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तेरे लिए जानम Chapter-27

तेरे लिए जानम Chapter-27

तभी बाहर से विवान के आने की आहट हुई। अगले ही पल वह डॉक्टर के साथ कमरे में दाख़िल हुआ। डॉक्टर को देखते ही आरोही ने उन्हें पहचान लिया। यही वही डॉक्टर थीं, जो सुबह अनुराधा को देखने आई थीं। डॉक्टर ने एक नज़र अनुराधा पर डाली और फिर आरोही की तरफ़ देखकर कहा,आप ज़रा बाहर जाइए।

आरोही का मन नहीं था। वह अनुराधा को इस हालत में अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने एक पल के लिए बिस्तर पर पड़ी अपनी दोस्त को देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़ नज़र गई, जहाँ राम खड़ा था।

राम ने कुछ कहा नहीं था, लेकिन उसकी मौजूदगी ही आरोही के लिए काफी थी। उसके चेहरे पर ऐसी सख़्ती थी कि आरोही चाहकर भी वहाँ रुकने की हिम्मत नहीं कर पाई। वह चुपचाप उठी और कमरे से बाहर आ गई।

डॉक्टर ने राम की तरफ़ देखा और कह, मिस्टर रघुवंशी, आप भी बाहर चले जाइए। "राम की नज़र एक बार फिर अनुराधा पर गई। उसके बाद उसने बिना कोई सवाल किए दरवाज़े से बाहर कदम रख दिया।

कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।अब बाहर सिर्फ़ इंतज़ार था।आरोही कुछ दूरी पर खड़ी थी। विवान और अथर्व भी वहीं मौजूद थे, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि राम से कुछ पूछ सके। राम खुद भी एक शब्द नहीं बोल रहा था। वह बस बंद दरवाज़े की तरफ़ देखे जा रहा था।

उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन वह गुस्सा सिर्फ़ उन लोगों के लिए नहीं था जिन्होंने अनुराधा के साथ वह सब किया था। उसमें खुद के लिए भी एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे वह किसी के सामने जाहिर नहीं कर रहा था।

कुछ देर पहले अनुराधा को जिस हालत में उसने अपनी बाँहों में उठाया था, वह दृश्य बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था। उसके बिखरे बाल, चेहरे पर पड़े निशान, गर्दन पर वह चोट... हर बार वही तस्वीर उसके भीतर कुछ और भड़का देती।

राम ने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।उसके भीतर जैसे आग जल रही थी।ऐसी आग, जिसे वह अपने चेहरे पर आने नहीं दे रहा था, लेकिन जो अंदर ही अंदर उसे लगातार जला रही थी। वह जितना उसे दबाने की कोशिश करता, वह उतनी ही गहरी होती जाती। जैसे उसके भीतर किसी ने आग लगा दी हो और अब उसके पास उसे बुझाने के लिए कुछ भी न हो।

फिर कमरे का दरवाज़ा खुला।डॉक्टर बाहर आईं।आरोही की नज़र तुरंत उनकी तरफ़ उठी। अथर्व और विवान भी उनकी ओर देखने लगे।लेकिन राम...राम पहले से ही डॉक्टर की तरफ़ देख रहा था।

उसका चेहरा अब भी बिल्कुल डार्क था। आँखों की लालिमा में रात भर की थकान नहीं, बल्कि वह दबा हुआ क्रोध था जो किसी भी पल फिर से भड़क सकता था। डॉक्टर के चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसकी मुट्ठियाँ एक बार फिर कस गईं।

उसके भीतर धधकती आग अभी भी वैसी ही थी।वह उसे अंदर ही अंदर जला रही थी... और सबसे बुरी बात यह थी कि राम जितना उसे बुझाना चाहता था, वह उतनी ही तेज़ जलती जा रही थी।

डॉक्टर कमरे से बाहर आते ही कुछ पल वहीं खड़ी रहीं। उनकी नज़र अनायास राम पर पड़ी, लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपनी आँखें दूसरी तरफ़ कर लीं। राम का चेहरा देखकर उनके भीतर भी एक अजीब-सा दबाव पैदा हो रहा था। 

उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "मिस्टर रघुवंशी... मैंने आपसे सुबह भी कहा था कि मिसेस रघुवंशी किसी गहरे सदमे की वजह से बेहोश हो जाती हैं। उनके दिल और दिमाग़ में पहले से ही किसी चीज़ का डर बैठा हुआ है।"

राम की आँखें डॉक्टर के चेहरे पर टिक गईं। वह कुछ नहीं बोला।डॉक्टर ने एक पल रुककर अपनी बात आगे बढ़ाई, "मैं आपसे एक बात कहूँगी... प्लीज़, इसे गलत मत समझिएगा। प्यार करने का मतलब सामने वाले को दर्द देना नहीं होता।"

राम की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।
डॉक्टर ने तुरंत स्पष्ट किया, "मैं उनकी गर्दन पर लगी चोट की बात कर रही हूँ। वहाँ चोट के निशान हैं और उनकी हालत को देखते हुए आपको थोड़ा सावधान रहना होगा। आप खुद समझ गए होंगे की मै क्या कह रहीं हु। उनके शरीर और मन...दोनों को इस वक्त किसी भी तरह के अतिरिक्त तनाव से बचाने की ज़रूरत है।"

राम की नज़र एक पल के लिए नीचे झुकी। उसके चेहरे पर कोई साफ़ प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन उसकी मुट्ठी धीरे से कस गई।

डॉक्टर ने आगे कहा, "बाकी मैंने उन्हें दवा दे दी है। इंजेक्शन भी लगा दिया है। उम्मीद है कुछ देर में उन्हें होश आ जाएगा। फिलहाल उन्हें आराम की ज़रूरत है। और सबसे ज़रूरी बात... उन्हें खुश और शांत रखिए। जितना वह सुरक्षित महसूस करेंगी, उतना ही उनकी हालत के लिए अच्छा होगा।"

वह कुछ पल चुप रहीं, फिर गंभीर होकर बोलीं, "आपको अपनी पत्नी का थोड़ा ज्यादा ख्याल रखना होगा, मिस्टर रघुवंशी। उनके अंदर बहुत डर भरा हुआ है। हो सकता है वह उसे शब्दों में न कह पाएँ, लेकिन उसका असर उनके शरीर पर साफ़ दिखाई दे रहा है।"

राम की आँखों में कुछ पल के लिए एक अजीब-सी चमक आई, लेकिन उसने उसे तुरंत अपने भीतर दबा लिया।

डॉक्टर ने अपना बैग संभालते हुए कहा, "अब मैं चलती हूँ। अगर उन्हें होश आने के बाद कोई परेशानी हो, या उनकी हालत में कोई बदलाव लगे, तो मुझे तुरंत फोन कर लीजिएगा।"

वह मुड़कर जाने लगीं।लेकिन दो कदम चलने के बाद जैसे उन्हें कुछ याद आया। उन्होंने पलटकर राम को देखा और धीमे स्वर में कहा, "और एक बात... उन्हें अभी किसी डर की नहीं, भरोसे की ज़रूरत है। कोशिश कीजिए कि जब उन्हें होश आए, तो उन्हें सबसे पहले यही महसूस हो कि वह सुरक्षित हैं।"

इतना कहकर डॉक्टर वहाँ से चली गईं।राम वहीं खड़ा रह गया।उसने कुछ नहीं कहा। न डॉक्टर को रोका, न कोई सवाल किया।बस कुछ देर तक बंद दरवाज़े को देखता रहा, जिसके पीछे अनुराधा बेहोश पड़ी थी।

डॉक्टर की एक बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी,"उनके अंदर बहुत डर भरा हुआ है।"राम ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।उसके भीतर धधकता गुस्सा अभी भी वहीं था... लेकिन अब उस आग के बीच एक और चीज़ थी। अनुराधा के उस डर का एहसास, जिसे वह चाहकर भी अपने दिमाग़ से निकाल नहीं पा रहा था।

डॉक्टर के मुँह से बार-बार "मिसेस रघुवंशी" सुनकर आरोही के अंदर पहले से ही गुस्सा जमा होता जा रहा था। हर बार जब वह नाम उसके कानों में पड़ता, उसकी नज़र अनायास अनुराधा की तरफ़ चली जाती। बिस्तर पर बेहोश पड़ी अपनी दोस्त की हालत और उसकी गर्दन पर पड़े निशान देखकर आरोही के दिमाग़ में बस एक ही बात घूम रही थी...आख़िर ये सब हुआ कैसे?

