तेरे लिए जानम Chapter-25
- 29 October, 2026
राम के भीतर उठ रहा क्रोध अब किसी के नियंत्रण में नहीं था। उसकी साँसें सामान्य थीं, चेहरा भी वैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों में उतर आई कठोरता देखकर अच्छे-अच्छों का साहस जवाब दे जाता।
अनुराधा ने अनजाने में उसकी शर्ट को और कसकर पकड़ लिया। अभी कुछ देर पहले तक वह उन दरिंदों से छूटने के लिए संघर्ष कर रही थी, और अब राम के भीतर उमड़ते उस भयानक क्रोध को देखकर उसके भीतर एक नया डर जन्म ले चुका था। वह बिना कुछ कहे और सिमटकर उसके सीने से लग गई।
राम ने उसकी उस हरकत को महसूस किया।
उसने एक पल के लिए अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया। उसकी पकड़ में वही दृढ़ता थी, लेकिन स्पर्श में अजीब-सी कोमलता थी। जैसे वह उसे यह भरोसा दे रहा हो कि अब उसे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं है। उसने अनुराधा को अपनी बाँहों की ओट में वैसे ही छिपाए रखा, जैसे कोई अपने सबसे अनमोल ख़ज़ाने को हर बुरी नज़र से बचाकर रखता है।
फिर उसकी नज़र दोबारा कुणाल पर टिक गई।
कुणाल दर्द से कराहता हुआ घुटनों के बल पड़ा था। वह उठने की कोशिश कर ही रहा था कि राम ने आगे बढ़कर अपने जूते का तलवा उसके चेहरे पर रख दिया।
कुणाल की कराह और तेज़ हो गई।राम ने बिना किसी जल्दबाज़ी के अपने जूते को उसके चेहरे पर दबाते हुए कहा,
"तुझे अंदाज़ा भी नहीं है कि तूने किसे हाथ लगाने की जुर्रत की है। तूने राम रघुवंशी की सबसे बेशकीमती चीज़ को छूने की कोशिश की है।"
उसकी आवाज़ में चीख नहीं थी।वह उतनी ही ठंडी थी जितनी किसी ऐसे आदमी की होती है, जो अपना फैसला सुना चुका हो।
उसने जूते का दबाव थोड़ा और बढ़ाया।
"तुम जैसे लोग ही किसी स्त्री के मान-सम्मान को कुचलते हैं। अपने आपको ताक़तवर समझते हो, क्योंकि सामने वाली औरत है। एक बार भी यह नहीं सोचते कि उसके भी सपने हैं, उसका भी आत्मसम्मान है, और उसकी ज़िंदगी से खेलने का हक़ इस दुनिया में किसी को नहीं मिला।"
राम कुछ पल के लिए रुका। उसकी आँखें अब भी कुणाल पर जमी थीं।
"स्त्री का सम्मान करना सिखाया जाता है... लेकिन जिसके संस्कार ही सड़े हुए हों, उससे ऐसी उम्मीद करना भी बेकार है। और जिसकी परवरिश ही ऐसी हो..." उसके होंठों पर तिरस्कार भरी मुस्कान उभरी, "...उसे औरत में सिर्फ़ शिकार ही दिखाई देता है।"
कुणाल दर्द से छटपटा रहा था, लेकिन राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। उसकी खामोशी और उसके शब्द ..दोनों मिलकर वहाँ मौजूद हर आदमी के दिल में ऐसा डर भर रहे थे, जिसे वे शायद ज़िंदगी भर भूल नहीं पाते। आखिर उन्हें समझ आ चुका था कि उन्होंने सिर्फ़ एक लड़की पर हाथ नहीं उठाया था... उन्होंने उस इंसान की सीमा लाँघ दी थी, जिसके लिए यह अपराध माफ़ करने योग्य नहीं था।
तभी कॉरिडोर में एक साथ कई लोगों के तेज़ कदमों की आहट गूँज उठी। अभिमन्यु, अथर्व और मीटिंग में मौजूद लगभग सभी लोग शोर सुनकर वहाँ तक पहुँच चुके थे। लेकिन जैसे ही अनुराधा के कानों में इतने लोगों की आवाज़ें पड़ीं, उसका डर और बढ़ गया। अभी-अभी जो भय उसने झेला था, उससे उसका पूरा शरीर अब भी काँप रहा था।
उसने बिना कुछ सोचे राम की शर्ट को अपनी मुट्ठियों में और कसकर पकड़ लिया और अपना चेहरा उसके सीने में छिपा लिया। वह इस तरह उससे लिपट गई, मानो खुद को दुनिया की नज़रों से नहीं, बल्कि राम के अंदर ही छिपा लेना चाहती हो।
