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तेरे लिए जानम Chapter-30

तेरे लिए जानम Chapter-30

राम ने आगे कहा, “अरे, तुम जैसे मर्द दुनिया में आते ही क्यों हो? अपनी हवस शांत करने के लिए वही लड़की क्यों चाहिए, जिसकी मर्जी तक इसमें शामिल नहीं होती? क्यों चाहिए?”

उसकी आवाज़ कमरे की दीवारों से टकराकर गूँज उठी।
“क्या उसकी मर्जी की कोई कीमत नहीं है? क्या उसे ना कहने का हक नहीं है?”

राम कुछ पल उसे घूरता रहा।
“और अगर इतनी ही गर्मी है तो अपनी ताकत और अपना पैसा वहाँ इस्तेमाल करना, जहाँ सामने वाला अपनी मर्जी से हो। लेकिन नहीं... तुम जैसे दरिंदों को तो किसी मासूम की जिंदगी बर्बाद करके ही अपनी मर्दानगी साबित करनी होती है।”

उसने अपना पैर पीछे खींच लिया।
“आज पता चलेगा तुम्हें... जब कोई तुम्हारी मर्जी के बिना तुम्हें छूता है, तुम्हारी सीमा तोड़ता है, तब कैसा लगता है।”

राम की आवाज़ आखिरी शब्दों पर और धीमी हो गई।
“दर्द सिर्फ उसका नहीं होता, जिसे तुम चोट देते हो। कभी-कभी उसका असर उन लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है, जो उसे अपना समझते हैं।”

इतना कहकर राम पलटा और बिना पीछे देखे वहाँ से बाहर निकल गया।दरवाजा बंद होने की आवाज़ के साथ कमरे में फिर वही भारी खामोशी छा गई।लेकिन राम के शब्द वहाँ मौजूद हर आदमी के कानों में अब भी गूँज रहे थे।

राम कुछ कदम आगे बढ़ा, फिर बिना पीछे देखे अपने आदमियों से ठंडी आवाज़ में कहा, “जब तक इनके भीतर की गर्मी....अपने किए का डर पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, इनकी खातिरदारी में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। ध्यान रहे, इनकी बदन की गर्मी तब तक निकालो जब तक यह अहसास ना कर ले की गर्मी कहाँ निकलनी चाहिए। "


उसके इतना कहते ही वह वहाँ से बाहर निकल गया।पीछे बंद दरवाज़े के उस पार पाँचों की घबराई हुई आवाज़ें और चीखें उस भूमिगत हिस्से में गूँजती रहीं। लेकिन बाहर निकल चुके राम ने पलटकर नहीं देखा। उसके लिए इस समय सबसे ज़रूरी अनुराधा थी।

वह बाहर खड़ी अपनी गाड़ी में जाकर बैठा। अभिमन्यु भी उसके साथ आकर बैठ गया। राम ने सीट पर टिकते हुए कुछ क्षण आँखें बंद कीं, फिर सीधे अभिमन्यु की तरफ देखकर कहा, “कमल रावत की कंपनी खरीद लो। उसे साफ़ शब्दों में कह देना कि इसके बाद वह देश छोड़कर चला जाए।”
अभिमन्यु ने सिर हिलाया, “ठीक है।”

राम ने आगे कहा, “और आहूजा के पास जितने भी शेयर हैं, उसके सारे शेयर कल तक हमारी कंपनी के नाम होने चाहिए। “हो जाएगा, यार।अभी अभिमन्यु की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके मोबाइल की घंटी बज उठी। उसने स्क्रीन पर नंबर देखा और तुरंत कॉल रिसीव कर ली।
“हाँ... बोलो।”
कुछ सेकंड तक वह दूसरी तरफ़ की बात सुनता रहा। उसके चेहरे के भाव धीरे-धीरे बदलने लगे।राम की नज़र तुरंत उस पर गई। “क्या हुआ?” उसने पूछा।

अभिमन्यु ने फोन कान से हटाया और राम की तरफ देखा। उसके चेहरे की गंभीरता देखते ही राम के चेहरे पर भी चिंता की हल्की रेखाएँ उभर आईं।
“राम ...” अभिमन्यु कुछ पल चुप रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो, “विला से फोन है।”राम की आँखें तुरंत गहरी हो गईं।“अनु...?” उसने धीमे लेकिन बेचैन स्वर में पूछा।अभिमन्यु ने बस इतना कहा, “कुछ हुआ है।”
अभिमन्यु ने फोन पर जैसे ही पूरी बात सुनी, उसके चेहरे की गंभीरता और बढ़ गई। उसने तुरंत कॉल काटकर राम की तरफ देखा। राम पहले ही उसके चेहरे के भाव पढ़ चुका था। उसके चेहरे पर पहली बार साफ परेशानी दिखाई दे रही थी।

