तेरे लिए जानम Chapter-31
- 29 October, 2026
डॉक्टर के जाते ही राम की नजर आरोही पर गई। उसकी आवाज़ में गंभीरता थी, लेकिन इस बार उसमें पहले जैसी सख्ती नहीं थी।"बच्चा... इसके कपड़े बदल दो। हमें बाहर जाना है।"
आरोही ने तुरंत सिर हिलाया। "हाँ।"
राम ने एक बार अनुराधा की तरफ़ देखा और फिर कमरे से बाहर निकल आया। उसके पीछे अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी बाहर आ गए। दरवाज़ा बंद होते ही राम कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर खामोशी थी, लेकिन दिमाग में लगातार एक ही सवाल घूम रहा था।आखिर अनुराधा के साथ उस दिन हुआ क्या था?
उसने अपनी नजर विवान की तरफ़ उठाई।"विवान। "जी, भाई।"राम की आवाज़ अब बिल्कुल ठंडी और गंभीर थी।
"मुझे अनुराधा ठाकुर के बारे में पूरी जानकारी चाहिए। एक-एक चीज़। उसके परिवार से लेकर उसके पुराने जीवन तक... उसके साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद उसने कहाँ और कैसे जिंदगी बिताई।मुझे सब पता चाहिए।"
विवान ने ध्यान से उसकी बात सुनी और सिर हिलाया।राम कुछ पल रुका, फिर बोला,"और सबसे जरूरी..."उसकी आँखों में अचानक वही पुराना गुस्सा उतर आया।
"जिस वक्त मिस ठाकुर के साथ वो सब हुआ था, उस समय वहाँ कौन मौजूद था? किसने उसे उस हालत में देखा? किसे उस रात की पूरी सच्चाई मालूम है? मुझे वो इंसान चाहिए। चाहे वो आज कहीं भी हो।"
विवान ने बिना देर किए कहा, "जी भाई। मैं पता लगाता हूँ। जो भी उस वक्त वहाँ मौजूद था, उसके बारे में जानकारी निकालूँगा।"राम ने हल्का-सा सिर हिलाया।मुझे सिर्फ़ जानकारी नहीं चाहिए, विवान। मुझे सच चाहिए। समझ गया, भाई।
राम की नजर एक बार फिर कमरे के बंद दरवाज़े पर चली गई। उसके चेहरे पर चिंता और गुस्सा दोनों साथ दिखाई दे रहे थे।फिर वह धीमे कदमों से आगे बढ़ गया। अब उसके लिए ये सिर्फ़ अनुराधा के अतीत को जानने की बात नहीं थी।उसे उस अतीत तक पहुँचना था, जिसने आज भी अनुराधा को चैन से जीने नहीं दिया था।
आरोही कुछ देर बाद अनुराधा के कपड़े बदलकर कमरे से बाहर आई। उसके चेहरे पर अभी भी चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। राम वहीं खड़ा था। आरोही को देखते ही उसने अपनी नज़र उसकी तरफ उठाई और गंभीर आवाज़ में पूछा, “क्या आप मुझे बताएँगी कि मिस ठाकुर को इस तरह के अटैक कब-कब आते हैं?”