उसकी काँपती हुई साँसें लगातार राम के सीने से टकरा रही थीं। राम ने उसकी हालत महसूस की। उसने अपना एक हाथ उसके सिर पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसे और मजबूती से अपनी बाँहों में समेट लिया। उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन उसकी पकड़ ही अनुराधा को यह भरोसा दिलाने के लिए काफ़ी थी कि अब उसके रहते कोई उसे छू भी नहीं सकता।
उधर वहाँ मौजूद हर इंसान की नज़र जब ज़मीन पर पड़ी, तो सबके चेहरे का रंग उड़ गया। कुणाल रावत दर्द से ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। बिज़नेस वर्ल्ड का एक बड़ा नाम... इस वक़्त राम रघुवंशी के पैरों के नीचे कराह रहा था।
किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे बढ़कर उसे छुड़ा सके। सभी जानते थे कि राम का गुस्सा ख़तरनाक होता है, लेकिन आज पहली बार वे उसे अपनी आँखों से देख रहे थे।
राम का एक पैर अब भी कुणाल के सिर पर रखा हुआ था, जबकि दूसरा उसी हाथ को अपने जूते के नीचे कुचल रहा था, जिस हाथ से उसने अनुराधा को पकड़ने की कोशिश की थी। कुणाल दर्द से बार-बार अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जितनी बार वह हिलता, राम अपने जूते का दबाव उतना ही बढ़ा देता। उसकी आँखों में अब दया जैसी कोई चीज़ नहीं बची थी।
उसने धीरे-धीरे अपनी नज़र वहाँ खड़े हर आदमी पर घुमाई। उसकी लाल आँखों से नज़र मिलाने की हिम्मत किसी में नहीं थी। फिर उसकी ठंडी, मगर रूह तक कंपा देने वाली आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँजी, "अगर... किसी ने भी... गलती से भी राम रघुवंशी की ज़िंदगी पर नज़र उठाकर देखने की कोशिश की... तो समझ लेना, वही उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।"
उसने बोलते हुए अपने जूते का दबाव कुणाल के हाथ पर और बढ़ा दिया। कुणाल दर्द से तड़प उठा, लेकिन राम के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। वह उसी कठोर स्वर में आगे बोला, "राम रघुवंशी अपनी सबसे छोटी चीज़ पर भी किसी और की नज़र बर्दाश्त नहीं करता... और तुम..." उसकी आवाज़ अचानक और भारी हो गई, "...तुमने तो मेरी रूह को हाथ लगाने की कोशिश की है।"
इतना कहते ही उसका धैर्य जैसे पूरी तरह टूट गया। उसने अपने जूते से कुणाल के चेहरे पर लगातार कई वार कर दिए। कुणाल की दर्द भरी चीखें पूरे कॉरिडोर में गूँज उठीं, लेकिन वहाँ मौजूद किसी भी आदमी के पैर आगे नहीं बढ़े।
सब पत्थर बने खड़े थे। उस पल किसी की नज़र कुणाल पर नहीं, बल्कि राम रघुवंशी के चेहरे पर थी। उसके चेहरे पर उबलता हुआ क्रोध साफ़ बता रहा था कि जिसने आज अनुराधा की तरफ़ ग़लत नज़र उठाई है, उसके लिए यह सज़ा अभी शुरुआत भर है।
कॉरिडोर में खड़े हर व्यक्ति के चेहरे का रंग उड़ चुका था। कुछ क्षण पहले तक जो लोग अपने प्रभाव और हैसियत के घमंड में खड़े थे, अब किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि राम की तरफ़ नज़र उठाकर भी देख सके।
वहाँ ऐसा सन्नाटा पसरा था कि लोगों को अपनी ही धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। राम का क्रोध किसी तूफ़ान की तरह शोर नहीं मचा रहा था, बल्कि उसकी ख़ामोशी ही सबके भीतर भय पैदा कर रही थी।
