पर हल्दी लगा देती है। धनंजय ने अपनी बाहों को फेला कर कहा, " मै करीब आया तो तुम्हें नाराजगी होगी। इसलिये तुम मेरी बाहों मे आ जाओ। " आराध्या को कुछ समझ मे नहीं आ रहा था की वो किस बात पर यकीन करे। आखों देखा सच, यू ही निगला नहीं जाता है। जो वो देख कर आयी थी। उस को झुठलाना नामुमकिन है। लेकिन अभी के सच को भी उसका दिल झुठला नहीं रहा था।

वो बीना किसी रोक टोक के सीधे धनंजय के सीने से लग जाती है। अपनी आँखे बंद किये, उसने मन मे कहा, " शंभू नाथ ! ये किस चक्रव्यूह की रचना किये हो प्रभु। हम ने तो सीधा रास्ता जाना तय किया था। तुमने मुझे इस चक्रव्यूह के भवर मे उलझा दिया।क्या करे प्रभु। कुछ समझ मे नहीं आ रहा है !!" ठकुराइन, धनंजय की आवाज़ पर आराध्या अपने ध्यान से बाहर आती है। धनंजय ने उसे फिर कहा, " शादी तक तुम अब बाहर नहीं जाओगी ठकुराइन  !! मै चाहता नहीं, मै मांगता हूँ की शादी तक मुझे मेरी ठकुराइन चाहिए। बाक़ी जो भी बातें है, वो शादी के बात तुम कर लेना मुझसे। मै सब बता दूँगा।

आराध्या उसके सीने से सर निकाल कर उसे देखती है, तो धनंजय की नजर एक बार बारीकी से अपने चारों तरफ जाती है। आराध्या एक बार फिर हैरानी से धनंजय को देखती है। धनंजय ने उसके चेहरे को हाथ मे भर कर कहा, " याद रखना अपने ठाकुर की बात ! चाहे परिस्थिति कैसी भी आये। खुद पर भरोसा रखना। इस घर को किसी हालत मे छोड़ कर नहीं जाना। क्या करोगी और कैसे करोगी। ये वक़्त पर छोड़ देना। लेकिन जैसे भी हालात हो। तुम खुद पर, अपने प्यार भरोसा एक प्लीज के लिये मत छोड़ना। ये दरिया तुम्हारा है लेकिन मगरमछच्छो की डर से अपने दरिया को मत छोड़ना।" ये सब पहलेयो मे बातें क्यों कर रहे हो ठाकुर ! क्योंकि मुझे भरोसा है अपनी ठकुराइन पर। कह कर उसके होठो को छूते हुए कहा, क्या अब भी तुम्हें मेरा अहसास अच्छा नहीं लग रहा है।

आराध्या अपनी पलकें झुका लेती है। जिसे देख एक बार फिर वो अपने होठो को उसके होठो से जोड़ देता है। उन दोनों के बीच गहरी किश का सिलसिला शुरू हो जाता है।

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जहाँ पूरा परिवार शादी की खुशियों मे शामिल था, वही आराध्या और धनंजय के बीच खींचा तानी बढ़ती जा रही थी।आज संगीत रखा गया था होटल मे। लेकिन एक बार फिर आराध्या की नजर धनंजय की तरफ थी जो अभी तक नहीं आया था। सभी एक एक करके अपने अपने जोड़े के साथ बेहद अपनी अपनी पसंद के गाने पर डांस कर रहे थे। सबसे पहले दादा -दादी, ने डांस किया !" क्यों डोल ते आगे पीछे भवरों की तरह !!"

उसके बाद दीपा -दीपक और रिंकू -मुकेश, और मिस्टर और मिसेस सिंह ये सभी ने," मन डोले मेरा टन डोले, मेरे दिल का गया करारा रे ! अब कौन बजाए बासुरियाँ!"

संकल्प - धनवी उनके साथ प्रथम -अयानी इन सभी ने भी "झुमका गिरा "पर बेहद मस्ती के साथ डांस करते है। उसके बाद ध्यान -तानिया और अयान -दीप्ती ने इस गाने पर डांस किया " मै तो चलिया, तेरी ओर चलिया "!!!

