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तेरे लिए जानम Chapter-26

 तेरे लिए जानम Chapter-26

राम ने तुरंत अपनी आँखों की नमी समेट ली। एक ही पल में उसके चेहरे पर फिर वही परिचित कठोरता लौट आई। उसने धीरे से अनुराधा की मुट्ठी से अपनी शर्ट छुड़ाई। इस बार उसने अपनी हथेली उसकी उँगलियों के नीचे रख दी, ताकि उसे अचानक खालीपन महसूस न हो।


तभी दरवाजा खुला और अंदर सबसे पहले अभिमन्यु आया। उसके पीछे आरोही थी और सबसे आखिर में अथर्व, जिसके हाथ में एक मेडिकल बैग था। 

आरोही की नज़र जैसे ही बिस्तर पर लेटी अनुराधा पर पड़ी, उसके कदम वहीं रुक गए।
बिखरे हुए बाल...चेहरे पर खरोंचों के निशान...गर्दन पर चोट...और बेहोशी की हालत...
एक पल के लिए उसे समझ ही आया गया था की आखिर हुआ क्या था ।वह घबराकर कभी अनुराधा को देखती, कभी राम को।

राम खिड़की के पास जाकर खड़ा हो चुका था। उसकी पीठ सबकी ओर थी। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था और उस सन्नाटे में किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि सबसे पहला सवाल पूछे।

आरोही अभी भी स्तब्ध खड़ी थी...क्योंकि कुछ ही देर पहले तक उसे इस बात का ज़रा-सा भी अंदाज़ा नहीं था कि होटल में ऐसा कुछ घट चुका है।

कुछ देर पहले...

होटल से निकलने के कुछ ही मिनट बाद अभिमन्यु के मोबाइल पर राम का मैसेज आया। मैसेज छोटा था, लेकिन उसके शब्दों से साफ़ समझ आ रहा था कि मामला बेहद गंभीर है। राम ने लिखा था, "मिस आरोही त्रिवेदी को लेकर तुरंत मेंशन पहुँचो।

अथर्व से कहो, अनुराधा के लिए कुछ कपड़े लेकर आए।" मैसेज पढ़ते ही अभिमन्यु के चेहरे का रंग बदल गया। वह राम को इतने वर्षों से जानता था। राम कभी भी बेवजह किसी को आदेश नहीं देता था, और अगर उसने अनुराधा के लिए कपड़े मँगवाने को कहा है।

तो इसका मतलब ज़रूर कुछ ऐसा हुआ है, जिसके बारे में सोचकर ही उसका मन बेचैन हो उठा। उसने बिना समय गंवाए अथर्व को फोन करके सारी बात समझाई और खुद सीधे उस कंपनी की ओर निकल गया, जहाँ आरोही काम करती थी।

उस समय ऑफिस में रोज़ की तरह काम चल रहा था। कर्मचारी अपनी-अपनी सीटों पर बैठे कंप्यूटर स्क्रीन में व्यस्त थे। कोई क्लाइंट से बात कर रहा था, तो कोई मीटिंग की तैयारी में लगा था। 

ऐसे माहौल में जब अभिमन्यु तेज़ कदमों से अंदर आया, तो कई लोगों की नज़रें अनायास उसकी ओर उठ गईं। वह बिना इधर-उधर देखे सीधे उस केबिन तक पहुँचा, जहाँ आरोही बैठी काम कर रही थी।

आरोही ने सामने किसी की आहट महसूस की तो सिर उठाकर देखा। वह कुछ समझ पाती, उससे पहले ही अभिमन्यु उसके सामने आकर खड़ा हो चुका था। उसने बिना किसी भूमिका के कहा, "चलिए, मेरे साथ।" इतना कहकर उसने उसका हाथ पकड़ लिया और लगभग उसे साथ लेकर बाहर की ओर चल पड़ा।

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि आरोही कुछ पल के लिए समझ ही नहीं पाई कि आखिर हो क्या रहा है। उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, "सुनिए... आप हैं कौन? और इस तरह मेरा हाथ पकड़कर मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?
लेकिन अभिमन्यु ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। उसके कदम लगातार बाहर की ओर बढ़ते रहे।