राम ने अपनी आवाज को कड़ा रखते हुए कहा, "अभी... मुझे दस मिनट के अंदर मेंशन पहुँचना है।"

अभिमन्यु ने बिना कोई सवाल किए सिर हिला दिया और गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी। कुछ ही सेकंड में गाड़ी सड़क पर तेज रफ्तार से दौड़ने लगी।
राम लगातार आगे देख रहा था। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी, "अनुराधा"।


कुछ देर पहले, जब राम अपने उस खुफिया ठिकाने से निकल चुका था, तभी अभिमन्यु के फोन पर आरोही का कॉल आया था।कॉल उठाते ही दूसरी तरफ से आरोही की घबराई हुई आवाज सुनाई दी थी।"अभिमन्यु... वो... वो अनु..."उसकी आवाज बुरी तरह काँप रही थी।

अभिमन्यु ने तुरंत पूछा, क्या हुआ, आरोही?

वो बहुत जोर-जोर से चीख रही है..." आरोही लगभग रोते हुए बोली, "उसने खुद को कमरे के अंदर बंद कर लिया है। हम उसे बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो दरवाजा नहीं खोल रही।"

अभिमन्यु का चेहरा गंभीर हो गया।तुम शांत रहो। हम बस पहुँचने वाले हैं।लेकिन आरोही की आवाज में डर कम नहीं हुआ।प्लीज जल्दी आओ... आप सब जल्दी आओ। मुझे समझ नहीं आ रहा उसे क्या हो रहा है। वो लगातार चीख रही है।

कॉल कटने के बाद अभिमन्यु ने तुरंत राम को सारी बात बताई थीऔर अब गाड़ी पूरी रफ्तार से अवंतिका मेंशन की तरफ बढ़ रही थी।

अगले दस मिनट के भीतर सभी अवंतिका मेंशन पहुँच चुके थे। गाड़ी के रुकते ही राम बिना किसी का इंतज़ार किए बाहर निकला और तेज़ कदमों से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। उसकी चाल में ऐसी बेचैनी थी, जिसे देखकर पीछे आ रहे सभी लोग समझ गए कि उसके मन में इस वक्त सिर्फ़ अनुराधा थी।


अंदर पहुँचते ही आरोही सामने दिखाई दी। उसकी आँखें रोने की वजह से लाल थीं और चेहरे पर साफ घबराहट थी।राम ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा, "अनुराधा कहाँ है?"आरोही ने काँपते हाथ से ऊपर की तरफ इशारा किया।

"अपने कमरे में... उसने अंदर से दरवाजा बंद कर रखा है।"ऊपर से अभी भी अनुराधा की चीखें सुनाई दे रही थीं।राम का चेहरा एक पल में बदल गया।वह बिना एक सेकंड गंवाए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। अभिमन्यु, आरोही और बाकी लोग भी उसके पीछे दौड़ पड़े।


जैसे-जैसे वह ऊपर पहुँचता गया, कमरे के भीतर से अनुराधा की चीखें और साफ़ सुनाई देने लगीं।
“नहीं... नहीं... मुझे छोड़ दो...!”

राम का चेहरा और कठोर हो गया। उसने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। कमरे के दरवाज़े तक पहुँचते ही उसने डुप्लीकेट चाबी निकाली और काँपते हाथों से नहीं, बल्कि पूरी मजबूती के साथ ताला खोल दिया।

दरवाज़ा खुलते ही वह अंदर जाने लगा, लेकिन तुरंत पीछे मुड़कर सबको हाथ के इशारे से वहीं रुकने के लिए कह दिया।“कोई अंदर नहीं आएगा।”

उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन इतनी गंभीर कि किसी ने उसकी बात का विरोध नहीं किया।
आरोही दरवाज़े के पास ही खड़ी रह गई। उसकी आँखें सामने के दृश्य पर टिकी थीं। कमरे के अंदर अनुराधा की हालत देखकर उसका चेहरा दर्द से सिकुड़ गया। वह अपनी दोस्त को इस तरह टूटते हुए देखकर खुद को रोक नहीं पा रही थी।

