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तेरे लिए जानम Chapter-29

तेरे लिए जानम Chapter-29

आरोही ने अपनी आँखों से आँसू पोंछे और कुछ क्षण चुप रहने के बाद फिर बोलना शुरू किया। उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। उसमें उस पुराने समय का दर्द साफ़ सुनाई दे रहा था। 

हम उसी रात अनु को लेकर कानपुर आ गए थे। पापा ने नानी के घर में किसी को भी खबर नहीं होने दी कि हम वहाँ से निकलकर वापस आ गए हैं। शायद वो नहीं चाहते थे कि किसी को अनु के बारे में पता चले। उन्होंने अपने एक बहुत भरोसेमंद डॉक्टर के घर पर अनु को रखा और अगले छः महीने तक हम वहीं रहे।

आरोही ने गहरी साँस ली। अनु को ठीक होने में पूरे छः महीने लगे। या यूँ कहूँ कि उसके शरीर के जख्मों को भरने में छः महीने लगे थे। क्योंकि उसके अंदर जो कुछ टूट चुका था, उसे ठीक होने में शायद उससे कहीं ज्यादा वक्त लगना था।उसकी आँखें फिर भर आईं।

उन छः महीनों में मैंने अपनी दोस्त को हर दिन दर्द से लड़ते हुए देखा है। दिन में वो जितना चुप रहती थी, रातें उतनी ही मुश्किल होती थीं। लगभग हर रात उसकी चीखों से मेरी नींद खुल जाती थी। वो ऐसी दर्द भरी चीख होती थी कि मेरी पूरी रूह काँप जाती थी। कभी-कभी मैं उसके कमरे के बाहर खड़ी होकर बस उसकी आवाज़ सुनती रहती थी और समझ नहीं पाती थी कि अंदर जाकर उसे कैसे संभालूँ। 

मैं उसके पास जाती, उसे पकड़कर बैठती... लेकिन उसके उस दर्द के सामने मैं खुद को बिल्कुल बेबस महसूस करती थी।आरोही ने अपने हाथों को कसकर पकड़ लिया। मम्मी-पापा कुछ समय बाद वापस चले गए थे। लेकिन मैं वहीं रह गई। मैं अनु को उस हालत में अकेला नहीं छोड़ सकती थी। वो छः महीने... मैंने उसके साथ बिताए। उसकी दवाइयाँ, उसके घाव, उसकी रातें... सब कुछ मेरी आँखों के सामने था।

वह कुछ पल के लिए चुप हुई और फिर धीमे स्वर में बोली, "उधर बनारस में सबको यही बताया गया कि अनुराधा पहाड़ी से गिर गई थी और उसकी मौत हो गई। किसी को नहीं पता था कि वो जिंदा है। शायद यही वजह थी कि उन छः महीनों में किसी ने उसे ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की।"

आरोही की आवाज़ में अब एक अजीब-सी कड़वाहट थी। "छः महीने बाद मेरी नौकरी मुंबई की एक आईटी कंपनी में लग गई। मुझे वहाँ जाना था। लेकिन मैं अनु को पीछे छोड़कर नहीं जा सकती थी। इसलिए मैंने अपने मम्मी-पापा को भी बिना बताए उसे अपने साथ मुंबई ले आई।"

उसने राम की तरफ देखा।मैं जानती थी कि ये आसान नहीं होगा। लेकिन उसके बाद मेरे लिए एक ही बात मायने रखती थी... अनु को उस जिंदगी से दूर रखना, जहाँ उसकी हर साँस के साथ उसे वही पुरानी रात याद आती थी।"

कुछ पल तक आरोही की आवाज़ थम गई। उसने नीचे देखा और बहुत धीमे से कहा, "मैंने सोचा था कि मुंबई में शायद हम दोनों एक नई शुरुआत कर पाएँगे। और कुछ हद तक... हम कर भी पाए।"

उसने हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
"लेकिन आज..." उसकी आवाज़ फिर काँप गई, "आज जो हुआ, उससे मुझे डर लग रहा है कि कहीं वो सब कुछ फिर से वापस न आ जाए।"