उधर पूरे ऑफिस में जैसे अचानक काम रुक गया था। जिस किसी ने भी यह दृश्य देखा, वह हैरानी से दोनों को देखता रह गया। एम्प्लोयी के बीच धीरे-धीरे फुसफुसाहट शुरू हो गई। कई लोग एक-दूसरे से पूछने लगे कि आखिर अभिमन्यु राठौर खुद ऑफिस आकर आरोही को इस तरह क्यों ले जा रहे हैं।

कुछ महिला कर्मचारी, जो अब तक अभिमन्यु को सिर्फ़ बिज़नेस मैगज़ीन या अख़बारों में देखा करती थीं, अब उन्हें अपने सामने देखकर पहले ही चौंकी हुई थीं। ऊपर से उसे आरोही का हाथ पकड़कर ले जाते देख उनके चेहरों पर हैरानी के साथ हल्की-सी जलन भी साफ़ दिखाई देने लगी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

ऑफिस से बाहर निकलकर जैसे ही अभिमन्यु उसे कार तक लाया, आरोही ने इस बार ज़ोर से अपना हाथ छुड़ाया। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। वह गुस्से और घबराहट, दोनों से भरी हुई थी। "पहले ये बताइए कि आप हैं कौन? और मुझे इस तरह जबरदस्ती कहाँ ले जा रहे हैं?"

अभिमन्यु पहली बार रुका। उसने महसूस किया कि अगर उसने अब भी कुछ नहीं बताया, तो आरोही उसके साथ नहीं जाएगी। उसने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा, "देखिए, मिस... प्लीज़ मुझे गलत मत समझिए। मेरा नाम अभिमन्यु राठौर है। मैं राम रघुवंशी के साथ काम करता हूँ।"

राम रघुवंशी का नाम सुनकर भी आरोही के चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं आया। वह अब भी उसी सवाल का जवाब चाहती थी।

अभिमन्यु ने बिना बात घुमाए कहा, "आपकी दोस्त अनुराधा ठाकुर की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। राम ने मुझे आपको तुरंत वहाँ लाने के लिए भेजा है।"

अनुराधा का नाम सुनते ही आरोही का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया। अभी तक उसके मन में जो गुस्सा था, उसकी जगह डर ने ले ली।

"अनु...?" उसकी आवाज़ काँप गई। "क्या हुआ उसे? वो ठीक तो है ना?

अभिमन्यु ने कुछ क्षण उसे देखा। उसके मन में बहुत कुछ था, लेकिन वह जानता था कि सड़क के बीच खड़े होकर यह सब बताना ठीक नहीं होगा।

उसने कार का दरवाज़ा खोलते हुए धीमे स्वर में कहा, "रास्ते में जितना बता सकता हूँ, बता दूँगा। लेकिन अभी हमें एक-एक मिनट की कीमत समझनी होगी।"


अभिमन्यु की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि आरोही ने उसे सिर से पैर तक ऐसे देखा, जैसे उसकी पूरी पर्सनैलिटी का एक्स-रे निकाल रही हो। अगले ही पल उसने फुर्ती से उसके हाथ से कार की चाबी झपट ली। 

अभिमन्यु एक पल के लिए समझ ही नहीं पाया कि हुआ क्या है। जब तक वह कुछ सोचता, आरोही चाबी अपनी मुट्ठी में दबाकर उससे दो कदम दूर जा चुकी थी।

उसने अपनी आँखें छोटी करते हुए उसे घूरा, फिर बोली, "देखो मिस्टर... सबसे पहले तो अपनी ये हीरोगिरी किसी और को दिखाना। 

"सुनो मिस्टर..." उसने पूरी गंभीरता से कहा, "मैं आरोही त्रिवेदी हूँ। कोई स्कूल की बच्ची या कॉलेज की बेवकूफ़ लड़की नहीं, जिसे तुम दो मीठी बातें सुनाओ और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल दूँ।"