तभी भीड़ को चीरता हुआ कमल रावत आगे आया। उसने एक नज़र दर्द से तड़पते कुणाल पर डाली और दूसरी राम पर। अगले ही पल वह बिना कुछ सोचे राम के पैरों में गिर पड़ा।
"सर...!" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "प्लीज़... मेरे भाई को माफ़ कर दीजिए। उससे बहुत बड़ी गलती हो गई। पहली बार है... पहली गलती समझकर छोड़ दीजिए। मैं वादा करता हूँ, दोबारा ऐसी गलती कभी नहीं होगी।"
वह सचमुच गिड़गिड़ा रहा था। उसकी आवाज़ में घमंड का नामोनिशान नहीं था।
"सर... पहली गलती तो भगवान भी माफ़ कर देते हैं... प्लीज़... इसे माफ़ कर दीजिए।"
राम ने कुछ क्षण तक उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर दया का कोई भाव नहीं था। उसने धीरे से अपने जूते की नोक कमल की ठुड्डी के नीचे रखी और उसका चेहरा ऊपर उठा दिया ताकि वह उसकी आँखों में देख सके।
"गलत इंसान से दया माँग रहे हो..."उसकी आवाज़ पहले की तरह ही धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसा ठंडापन था कि कमल का शरीर काँप उठा।
"मैं... भगवान नहीं हूँ।"राम कुछ क्षण चुप रहा। फिर एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बोला,
"फिर भी..."उसने कुणाल की ओर देखा, जो दर्द से कराहते हुए फर्श पर पड़ा था।..आज इसकी जान छोड़ रहा हूँ।
कमल की आँखों में उम्मीद की हल्की-सी चमक उभरी ही थी कि राम ने अपनी बात पूरी की
"लेकिन इसकी ज़िंदगी... मौत से भी बदतर होगी।"उसके शब्द किसी फैसले की तरह गिरे।
कमल का चेहरा फिर से सफ़ेद पड़ गया। वह समझ गया था कि राम जो कह देता है, उसे बदलता नहीं।
राम ने अब एक पल भी वहाँ रुकना उचित नहीं समझा। उसकी पूरी चिंता इस समय अनुराधा थी, जो अब तक उसके सीने से लगी हुई थी। उसने नीचे देखा। अनुराधा का शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। उसके होंठों का रंग उड़ गया था और आँखें बंद थीं।
"जाना ..."उसने बहुत धीमे स्वर में पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।राम के चेहरे की कठोरता एक पल को बदल गई। उसने तुरंत उसे अपनी बाँहों में संभाला। अगले ही क्षण वह झुककर उसे सावधानी से गोद में उठा चुका था।
अनुराधा बिल्कुल निश्चल थी।उसका सिर राम के कंधे से टिक गया।राम ने एक बार उसकी साँसों को परखा। यह देखकर कि वह बेहोश हो चुकी है, उसकी बेचैनी और बढ़ गई।
उसने बिना कुछ कहे अभिमन्यु की ओर देखा।दोनों की नज़रें मिलीं और राम को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।अभिमन्यु उसके हर इशारे को समझता था।उसने हल्का-सा सिर हिलाकर संकेत दिया कि यहाँ का बाकी मामला वह संभाल लेगा।
राम अनुराधा को अपनी बाँहों में उठाए तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गया। इस समय उसके लिए न मीटिंग मायने रखती थी, न करोड़ों का प्रोजेक्ट। उसके मन में बस एक ही बात थी की अनुराधा को तुरंत सुरक्षित जगह और इलाज की ज़रूरत थी।
राम के जाते ही स्वाति और कविता दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। दोनों के चेहरे पर अलग-अलग भाव थे, लेकिन आँखों में एक जैसी चुभन थी।
कविता ने होंठ भींचते हुए धीमे स्वर में कहा,"हुँह... देखती हूँ, मिस्टर रघुवंशी... कब तक इस गुड़िया को इस तरह सँभालकर रखते हैं।"