उसने घबराकर अभिमन्यु की बाँह पकड़ ली।“अभिमन्यु...” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखा। आरोही की आँखों में डर और बेबसी साफ़ दिखाई दे रही थी। उसने बिना कुछ पूछे उसे अपनी बाँहों में लेकर एक तरफ कर दिया।

“शांत रहो,” उसने धीमे से कहा, “राम है ना अंदर।”आरोही ने फिर कमरे की तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू तैर रहे थे।अंदर राम धीरे-धीरे अनुराधा की तरफ बढ़ रहा था। उसकी चीखों के बीच उसका नाम पुकारने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

“अनु...”राम की आवाज़ सुनते ही अनुराधा की चीख जैसे एक पल के लिए थम गई।लेकिन अगले ही क्षण उसकी साँसें फिर तेज़ हो गईं।राम ने वहीं खड़े होकर उसे देखा और बहुत शांत स्वर में कहा,“अनु... मेरी तरफ देखो। मैं हूँ।”बाहर खड़े सभी लोग साँस रोके उस कमरे की तरफ देख रहे थे।


अंदर का नजारा देखकर राम कुछ पल के लिए बिल्कुल ठहर गया। पूरा कमरा तहस-नहस पड़ा था। सामान इधर-उधर बिखरा हुआ था, आईना टूटकर फर्श पर बिखरा पड़ा था और उसके नुकीले टुकड़े अनुराधा के पैरों में चुभे हुए थे। उसके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे और वह कमरे के एक कोने में सिकुड़कर बैठी थी। 

उसके हाथ में अब भी काँच का एक टुकड़ा था, जिसे उसने इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उँगलियों पर भी चोट लग गई थी।
राम ने उसे उस हालत में देखा तो दर्द से कुछ पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गईं, लेकिन उसने खुद को संभाला। इस वक्त उसे अपने गुस्से से ज्यादा अनुराधा की जरूरत थी।


वह धीरे-धीरे उसके पास बढ़ा।अनुराधा लगातार खुद में ही बड़बड़ा रही थी, "मुझे जाने दो... मुझे जाने दो... प्लीज मुझे जाने दो..."राम उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने तुरंत उसे पकड़ने की कोशिश नहीं की। कुछ पल तक बस उसकी तरफ देखता रहा, जैसे उसे यकीन दिलाना चाहता हो कि सामने खड़ा इंसान उसके लिए कोई खतरा नहीं है।

फिर उसने बहुत धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके हाथ में पकड़े काँच के टुकड़े को सावधानी से छुड़ाने की कोशिश की।"अनु..." उसने धीमे स्वर में कहा, "इसे छोड़ दो।"लेकिन अनुराधा जैसे उसकी आवाज सुन ही नहीं रही थी।

राम ने बेहद सावधानी से उसके हाथ से काँच अलग किया और उसे एक तरफ रख दिया। इसके बाद उसने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा।उसके हाथ का स्पर्श होते ही अनुराधा अचानक जोर से चीख उठी,"नहीं!!!! मुझे छोड़ दो!"

राम का हाथ वहीं रुक गया।उसने तुरंत अपना हाथ पीछे कर लिया और कुछ पल तक बस उसे देखता रहा। अनुराधा डर के मारे खुद को और ज्यादा समेटे जा रही थी।राम ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "अनु... मैं हूँ। राम।"लेकिन अनुराधा की आँखों में अभी भी डर था। वह जैसे अपने सामने खड़े राम को पहचान ही नहीं पा रही थी।

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राम ने अपने भीतर उठ रहे तूफ़ान को किसी तरह दबाया। अनुराधा की हालत देखकर उसका दिल बेचैन था, लेकिन वह जानता था कि इस समय अगर उसने अपना गुस्सा या घबराहट उसके सामने आने दी, तो उसकी हालत और बिगड़ सकती है।

उसने बहुत शांत आवाज़ में कहा, “मिस ठाकुर... शांत हो जाओ। देखो, यहाँ कोई नहीं है। तुम सुरक्षित हो। शांत हो जाओ।”अनुराधा जैसे उसकी आवाज़ सुन ही नहीं रही थी। उसकी साँसें अब भी तेज़ थीं और आँखें डर से बंद थीं।

राम ने एक पल उसकी हालत देखी और फिर सावधानी से उसे अपनी गोद में उठा लिया।
अचानक खुद को ज़मीन से ऊपर महसूस करते ही अनुराधा बुरी तरह घबरा गई। वह हाथ-पैर पटकने लगी और घबराई हुई आवाज़ में कुछ कहने की कोशिश करने लगी।
“नहीं... छोड़ो... मुझे जाने दो...”