इन सभी गानो के साथ सबके डांस खत्म होते है की तभी धनवी ओर संकल्प ने आराध्या ओर धनंजय को बुलाया डांस करने के लिये। सभी की नजर आराध्या पर गयी लेकिन धनंजय कही नहीं दिखा। सबके बीच बातें होने लगी। अब धनवी को भी अफ़सोस हुआ की क्यों सबके बीच उसने अनाउंसमेंट कर दि। आराध्या के पास दीप्ती ओर तानिया आती उससे पहले आराध्या स्टेज पर पहुंच जाती है।उसे समझ मे नहीं आता की वो क्या डांस करे। तभी हॉल की रौशनी कम हो जाती है ओर एक जगह सफ़ेद रंग की पठानी कपड़े मे धनंजय गाने के बोल पर डांस करता है...

आ के भर लो बाज़ूओं में तुमको है कसम
जान मेरी जा रही सनम....... ये गाते हुए वो मुस्कुराते हुए अपने दोनों बाहें फेला देता है। आराध्या भाग कर उसके सीने से लग जाती है।फिर धनंजय उसे बाहों मे घूमता हुए गाता है...

क्या मोहब्बत है, क्या नज़ारा है
कल तलक ये दिल था मेरा, अब तुम्हारा है............. इसके साथ उसके हाथ आराध्या को आगे से गर्दन पर आ जाते है। दोनों एक साथ घूमते है। तभी आराध्या के हाथ उसके गालों पर आ जाते है। धनंजय के हाथ उसके कमर पर आता है। दोनों एक दूसरे की आखों मे देखते है... आराध्या उसे देख कर, उसके चारों तरफ घूमते हुए गाती है....

क्या तमन्ना है, क्या इशारा है
हमने तो पल पल तड़प के, पल गुजारा है................ डांस करती हुई उससे आगे बढ़ जाती है। तभी तेजी से धनंजय उसके पास आते है ओर उसे कमर को पकड़ कर घुमाते हुए.... उठा देता है, आराध्या उस पर झुकी होती है ओर उसकी नजर आराध्या पर होती है.... तब आगे की लाइन गाता है...

देखो देखो ना, अब करो न मुझपे यूँ सितम 
जान मेरी जा रही सनम.........................दोनों एक दूसरे को घुमाते हुए, दोनों तरफ मुड़ जाते है। आराध्या अपने चेहरे ओर मुद्रा को बनाती हुई, उसकी तरफ देखती है। उसके आखों मे धनंजय को शिकायत नजर आती है। लेकिन वो फिर भी मुस्कुरा रहा होता है।

क्या लड़कपन है, क्या जवानी है
अब तुम्हारे नाम सारी ज़िन्दगानी है..................
क्या हकीकत है, क्या जवानी है
अब तुम्हारे नाम सारी ज़िन्दगानी है............. गाती हुई आराध्या उसकी तरफ घूम जाती है।धनंजय उसके बढे हुए  हाथों को थाम लेता है और उसे चूमते हुए ........ उसे अपने करीब करता है। उसकी उंगलियां आराध्या के चेहरे पर घूमती है। आराध्या अपनी आँखे बंद कर लेती है... धनंजय के हल्के होंठ उसके गालों पर जाते है और वो आगे गाता है....

क्या हकीकत है, क्या कहानी है
सामने मेरे, मेरे सपनों की रानी है
अब सहा ना जाए मुझसे दूरी का ये ग़म
जान मेरी जा रही सनम........................ ये गाते हुए उसके हाथ आराध्या की कमर पर जाता है। दोनों बेहद रोमांटिक और धीमी गति से डांस कर रहे थे। सभी उनकी डांस को देख कर मुस्कुरा रहे होते है। दोनों के बीच की मोहब्बत देख सभी मुस्कुरा रहे होते है। लेकिन इस गाने से धनंजय ने अपनी दिल की बात कही आराध्या से। सभी तालियों से उन दोनों को स्वागत करते है।
सभी आपस मे फिर घुल मिल जाते है और खाने -पीने लगते है।

इधर आराध्या को खींच कर एक हिस्से मे धनंजय उसे ले जाता है। सामने देख कर उसे हैरानी होती है क्योंकि वहाँ बेहद खूबसूरत से टेबल सजाया गया था। आराध्या हैरानी से उसकी तरफ देखती है। धनंजय उसके हाथों को थाम कर कुर्सी पर बिठा देता है। 