और उसके मन ने बिना किसी सबूत के उसका जवाब भी तय कर लिया था....राम!उसे यकीन होने लगा था कि अनुराधा की इस हालत के पीछे वही है। शायद इसी वजह से डॉक्टर भी बार-बार उसकी पत्नी कह रही थीं। जितना वह इस बारे में सोचती, उतना ही उसका गुस्सा बढ़ता जाता।

डॉक्टर के जाते ही आरोही खुद को रोक नहीं पाई। वह तेज़ कदमों से राम के सामने जाकर खड़ी हो गई।राम ने धीरे से अपनी नज़रें उठाईं।उसकी आँखें सीधी आरोही पर आकर टिक गईं।

वह नज़र इतनी ठंडी और गहरी थी कि आसपास खड़े अथर्व और विवान ने एक-दूसरे की तरफ़ तक नहीं देखा। दोनों के मन में एक ही ख्याल आया की ये लड़की सच में अपनी गर्दन शेर के जबड़े में डालकर खड़ी हो गई है।

लेकिन आरोही के अंदर इस वक्त डर से ज्यादा गुस्सा था।उसने राम की आँखों में देखते हुए कहा, "मिस्टर रघुवंशी... मुझे आपके इस तरह घूरने से डर नहीं लगता।"

राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।आरोही की आवाज़ थोड़ी और सख़्त हो गई।
"ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे आप? मुझे मार देंगे?"

कुछ पल तक राम उसे बस देखता रहा।आरोही की आँखों में अचानक आँसू भर आए, लेकिन उसने उन्हें पलकों के पीछे रोकने की कोशिश की। फिर भी आवाज़ में आई कंपकंपी छिप नहीं सकी।

"लेकिन मुझे उसकी परवाह नहीं है..."उसने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, जैसे खुद को संभाल रही हो, फिर राम की तरफ़ देखकर बोली,"मुझे बस ये समझ नहीं आ रहा कि आपने उसके साथ ऐसा क्यों किया?"

इस बार राम की आँखों में हल्की-सी हरकत हुई।आरोही ने काँपते हाथों से अपने आँसू पोंछे।
"आपको पता भी है वो कितनी मुश्किल से अपने पुराने दर्द से बाहर आई थी?"उसकी आवाज़ अब ऊँची नहीं थी। बल्कि पहले से कहीं ज्यादा टूट चुकी थी।

"कितनी मुश्किल से उसने खुद को संभाला था... कितनी कोशिश की थी उसने सब कुछ पीछे छोड़ने की। और आज..."उसकी नज़र कमरे के बंद दरवाज़े पर चली गई।"...आज फिर वही हालत।"

आरोही ने राम की तरफ़ देखा।उस राक्षस ने क्या उसे कम दर्द दिया था?आख़िरी शब्दों के साथ उसकी आवाज़ टूट गई।

वह आँसू पोंछते हुए बोली, "आप जानते हैं, उस सबके बाद उसे वापस नॉर्मल होने में कितना वक्त लगा था? कितनी मुश्किल से उसने खुद पर भरोसा करना सीखा था? कितनी मुश्किल से उसने अपने अंदर का डर दबाया था?"

