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धड़कन तू है मेरी Chapter-3

धड़कन तू है मेरी Chapter-3

धड़कन तू है मेरी 
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रात गहरी हो चुकींठी और प्रताप मेंशन मे रौशनी धीमी पड़ गयी थी।आर्यन को सुलाने के बाद अनिरुद्ध सीधे अपने स्टडी रूम में चला गया। कमरे का दरवाजा बंद करते ही उसने अपनी जेब से फोन निकाला और बिना किसी भूमिका के एक नंबर डायल कर दिया। कुछ ही सेकंड में दूसरी तरफ से कॉल उठ गई।

अनिरुद्ध की आवाज हमेशा की तरह गंभीर थी। उसने सीधे पूछा, “जिसके बारे में पता करने के लिए कहा था, उस पर कहाँ तक बात पहुँची?”दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।
अनिरुद्ध कुछ पल चुपचाप सुनता रहा। उसकी आँखों में एक गहरी गंभीरता उतर आई थी।
“ठीक है... जितनी जल्दी हो सके, मुझे पूरी जानकारी चाहिए। छोटी से छोटी बात भी मुझसे छिपनी नहीं चाहिए।”

इतना कहकर उसने कॉल काट दी। फोन टेबल पर रखते हुए उसकी नजर कुछ पल के लिए सामने की खिड़की पर टिक गई। उसके दिमाग में वही सवाल फिर से घूमने लगे, जिनका जवाब वह जल्द से जल्द चाहता था।

वहीं दूसरी तरफ, डिनर खत्म करने के बाद राध्या आर्या को लेकर दूसरे कमरे में चली गई थी। दिनभर की भागदौड़ के बाद आर्या भी अब काफी थक चुकी थी। राध्या ने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके बालों को प्यार से सहलाने लगी।

कुछ पल बाद आर्या ने उनींदी आवाज में पुकारा, “मम्मा...! “हम्म...” राध्या ने प्यार से जवाब दिया।अब हम यहीं रहेंगे ना?राध्या ने उसकी तरफ देखा। उसकी मासूम आँखों में जैसे पिछले कुछ दिनों की सारी परेशानियाँ छिपी हुई थीं।

आर्या ने फिर धीरे से पूछा, “अब वो गंदे और बुरे लोग हमें परेशान नहीं करेंगे ना?”
राध्या के चेहरे पर एक पल के लिए उदासी उतर आई, लेकिन उसने उसे तुरंत छिपा लिया। उसने आर्या के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “हम्म... अब कोई तुम्हें परेशान नहीं करेगा, बेटू। 

कल तुम्हारा यहाँ किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन करवा दूँगी। अब हम यहीं रहेंगे और एक नई शुरुआत करेंगे।उसने आर्या के छोटे-से चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा, “और मेरी बेटू को कोई परेशान करने की कोशिश भी नहीं करेगा। मम्मा हमेशा अपनी बेटू का ध्यान रखेगी। Love you, मेरी जान।”

राध्या ने प्यार से उसके दोनों गालों और माथे पर किस कर दी।आर्या के चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान आ गई,“Love you too... आपकी जान की प्यारी मम्मा।”राध्या की आँखें भी हल्की-सी नम हो गईं। उसने मुस्कुराते हुए आर्या को अपने सीने से लगा लिया।

कुछ पल बाद आर्या ने जम्हाई लेते हुए कहा, “हम्म... अब निनी करनी है। राध्या हँस पड़ी।
“हाँ मेरी जान, अब सो जाओ। “Okay, मॉम्मा...”कुछ ही देर में आर्या की आँखें बंद हो गईं और उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।

राध्या कुछ देर तक उसके मासूम चेहरे को देखती रही, फिर एक गहरी साँस लेकर उसके ऊपर ठीक से कम्बल ओढ़ाने लगी।तभी उसकी नजर कमरे के दरवाजे पर पड़ी।

स्वाति वहाँ खड़ी थी। उसके दोनों हाथों में कॉफी के दो कप थे और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।राध्या ने उसे देखते हुए धीमे से पूछा, “तुम कब से खड़ी हो वहाँ?”