धनंजय ने होटल के वीआईपी हिस्से मे आराध्या के लिये डिनर डेट तैयार किया था। वहाँ उसने बेहद खूबसूरती से उस हिस्से को सजवाया था। आराध्या ने हैरान होते हुए कहा, " ये सब क्या है ठाकुर ! " धनंजय उसकी हाथों को थाम कर बेहद प्यार से कुर्सी पर बिठा देता है फिर उसके बगल मे खुद बैठ जाता है। धनंजय ने आराध्या के हाथों को थामे हुए कहा, " ठकुराइन ! चाह रहा हूँ एक खूबसूरत वक़्त तुम्हारे साथ बिताता चलु। पता नहीं कब फिर ऐसा मौका मिले। आराध्या ने अपना दूसरा हाथ उसकी हाथों मे देते हुए, बेचैनी से कहा, " ये हर बार इस तरह की बातें क्यों कर रहे हो ठाकुर ! सीधा सीधा बता क्यों नहीं देते की बात क्या है? ऐसा कुछ नहीं है ठकुराइन ! बस बीजी रहता हूँ इसलिये ये बातें कही। चलो अब मै तुम्हें अपनी हाथों से खाना खिलता हूँ। ये कह कर वो आराध्या को बेहद मोहब्बत से खिलाने लगता है। आराध्या ख़ामोशी से उसके हाथों खा रही थी।क्या मुझे नहीं खिलाओगी ठकुराइन ! आराध्या उसे खिलाने लगती है।

खाने के बाद, धनंजय उसे बाहों मे भर लेता है। ये क्या कर रहे हो ठाकुर !सभी इंतजार कर रहे होंगे हमारा। नहीं ठकुराइन! मैंने अयान को बता दिया है और सभी शादी तक यही रुकने वाले। अब तक सभी अपने अपने कमरे मे चले गए होंगे और हम दोनों अपने कमरे मे जा रहे है। आराध्या फिर कोई सवाल नहीं करती है।

उस होटल के सबसे ऊपरी हिस्से मे धनंजय ने कमरा लिया था। उस कमरे को बेहद खूबसूरती से तैयार करवाया था। पुरे कमरे मे खुशुब वाली कैंडिल्स जल रही थी, पूरा कमरा फूलों से सजा हुआ था। जैसी किसी की सुहागरात की तैयारी की गयी हो। उस कमरे की सजावट देख कर आराध्या फिर उसकी तरफ देखती है। ये सब क्या है ठाकुर? धनंजय उसे उतार देता है। फिर उसकी हाथ मे एक पैकेट देते हुए कहा, " ये पहन कर मेरे लिये आओगी ठकुराइन !! मै चाहता हूँ की एक बार फिर से तुम्हें पूर्ण सोलह श्रृंगार मे देखूँ !" वो कुछ कहने को अपने लबों को खोलती.. धनंजय की ऊँगली उसके होठो पर आ जाती है। आज कोई सवाल जबाब नहीं। आज बस मोहब्बत करना चाहता हूँ अपनी आराध्या से !!"

आराध्या जा कर तैयार होने लग जाती है। वो जैसे ही तैयार होकर आती है, धनंजय कुछ पलो के लिये बस उसे निहारता रह जाता है।धनंजय उसके करीब आता है और लाल साड़ी मे उसे देख कर अपनी बाहों मे भर लेता है। दोनों की आँखे बंद हो जाती है, सुकून से। उसके हाथों मे भरी हुई लाल चुड़ीयों को चूमते हुए, उसने कहा, " ये श्रृंगार सिर्फ मेरे लिये करना ठकुराइन!!" लाल साड़ी और सोलह श्रृंगार की हुई आराध्या बेहद खूबसूरत लग रही थी।

अब आराध्या की आखों मे आंसू आने लगे थे। वो बहुत देर से खुद को संभाल रही थी लेकिन धनंजय की बीते दिनों की व्यवहार ने उस की अंदर तूफान मचा रखा था। उसके आखों मे आंसू देख, धनंजय ने बेहद बेचैनी से कहा, " ठकुराइन! मैंने कुछ गलत कर दिया या कह दिया। तुम रोने क्यों लगी !" आराध्या उसकी आखों मे देखते हुए कहा, " क्या बात ? क्यों मुझे बेचैनी दें रहे हो ठाकुर? बोलो ना क्यों? खुद कुछ बता नहीं रहे और मुझे कसम मे बांध रखे हो!!"