आरोही कुछ पल चुप रही। फिर उसने धीरे से कहा, “जब भी अनुराधा के सामने उस हादसे से जुड़ी कोई चीज़ आ जाती है, तब उसे ऐसा अटैक आता है। लेकिन... इतना भयानक कभी नहीं हुआ।”
राम बिना कुछ बोले उसकी बात सुनता रहा।आरोही ने आगे कहा, “आमतौर पर वो कुछ देर घबराती है, फिर धीरे-धीरे खुद को संभाल लेती है। और जब अटैक खत्म हो जाता है, तो उसे बहुत कुछ याद भी नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। शायद उसका दिमाग खुद को उस दर्द से बचाने के लिए उन पलों को भूल जाता है।”
राम की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं।“लेकिन आज...” आरोही की आवाज़ भर्रा गई, “आज तो एक ही दिन में इतनी बार हुआ है। मैंने उसे कभी इस तरह नहीं देखा।”कुछ क्षण के लिए कमरे में खामोशी छा गई।
आरोही ने अनुराधा के बंद कमरे की तरफ देखते हुए धीमे से कहा, “मुझे नहीं पता कि इस बार जब उसे होश आएगा, तो उसे सब कुछ याद रहेगा या फिर हमेशा की तरह वह भूल जाएगी। सच कहूँ तो... मुझे खुद डर लग रहा है कि वो होश में आने के बाद कैसी होगी।”
राम की नज़र भी उसी बंद दरवाज़े पर टिक गई।उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन आवाज़ हमेशा की तरह संयत रही।इस बार उसे कुछ भी याद रहे या न रहे... मैं चाहता हूँ कि उसे दोबारा वैसा दर्द न झेलना पड़े।
आरोही ने उसकी तरफ देखा।राम ने आगे कहा, “और अगर उसके अतीत में कोई ऐसी बात है, जो आज भी उसे अंदर से तोड़ रही है, तो मैं उसे जानकर रहूँगा।”उसकी आँखों में एक दृढ़ता उतर आई। क्योंकि अब उसकी परेशानी सिर्फ़ उसकी नहीं है।
राम ने कुछ पल तक अनुराधा के बंद कमरे की तरफ देखा, फिर शांत आवाज़ में कहा, “उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि वो भूल जाए। और अगर नहीं भूलती... तो हम हैं। हम उसे याद नहीं आने देंगे। आप सब फ़िक्र मत कीजिए।”
कमरे में मौजूद सभी ने उसकी बात पर धीमे से “हम्म” कहा। रात काफी हो चुकी थी और हर किसी के चेहरे पर दिनभर की थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। एक-एक करके सभी वहाँ से जाने लगे।
तभी आरोही रुक गई।“मैं अनु के साथ कमरे में रुकूँगी।”राम ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
वह आरोही के पास आया और सहज स्वर में बोला, “मैं समझता हूँ कि आप क्या सोच रही हैं। अपनी दोस्त को इस हालत में अकेला छोड़ने का मन नहीं कर रहा है।”
आरोही चुप रही।राम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “लेकिन आप इतनी नादान तो नहीं हैं कि किसी की नीयत को समझ न सकें।”
आरोही ने हल्का-सा सिर उठाकर उसे देखा।राम के चेहरे पर इस बार कोई कठोरता नहीं थी। उसकी आवाज़ भी पहले से कहीं नरम थी।“क्या आपको सच में लगता है कि मेरी नीयत में कोई खोट है?”
आरोही कुछ क्षण उसे देखती रही। राम ने बिना कोई जवाब माँगे बस इतना कहा, “आपको मुझ पर भरोसा करने की कोई जल्दी नहीं है, बच्चे । लेकिन कम-से-कम इतना भरोसा रखिए कि मैं अनु को किसी ऐसी चीज़ से दोबारा नहीं गुजरने दूँगा, जिससे वह डरती है।”
आरोही की आँखें एक पल के लिए झुक गईं।राम ने फिर हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप आराम कीजिए। अगर उसे आपकी ज़रूरत हुई, तो मैं खुद आपको बुला दूँगा।”