राध्या ने एक बार फिर सोती हुई आर्या के चेहरे को देखा, उसके माथे पर हल्के से हाथ फेरा और फिर कमरे की लाइट बंद कर दी। वह धीरे से दरवाजा बंद करके बाहर आ गई।
स्वाति अब भी वहीं खड़ी थी। उसने मुस्कुराते हुए राध्या की तरफ कॉफी का एक कप बढ़ा दिया।

“लो... तुम्हारे लिए।”राध्या ने कप लेते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “थैंक यू।”स्वाति ने उसे घूरकर देखा तो राध्या तुरंत अपनी बात सुधारते हुए हँस पड़ी, “सॉरी... अब नहीं बोलूँगी।”
“बेहतर है,” स्वाति ने मुस्कुराते हुए कहा।

दोनों धीरे-धीरे बाहर गार्डन में आ गईं। रात की ठंडी हवा पूरे माहौल में घुली हुई थी। शिमला की पहाड़ियों पर रात उतर चुकी थी और खुले आसमान में अनगिनत सितारे टिमटिमा रहे थे। दूर कहीं पहाड़ों के बीच बसी रोशनियाँ तारों की तरह ही चमक रही थीं।

राध्या ने कॉफी का कप दोनों हाथों में थाम रखा था और चुपचाप आसमान की तरफ देख रही थी। ठंडी हवा उसके खुले बालों को बार-बार चेहरे पर ला रही थी। उसने उन्हें कान के पीछे किया और फिर आसमान की तरफ देखने लगी।

पिछले दस सालों में उसकी जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था। शायद यही वजह थी कि आज इतने लंबे समय बाद उसे अपने भीतर एक अजीब-सा सुकून महसूस हो रहा था। जैसे जिंदगी ने पहली बार उसे थोड़ी देर के लिए रुकने और साँस लेने की इजाजत दी हो।
स्वाति भी कुछ देर तक खामोश रही। फिर उसने धीरे से कहा, “राध्या...”

“हम्म?”
“हमारी बॉन्डिंग इतनी जल्दी हो गई कि मैं तुमसे ठीक से कुछ पूछ ही नहीं पाई।”
राध्या ने उसकी तरफ देखा।

स्वाति ने थोड़ी झिझक के साथ पूछा, “अगर तुम्हें कोई एतराज न हो तो... कुछ अपने बारे में बताओगी? मेरा मतलब... तुम यहाँ इस शहर में पाँच साल की बच्ची के साथ अकेली आई हो। न कोई परिवार, न कोई अपना... आखिर ऐसी क्या बात थी कि तुम्हें सब छोड़कर यहाँ आना पड़ा?”

राध्या की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।उसने कुछ पल तक हाथ में पकड़े कॉफी के कप को देखा, जैसे उसके अंदर ही अपने अतीत का जवाब ढूँढ़ रही हो। फिर उसकी नजर दोबारा आसमान पर टिक गई।

“कुछ जख्म ऐसे होते हैं, स्वाति...” उसकी आवाज धीमी हो गई, “जिन्हें कुरेदना जितना आसान होता है, उन्हें सहना उतना ही मुश्किल।”स्वाति चुपचाप उसकी तरफ देखती रही।

राध्या ने एक गहरी साँस ली और फिर उसकी तरफ देखते हुए कहा, “लेकिन तुमने इस अजनबी शहर में मुझे सिर्फ रहने की जगह नहीं दी। तुमने मुझे एक रिश्ता दिया, एक घर दिया... और सबसे बढ़कर, एक ऐसा सहारा दिया जिसकी शायद मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी।”