स्वाति ने भी उसी दिशा में देखते हुए हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान दी, लेकिन कुछ बोली नहीं।
उधर अभिमन्यु ने एक गार्ड को हाथ के इशारे से अपने पास बुलाया। उसका चेहरा पूरी तरह गंभीर था। उसने धीमे स्वर में कुछ निर्देश दिए। गार्ड ने तुरंत सिर हिलाया और बाकी सुरक्षा कर्मचारियों को संकेत देने के लिए आगे बढ़ गया।
अथर्व भी वहीं खड़ा था। उसकी नज़र अब भी कुणाल और उसके साथियों पर टिकी हुई थी। वह समझ चुका था कि यह घटना यहीं समाप्त नहीं हुई है। यह तो सिर्फ़ शुरुआत थी।
राम बिना एक पल रुके अनुराधा को अपनी बाँहों में उठाए होटल से बाहर निकला। उसकी चाल तेज़ थी, लेकिन इतनी संभली हुई कि अनुराधा को ज़रा-सा भी झटका न लगे।
होटल के बाहर पहले से खड़ी कार का दरवाज़ा ड्राइवर ने तुरंत खोल दिया। राम ने बड़ी सावधानी से अनुराधा को पिछली सीट पर अपने पास बैठाया। उसका सिर अब भी उसके कंधे से टिका हुआ था। वह पूरी तरह बेहोश थी।
"मेंशन चलो।"
राम की आवाज़ हमेशा की तरह धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसा कठोर आदेश था कि ड्राइवर ने बिना कुछ पूछे तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।
कार सड़क पर दौड़ने लगी। बाहर शहर की चहल-पहल थी, लेकिन कार के भीतर अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।
राम ने जेब से अपना मोबाइल निकाला और अभिमन्यु को एक छोटा-सा मैसेज भेज दिया। संदेश में सिर्फ़ कुछ निर्देश थे। उसे पता था कि बाकी सब अभिमन्यु संभाल लेगा। मैसेज भेजने के बाद उसने मोबाइल एक तरफ़ रख दिया। उसकी सारी तवज्जो अब अनुराधा पर थी।
वह कुछ क्षण तक चुपचाप उसे देखता रहा।डर और सदमे की वजह से अनुराधा का चेहरा पूरी तरह पीला पड़ चुका था। उसके खुले हुए बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे। राम ने बहुत सावधानी से वे लटें हटाकर उसके कान के पीछे कर दीं, ताकि उसके चेहरे पर साफ़ नज़र पड़ सके।
जैसे ही उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे पर गई, उसकी साँस एक पल को भारी हो गई।
दोनों गालों पर सूख चुका खून साफ़ दिखाई दे रहा था। नाखूनों के गहरे निशान उसकी मुलायम त्वचा पर लाल लकीरों की तरह उभर आए थे। गर्दन पर दाँतों के निशान अब भी ताज़ा थे और वहाँ से निकला खून जमकर गहरा पड़ चुका था।
राम की उँगलियाँ अनायास मुट्ठी में बदल गईं।उसकी कनपटियों की नसें तन गईं।
वह बिना पलक झपकाए उन ज़ख्मों को देखता रहा। हर निशान उसके भीतर जलते हुए क्रोध को और भड़का रहा था। उसे बार-बार यही एहसास हो रहा था कि अगर वह कुछ मिनट पहले पहुँच जाता, तो अनुराधा को यह सब सहना नहीं पड़ता।
उसने धीरे से अपनी नज़रें बंद कीं और एक लंबी साँस ली, लेकिन भीतर उठ रहा तूफ़ान शांत नहीं हुआ।
कुछ क्षण बाद उसने बहुत सावधानी से अपना हाथ अनुराधा के सिर पर रखा। उसका स्पर्श इतना हल्का था, मानो उसे डर हो कि कहीं उसकी तकलीफ़ और न बढ़ जाए।
अनुराधा बेहोशी में भी हल्का-सा सिहर उठी और अनजाने में उसका सिर राम के कंधे की ओर और झुक गया।
राम ने उसे फिर से सहारा दिया और खिड़की के बाहर देखने लगा।उसके चेहरे पर वही ठंडी ख़ामोशी लौट आई थी।
लेकिन उसकी भींची हुई मुट्ठियाँ इस बात की गवाही दे रही थीं कि आज जो हुआ था... उसका हिसाब वह किसी भी कीमत पर अधूरा नहीं छोड़ेगा।
अवंतिका विला...