वह उसकी तरफ़ थोड़ा झुककर और उसकी आवाज़ की नकल उतार कर बोली, "आजकल सबसे पहले यही बोला जाता है, 'आपके मम्मी-पापा का एक्सीडेंट हो गया है... आपके दोस्त की तबीयत खराब है... जल्दी चलिए...'। और सामने वाला घबराकर बिना कुछ सोचे उनके साथ निकल पड़ता है।"

उसने अपनी उँगली हवा में लहराते हुए कहा, "लेकिन अफ़सोस... तुम गलत लड़की के पास आ गए हो।"इतना कहकर उसने चाबी अपनी जेब में रख ली और होंठ टेढ़े करते हुए बोली, "तो ये इमोशनल ड्रामा किसी और पर ट्राय करना। मुझ पर नहीं चलेगा।"

फिर उसने खुद ही मुँह बनाया और दोनों हाथ हवा में फैलाकर बोली,"क्यों...? और मैं इतनी बड़ी बुद्धू दिखती हूँ तुम्हें कि तुम्हारी बात सुनते ही गाड़ी में बैठ जाऊँ?"

अभिमन्यु कुछ बोलने के लिए मुँह खोलता, उससे पहले ही उसने उँगली उठाकर उसे रोक दिया।"नो... एक शब्द भी नहीं। पहले तुम बताओ हो कौन? कहाँ से आए हो? और मुझे कैसे जानते हो?"

वह एक कदम उसकी तरफ़ बढ़ी और चाबी हवा में हिलाते हुए बोली,"और अगर तुम्हारे दिमाग़ में ये चल रहा है कि मेरा हाथ पकड़ोगे, गाड़ी में बैठाओगे और मैं चुपचाप चली जाऊँगी..."

उसने हल्की-सी हँसी छोड़ी।"...तो भाईसाहब, बहुत गलत लड़की चुन ली है तुमने।"

इतना कहकर उसने अपनी दोनों बाँहें मोड़ीं, कराटे की मुद्रा बनाई और पूरी शान से बोली,
"मैं नेशनल लेवल मार्शल आर्ट्स चैंपियन हूँ। इसलिए शरीफ़ी से अपनी गाड़ी की चाबी वापस माँग लो... वरना अगले पाँच मिनट में तुम्हें खुद समझ नहीं आएगा कि ज़मीन पर पड़े हो या आसमान देख रहे हो।"

उसने फिर आँखें तरेरीं।"और हाँ... एक कदम भी मेरी तरफ़ बढ़ाया ना..."उसने चाबी से उसकी तरफ़ इशारा किया।"...तो सिर फोड़ने में मुझे दो सेकंड भी नहीं लगेंगे।"

आरोही पूरी अकड़ के साथ उसके सामने खड़ी थी। दूसरी तरफ़ अभिमन्यु उसे देख रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि सामने वाली लड़की सिर्फ़ बातूनी नहीं... बल्कि किसी को भी अपने शब्दों से चकरा देने का हुनर रखती है।

"इसलिए चुपचाप रास्ते से हट जाओ... नहीं तो त डॉक्टर भी एक्स-रे देखकर पूछेगा, 'भाई, हुआ क्या था?'"

उसकी आँखों में ज़रा-सा भी डर नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ अभिमन्यु के सामने खड़ी थी, मानो अगला वार करने के लिए बस उसके एक कदम बढ़ाने का इंतज़ार कर रही हो।

एक तरफ़ अभिमन्यु पहले से ही इस टेंशन में था कि उसे किसी भी हालत में राम से पहले मेंशन पहुँचना है, ऊपर से सामने हमारी आरोही त्रिवेदी खड़ी थी, जो अपनी फाइट स्किल्स दिखाकर उसकी बची-खुची patience का भी टेस्ट लेने पर तुली हुई थी। 

अभिमन्यु ने उसे कुछ पल तक घूरकर देखा और मन ही मन बड़बड़ाया, दुनिया की पहली एलियन इंसान... इसे इंसानों की भाषा समझ ही नहीं आती क्या?