उसकी आँखों में हल्की नमी उतर आई, लेकिन इस बार उसने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की।“इसलिए... तुम्हें जरूर बताऊँगी। सब कुछ।”

स्वाति ने कुछ नहीं पूछा। बस चुपचाप राध्या के पास आकर बैठ गई।रात की ठंडी हवा के बीच दोनों कुछ देर यूँ ही खामोश बैठी रहीं।क्योंकि कुछ कहानियाँ सवाल पूछने से नहीं, भरोसा बनने के बाद खुद-ब-खुद सामने आती हैं।

स्वाती ने धीमी आवाज़ मे कहा, अगर तुम्हें दर्द हो तो मुझे बताने के लिए तुम्हें अतीत मे जाने की जरूरत नही है। अतीत है उसे अतीत रहने दो। राध्या हलकी दर्द भरी मुस्कान लिए उसे देख रहीं थी। जब नयी शुरुआत करनी हो तो एक बार अतीत क़ो जरूर याद कर लेनी चाहिए। ताकी वर्तमान और भविष्य सुकून भरा हो।

दोनों ने एक साथ गहरी सांस भरी और शिमला की ठंडी हवाओं मे गार्डन मे बैठी थी। जहाँ स्वाती इंतजार मे थी राध्या के अतीत क़ो सुनने के लिए। वही राध्या खुद मे हिम्मत कर रहीं थी। एक बार फिर से उस दर्द क़ो जीने के लिए।

🌼🌼🌼🌼🌼

राध्या कुछ देर तक खामोश बैठी रही। उसकी नजरें आसमान में टिमटिमाते तारों पर टिकी थीं, लेकिन जैसे उसकी आँखों के सामने अब शिमला की रात नहीं, बल्कि उसका बीता हुआ वक्त घूम रहा था। हाथ में पकड़ी कॉफी कब ठंडी हो गई, उसे इसका भी एहसास नहीं हुआ।

फिर उसने धीमी आवाज में कहना शुरू किया, “मैं जमशेदपुर की रहने वाली हूँ। राध्या झा मेरा पूरा नाम है। मैंने मनोविज्ञान से डॉक्टरेट की है।”

वह कुछ पल रुकी और फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, “मैं एक बहुत बड़े और भरे-पूरे परिवार से थी, स्वाति। हमारे घर में माँ-पापा के साथ दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन... इतने लोग थे कि घर कभी शांत ही नहीं रहता था।

किसी न किसी की आवाज हमेशा सुनाई देती रहती थी। हमारा अपना बिजनेस था, वी. जे. कंस्ट्रक्शन कंपनी। मेरे दादा जी ने उसे शुरू किया था और धीरे-धीरे वह हमारे परिवार की पहचान बन गई थी।राध्या के चेहरे पर बीते दिनों की एक हल्की-सी चमक आई।

“मेरे दादा जी, विश्वनाथ झा... अट्ठहत्तर साल के हैं। परिवार में उनका बहुत सम्मान है। स्वभाव से शांत हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी ही इतनी दमदार है कि उनके सामने कोई भी अपनी आवाज ऊँची करने से पहले सोचता था।

उन्होंने अपनी मेहनत से वी. जे. कंस्ट्रक्शन को एक बड़ा नाम बनाया था। दादी, शांति झा... बहत्तर साल की हैं। दादा जी के बिल्कुल विपरीत, बहुत शांत, सौम्य और ममता से भरी हुई। घर में किसी को भी उनकी गोद में सिर रख देने भर से सुकून मिल जाता था।”
राध्या की आवाज में अपने दादा-दादी के लिए प्यार साफ सुनाई दे रहा था।

“मेरे पापा विपुल झा... पचपन साल के हैं। दादा जी के साथ कंपनी संभालते थे। बहुत ईमानदार और उसूलों वाले इंसान हैं। लेकिन उनके लिए बिजनेस से भी ज्यादा जरूरी उनका परिवार था... और शायद सबसे ज्यादा मैं।”