पागल लड़की तुमसे मोहब्बत करना चाहता हूँ। शादी की रात सुहागरात नहीं मनाया था तो आज वो पल जीना चाहता हूँ। क्या इज्जाजत नहीं दोगी अपने ठाकुर को। आराध्या उसकी बात सुनकर खामोश हो जाती है, वो समझ जाती है की धनंजय उसे कुछ नहीं बताने वाला है। इसलिये वो भी सब कुछ भूल कर उसके साथ ये पल जीने लगती है।

धनंजय उसके लाल होठो पर अपने होठो को रख देता है और उसके हाथ उसकी खुली पीठ पर चलने लगती है। दोनों एक दूसरे को अपनी सांसों की साथ तक चूमते है। उसके बाद धनंजय की होंठ उसके माथे पर पहने हुए मांगटिका को चूमते है। इस लम्हें मे दोनों की आँखे बंद हो जाती है। उसके बाद वो उसके टिके को उतार देता है। फिर उसके होंठ कानों की झुमके को चूमते है। जिससे आराध्या खुद को समेट लेती है और धनंजय उसके कानों की झुमके को उतार देता है।

धनंजय ने अपने होठो से आराध्या की बदन पर मौजूद हर हिस्से को चूमते हुए निकाल दिया था। अब आराध्या उसके सामने सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट मे आँखे बंद किये खड़ी थी। उसके खुले बाल, गले मे पहना मंगलसूत्र और कमर मे बँधा कमरबंध, जिसे देख धनंजय बेहद हसरत से उसके पास घुटनों पर बैठ जाता है। फिर उसके कमर बंद को अपने होठो से खोलने की लिये उसके पेट पर अपने लबों को रख देता है। जैसे जैसे रात गहरी होती जा रही थी धनंजय बेहद गहराइयों से आराध्या को अपनी मोहब्बत की दुनिया मे शामिल करता जा रहा था।

अब दोनों बिस्तर मे, एक चादर से लिपटे हुए, एक दूसरे की होठो को चूम रहे थे। दोनों का खुल बदन एक दूसरे को महसूस कर रहे थे। आराध्या बस धनंजय की इशारो पर अपना सुद बुध खोयी उसके साथ बस डूबती जा रही थी। धनंजय आज अपनी मोहब्बत के सारे रंग मे अपनी ठकुराइन को डूबो रहा था। दोनों की आहे और सिसकियाँ साथ गूंज रही थी। दोनों अपनी मोहब्बत की निशानी एक दूसरे के बदन पर दिए जा रहे थे। आज धनंजय को कोई जल्दी नहीं और ना वो आक्रमक हो रहा था। आज वो बस आराध्या के साथ अपने रूह को जोड़ रहा था।दोनों ना जाने कब तक एक दूसरे को प्यार करते रहे।
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सुबह का वक़्त धनंजय की बाहों मे सोई आराध्या थी। जिसे ना जाने कब से वो देखे जा रहा था की तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। बाहर से तानिया की आवाज़ आयी, आरू ! जल्दी आओ रस्मे शुरू हो गयी। ये कह कर वो चली जाती है। धनंजय ने अपनी बाहों मे सोई हुई आराध्या से कहा, " ये इतनी सुबह सुबह कौन सी रस्म होनी है!"

गौरी -गणेश, कुल देवी, मिट्ठी -कलश ये सब की पूजा होगी। आप भी तैयार हो जाओ क्योंकि हम दोनों को बैठना होगा। हम दोनों ही धनवी का कन्यादान करेंगे और दीप्ती -अयान, प्रथम और अयानी का !! हम्म्म्म ! क्या तुम ठीक हो? धनंजय की बात पर आराध्या उसकी तरफ देखती है। आज उसकी आखों मे कोई चुलबुलापन नहीं था। मै ठीक हूँ ठाकुर '! ये कह कर उठने लगती है। तभी धनंजय उसे थाम लेता है और बाहों मे उठा कर वाशरूम लेकर चला जाता है।