आरोही ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए धीमे स्वर में कहा, "पाँच साल हो गए हैं... हम दोनों में से किसी ने भी अपने परिवार से बात नहीं की। सिर्फ़ इस डर से कि कहीं किसी को पता न चल जाए कि अनुराधा जिंदा है।"

उसने कुछ पल के लिए चुप होकर साँस ली। हॉल में मौजूद सभी लोग बिना कुछ बोले उसकी बात सुन रहे थे।
"इन पाँच सालों में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली..." आरोही ने धीमे से कहा, "अनु के अंदर का वो डर। बाहर से देखने पर वो बहुत स्ट्रॉन्ग है। खुद को हमेशा संभालकर रखती है। किसी को अपने अंदर की कमजोरी दिखने नहीं देती। लेकिन वो डर कभी पूरी तरह उसके अंदर से गया ही नहीं।"

उसकी आँखें फिर नम हो गईं।हमने अपनी पूरी कोशिश की कि वो उस सबको पीछे छोड़ सके। और कई बार लगा भी कि शायद अब वो सच में ठीक हो रही है। लेकिन..." आरोही ने सिर झुका लिया, "कुछ डर ऐसे होते हैं जो इंसान के अंदर कहीं बहुत गहराई में रह जाते हैं।"
कुछ पल तक वहाँ खामोशी रही।

फिर राम ने सीधे आरोही की तरफ देखते हुए पूछा, "क्या तुम्हें पता है... वो कौन था?"
आरोही ने धीरे से सिर ना में हिला दिया,"नहीं।"राम की आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं।आरोही ने आगे कहा, "और मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की... कम से कम उस एक घटना के बाद तो बिल्कुल नहीं।"वह कुछ पल रुकी, फिर बोली, "एक बार मैंने उससे पूछने की कोशिश की थी। बस एक बार।"

उसके चेहरे पर उस पुराने डर की छाया फिर से उतर आई।"लेकिन जैसे ही मैंने उस रात के बारे में बात की... अनु बुरी तरह पैनिक करने लगी। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं, हाथ काँप रहे थे और वो लगातार कह रही थी कि उसे कुछ याद नहीं करना है। उसकी हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसे नॉर्मल होने में पूरे दो दिन लग गए।"

राम की आँखों में अब गंभीरता और बढ़ गई।आरोही ने धीमे से कहा, "उसके बाद मैंने कभी उससे वो सवाल नहीं किया। मैं नहीं चाहती थी कि उसे ठीक करने की कोशिश में मैं ही उसे फिर उसी दर्द में धकेल दूँ।"

उसने बंद कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा, जिसके पीछे अनुराधा अभी भी सो रही थी।
"लेकिन इस बार..." उसकी आवाज़ काँप गई, "इस बार जब उसे होश आएगा, तो वो कैसे रिएक्ट करेगी... मुझे नहीं मालूम।"आरोही ने अपनी आँखें बंद करके एक गहरी साँस ली।

"पता नहीं इस बार ऐसा क्या हुआ है..." उसने बहुत धीमे से कहा, "लेकिन आज जो हुआ, उससे उसका वो पुराना डर फिर से जाग गया है। और मुझे सबसे ज्यादा इसी बात का डर लग रहा है कि जब अनु को सब याद आएगा... तो वो खुद को कैसे संभालेगी।"


राम ने कुछ पल तक आरोही को देखा। उसकी आँखों में अब पहले जैसा गुस्सा नहीं था, लेकिन अनुराधा की बातों के बाद उसके भीतर जो बेचैनी थी, वह साफ़ महसूस की जा सकती थी। उसने शांत आवाज़ में कहा, "तुम फिक्र मत करो। तुम यहीं रुक जाओ।"

 फिर उसने पास खड़े एक नौकर को इशारे से अपने पास बुलाया और कहा, "ये मेरी छोटी बहन हैं। इनका ध्यान रखना और इन्हें इनका कमरा दिखा दो। अगर इन्हें किसी भी चीज़ की जरूरत हो तो तुरंत देखना।"