उसने सिर हिलाया।"और अब... अब वो फिर उसी डर में चली गई है।"राम का चेहरा अब भी शांत था, लेकिन उसकी आँखों की कठोरता धीरे-धीरे बदल रही थी।

आरोही के आँसू अब रुक नहीं रहे थे।"अगर आपको उससे प्यार है ना, तो उसका ख्याल रखना चाहिए था... उसे फिर से वही दर्द नहीं देना चाहिए था।"

राम की मुट्ठियाँ धीरे-धीरे कस गईं।आरोही ने उसे देखा और लगभग शिकायत करते हुए, टूटती आवाज़ में कहा,"आपने ऐसा क्यों किया उसके साथ...? हम तो मिले भी आपसे पहली बार है। फिर कौन सी दुश्मनी जाग गयी आपके अंदर। आपको क्या खूबसूरत लड़कियो की कमी थी। जो आप मेरी अनु के पीछे पड़ गए।"

कुछ पल के लिए पूरी जगह पर सन्नाटा छा गया।राम ने अब भी कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन इस बार उसकी खामोशी पहले जैसी नहीं थी।क्योंकि आरोही जिस सच को समझकर उस पर इल्ज़ाम लगा रही थी... राम के भीतर वही बात किसी और वजह से तूफ़ान मचा रही थी।

और शायद पहली बार उसे अपने उस गुस्से से ज्यादा तकलीफ़ हो रही थी, जो उसने अनुराधा के लिए महसूस किया था... क्योंकि उस गुस्से में अब एक सवाल शामिल हो चुका था।

अनुराधा को इतना डर आखिर किस चीज़ से लगा था?

राम के साथ कमरे के बाहर खड़े सभी लोग बेहद ध्यान से आरोही की बात सुन रहे थे। आरोही अनुराधा की हालत को लेकर राम को कुछ समझा ही रही थी कि तभी कमरे के भीतर से अचानक एक चीख सुनाई दी।

"जाने दो... जाने दो..."आवाज़ इतनी डरी हुई थी कि बाहर खड़े सभी लोग एक पल के लिए सन्न रह गए।

राम ने बिना एक क्षण गँवाए दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया। उसके पीछे अभिमन्यु, अथर्व और बाकी लोग भी कमरे में आ गए।

बिस्तर पर अनुराधा बुरी तरह तड़प रही थी। उसकी आँखें बंद थीं और वह जैसे किसी भयानक सपने में फँसी हुई थी। उसके हाथ-पैर बार-बार बिस्तर पर पड़ रहे थे। वह लगातार खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, जैसे अभी भी वही लोग उसे पकड़कर खींच रहे हों।

कमरे में एसी चल रहा था, फिर भी उसके माथे और गर्दन पर पसीने की बूँदें उभर आई थीं। उसके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था। होंठ काँप रहे थे और आँखें बंद होने के बावजूद आँसू उनके किनारों से निकलकर तकिए में समा रहे थे।

"जाने दो... प्लीज़... मुझे जाने दो..."

उसकी टूटी हुई आवाज़ सुनकर कमरे में मौजूद सभी लोगों की आँखें नम हो गईं।आरोही खुद को रोक नहीं पाई। उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े और वह तुरंत अनुराधा की तरफ बढ़ी।
लेकिन इससे पहले कि वह बिस्तर तक पहुँचती, राम आगे बढ़ चुका था।

उसने झुककर अनुराधा को अपनी बाँहों में उठा लिया और उसे अपने सीने से लगा लिया।
अनुराधा की बेचैन हरकतें कुछ पल तक जारी रहीं। वह आँखें बंद किए हुए ही राम से खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, जैसे उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ है।

राम ने धीरे-धीरे अनुराधा के माथे पर हाथ फेरना शुरू किया। उसकी उँगलियों का स्पर्श बेहद हल्का था, जैसे वह डर रहा हो कि कहीं ज़रा-सी सख़्ती भी उसके भीतर छिपे डर को फिर से जगा न दे।

"शांत हो जाओ, अनु... मैं हूँ ना। कुछ नहीं हुआ... और ना कभी कुछ होने दूँगा।"

उसकी आवाज़ में इस बार वह कठोरता नहीं थी, जो कुछ देर पहले उन लोगों के सामने थी। अनुराधा के लिए उसके स्वर में सिर्फ़ भरोसा था।

राम की आवाज़ सुनते-सुनते अनुराधा की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उसके शरीर का तनाव कम हुआ और वह उसकी बाँहों में बिल्कुल शांत हो गई। कुछ देर बाद उसकी पलकों पर फिर से नींद उतरने लगी।