कुछ ही देर बाद काली बीएमडब्ल्यू अवंतिका विला के पोर्टिको में आकर रुकी। गाड़ी रुकते ही ड्राइवर जल्दी से नीचे उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोल दिया।
राम बिना एक पल गँवाए अनुराधा को उसी तरह अपनी बाँहों में उठाए गाड़ी से नीचे उतरा। उसका पूरा ध्यान सिर्फ़ अनुराधा पर था। वह बेहोश थी और उसका चेहरा अब भी दर्द और थकान से बिल्कुल निढाल लग रहा था।
विला के मुख्य दरवाज़े पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड से लेकर अंदर मौजूद नौकर-चाकर तक, सबकी नज़रें एक साथ राम पर टिक गईं।
पूरा माहौल कुछ पल के लिए जैसे थम गया।रघुवंशी परिवार में काम करने वाले ज़्यादातर लोग कई सालों से इस विला में थे। उन्होंने राम को बचपन से लेकर आज तक देखा था। उसका सख़्त स्वभाव, उसका अनुशासन और औरतों से उसकी दूरी... यह सब पूरे स्टाफ़ को अच्छी तरह मालूम था।
लेकिन आज...आज पहली बार उन्होंने किसी लड़की को राम रघुवंशी की बाँहों में देखा था।
सबके चेहरों पर हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी।
किसी के मन में सौ सवाल उठ रहे थे, लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि राम से कुछ पूछ सके। सब बस चुपचाप उसे जाते हुए देख रहे थे।
राम किसी की तरफ़ देखे बिना तेज़ कदमों से अंदर बढ़ गया। उसने एक पल भी नीचे रुकना ज़रूरी नहीं समझा। सीढ़ियाँ लगभग बिना रुके चढ़ते हुए वह सीधे पहली मंज़िल पर पहुँचा और अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
राम का कमरा उसकी पूरी शख़्सियत की तरह ही अलग था।कमरे की दीवारों पर पीच और क्रीम रंग का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन था, जो सादगी के साथ शाही एहसास भी देता था। हर चीज़ अपनी तय जगह पर रखी हुई थी। कमरे का इंटीरियर आधुनिक था, लेकिन उसमें घर जैसा सुकून भी महसूस होता था।
बीचों-बीच रखा बड़ा-सा किंग साइज़ बेड पूरे कमरे का आकर्षण था। उसके ठीक ऊपर क्रिस्टल का शानदार झूमर लगा था, जिसकी हल्की सुनहरी रोशनी पूरे कमरे को और भी खूबसूरत बना रही थी।
कमरे की एक तरफ़ पूरी काँच की दीवार थी, जिसके पार एक प्राइवेट इनडोर स्विमिंग पूल दिखाई देता था। उससे आगे एक छोटी-सी ओपन टैरेस थी। टैरेस पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों और हरे पौधों से सजा हुआ छोटा-सा गार्डन बना था। उसी गार्डन के बीच लकड़ी का एक खूबसूरत झूला लगा था, जो हल्की हवा के साथ धीमे-धीमे हिल रहा था।
कमरे का हर कोना यह बता रहा था कि उसके मालिक को शोर-शराबे से ज़्यादा सुकून पसंद है।लेकिन इस समय न राम की नज़र उस कमरे की खूबसूरती पर थी और न ही उसके मन में किसी और चीज़ की जगह बची थी।
राम ने बहुत सावधानी से अनुराधा को बिस्तर पर लिटाया। उसके सिर के नीचे तकिया ठीक किया और कंधों पर चादर डाल दी। कुछ पल तक वह वहीं खड़ा उसे देखता रहा। बेहोशी में भी उसके चेहरे पर डर की रेखाएँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे उसका मन अब भी उस भयावह घटना से बाहर नहीं निकल पाया हो।
राम धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। उसने सोचा, डॉक्टर के आने तक ज़रूरी सामान की व्यवस्था कर ले। लेकिन जैसे ही वह मुड़ा, उसे अपने कदम रुकते हुए महसूस हुए।
उसने नीचे देखा।अनुराधा की उँगलियाँ उसकी शर्ट को कसकर पकड़े हुए थीं।बेहोशी की हालत में भी उसकी मुट्ठी ढीली नहीं हुई थी। उसकी पकड़ में इतनी घबराहट थी कि कपड़े पर सिलवटें पड़ गई थीं।
ऐसा लग रहा था, मानो उसका अवचेतन मन भी उसे जाने देने को तैयार नहीं था। जैसे उसे डर हो कि अगर उसने यह सहारा छोड़ दिया, तो वह फिर उसी अँधेरे में अकेली रह जाएगी।
राम कुछ क्षण तक निःशब्द उसे देखता रहा।
उसने धीरे से अपनी उँगलियाँ अनुराधा की मुट्ठी पर रखीं। वह चाहता तो आसानी से अपना हाथ छुड़ा सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उस काँपती हुई पकड़ ने उसके भीतर कहीं गहरा घाव कर दिया था।
उसकी आँखों में पहली बार नमी उतर आई।वह पलंग के किनारे बैठ गया। बहुत धीरे से उसने दूसरी हथेली अनुराधा के सिर पर फेरी। उसके बिखरे बालों को कान के पीछे किया और कुछ क्षण तक उसके शांत चेहरे को देखता रहा।
उसके मन में बार-बार वही एक बात गूँज रही थी! अगर मैं कुछ मिनट पहले पहुँच जाता...शायद यह सब नहीं होता।उसने झुककर बहुत हल्के से अनुराधा के माथे को चूम लिया।
"सॉरी, जाना ..." उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी। "मैं... तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाया।"
उसके शब्दों में पहली बार वह राम नहीं था, जिसे दुनिया जानती थी। उसमें एक ऐसा अपराधबोध था, जो उसे भीतर ही भीतर खाए जा रहा था।उसी समय कमरे के बाहर हल्की-सी दस्तक हुई।
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