इसके बाद राम ने आरोही की तरफ़ देखा और कहा, "और अगर अनुराधा को लेकर कोई भी बात हो, या उसकी तबीयत में कुछ बदलाव आए, तो सीधे मुझे फोन करना।" आरोही ने सिर हिलाया, लेकिन तभी उसे याद आया कि उसके पास राम का नंबर तो था ही नहीं। 

राम ने बिना कुछ कहे अभिमन्यु की तरफ़ देखा। इशारा मिलते ही अभिमन्यु उसके पास आया और आरोही के हाथ से मोबाइल लेकर उसमें राम का नंबर सेव कर दिया। मोबाइल वापस करते हुए उसने कहा, "अब कोई भी जरूरत हो तो सीधे कॉल कर देना।"


आरोही ने मोबाइल हाथ में लिया और एक बार राम की तरफ़ देखा। शायद वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन राम पहले ही मुड़ चुका था। अभिमन्यु, अथर्व और विवान भी उसके पीछे चल दिए। चारों के घर से बाहर निकलते ही राम के चेहरे के सारे नरम भाव गायब हो गए। 

अनुराधा के कमरे के बाहर जो आदमी कुछ देर पहले अपनी भावनाओं को दबाए खड़ा था, अब वही फिर से राम रघुवंशी था... जो ठंडा, शांत और बेहद गंभीर नजर आ रहा था । गाड़ी में बैठने के बाद किसी ने उससे कोई सवाल नहीं किया। उसके चेहरे को देखकर ही सब समझ चुके थे कि अब वह कहाँ जाने वाला है और किसलिए।

कुछ देर बाद गाड़ी शहर की मुख्य सड़कों से हटकर एक सुनसान रास्ते पर पहुँची। वहाँ से एक बंद परिसर के अंदर जाने के बाद राम और उसके साथ बाकी तीनों नीचे की तरफ़ बनी सीढ़ियों से उतरने लगे। जैसे-जैसे वे नीचे जाते गए, बाहर की दुनिया का शोर पीछे छूटता गया। 

आखिरकार वे एक बड़े अंडरग्राउंड हॉल में पहुँचे, जहाँ हल्की रोशनी के बीच कई आदमी बँधे हुए थे। उनके चेहरों पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था। वे वही लोग थे, जो कुछ समय पहले अनुराधा के साथ बदतमीज़ी कर रहे थे। उनके बीच कुणाल मेहता भी बँधा हुआ था।

राम के कदमों की आहट सुनते ही उन सभी की नज़रें उसकी तरफ़ उठ गईं। कुणाल ने उसे देखते ही बेचैनी में खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ-पैर मजबूती से बँधे हुए थे। राम बिना किसी जल्दबाज़ी के उनके सामने जाकर रुक गया। उसने पहले एक नज़र वहाँ मौजूद सभी आदमियों पर डाली और फिर उसकी नज़र जाकर कुणाल पर ठहर गई।

कुणाल की साँसें तेज़ हो गईं। उसे शायद अब समझ आने लगा था कि यह जगह किसलिए है और राम उसे यहाँ क्यों लेकर आया है। लेकिन राम के चेहरे पर इस वक्त न गुस्सा था, न कोई जल्दबाज़ी। वह बिल्कुल शांत खड़ा था और बस कुणाल को देख रहा था। 

उसकी यही खामोशी वहाँ मौजूद हर आदमी के लिए सबसे ज्यादा डरावनी थी, क्योंकि उन्हें पता था कि राम जब अपना गुस्सा दिखाता है तो उसके इरादे समझ में आ जाते हैं, लेकिन जब वह इस तरह बिल्कुल शांत हो जाता है, तब उसके अगले कदम का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है।
राम ने कुछ पल बाद बेहद ठंडी आवाज़ में कहा, "तो... अब बात करते हैं।"

राम इस वक्त अपने वेयरहाउस में मौजूद था। शहर से काफी दूर, एक सुनसान जगह पर बना वह अंडरग्राउंड वेयरहाउस बाहर से जितना शांत दिखाई देता था, अंदर का माहौल उतना ही खौफनाक था।