राम ने उसे और कसकर पकड़ने के बजाय बस इतना किया कि उसे अपने सीने से सुरक्षित ढंग से लगा लिया। उसकी आवाज़ लगातार शांत बनी रही।
“शांत... बस शांत। मैं हूँ।”

कुछ क्षण तक अनुराधा की बेचैनी जारी रही। फिर जैसे ही उसका चेहरा राम के सीने से लगा, उसकी हरकतें धीरे-धीरे कम होने लगीं।राम ने महसूस किया कि उसकी साँसें पहले से कुछ सामान्य हो रही थीं।

उसने उसके सिर पर हाथ रखते हुए बहुत धीमे से कहा, “कुछ नहीं होगा, अनु... मैं हूँ।”
अनुराधा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस उसकी बाँहों में सिमटी रही।

राम उसे लेकर कमरे से बाहर निकला। दरवाज़े के पास खड़े नौकरों की तरफ देखकर उसने आदेश दिया, “मिस ठाकुर का कमरा पूरी तरह साफ़ करवाओ। टूटे हुए काँच का एक टुकड़ा भी वहाँ नहीं रहना चाहिए। और ध्यान रखना, जब तक मैं न कहूँ, कोई उनके कमरे में नहीं जाएगा।”
“जी, साहब।”

राम अनुराधा को लेकर अपने कमरे में चला गया।उसने उसे बहुत सावधानी से बिस्तर पर लिटाया। तकिया ठीक किया और उसके चेहरे से बिखरे बालों को हटाया।तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ, “अनु?”उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ।

राम ने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें बंद थीं और शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था।राम का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया,“अनुराधा...”

उसने उसकी नब्ज़ जाँचने के लिए हाथ बढ़ाया। नब्ज़ चल रही थी, साँसें भी थीं..लेकिन वह पूरी तरह बेहोश हो चुकी थी।राम कुछ क्षण उसके पास बैठा उसे देखता रहा।फिर उसने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा और बेहद धीमी आवाज़ में कहा,“बहुत सह लिया तुमने... अब और नहीं।”उसकी आँखों में चिंता के साथ एक दृढ़ संकल्प उतर आया।


आरोही भी बाकी सबके साथ राम के कमरे में आ गई। अनुराधा को बिस्तर पर उस हालत में देखकर उसकी आँखें फिर भर आईं। कुछ देर पहले तक जो लड़की अपने सामने किसी को टिकने नहीं देती थी, वही अब बिल्कुल बेहोश पड़ी थी। उसके बिखरे बाल, चेहरे पर चोट के निशान और हाथ-पैरों पर लगी चोटें देखकर कमरे में मौजूद हर किसी के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

अभिमन्यु तुरंत फर्स्ट-एड बॉक्स लेकर आया और राम के पास रख दिया। विवान गरम पानी लेकर आया और उसे भी पास रख दिया।

आरोही बिस्तर के पास बैठ गई। वह काँपते हाथों से अनुराधा के माथे पर आए बालों को धीरे-धीरे पीछे कर रही थी। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। वह कुछ कह नहीं रही थी, बस अपनी दोस्त को देखे जा रही थी।

राम और अभिमन्यु उसके पैरों के पास बैठ गए। राम बहुत सावधानी से उसके पैरों में चुभे काँच के छोटे-छोटे टुकड़े निकाल रहा था। हर बार कोई टुकड़ा निकालते हुए उसकी नजर अनुराधा के चेहरे पर चली जाती, जैसे उसे डर हो कि कहीं उसकी बेहोशी में भी उसे दर्द न हो जाए।

अभिमन्यु भी दूसरे पैर को संभालकर धीरे-धीरे काँच के टुकड़े निकाल रहा था।
विवान ने उसके हाथों को गरम पानी से साफ किया और जहाँ-जहाँ चोट लगी थी, वहाँ दवा लगाकर पट्टी बाँधने लगा। उसके हाथों, पैरों और सिर पर कई जगह चोट के निशान थे। किसी जगह हल्की खरोंच थी तो कहीं चोट ज्यादा गहरी थी। सभी ने मिलकर जितना संभव था, उसकी चोटों को साफ किया और पट्टियाँ बाँध दीं।