यह कहते हुए राध्या के होंठों पर मुस्कान आई, मगर उसकी आँखें अचानक नम हो गईं।
“मेरी माँ मधु झा... चौवन साल की हैं। वो डॉक्टर हैं। बहुत दयालु और समझदार महिला हैं। बचपन में मुझे कभी किसी चीज की जरूरत महसूस नहीं होने दी। सच कहूँ तो माँ मेरे लिए सिर्फ माँ नहीं, मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी थीं।”

राध्या ने एक लंबी साँस ली और आगे कहा, “मेरा एक बड़ा भाई भी है... वंश झा। तीस साल का। करीब छह फीट दो इंच लंबा, गोरा रंग और काफी हैंडसम। स्वभाव थोड़ा गुस्सैल और एरोगेंट है, लेकिन मेरे लिए वो हमेशा सबसे अलग रहा। वो एक सीक्रेट एजेंट है, इसलिए कभी महीनों तक घर से बाहर रहता है, तो कभी सालों तक उसका कोई अता-पता नहीं होता। लेकिन जब भी वापस आता था, सबसे पहले मुझे ढूँढ़ता था।”

उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए भाई की याद में सच्ची मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल वह फिर गंभीर हो गई।
“मेरे चाचा विशाल झा भी पापा के साथ कंपनी में काम करते हैं। पचास साल के हैं। और चाची विधि झा... अड़तालीस साल की। वो घर संभालती हैं। हमारे घर के हर बच्चे को उन्होंने अपने बच्चों की तरह प्यार दिया है। सच में, हमारे घर का पूरा परिवार उनकी ममता से जुड़ा हुआ था।”
“चाचा-चाची के दो बच्चे हैं। उनका बेटा विवेकानंद झा... पच्चीस साल का है। पाँच फीट दस इंच लंबा, साँवला रंग और काफी हैंडसम। वो वी. जे. कंस्ट्रक्शन कंपनी का सीईओ है। दिमाग बहुत तेज है और अपनी मेहनत से उसने कंपनी को एशिया की बेहतरीन कंस्ट्रक्शन कंपनियों में जगह दिलाने में बहुत योगदान दिया है।”

राध्या के होंठों पर हल्की शरारती मुस्कान आई।“हालाँकि उसकी जिंदगी में भी एक राज है... उसकी एक सीक्रेट गर्लफ्रेंड है।स्वाति की आँखों में उत्सुकता उभरी, लेकिन राध्या ने मुस्कुराकर कहा, “उसकी कहानी फिर कभी।”

फिर उसने आगे कहा, “उसकी छोटी बहन रूही है। अठारह साल की। अभी कॉलेज शुरू किया है। गेहुँआ रंग, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें, भूरे बाल और करीब पाँच फीट दो इंच की। पूरे घर की लाडली है। उसकी एक छोटी-सी मुस्कान पर घर का माहौल बदल जाता था। बहुत मासूम है वो... और सबकी प्यारी।”

राध्या कुछ पल चुप रही। मेरी बुआ वैदेही मिश्रा हैं। तिरपन साल की। उनके पति शशिकांत मिश्रा पचपन साल के हैं। दोनों कॉलेज के जूलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं। उनका बेटा कुणाल मिश्रा है, उसकी पत्नी काव्या। 

दोनों इंजीनियर हैं और ऑस्ट्रेलिया में सेटल हैं। उनकी बेटी सोनल चौधरी है, उसके पति अनील चौधरी। दोनों सरकारी अधिकारी हैं और हैदराबाद में रहते हैं।
इतना कहते-कहते राध्या की आवाज भारी हो चुकी थी। जिन लोगों का जिक्र करते हुए कुछ देर पहले उसके चेहरे पर मुस्कान थी, अब उन्हीं यादों के साथ उसकी आँखों में नमी उतर आई थी।