आरोही राम की बात सुनकर थोड़ी असहज हो गई। आखिर राम रघुवंशी उसका बॉस था और अनुराधा उसकी सबसे करीबी दोस्त। इतने बड़े हादसे के बाद उसके मन में अपनी दोस्त को लेकर चिंता होना स्वाभाविक था।
उसे इस तरह उलझन में खड़ा देखकर अभिमन्यु ने शांत स्वर में कहा, “ज्यादा तो नहीं कहूँगा, लेकिन अपने दोस्त के बारे में इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि तुम्हारी दोस्त इस वक्त सबसे सुरक्षित इंसान के पास है।”
आरोही ने धीरे से उसकी तरफ देखा। फिर उसकी नज़र राम पर चली गई।एक पल के लिए उसकी आँखें दोनों के चेहरों के बीच घूमती रहीं। राम की आँखों में गंभीरता थी और अभिमन्यु की बातों में अपने दोस्त के लिए पूरा भरोसा। दोनों की आँखों में उसे कोई झूठ या बनावटीपन दिखाई नहीं दिया।
आरोही ने आखिरकार धीरे से सिर हिला दिया।“ठीक है... अगर रात के किसी भी वक्त अनु को मेरी ज़रूरत हो, तो मुझे बुला लीजिएगा।”
राम ने सिर हिलाते हुए कहा, “ज़रूर।”
आरोही ने एक आखिरी बार अनुराधा के कमरे की तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब भी चिंता थी, लेकिन पहले जैसी बेचैनी नहीं थी।अभिमन्यु ने उसके कंधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, “चलो, अब तुम भी आराम कर लो। आज का दिन वैसे ही बहुत लंबा रहा है।”
आरोही उसके साथ आगे बढ़ गई।राम वहीं कुछ क्षण खड़ा रहा। उसकी आँखों में अब भी वही सवाल था। पाँच साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिसने अनु के भीतर आज तक उस डर को ज़िंदा रखा है?और इस बार राम उस सवाल का जवाब जाने बिना रुकने वाला नहीं था।
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
आरोही जाने के लिए आगे बढ़ ही रही थी कि अचानक राम ने उसे पीछे से आवाज़ देकर रोक लिया। राम की आवाज़ सुनते ही आरोही के कदम रुक गए और उसके साथ चल रहा अभिमन्यु भी वहीं ठहर गया। दोनों ने पलटकर राम की तरफ देखा।
राम कुछ क्षण चुप रहा, जैसे उसके मन में चल रहा कोई सवाल उसे दोबारा परेशान कर रहा हो। फिर उसने आरोही की तरफ देखते हुए कहा, “बच्चे, एक बात और पूछनी है। जब मिस ठाकुर के साथ वो हादसा हुआ था, तब कोई तो ऐसा होगा जिसे उस पूरी घटना के बारे में मालूम हो। कोई ऐसा इंसान, जिसने उस समय कुछ देखा हो या जिसे उस रात की पूरी सच्चाई पता हो।”
आरोही ने कुछ पल राम को देखा और फिर धीरे से अपना सिर ना में हिला दिया। “उस समय तो... सिर्फ मैं और नंदू थे। नंदू का नाम सुनकर राम और अभिमन्यु की नजरें अजीब हो गयी। तभी आरोही ने फिर से कहा, " नंदू ! मेरा मतलब हमारी नंदनी !"
बाकी सब भाई-बहन उस वक्त बनारस में थे ही नहीं। मैं तो शादी के लिए कानपुर गई हुई थी और उसके बाद पापा अचानक मुझे वापस ले आए थे। नंदू भी हमारे साथ थी , लेकिन उस रात के बारे में उसने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा। पापा ने भी उस घटना के बाद किसी को कुछ बताने से साफ़ मना कर दिया था।”
राम की आँखें यह सुनते ही कुछ पल के लिए स्थिर हो गईं। उसने धीमे स्वर में पूछा, “नंदू?”
“हाँ,” आरोही ने सिर हिलाते हुए कहा, “नंदू। उस समय वही हमारे साथ थी । लेकिन मुझे नहीं पता कि उसे कितना मालूम है और कितना नहीं।”
राम ने कुछ पल आरोही को देखा, फिर उसके मन में आया अगला सवाल पूछते हुए कहा, "वो सब कहाँ थे?"