आरोही बीच-बीच में उसके चेहरे को देखती और फिर अपने आँसू पोंछ लेती।
कमरे में किसी की आवाज नहीं थी। बस पट्टी खोलने और दवा लगाने की हल्की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

तभी बाहर से कदमों की आवाज आई।अथर्व तेजी से कमरे के अंदर आया। उसके साथ डॉक्टर भी थीं।"डॉक्टर आ गई हैं," अथर्व ने धीमे स्वर में कहा।


राम तुरंत अपनी जगह से उठ गया और डॉक्टर को बिस्तर के पास आने की जगह दे दी। डॉक्टर ने अनुराधा की हालत देखी और गंभीरता से उसकी तरफ बढ़ीं। कमरे में मौजूद सभी लोग अब उनकी तरफ देखने लगे।

डॉक्टर ने अनुराधा की अच्छी तरह जाँच करने के बाद धीरे से अपनी साँस छोड़ी। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। वह राम की तरफ़ मुड़ीं और गंभीर आवाज़ में बोलीं,
"मिस्टर रघुवंशी... मैं सच कहूँ तो आपकी पत्नी की हालत देखकर काफी परेशान हूँ। एक ही दिन में इन्हें तीन बार ऐसा अटैक आ चुका है।"

राम की आँखें तुरंत डॉक्टर पर टिक गईं।डॉक्टर ने आगे कहा, "पहले भी इनकी हालत चिंताजनक थी, लेकिन इस बार इन्होंने घबराहट में खुद को काफी चोट पहुँचा ली है। पैरों में काँच के टुकड़े चुभे हैं, हाथों पर चोट है और शरीर पर भी कई जगह चोट के निशान हैं।"

कमरे में खड़े सभी लोग चुपचाप डॉक्टर की बात सुन रहे थे।डॉक्टर कुछ पल रुकीं, फिर थोड़ा गंभीर होकर बोलीं, "मुझे माफ़ कीजिएगा... शायद मुझे ये बात नहीं कहनी चाहिए, लेकिन आपको इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा।

 अगर इन्हें दोबारा इसी तरह का अटैक आया और वह लंबे समय तक रहा, तो इनकी मानसिक स्थिति पर भी गहरा असर पड़ सकता है।"
राम का चेहरा और गंभीर हो गया।

डॉक्टर ने आगे कहा, "मैंने अभी इन्हें दोबारा इंजेक्शन दे दिया है। फिलहाल इन्हें आराम की जरूरत है। लेकिन जब इन्हें होश आए, तब सबसे ज्यादा ध्यान इस बात का रखिएगा कि इन्हें किसी ऐसी चीज़ या बात का सामना न करना पड़े, जिससे इनका डर फिर से जाग जाए।"


उन्होंने अनुराधा की तरफ़ देखा और फिर राम से कहा,"अभी सबसे जरूरी है कि इन्हें सुरक्षित और शांत माहौल मिले। इन्हें अकेला मत छोड़िएगा और कोशिश कीजिए कि होश में आने के बाद इन्हें किसी भी तरह का मानसिक दबाव न हो।"

राम ने धीमे से सिर हिला दिया।डॉक्टर ने अपना सामान समेटते हुए आखिरी बार कहा,"इस बार इनके होश में आने के बाद आप बहुत सावधानी रखिएगा, मिस्टर रघुवंशी। अगर फिर से अटैक के लक्षण दिखाई दें, तो मुझे तुरंत फोन कीजिएगा।"

राम की नजर अब भी अनुराधा के शांत चेहरे पर टिकी हुई थी। उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन उसके भीतर जैसे एक फैसला और मजबूत हो चुका था।अब अनुराधा को उसके अतीत का कोई डर अकेले नहीं झेलना पड़ेगा।

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राम ने डॉक्टर की तरफ़ देखा और बिना किसी अतिरिक्त सवाल के बस इतना कहा, "थैंक यू, डॉक्टर।"डॉक्टर ने हल्का-सा सिर हिलाया और सहज आवाज़ में बोलीं, "इट्स ऑल राइट।" इसके बाद वह अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चली गईं।