स्वाति ने धीरे से उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।“राध्या... जब दिल करे तब आगे बताना। खुद को इतना तकलीफ मत दो।”राध्या ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल तक उसकी आँखें नम रहीं, फिर उसने अपना सिर हल्का-सा हिलाया।

“नहीं स्वाति... आज बोल लेने दो।”उसकी आवाज में दबा हुआ दर्द साफ महसूस हो रहा था।
“बहुत सालों से सब कुछ अपने अंदर दबाकर रखा है। आत्मा पर बहुत बोझ है मेरे... आज अगर नहीं बोला तो शायद फिर कभी नहीं बोल पाऊँगी।”

स्वाति ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे रखा।राध्या ने गहरी साँस ली और अपनी नजरें फिर आसमान की तरफ उठा दीं।तुमने मेरे परिवार के बारे में पूछा था ना... तो अब मेरी कहानी भी सुनो।उसकी आवाज अचानक धीमी पड़ गई।

“क्योंकि मेरी जिंदगी हमेशा ऐसी नहीं थी, स्वाति... कभी मैं भी बहुत खुश थी। मेरा परिवार ही मेरी पूरी दुनिया था... और मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन वही दुनिया मेरी जिंदगी से इस तरह छिन जाएगी।”

राध्या की आँखों से आखिरकार एक आँसू निकलकर उसके गाल पर ठहर गया।
और यहीं से उसकी जिंदगी के उस अतीत की शुरुआत होने वाली थी, जिसे वह पिछले दस सालों से अपने सीने में दफन किए बैठी थी।

उधर उसी समय प्रताप मेंशन के स्टडी रूम में अनिरुद्ध के फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाकर कॉल रिसीव किया।
“Hello।”

दूसरी तरफ से आवाज आई, “सर, आपने जिस मैम के बारे में पता करने के लिए कहा था, उनकी पूरी जानकारी मैंने आपको मेल कर दी है। आप चेक कर लीजिए।”
“ठीक है।”

अनिरुद्ध ने कॉल काट दी और तुरंत अपने लैपटॉप की तरफ बढ़ गया। कुछ ही पलों में उसकी मेल खुल गई।स्क्रीन पर सबसे ऊपर एक नाम लिखा था, "राध्या झा।अनिरुद्ध की नजर उसी नाम पर टिक गई।उसने पढ़ना शुरू किया।

जैसे-जैसे वह राध्या की जिंदगी के बारे में जानता गया, उसके चेहरे के भाव बदलते चले गए। कभी उसकी भौंहें सिकुड़ जातीं, कभी उसका जबड़ा गुस्से से कस जाता। कुछ बातों को पढ़ते हुए उसकी आँखों में गुस्सा साफ नजर आता, तो कुछ जगहों पर वही आँखें दर्द और तकलीफ से भर उठतीं।वह लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठा था।

जिस लड़की को वह सुबह से सिर्फ एक अजीब-सी, खुद में रहने वाली और attitude वाली लड़की समझ रहा था, उसकी जिंदगी के पीछे इतनी बड़ी कहानी छिपी होगी, यह उसने कभी नहीं सोचा था।

अनिरुद्ध ने मेल को ऊपर से नीचे तक पढ़ा और फिर कुछ देर तक बिल्कुल शांत बैठा रहा। उसके चेहरे पर कोई साफ भाव नहीं था, लेकिन उसके भीतर क्या चल रहा था, यह शायद सिर्फ वही जानता था।


राध्या ने अपनी हथेली से आँसू पोंछे और धीमी आवाज में कहा, “तुमने आज मेरी जिंदगी का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा देखा है, स्वाति। असली कहानी तो उसके बाद शुरू हुई थी।”
उसने एक गहरी साँस ली।

“उस दिन से लेकर आज तक... मैंने जो जिया है, शायद उसे याद करना भी मेरे लिए किसी सजा से कम नहीं है।”और फिर राध्या अपने अतीत की उन परतों को एक-एक करके खोलने लगी, जिन्हें उसने दस सालों से दुनिया से छिपाकर रखा था।