आरोही ने धीरे से जवाब दिया, "पार्थ भाई और वेदांश भाई की जॉब एआर कम्पनी में हो गई थी, न्यूयॉर्क में... और वैदेही की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी, तो वो दोनों भाइयों के पास घूमने चली गई थी।
नंदू की उस वक्त फाइनल ईयर की परीक्षाएँ चल रही थीं, इसलिए वो नहीं जा पाई। अनुराधा भी मेरे और नंदू के लिए रुक गई थी। हम तीनों ने सोचा था कि परीक्षाएँ खत्म होने के बाद साथ में घूमने जाएँगे।"
आरोही कुछ पल के लिए चुप हुई। उसके चेहरे पर सोच के भाव आ गए। फिर उसने धीरे से कहा, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि नंदू को उस वक्त कुछ मालूम भी होगा। वो वैसे भी बाहर के लोगों के सामने बहुत मासूम और डरी-सहमी रहती थी।
उसका तो घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक का ही रूटीन था, और वो भी अकेले नहीं। या तो मैं उसके साथ होती थी, या अनुराधा, या फिर घर का कोई और। इसलिए ये पक्का नहीं कह सकती कि उसे उस वक्त की किसी बात के बारे में कुछ पता था या नहीं।"
राम ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी। फिर कुछ पल सोचने के बाद उसने शांत स्वर में कहा, "ठीक है, बच्चे... अब आप आराम कर लीजिए।"
आरोही ने सिर हिलाया और जाने के लिए मुड़ी ही थी कि राम ने उसे रोकते हुए कहा, "और अनुराधा की ज्यादा चिंता मत कीजिए। आप बेफिक्र होकर जाइए। मैं हूँ उसके साथ।"
राम की बात सुनकर आरोही ने एक पल उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब पहले जैसा डर नहीं था। उसे शायद पहली बार पूरी तरह यकीन हुआ कि अनुराधा इस वक्त अकेली नहीं है।उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, "गुड नाइट।"
"गुड नाइट।"
आरोही वहाँ से अपने कमरे की तरफ चली गई। उसके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे गलियारे में खो गई। राम कुछ पल वहीं खड़ा रहा, फिर उसकी नजर दोबारा अनुराधा के कमरे के दरवाज़े पर जाकर ठहर गई।
राम कुछ देर तक बिना कुछ बोले उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी बेचैनी नहीं थी, बल्कि एक गहरी गंभीरता उतर आई थी। जैसे उसके दिमाग में किसी पुराने बंद दरवाज़े की पहली कुंडी मिल गई हो।
अभिमन्यु जाते-जाते एक बार राम की तरफ देखने लगा। वह अपने दोस्त को अच्छी तरह जानता था। राम के चेहरे की वह खामोशी बता रही थी कि उसके दिमाग में अब सिर्फ एक ही नाम घूम रही थी।
कुछ देर बाद राम अपने स्टडी रूम में चला गया। कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही वह अपनी कुर्सी पर बैठ गया और कुछ देर तक चुपचाप सामने रखी फाइलों को देखता रहा। उसके दिमाग में अनुराधा से जुड़ी बातें लगातार घूम रही थीं। कुछ ही देर में अभिमन्यु, अथर्व और विवान भी स्टडी रूम में आकर उसके सामने खड़े हो गए।
राम ने अपनी नजरें उठाकर सीधे विवान की तरफ देखा और शांत आवाज़ में पूछा, "विवान, एआर कम्पनी मालूम है ना... किसकी कम्पनी है?"विवान ने तुरंत सिर हिलाया, "जी भाई, मालूम है।"
राम कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बिना किसी भूमिका के बोला, "तो तुम दोनों भाई न्यूयोर्क के लिए निकलो। अभी के अभी।"विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की तरफ देखा, लेकिन दोनों ने कोई सवाल नहीं किया। राम का फैसला सुनते ही उन्हें समझ आ गया था कि वह किस दिशा में जाना चाहता है।
राम ने आगे कहा, "यहाँ मैं और अभिमन्यु हैं। बाकी वहाँ जाकर क्या करना है... तुम दोनों समझ चुके होगे।"विवान ने गंभीरता से सिर हिलाया। "जी भाई, समझ गया।"अथर्व ने भी कहा, "जी भाई।"
राम ने बस सिर हिलाकर उन्हें जाने का इशारा कर दिया।दोनों बिना कोई और सवाल किए स्टडी रूम से बाहर निकल गए। उनके जाते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।
अभिमन्यु वहीं खड़ा राम को देख रहा था। वह समझ चुका था कि राम ने न्यूयोर्क का नाम यूँ ही नहीं लिया था। अनुराधा के अतीत की एक-एक कड़ी अब उसके सामने जुड़ने लगी थी और राम किसी भी कड़ी को अधूरा छोड़ने वाला नहीं था।