निचे प्रथम ने अयान से पूछा, कुछ मालूम हुआ की आज कल धनंजय कहा व्यस्त रहता है। उसकी बात सुनकर ध्यान के चेहरे का रंग बदल जाता है। जिसे अयान देख लेता है। लेकिन उसने प्रथम से कहा, आज शादी कर ले। फिर ये बातें होती रहेगी।

दिन बीत जाता है और अब शादी की तैयारी शुरू हो जाती है। क्योंकि बाराती और सराती दोनों के लिये एक जगह रहने की व्यवस्था की गयी थी और शादी होटल से होनी थी। इसलिये बारात का आना पहले ही हो चुका था। इसलिये अब सीधे शादी और यही से विदाई की तैयारी थी।

मंडप सज चुका था और दोनों दूल्हा मंडप पर बैठ चुके थे। तभी धनवी ने लाल और अयानी ने गुलाबी जोड़े मे बीच मे सर झुकाये आ रही थी और धनंजय, ध्यान, अयान, दीप्ती और तानिया ने ऊपर से फूलोबसे सजी चुनर पकड़ रखी थी। संकल्प और प्रथम तो बस अपनी अपनी वालियों को निहार रहे थे। उसके बाद दोनों ने आगे बढ़ कर उनके हाथों को थाम लिया और साथ लेकर मंडप पर बैठ गए।

आज ये पल तीनों भाइयों और दादी -दादा के लिये बेहद भावुक पल था। जिन्हें बचपन से अपनी गोद मे पाला, नाजो से रखा, आज वो इतनी बड़ी हो गयी की पराये घर जा रही है। ध्यान के आखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। क्योंकि सबसे ज्यादा वक़्त उसने ही बिताया था। तानिया ने उसे अपना दुप्पटा देते हुए कहा, यही नियम है ध्यान ! हम ने भी तो अपने बाबुल का घर छोड़ा। सम्भालिये खुद को !!" ध्यान ने अपने आखों के आंसुओ को साफ करते हुए कहा, " तुम्हें मालूम होना चाहिए। दूसरे का दर्द हम समझे या नहीं समझे। लेकिन खुद पर जाती है तो दर्द समझ मे आता है।

धनंजय और आराध्या दोनों के आखों मे आंसू थे और अयान -दीप्ती के भी आखों मे आंसू थे, जब वो दोनों धनवी और अयानी का कन्यादान कर रहे थे। धनंजय ने अपनी कठोर आवाज़ मे कहा, अगर मेरी छोटी के आखों मे आंसू आ गए तो संकल्प तुम याद कर लेना मुझे। संकल्प ने मुस्कुरा कर कहा, " फ़िक्र मत करो आप ! कभी कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। "


शादी सम्पन्न हो जाती है और अब विदाई की तैयारी संकल्प और धनवी की गयी थी क्योंकि अयानी और प्रथम तो ठकुर निवास मे ही रहने वाले थे। धनवी सबसे ज्यादा आराध्या और धनंजय से लिपट कर रो रही थी। बेहद मुश्किल से तीनों भाइयों ने उसे संकल्प के साथ गाड़ी मे बिठाया और पानी गाड़ी पर डाल कर आराध्या ने उसे विदा किये।

शादी और विदाई के बाद सभी का रो रो कर बुरा हाल था। आराध्या ने दादी और दादा को संभाल और सभी घर को निकल गए। 

ठाकुर हवेली मे अयानी और प्रथम की सारी रस्मे करवाई गयी थी, क्योंकि सुबह हो गयी थी शादी होते होते तो धनवी और संकल्प को सबने विदा किया फिर सवेरे ही अयानी और प्रथम की सारी रस्मे की निभाई गयी। लेकिन दीपा और रिंकू जी ने फरमान सुना दिया की दूल्हा और दूल्हन को रात मे कमरे मे साथ भेजना है। इसलिये अयानी को अलग कमरे मे ले जायेगा।

पिछले दस दिनों मे पूरा परिवार शादी की भाग दौड़ मे थक गया था। इसलिये बीना बहस किये सभी अपने अपने कमरे मे चले गए। आराध्या और तानिया ने सभी रिस्तेदारो को आराम करने की व्यवस्था कर दि। क्योंकि सब शाम तक या सुबह तक जाने वाले थे। पूरा परिवार शादी के बाद आराम से अपने अपने कमरे मे सोने चला गया। आराध्या कमरे मे आयी तो उसे धनंजय कही नहीं दिखा। लेकिन कल रात उसकी की हुई मोहब्बत ने आराध्या को इस तरह थका दिया था की वो बीना कुछ सोचें समझे, सीधे सो गयी। लेकिन तभी उसके मोबाइल पर मेसेज आया :!!"