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌿🌿🌿

राध्या कुछ पल तक चुप रही। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि उन पुराने दिनों की यादें थीं, जिनमें कभी उसकी पूरी दुनिया बसी हुआ करती थी।

“मैं अपने घर की सबसे लाडली और समझदार बच्ची थी, स्वाति। मेरे परिवार ने मुझे हमेशा सिर-आँखों पर बिठाकर रखा। दादा-दादी से लेकर माँ-पापा, भाई-बहन... हर किसी की जान थी मैं।”उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“मुझमें जितना अल्हड़पन था, उतनी ही समझदारी भी। घर में किसी के सामने कोई परेशानी आती, तो सबकी नजरें मेरी तरफ उठ जाती थीं। न जाने कैसे, मैं हर उलझन का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती थी। मेरे परिवार वाले मजाक में मुझे ‘प्रॉब्लम सॉल्वर’ कहा करते थे।”
वह धीमे से हँसी, मगर अगले ही पल उसकी आँखों की चमक फीकी पड़ गई।

“मेरे माँ-पापा को मुझ पर नाज था... दादा-दादी को मुझ पर गुरूर था। सच कहूँ तो मेरे परिवार का हर सदस्य मुझे लेकर गर्व महसूस करता था। मुझे हमेशा लगता था कि मैं कभी ऐसा कोई काम नहीं करूँगी, जिससे मेरे परिवार की नजरों में मेरी इज्जत कम हो।”

राध्या ने एक पल के लिए अपनी नजरें झुका लीं।
“स्कूल से लेकर कॉलेज तक मैं पढ़ाई में हमेशा आगे रही। सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, जिस भी क्षेत्र में कदम रखा, वहाँ अपना नाम बनाया। हर परीक्षा में अच्छे नंबर, हर प्रतियोगिता में जीत... मेरे लिए ये सब सिर्फ मेरी कामयाबी नहीं थी। मुझे लगता था कि मेरी हर जीत मेरे परिवार की खुशी है।”

उसकी आवाज़ में गर्व नहीं, बल्कि उन दिनों के लिए एक गहरी मोहब्बत थी।
“मैं बहुत खुश थी, स्वाति। शायद जरूरत से ज्यादा खुश थी। मुझे लगता था कि मेरी जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी। मेरे पास मेरा परिवार रहेगा, उनके प्यार की छाँव रहेगी और मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीती रहूँगी।”

वह कुछ पल के लिए खामोश हुई।फिर बहुत धीमे से बोली,“लेकिन शायद इंसान जब अपनी जिंदगी को लेकर सबसे ज्यादा निश्चिंत होता है... तभी किस्मत उसके सामने सबसे बड़ा इम्तिहान रख देती है।”

राध्या की उँगलियाँ काँपने लगीं।“और मेरी जिंदगी में भी वो इम्तिहान आया था... मेरी अपनी एक गलती बनकर।”उसने आँखें बंद कर लीं।“उस दिन तक मैं अपने परिवार की वो बेटी थी, जिस पर सबको नाज था... लेकिन उसके बाद मैं खुद अपनी ही नजरों में गिर गई।”

राध्या ने अपनी बात आगे बढ़ाई। इस बार उसकी आवाज़ में पुरानी यादों की गर्माहट के साथ-साथ एक अनजाना डर भी उतर आया था।
“मैं कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ पापा और चाचू के बिज़नेस में भी हाथ बँटाया करती थी। बचपन से ही चीज़ों को समझने की मेरी क्षमता थोड़ी तेज थी। किसी भी मामले को समझने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगता था।