राम ने उसे सावधानी से बिस्तर पर लिटाया। उसने तकिया ठीक किया और चादर उसके कंधों तक खींच दी। एक बार उसने अनुराधा के चेहरे को देखा, फिर उसके माथे पर हाथ रखकर यह सुनिश्चित किया कि अब वह सच में शांत है।

आरोही ने अभी कुछ देर पहले जो बातें उसे बताई थीं, वे बार-बार उसके दिमाग में घूम रही थीं। डॉक्टर को अनुराधा की हालत पर लगातार नज़र रखने की ज़रूरत थी और राम समझ चुका था कि इस समय उसे आराम की सबसे ज़्यादा आवश्यकता है।

वह धीरे से उठा,लेकिन तभी उसे अपनी शर्ट पर हल्की-सी खिंचाव महसूस हुई।राम रुक गया।उसने अपनी नजरें निचे की तो देखा।

अनुराधा की आँखें बंद थीं। वह अब भी बेहोश थी, लेकिन उसकी उँगलियाँ राम की शर्ट का कपड़ा कसकर पकड़े हुए थीं। इतनी मजबूती से कि उसकी मुट्ठी में कपड़े की सिलवटें पड़ गई थीं।

राम कुछ क्षण उसे देखता रहा।शायद बेहोशी में भी उसके भीतर वही डर कहीं बाकी था। जिस इंसान की बाँहों में आकर उसने पहली बार खुद को सुरक्षित महसूस किया था, उसे वह जाने नहीं देना चाहती थी। शायद उसे डर था कि अगर राम अभी चला गया, तो वह फिर उसी जगह पहुँच जाएगी जहाँ से उसे बचाकर लाया गया था।

राम ने धीरे से उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों से छुआ।उसने शर्ट छुड़ाने की कोशिश नहीं की।बस वापस वहीं उसके सिरहाने बैठ गया।

बिस्तर के सिरहाने बैठकर उसने अनुराधा की ओर देखा और बहुत धीमे से कहा, "मैं यहीं हूँ, अनु।"

अनुराधा ने नींद में ही उसकी शर्ट की पकड़ थोड़ी और कस दी।राम कुछ नहीं बोला।वह वहीं बैठा रहा।

राम को उसी तरह अनुराधा के पास बैठे देखकर कमरे में मौजूद बाकी लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा। शायद सभी समझ चुके थे कि इस वक्त राम को अकेला छोड़ देना ही बेहतर होगा। धीरे-धीरे एक-एक करके अभिमन्यु, अथर्व और विवान कमरे से बाहर निकलने लगे। 

आरोही मगर अब भी वहीं खड़ी रही। उसने अपने दोनों हाथ सीने पर बाँध रखे थे और लगातार राम को घूर रही थी। उसके चेहरे पर अभी भी वही सवाल और गुस्सा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कुछ देर पहले जिस आदमी पर वह अनुराधा की हालत का दोष लगा रही थी, वही अब उसकी दोस्त को इस तरह अपने सीने से लगाए बैठा है।

वह कुछ बोलने ही वाली थी कि अचानक किसी ने पीछे से उसकी कलाई पकड़ ली। आरोही ने पलटकर देखा, लेकिन सामने वाले ने बिना कुछ कहे उसे कमरे से बाहर ले जाना ही बेहतर समझा। आरोही ने एक बार फिर पीछे मुड़कर कमरे के अंदर देखा। राम अब भी अनुराधा के पास बैठा था और उसकी नज़रें केवल उसी पर थीं। दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर से शांति छा गई।

राम ने कुछ देर तक अनुराधा को देखा। उसके चेहरे पर थकान थी और साँसें अब पहले की तुलना में काफी सामान्य हो चुकी थीं। राम ने धीरे से उसके सिर के नीचे हाथ लगाया और खुद भी उसके पास लेट गया। जैसे ही वह लेटा, अनुराधा ने नींद में ही करवट बदली और बिना जाने उसका चेहरा राम के सीने से लग गया। उसकी बाँहें अनजाने में राम को घेर गईं और वह एक छोटे बच्चे की तरह उसके सीने से चिपककर सो गई।

राम कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर पड़ा रहा। फिर उसने बहुत सावधानी से अपनी बाँह उसके चारों ओर रख दी। उसकी हथेली अनुराधा की पीठ पर थी और उसकी उँगलियाँ हल्के-हल्के उसकी पीठ पर चल रही थीं।

उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन दिमाग़ में सवालों का सिलसिला चल रहा था।

आखिर उसके साथ ऐसा क्या हुआ था?