लेकिन उसके पास इस वक्त बहस करने का समय नहीं था। उसने बिना एक शब्द कहे बस हाथ के इशारे से आरोही को बाहर आने के लिए कहा।

आरोही ने उसके इशारे को देखा और फिर अपने कंधे उचकाते हुए चेहरे पर ऐसी विजयी मुस्कान लाई, जैसे उसने अभिमन्यु को अभी-अभी अखाड़े में चारों खाने चित कर दिया हो।

"देखा... डर गए ना?"

वह अपनी जीत पर इतरा कर आगे बढ़ी ही थी कि अगले ही पल अभिमन्यु ने पीछे से उसे झटके से उठाकर अपनी गोद में उठा लिया।आरोही की आँखें हैरानी से फैल गईं।

"हुँ !"उसकी आवाज़ पूरी निकलती, उससे पहले ही अभिमन्यु ने उसके मुँह पर टेप चिपका दिया।

आरोही की आँखें अब हैरानी से सीधे गुस्से में बदल चुकी थीं।
"हुँह! हुँह! हुँह!"

वह सिर हिलाकर, हाथ-पैर चलाकर अपना विरोध दर्ज कराने लगी, लेकिन अभिमन्यु इस बार उसकी एक भी बात सुनने के मूड में नहीं था। उसने जल्दी से उसके हाथों और पैरों को भी टेप से बाँधा और उसे उठाकर गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा दिया।

सीट बेल्ट लगाकर उसने एक बार उसे देखा..आरोही की आँखों में इस वक्त इतनी आग थी कि अगर सिर्फ़ नज़रों से किसी को मारने का हुनर होता, तो अभिमन्यु अब तक कई बार मर चुका होता।

उसने बिना कोई प्रतिक्रिया दिए दरवाज़ा बंद किया और ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गया।
गाड़ी स्टार्ट हुई।पीछे बैठी आरोही ने तुरंत अपनी पूरी ताक़त टेप छुड़ाने में लगा दी। कभी अपनी कलाई मोड़ती, कभी हाथों को सीट से रगड़ती, फिर पैरों को झटका देती और बीच-बीच में मुँह पर लगे टेप के पीछे से लगातार, "हुँह! हुँह! हुँह!"

अभिमन्यु ने रियर-व्यू मिरर में उसकी तरफ़ देखा।आरोही उसी वक्त उसे घूरते हुए टेप खोलने की कोशिश कर रही थी।दोनों की नज़रें मिरर में मिलीं।आरोही ने आँखें और बड़ी कर दीं।

अभिमन्यु ने तुरंत नज़रें सड़क पर वापस कर लीं।मन ही मन उसने गहरी साँस छोड़ी।राम रघुवंशी... तेरे एक मैसेज की वजह से आज मुझे ये दिन भी देखना पड़ रहा है।पीछे से फिर आवाज़ आई,"हुँह! हुँह!"

अभिमन्यु ने आँखें बंद करने की इच्छा को बड़ी मुश्किल से दबाया और गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। उसे बस किसी भी तरह जल्दी से मेंशन पहुँचना था... इससे पहले कि राम का गुस्सा उस पर भी उतर जाए।


अभिमन्यु ने कुछ देर तक आरोही की तरफ़ देखा, फिर इस बार उसकी आवाज़ में साफ़ सख़्ती आ गई। "चुपचाप बैठो... और शांति से चलो। सच में तुम्हारी दोस्त की तबीयत खराब है। बाकी वहाँ पहुँचकर अपनी आँखों से देख लेना।"

इस बार आरोही के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। अभिमन्यु के चेहरे पर जो गंभीरता थी, उसने उसके सारे ताने और सवाल जैसे वहीं रोक दिए। वह धीरे से सीट पर टिक गई। उसके मन में अब भी बहुत कुछ चल रहा था, लेकिन पहली बार उसे सच में चिंता होने लगी थी। अगर अनुराधा की तबीयत इतनी खराब थी, तो अभिमन्यु उसे इस तरह अचानक क्यों लेकर जा रहा था?