सामने वही पाँच आदमी जमीन पर पड़े हुए थे, जो कुछ देर पहले तक अपनी ताकत और हैसियत के नशे में चूर थे। अब उनकी हालत ऐसी थी कि राम के सामने नजर उठाने तक की हिम्मत नहीं हो रही थी। वे घबराए हुए लगातार माफी मांग रहे थे।

राम ने धीरे-धीरे अपनी नजरें उन पाँचों पर डालीं। उसकी आँखों में ऐसा गुस्सा था कि उन सभी को अपनी मौत साफ दिखाई दे रही थी। कुछ पल तक राम बिना कुछ बोले उन्हें देखता रहा, फिर बेहद कठोर आवाज में बोला, "बहुत शौक है ना तुम लोगों को लड़कियो के साथ खेलने का?"

उसकी आवाज सुनकर सभी सहम गए।राम ने एक कदम आगे बढ़ाया और ठंडी नजरों से उन्हें देखते हुए कहा, "क्या हो... अगर कोई तुम्हारे साथ खेले?"
कुछ सेकंड तक वहाँ सन्नाटा रहा। फिर राम ने अचानक तेज आवाज में पुकारा, "अभिमन्यु!"
अभिमन्यु तुरंत उसके पास आकर खड़ा हो गया।

राम ने उसकी तरफ देखा।अभिमन्यु ने बिना किसी भूमिका के कहा, "जो तू चाहता था, वो हो गया।"इतना सुनते ही उसके पीछे खड़े दस आदमी आगे बढ़कर उन पाँचों के सामने आकर खड़े हो गए।

उन्हें देखते ही उन पाँचों की हालत और खराब हो गई। वे घबराकर राम की तरफ देखने लगे और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे, "सर... हमें माफ कर दीजिए। हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। दोबारा ऐसा कभी नहीं होगा। प्लीज हमें छोड़ दीजिए।"

कुणाल भी डर के मारे काँप रहा था। उसने किसी तरह अपनी आवाज संभालते हुए राम की तरफ देखा और बोला, "मिस्टर रघुवंशी... मुझे माफ कर दीजिए। मुझे नहीं मालूम था कि वो आपके लिए इतनी खास है। अगर मुझे पता होता तो मैं उसकी तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखता।"

राम कुछ पल तक उसे घूरता रहा। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, लेकिन उसकी आँखों का गुस्सा पहले से कहीं ज्यादा गहरा हो चुका था।
फिर राम ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है, कुणाल।"
कुणाल ने डरते हुए सिर उठाया।

राम उसके करीब जाकर बोला, "तुम्हें ये जानने की जरूरत नहीं थी कि वो मेरे लिए खास है या नहीं। तुम्हें सिर्फ इतना समझना चाहिए था कि वो एक इंसान है... और किसी इंसान की इज्जत के साथ खेलने का हक तुम्हें किसने दिया?"

कुणाल ने घबराकर उसकी तरफ़ देखा।तुम्हें लगता है कि किसी लड़की की इज़्ज़त सिर्फ़ इसलिए मायने रखती है क्योंकि वह मेरे लिए खास है?राम की आवाज़ में अब गुस्से से ज्यादा एक खतरनाक ठहराव था।अगर वो मेरी ज़िंदगी में नहीं होती... तब क्या तुम्हें उसे छूने का अधिकार मिल जाता?

कुणाल के पास कोई जवाब नहीं था।राम ने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, “तुम लोगों ने सिर्फ़ एक लड़की को नहीं छुआ था। तुमने उसकी इच्छा, उसकी मर्यादा और उसके डर की कोई कीमत नहीं समझी।”
उसकी मुट्ठियाँ कस गईं! "और यही बात मैं तुम्हें कभी भूलने नहीं दूँगा।”

राम गुस्से में उसके सामने आकर रुका। उसने अपने जूते की नोक से उसके सिर को ऊपर उठाया और ठंडी, मगर बेहद कठोर आवाज़ में कहा, “क्यों? कोई और लड़की होती तो तू अपनी मर्दानगी उस पर दिखाता?”

उसकी आँखों में ऐसा गुस्सा था कि सामने खड़ा कुणाल काँप उठा।