अभिमन्यु कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा, जहाँ से विवान और अथर्व अभी-अभी बाहर गए थे। फिर उसने राम की तरफ मुड़कर पूछा, “तुमने दोनों को साथ क्यों भेजा? विवान अकेला भी जा सकता था।”
राम ने मेज़ पर रखी फाइल बंद की और गंभीर नज़रों से अभिमन्यु की तरफ देखा। “विवान अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता और बहुत जल्दी अपना कंट्रोल खो देता है। गुस्से में वो कब और कैसे प्रतिक्रिया दे दे, ये तो तुम जानते ही हो।”
अभिमन्यु चुपचाप उसकी बात सुनता रहा।राम ने आगे कहा, “लेकिन अथर्व... गुस्से में भी अपना विवेक और संयम नहीं खोता। वो हालात को समझकर कदम उठाता है। इसलिए दोनों को साथ भेजा है। एक का गुस्सा दूसरे का संतुलन संभाल लेगा।”
अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया। हाँ, ये बात सही है।राम ने घड़ी की तरफ देखा। रात काफी हो चुकी थी। उसने अभिमन्यु से कहा, “अब तुम भी जाओ। आराम कर लो। कल सुबह बहुत काम है।”
अभिमन्यु ने सिर हिलाया, “ठीक है। गुड नाइट। “गुड नाइट, यार ।”
अभिमन्यु कमरे से बाहर निकल गया। राम भी कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर धीमे कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
दूसरी तरफ, अभिमन्यु सीधे अपने कमरे में जाने के बजाय किचन की तरफ चला गया। उसने एक प्लेट में खाना निकाला और उसे लेकर आरोही के कमरे की तरफ बढ़ गया।
दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने हल्की दस्तक दी, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।आरोही अभी तक जाग रही थी।वह कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी और बाहर आसमान की तरफ देख रही थी। आज आसमान पर बादलों का घेरा था। चाँद कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कमरे में खिड़की से आती हल्की-सी ठंडी हवा के अलावा एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।
अभिमन्यु कुछ पल दरवाज़े पर खड़ा उसे देखता रहा। उसके हाथ में अब भी खाने की प्लेट थी।फिर उसने धीमे से कहा, “इतनी रात हो गई है... और मैडम अभी तक आसमान से बातें कर रही हैं?”
आरोही ने आवाज़ सुनकर धीरे से पलटकर उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में अब भी अनुराधा की चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।अभिमन्यु ने प्लेट आगे बढ़ाते हुए कहा, “पहले ये खा लो। आज पूरे दिन तुमने ठीक से कुछ नहीं खाया।”
आरोही ने प्लेट की तरफ देखा, फिर उसकी तरफ।“मुझे भूख नहीं है।”अभिमन्यु ने बिना बहस किए प्लेट पास की मेज़ पर रख दी।“भूख हो या न हो, खाना पड़ेगा। वरना कल तुम खुद बीमार पड़ जाओगी और फिर तुम्हारी दोस्त को संभालने के लिए एक और मरीज मिल जाएगा।”
आरोही उसे घूरने लगी।अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया। “अब ऐसे मत देखो। खाना है।”
🌼🌼🌼🌼🌼🌼
अभिमन्यु के कमरे में आने का आरोही को जरा भी एहसास नहीं हुआ। वह अब भी खिड़की के पास खड़ी आसमान को देख रही थी। बाहर बादलों ने चाँद को पूरी तरह ढक रखा था और आरोही जाने कब से उसी खामोश आसमान में अपनी उलझनों का जवाब ढूँढ रही थी।
अभिमन्यु ने बिना उसे परेशान किए टेबल पर खाने की प्लेट रखी और कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसके पीछे जाकर शांत आवाज़ में बोला, "तुम इतना परेशान मत हो। तुम्हारी दोस्त ठीक हो जाएगी।"
अचानक पीछे से आई आवाज़ सुनकर आरोही चौंक गई। वह तेजी से पलटी, लेकिन सामने अभिमन्यु को इतनी करीब खड़ा देखकर संभल नहीं पाई और सीधे उसके सीने से टकरा गई।
दोनों कुछ पल के लिए एक-दूसरे को देखते रहे।
आरोही तुरंत एक कदम पीछे हुई और अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए बोली, "आप... और यहाँ?"
अभिमन्यु ने बिल्कुल सहज अंदाज़ में कहा, "हाँ... कोई प्रॉब्लम है?"
आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, "इतनी रात को किसी लड़की के कमरे में चुपके से आना आपको प्रॉब्लम नहीं लगता?"
अभिमन्यु ने टेबल पर रखी प्लेट की तरफ इशारा किया। "चुपके से नहीं आया था। तुम ही इतनी खोई हुई थी कि तुम्हें पता नहीं चला। तुम्हारे लिए खाना लेकर आया हूँ।"
आरोही कुछ कहती, उससे पहले अभिमन्यु ने आगे कहा, "राम ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। जब तक वो मिस ठाकुर को अपनी आँखों से ठीक नहीं देख लेता, तब तक वो खाना नहीं खाएगा। और उसे कोई जबरदस्ती खिलाने की कोशिश करे, तो वो किसी की सुनेगा भी नहीं।"
फिर उसने आरोही की तरफ देखते हुए कहा, "और तुम भी सुबह से भूखी हो। इसलिए सोचा, कम से कम तुम तो खाना खा लो।"आरोही ने कुछ पल उसे देखा। फिर अपनी भौंहें ऊपर उठाईं और थोड़ी हैरानी से पूछा, "क्यों?"
अभिमन्यु ने उसकी तरफ देखा। "क्या?"आरोही ने अपनी बाँहें सीने पर बाँध लीं और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए बोली, "मैं कौन हूँ आपकी?"
अभिमन्यु कुछ पल चुप रहा। फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। "ये सवाल खाना खाने के बाद भी पूछा जा सकता है, मिस त्रिवेदी। पहले बैठिए... खाना ठंडा हो रहा है।"
अभिमन्यु ने जैसे ही आरोही का चेहरा देखा, वह समझ गया कि उसके दिमाग में अब कोई न कोई उल्टी-सीधी खुराफात जरूर चल रही है। उसने मन ही मन सोचा, ये उलटी खोपड़ी की लड़की अब जरूर कुछ उल्टा सोचेगी।
अगले ही पल उसके होंठों पर शरारती-सी मुस्कान आ गई। वह थोड़ा उसकी तरफ झुका और धीमी आवाज़ में बोला, “वो इसलिए... क्योंकि सुबह में जो तुमने किया था, याद है ना?”
अभिमन्यु की बात सुनते ही आरोही को सुबह की घटना याद आ गई। उसके चेहरे के भाव तुरंत बदल गए। उसने अनायास ही अपने कदम पीछे खींचे और थोड़ी हड़बड़ाई आवाज़ में बोली, “तो... तो आपको भी याद है ना कि आपने क्या किया था?”
अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी तरह से। इसलिए तो आया हूँ हिसाब पूरा करने।”
आरोही ने उसे उलझन से देखा। “क्या... क्या मतलब आपका?”
अभिमन्यु उसके और करीब झुकते हुए बोला, “मेरा मतलब ये है कि कोई तो बहाना होना चाहिए, जिसको कारण बनाकर मैं तुमसे उस गलती का बदला ले सकूँ... जैसे तुमने लिया था मुझसे।”
आरोही की आँखें फैल गईं।अभिमन्यु ने टेबल पर रखी प्लेट की तरफ इशारा किया और मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे मालूम था कि तुम मेरे हाथों से लाया खाना नहीं खाओगी। और बस... मुझे कारण मिल जाएगा।”
वह जानबूझकर उसकी तरफ थोड़ा और झुका..“और...”अभिमन्यु की बात पूरी होने से पहले ही आरोही ने तुरंत अपने दोनों हाथों से उसे हल्का-सा पीछे धकेल दिया।
“बस!”वह झट से टेबल की तरफ गई, वहाँ रखी प्लेट उठाई और बिना उसकी तरफ देखे खाना खाने लगी।अभिमन्यु कुछ पल उसे देखता रहा।फिर उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान लौट आई।
“देखा... आखिर खाना तो तुम्हें खाना ही था।”आरोही ने निवाला लेते हुए उसे घूरकर देखा, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर नाराजगी से ज्यादा झेंप थी।
अभिमन्यु चुपचाप वहीं खड़ा रहा और मन ही मन मुस्कुरा दिया। उसे पता था। इस लड़की को परेशान करना शायद उसके लिए आने वाले दिनों का सबसे मनोरंजक काम बनने वाला था।
अभिमन्यु के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई, लेकिन उसने तुरंत अपने होंठों को सीधा कर लिया, जैसे आरोही को अपनी खुशी की भनक तक नहीं लगने देना चाहता हो। वह कुछ पल वहीं खड़ा उसे देखता रहा। आरोही बेखबर होकर खाना खा रही थी, लेकिन बीच-बीच में उसकी नजर भी अभिमन्यु पर चली जाती थी।
कुछ देर बाद उसे फिर महसूस हुआ कि अभिमन्यु लगातार उसे ही देख रहा है। उसने मुँह में खाना लिए हुए ही भौंहें सिकोड़कर पूछा, "ऐसे क्या घूर रहे हो मुझे? अफसोस हो रहा है क्या कि अब मुझे परेशान करने का कोई कारण नहीं मिला?"