आराध्या ने नींद मे ही एक बार उसने मेसेज देखा तो वो किसी अनजान नंबर से आया है। उसने खोल कर देखा तो उसमें लिखा हुआ था... ठकुराइन ! एक बार मेरी लॉकर को खोल कर देख लेना। पासवर्ड तुमको मालूम है जान। आई लव यू !! मै तुमसे बहुत बहुत प्यार करता हूँ। अपना ख्याल रखना..... उसके बाद मेसेज खत्म हो जाती है। आराध्या चुंकि बेहद थकी हुई थी इसलिये उसने एक नजर पढ़ा और वो सीधे सो गयी।

इस बात से बिल्कुल बेखबर की आगे उसकी जिंदगी किस मोड़ पर जाने वाली है।

शाम को,
ठाकुर हवेली बहुत तेज शोर होने लगा था। आराध्या के दरवाजे पर तेज आवाज़ से तानिया और दीप्ती नॉक कर रही थी। आराध्या जो गहरी नींद मे थी। बेहद मुश्किल से उसने अपनी आँखे खोली और मुश्किल से उठ कर दरवाजा खोला। तब उसे निचे से किसी की तेज आवाज़ सुनाई दें रही थी। सामने खड़ी दीप्ती और तानिया बेहद तेजी मे कहा, निचे चलो जल्दी। सबके चेहरे पर परेशानी थी। आराध्या हाँ करती हुई, उनके साथ बढ़ जाती है।

निचे हॉल मे, वसुधा मौजूद थी सबके साथ.... आराध्या जितना उसे देख कर हैरान नहीं हुई, उससे कही ज्यादा हैरान उसके बगल मे खड़े धनंजय को देख कर हो रही थी। ठाकुर परिवार के चेहरे पर आये भाव को देख वसुधा अपनी कुटिल मुस्कान लिये सबको देखती है। लेकिन आराध्या की नजर सिर्फ धनंजय पर थी। गोपी जी ने हैरानी से कहा, " ये क्या है बच्चे ! तू इस औरत को लेकर क्यों आया है हमारे घर? "भाई ये क्या!आप ऐसी औरत को घर मे क्यों ले आये है?

"तमीज से ध्यान ये हमारी माँ है और अपनी माँ से ऐसी बात करना अच्छा नहीं है!" धनंजय की बातों ने एक झटके मे, सबको सदमे ले आया। गोपी जी की छड़ी हाथों से गिड़ गयी और वो गिरने लगे की मुकेश और दीपक जी ने उनको संभाल लिया। आराध्या ने दीप्ती और अयान से कहा, मेहमानों को विदा करो। क्योंकि वसुधा के चीखने पर सारे रिस्तेदार बाहर आ चुके थे और आपस मे बातें बना रहे थे।दीप्ती और अयान ने नौकरो के साथ सबको विदाह करवाने की जिम्मेदारी लीं।

फिर वसुधा की तरफ देख कर कहा, " नाच -तमाशा कर चुकी हो तो आप बैठ जाईये और बैठ कर बात करते है !!" आराध्या तुम ऐसे कैसे मेरी माँ से बात कर सकती हो। एक बार फिर धनंजय की बातों ने सबको हैरानी मे डाल दिया था। तानिया कुछ कहती, उससे पहले आराध्या ने उसके हाथों को पकड़ लिया और इशारे मे ना मे सर हिलाया। फिर उसने कहा, " धनंजय ! आपकी माँ है ये अच्छी बात है लेकिन मै पहली बार आपको माँ -माँ करते सुन रही हूँ। तो आपकी तरह मै भी माँ -माँ कह कर इनसे लिपट जाऊ। आप भूल रहे है ये आपकी माँ है, मेरी नहीं। और आज ये कोई टीवी सिरियल नहीं है, देख कर आप  आये है और मै उसी हिसाब से व्यवहार करुं तो ये सम्भव नहीं है। इसलिये आप अपनी माँ के साथ सीधे सीधे बैठ जाइये। फिर  आप बताये की आपने ये क्यों किया है?