कुछ ही देर बाद गाड़ी अवंतिका विला के सामने जाकर रुकी। अभिमन्यु के साथ आरोही अंदर आई तो उसने देखा कि अथर्व पहले से ही वहाँ एक बैग लिए खड़ा था। शायद उसमें अनुराधा के लिए कपड़े थे। आरोही अभी अथर्व से कुछ पूछने के लिए उसकी तरफ़ देख ही रही थी कि उसकी नज़र सीढ़ियों की तरफ़ चली गई।

राम...वह अनुराधा को अपनी बाँहों में उठाए तेज़ी से ऊपर जा रहा था।आरोही की आँखें वहीं टिक गईं।

कुछ पल पहले तक जो सवाल उसके दिमाग़ में घूम रहे थे, अब वे और भी उलझ गए थे। राम रघुवंशी के चेहरे पर ऐसा गुस्सा था, जिसे आरोही ने शायद ही कभी देखा हो। उसके जबड़े भींचे हुए थे, आँखें लाल थीं और चेहरे पर इतनी कठोरता थी कि उसे देखते ही आरोही के भीतर एक अनजाना डर उतर आया।

"मिस आरोही..." अथर्व ने कपड़ों वाला बैग उसकी तरफ़ बढ़ाया।आरोही ने चुपचाप बैग पकड़ लिया।अब वह बिना कुछ पूछे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गई।

ऊपर पहुँचकर उसने देखा, राम अनुराधा के कमरे के बाहर खड़ा था। वह कुछ पल वहीं रुक गई। राम ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे का गुस्सा अभी भी वैसा ही था। बल्कि अब करीब से देखने पर उसकी आँखों में वह बेचैनी भी दिखाई दे रही थी, जिसे शायद वह खुद भी किसी के सामने आने नहीं देना चाहता था।

आरोही ने धीमे से पूछा, "अनुराधा..."

राम ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही सीधे कहा, "अंदर जाइए। इनके कपड़े बदल दीजिए।"आवाज़ में आदेश था।

आरोही ने पहली बार कोई सवाल नहीं किया। उसने बस सिर हिलाया और बैग लेकर कमरे के अंदर चली गई।लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र बिस्तर पर पड़ी और उसके कदम वहीं जम गए।

"अनु..."उसके मुँह से निकली वह एक छोटी-सी आवाज़ ही बता रही थी कि उसने अनुराधा को किस हालत में देखा था।

अनुराधा की बिखरी हुई हालत देखकर आरोही की आँखों में तुरंत आँसू भर आए। उसके चेहरे पर चोट के निशान थे, बाल पूरी तरह अस्त-व्यस्त थे और गर्दन पर पड़े निशान देखते ही आरोही का दिल जैसे बैठ गया।

वह तेजी से बिस्तर के पास पहुँची।"अनु... क्या हुआ?"उसकी आवाज़ काँप गई।उसने अनुराधा के चेहरे को देखते हुए अपने आँसू रोकने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल एक आँसू उसके गाल से नीचे उतर गया।

"तू ठीक तो है ना, अनु?"अनुराधा ने कोई जवाब नहीं दिया।

आरोही ने घबराकर उसकी तरफ़ देखा। तभी कमरे के बाहर से राम की आवाज़ आई।
"डॉक्टर आने वाली होंगी। उससे पहले इनके कपड़े बदल दीजिए।"

आरोही ने दरवाज़े की तरफ़ देखा।राम अंदर नहीं आया था।वह बाहर ही खड़ा था, जैसे अनुराधा को इस हालत में देखकर भी उसके पास जाने की हिम्मत और उसे अकेला छोड़ने का धैर्य...दोनों के बीच कहीं अटका हुआ हो।

आरोही ने अपने आँसू पोंछे और वापस अनुराधा की तरफ़ मुड़ी।"हाँ... पहले तुझे ठीक करते हैं। बाकी सब बाद में पूछूँगी।"

उसने बैग खोला और अनुराधा के लिए कपड़े निकालने लगी, लेकिन उसकी आँखें बार-बार अपनी बेहोश दोस्त के चेहरे पर चली जा रही थीं।

उसे अभी तक नहीं पता था कि अनुराधा के साथ हुआ क्या था...लेकिन इतना वह समझ चुकी थी कि आज जो कुछ हुआ था, वह सिर्फ़ 'तबीयत खराब' होने की बात नहीं थी।