आरोही ने पुराने दर्द की बात क्यों कही थी? वह कौन-सा दर्द था, जिससे अनुराधा इतनी मुश्किल से बाहर आई थी? और आज की घटना ने उस पुराने डर को इतनी बुरी तरह क्यों जगा दिया कि वह नींद में भी "जाने दो" चिल्लाने लगी?

राम की नज़र अचानक उसकी गर्दन पर चली गई।

वहाँ बने निशान अभी भी साफ़ दिखाई दे रहे थे।

उसकी आँखों में एक पल में फिर वही क्रोध उतर आया। उसकी कनपटियों की नसें तन गईं और उँगलियाँ अनायास मुट्ठी में बदलने लगीं। कुछ ही सेकंड में उसके भीतर वही आग फिर भड़क उठी, लेकिन उसने गहरी साँस लेकर खुद को रोक लिया। उसने अनुराधा की तरफ देखा, जो इस समय उसके सीने से बिल्कुल निश्चिंत होकर सो रही थी।

राम ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"अभी नहीं..." उसने मन ही मन खुद को समझाया। "पहले अनु।"

उसने धीरे से अनुराधा को और करीब कर लिया और उसके माथे पर हाथ रख दिया। बाहर की दुनिया में चाहे जितना तूफ़ान मचा हो, इस वक्त उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता उसके पास सोई यह लड़की थी।

इसलिए उसने अपने गुस्से को वहीं दबा दिया और अनुराधा को अपनी बाँहों में लिए चुपचाप उसके पास सोया रहा।
अभिमन्यु ने आरोही की कलाई पकड़ी और उसे लगभग खींचते हुए पास के कमरे में ले गया। आरोही को जैसे ही समझ आया कि वह उसे सबसे अलग क्यों लेकर आया है, वह गुस्से में कुछ कहने के लिए मुँह खोलती, लेकिन उससे पहले ही अभिमन्यु ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।


उसने अपनी आँखों से उसे चुप रहने का इशारा किया।आरोही की आँखें गुस्से से फैल गईं। उसने उसके हाथ को हटाने की कोशिश की, मगर अभिमन्यु ने कुछ पल उसे उसी तरह देखा और फिर धीरे से अपना हाथ उसके मुँह से हटा लिया।

आरोही तुरंत बोलने ही वाली थी कि अभिमन्यु ने अपनी एक उँगली उसके होंठों पर रख दी।
"श्श्श्श...!"
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन लहजे में इतनी सख्ती थी कि आरोही वहीं रुक गई।
"अभी अगर तुमने कुछ कहा ना..." अभिमन्यु ने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे-धीरे कहा, "तो मैं कुछ ऐसा कर दूँगा, जो तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं आएगा।"


आरोही ने आँखें सिकोड़कर उसे घूरा।अभिमन्यु ने उँगली उसके होंठों से हटाई और कहा, "और एक बात... पहले सुनना सीखो, फिर बोलना। हर बार अपनी तरफ से फैसला करके बीच में कूद पड़ना बंद करो।"

आरोही ने तुरंत कुछ कहने के लिए मुँह खोला।
"और हाँ..." अभिमन्यु ने उसकी तरफ उँगली उठाकर उसे फिर रोक दिया, "अभी-अभी जिस शेर के आगे तुम म्याऊँ-म्याऊँ कर रही थीं ना..."उसके चेहरे पर हल्की-सी तंज भरी मुस्कान आई।"...उसके सामने तुम्हारी एक नहीं चलती।"