शायद यही वजह थी कि जब भी कंपनी में कोई बड़ा टेंडर आता या किसी प्रोजेक्ट के लिए कोटेशन तैयार किया जाता, तो पापा, चाचू और भैया मुझे भी अपने साथ बैठाते थे।”
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“मुझे अच्छा लगता था जब पापा किसी फैसले से पहले मेरी राय पूछते थे। कभी-कभी चाचू मेरी किसी बात पर सहमत होते, तो कभी भैया मुझसे बहस करने लगते। लेकिन उन छोटी-छोटी बहसों में भी एक अपनापन था। मुझे लगता था कि मैं सिर्फ उनके परिवार का हिस्सा नहीं हूँ... बल्कि उनके सपनों का भी हिस्सा हूँ।”

राध्या ने एक गहरी साँस ली।“हमारी जिंदगी अपने तरीके से बहुत अच्छी चल रही थी। घर में खुशियाँ थीं, बिज़नेस अच्छा चल रहा था और परिवार का हर सदस्य अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रहा था। हमें लगता था कि आने वाला वक्त और भी खूबसूरत होगा।”

वह कुछ पल के लिए खामोश हुई।“फिर एक दिन हमारी कंपनी के सामने एक बहुत बड़ा टेंडर आया।”उसकी आवाज़ में अब गंभीरता उतर आई थी।“वो कोई सामान्य टेंडर नहीं था। अगर वो प्रोजेक्ट हमारी कंपनी को मिल जाता, तो V. J. Construction सिर्फ देश तक सीमित नहीं रहती। 

हमारे पास विदेशों में भी काम करने का रास्ता खुल जाता। कंपनी को एक नई ऊँचाई मिलती... और हमारे परिवार का सपना भी पूरा हो सकता था। राध्या की नजरें अब कहीं दूर टिक गईं।
“पूरा परिवार उस टेंडर को लेकर उत्साहित था। पापा दिन-रात उसके काम में लगे हुए थे। चाचू अपनी टीम के साथ तैयारियों में जुटे थे और भैया भी हर छोटी-बड़ी चीज पर नजर रख रहा था। मुझे भी उस प्रोजेक्ट की तैयारी में शामिल किया गया था।”

उसने धीरे से कहा, “हमें क्या पता था कि जिस टेंडर को हम अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी समझ रहे थे... वही हमारे लिए सबसे बड़ी तबाही लेकर आने वाला है।”
राध्या की उँगलियाँ आपस में कस गईं।

“क्योंकि उसी टेंडर के साथ... हमारी जिंदगी में एक ऐसा तूफान दाखिल हुआ, जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया।”उसने कुछ पल आँखें बंद रखीं।फिर बहुत धीमी, मगर साफ आवाज़ में कहा,“उस तूफान का नाम था... युवराज सिंह चौहान।

स्वाति के चेहरे पर भी अब गंभीरता उतर आई थी।राध्या ने उसकी तरफ देखा।
“उस वक्त मैं नहीं जानती थी कि युवराज सिंह चौहान सिर्फ हमारे बिज़नेस की एक कहानी नहीं बनने वाला था... वो मेरी जिंदगी का वो अध्याय बनने वाला था, जिसे मैं चाहकर भी कभी भूल नहीं पाई।”उसकी आवाज़ के साथ ही उसकी आँखों में फिर वही पुराना दर्द उतर आया।


राध्या के मुँह से “युवराज सिंह चौहान” नाम निकलते ही उसकी आँखों में अचानक एक गहरा दर्द उभर आया। जैसे सिर्फ उस नाम ने ही उसके भीतर दफन किए हुए दस साल पुराने जख्म को फिर से छू दिया हो।

स्वाति ने बिना कुछ पूछे धीरे से उसके हाथों पर अपना हाथ रख दिया।राध्या ने कुछ पल अपनी आँखें बंद रखीं। फिर खुद को संभालते हुए एक लंबी साँस ली और आगे कहना शुरू किया।