आरोही ने राम की बात सुनते ही बिना कोई सवाल किए जल्दी से अनुराधा के कपड़े बदल दिए और फिर उसके पास ही बैठ गई। बार-बार उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे पर जा रही थी। वह अभी भी ठीक से समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसकी दोस्त के साथ हुआ क्या था, लेकिन अनुराधा की हालत देखकर उसके मन में बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी।

तभी बाहर से कदमों की आहट सुनाई दी। अगले ही पल विवान डॉक्टर के साथ कमरे में दाख़िल हुआ। डॉक्टर को देखते ही आरोही की नज़र उनके चेहरे पर टिक गई। यह वही डॉक्टर थीं, जो सुबह अनुराधा को देखने आई थीं। डॉक्टर ने कमरे में आते ही एक नज़र अनुराधा पर डाली और फिर आरोही की तरफ़ देखते हुए शांत लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा, "आप ज़रा बाहर जाइए।"

आरोही का मन बिल्कुल नहीं था कि वह अनुराधा को इस हालत में अकेला छोड़कर जाए। उसने एक बार अनुराधा की तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े के पास खड़े राम की तरफ़। राम कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन उसके चेहरे की कठोरता और आँखों में जमा गुस्सा देखकर आरोही पहले ही उससे सहमी हुई थी। इसलिए उसने कोई बहस नहीं की। चुपचाप उठी और कमरे से बाहर निकल आई।

डॉक्टर ने राम की तरफ़ देखा और कहा, "मिस्टर रघुवंशी, आप भी बाहर जाइए। मुझे मरीज को चेक करना है।"

राम ने एक पल के लिए अनुराधा की तरफ़ देखा। उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे से हटने का नाम नहीं ले रही थी। फिर उसने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और कमरे से बाहर आ गया।

दरवाज़ा बंद हो गया।

अब बाहर सिर्फ़ इंतज़ार था।

आरोही एक तरफ़ खड़ी थी, विवान और अथर्व कुछ दूरी पर मौजूद थे और राम वहीं चुपचाप खड़ा था। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उससे कुछ पूछ सके। उसके चेहरे पर गुस्सा अब भी साफ़ दिखाई दे रहा था। आँखें लाल थीं, जबड़ा कसा हुआ था और हाथों की मुट्ठियाँ बार-बार अनजाने में भींच जा रही थीं।

वह बाहर से जितना शांत दिखाई दे रहा था, उसके भीतर उतना ही भयानक तूफ़ान चल रहा था। कुछ देर पहले अनुराधा को जिस हालत में उसने देखा था, उसकी एक-एक तस्वीर उसके दिमाग़ में बार-बार घूम रही थी। वह खुद को जितना शांत रखने की कोशिश करता, उसके भीतर का गुस्सा उतना ही भड़क उठता।

आख़िरकार कुछ देर बाद कमरे का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर बाहर आईं।

डॉक्टर को देखते ही वहाँ मौजूद हर शख़्स की नज़र उनकी तरफ़ उठ गई।

आरोही सबसे पहले आगे बढ़ी, लेकिन राम उससे भी पहले डॉक्टर के सामने पहुँच चुका था।

उसका चेहरा अब भी उतना ही सख़्त था। बल्कि इस इंतज़ार ने जैसे उसके भीतर के गुस्से को और गहरा कर दिया था। वह डॉक्टर को बिना पलक झपकाए देख रहा था, जैसे उनके अगले शब्दों से ही तय होना था कि उसके भीतर धधक रही आग थोड़ी शांत होगी... या फिर और भड़क उठेगी।

आरोही ने राम की बात सुनते ही जल्दी से अनुराधा के कपड़े बदल दिए और फिर उसके पास बैठ गई। उसकी उँगलियाँ काम कर रही थीं, लेकिन उसका ध्यान बार-बार अनुराधा के चेहरे पर चला जाता। वह कुछ पूछना चाहती थी, बहुत कुछ जानना चाहती थी, लेकिन इस वक्त उसकी हालत देखकर उसके मुँह से कोई सवाल निकल ही नहीं रहा था।