वसुधा और रणवीर उसे इशारे मे बुलाते है। फिर धनंजय आकर वसुधा के बगल मे बैठ जाता है। धनंजय का बदला व्यवहार सबके लिये असहनीय था लेकिन आराध्या ने सबको चुप करवा रखा था। यहाँ तक अयानी और प्रथम भी हैरानी से अपने भाई को देख रहे थे। इन सब के बीच सिर्फ आराध्या थी जो बेहद शांत थी। जो हर छोटी से छोटी बात पर अपनी प्रतिक्रिया देती थी। आज वो सबसे ज्यादा संयमित थी। उसके व्यवहार को देख कर ही पूरा परिवार अब भी शांत थे क्योंकि सबको आराध्या पर भरोसा था।

आराध्या ने तानिया से कहा, सबके लिये चाय और कॉफी बनाओ। मै एक बार सारे मेहमानों को मिल लूँ। घर से बाहर सभी रिश्तेदार  मौजूद, अपनी अपनी गाड़ीयों मे बैठने लगे थे। उनमें से दादी -दादू के उम्र के रिस्तेदार जो बाहर खड़े परेशान थे। उनके पैर को छूते हुए, आराध्या ने कहा, आप फ़िक्र मत कीजिये बड़ी दादी। सब संभाल लुंगी। बिटिया तुम पर ही उम्मीद है, पता नहीं धनंजय को क्या हो गया है !! आप आराम से जाईये। बहुत जल्दी फिर मिलेंगे। आराध्या सबको आराम से विदाह कर देती है।

जब वो अंदर आती है तो. धनंजय ने उससे कहा, मेरे पास आओ आराध्या ! इस समय उसकी आखों मे कुछ अलग था। जिसे देख कर आराध्या ने कहा, पहले सभी सवालों के जबाब दीजिये धनंजय ! ये औरत यहाँ क्यों है? ये घर मे घुसते के साथ चीख रही थी और अगर आपकी माँ है तो आपको रोकना चाहिए था ना की अभी अभी पुरे घर मे मेहमान मौजूद थे। आराध्या की तीखी बात सुनकर वसुधा उसकी तरफ देखती है। आराध्या ने कहा, " सारे मेहमान थे इसलिये मै चुप थी। अब जबाब चाहिए। इस बार उसकी आवाज़ शख्त थी। उसकी बात पर वसुधा ने कहा, तुम होती कौन ये पूछने वाली की मेरे बेटे ने मुझे यहाँ क्यों लाया है? आखिरी कब तक एक बेटा अपनी माँ से नाराज रहता। इसके पिता की धोखेबाजी की वजह से ही मै घर छोड़ कर गयी और फिर मैंने रणवीर से शादी की।

उस समय ( एक नजर गोपीकांत और सुमती जी पर डालते हुए  कहा ) कुछ लोगों ने मेरे बच्चे के कान मे जहर जरूर भर दिया था लेकिन अब मेरे बच्चे को मालूम है की माँ तो माँ होती है। वसुधा ने अपनी बात खत्म की तो एक बार फिर अपनी सधी आवाज़ मे आराध्या ने कहा, " आपका प्रवचन खत्म हो गया हो तो सीधे बताईये की यहाँ किसलिए आना हुआ। और राजनितिक नेता की तरह मुद्दे से दाए बाएं मत जाये, सीधे सवालों का जबाब दें।" सबको आराध्या पर यकीन था इसलिये सब उसकी बात पर चुप हो गए थे।

धनंजय ने एक बार वसुधा की तरफ देखा और फिर आराध्या से कहा, तुम्हारी जुबान ज्यादा चलने लगी है आराध्या। ये लेकिन कोई बात नहीं बहुत जल्दी ठीक हो जाएगी।आज से मेरे माता -पिता यही इसी घर मे रहेंगे। ये मेरा फैसला है। उसकी बात पर पूरा परिवार गु