अभिमन्यु ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसे देखता रहा।आरोही ने प्लेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, "देखो, मैं खाना खा रही हूँ। अब तो तुम्हारा बहाना भी खत्म हो गया ना? इसलिए जाओ यहाँ से... और मुझे शांति से खाना खाने दो।"
अभिमन्यु ने धीरे से सिर हिलाया और मुस्कुराहट दबाते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। वह अभी दो कदम ही आगे बढ़ा था कि पीछे से आरोही की आवाज़ आई, "और हाँ..."अभिमन्यु रुक गया, लेकिन पीछे मुड़कर नहीं देखा।
आरोही ने थोड़ा सख्त होकर कहा, "अब मुझसे दूर रहना। समझे?"अभिमन्यु के होंठों पर फिर वही शरारती मुस्कान आ गई। वह धीरे से पीछे मुड़ा और कुछ पल तक उसे देखता रहा। आरोही को उसकी खामोशी देखकर लगा कि शायद इस बार उसने बात समझ ली है।
लेकिन अगले ही पल अभिमन्यु वापस उसकी तरफ आया। आरोही कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने झुककर उसके गाल क़ो जोर से चूम कर दाँत काट लिया।
आरोही की आँखें हैरानी से फैल गईं। उसके हाथ में पकड़ा हुआ चम्मच हवा में ही रुक गया।
अभिमन्यु दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए बिल्कुल बेफिक्र अंदाज़ में बोला, "बिल्कुल नहीं समझा।"
"अभिमन्यु!" आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, लेकिन तब तक वह दरवाज़े तक पहुँच चुका था।
वह पीछे मुड़ा और मुस्कुराते हुए बोला, "गुड नाइट। और हाँ, दरवाज़ा बंद कर लेना। नहीं तो मेरा मूड बन गया तो मैं फिर आ जाऊँगा।"
आरोही कुछ सेकंड तक उसे अविश्वास से देखती रही। फिर झुंझलाकर बोली, "तुम्हारी इतनी हिम्मत जो मुझे काटा ! पागल इंसान !"अभिमन्यु ने बाहर निकलते हुए बस हाथ हिलाया। "ये बात तो तुम सुबह से साबित कर चुकी हो कि तुम्हारी नजर में मैं क्या हूँ।"
इतना कहकर उसने दरवाज़ा बाहर से छोड़ दिया।आरोही कुछ पल वहीं खड़ी उसे देखती रही, फिर उसे उसकी आखिरी बात याद आई और उसने तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ गलियारे में गूँज गई।
बाहर खड़ा अभिमन्यु उस आवाज़ को सुनकर मुस्कुरा दिया। उसने एक पल बंद दरवाज़े की तरफ देखा और फिर धीमे से अपना सिर हिलाया।
"कहाँ फँस रहे हो, अभिमन्यु राठौर?" उसने खुद से कहा।फिर उसकी मुस्कान थोड़ी और गहरी हो गई। "एक ऐसी लड़की के साथ... जो तुम्हें चैन से साँस भी नहीं लेने देगी।"
वह खुद ही अपनी बात पर हल्का-सा हँसा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। लेकिन कमरे तक पहुँचने के बाद भी उसके चेहरे से वह मुस्कान पूरी तरह गायब नहीं हुई थी।
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