“युवराज सिंह चौहान... अट्ठाईस साल का था। करीब छह फीट तीन इंच लंबा, गोरा रंग और ऐसा चेहरा कि पहली नजर में कोई भी उसे देखकर उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाए। वह चौहान कंस्ट्रक्शन का मालिक था... भोपाल का एक बहुत बड़ा नाम।”

राध्या की आवाज में अब नफरत साफ महसूस हो रही थी।लेकिन उसके खूबसूरत चेहरे के पीछे जो इंसान छिपा था, उसे बहुत कम लोग जानते थे। वह बेहद घमंडी और अपनी ताकत के नशे में रहने वाला इंसान था। पैसा, रुतबा और अपनी पहुँच... इन तीनों का उसे इतना घमंड था कि उसे लगता था दुनिया में हर चीज उसके इशारे पर मिल सकती है।”

वह कुछ पल रुकी।उसे किसी इंसान की भावनाओं या उसकी इज्जत की कोई परवाह नहीं थी। जो चीज उसे पसंद आ जाती... उसे किसी भी कीमत पर हासिल करके ही दम लेता था। उसके लिए सही और गलत से ज्यादा मायने रखता था सिर्फ एक शब्द...उसकी इच्छा।”

राध्या की आँखों में अब गुस्सा और दर्द दोनों दिखाई दे रहे थे और सबसे खतरनाक बात ये थी कि उसके चेहरे को देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि उसके अंदर कितना अंधेरा छिपा है।”

उसने धीमे से कहा, “युवराज उसी टेंडर के लिए आया था, जिसकी तैयारी हमारी कंपनी महीनों से कर रही थी। हमारे लिए वो टेंडर सिर्फ एक बिजनेस प्रोजेक्ट नहीं था... वो हमारे परिवार के कई सालों के सपनों का रास्ता था।”

राध्या कुछ पल चुप रही।“टेंडर जमा होने से पहले सभी कंपनियों के मालिकों और उनके परिवारों के लिए एक पार्टी रखी गई थी। मकसद यही था कि बिजनेस में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद सभी लोग आपस में मिलें-जुलें, एक-दूसरे को जानें और माहौल थोड़ा सहज रहे।”

उसकी आवाज अचानक धीमी हो गई।लेकिन मुझे क्या पता था कि वही पार्टी मेरी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन बनने वाली है।स्वाति ने उसकी तरफ देखा। राध्या की उँगलियाँ अब काँप रही थीं।

राध्या ने अपनी नजरें झुका लीं और बहुत धीमे से कहा,“मुझे आज भी वो दिन... उस रात का एक-एक पल याद है।”कुछ क्षणों तक वह चुप रही।फिर उसकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर बह गया।

“काश... मैं उस दिन उस पार्टी में गई ही नहीं होती।”शिमला की ठंडी हवा के बीच कुछ पल के लिए दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई।राध्या ने आँसू पोंछे और खुद को फिर संभाला।
“लेकिन मैं गई थी, स्वाति... और वहीं से मेरी जिंदगी ने वो मोड़ लिया, जहाँ से फिर कभी पीछे मुड़कर देखना मेरे लिए संभव नहीं रहा।”

उसने धीरे से आँखें बंद कीं।वो पार्टी... और युवराज से मेरी पहली मुलाकात...यही मेरी जिंदगी के सबसे बुरे अध्याय की शुरुआत थी।

🌼🌼🌼🌼🌼🌼
राध्या का दिल उस दिन न जाने क्यों बहुत बेचैन था। जैसे आने वाले किसी तूफान की आहट उसके दिल ने पहले ही सुन ली हो। पार्टी का नाम सुनते ही उसके मन में एक अजीब-सी घबराहट होने लगी थी। वह बिल्कुल नहीं जाना चाहती थी।

उसने अपनी माँ की तरफ देखते हुए कहा, “माँ, मुझे किसी पार्टी में नहीं जाना। मैं घर पर दादा-दादी के साथ रहूँगी। आप सब तो जा ही रहे हो... उसमें मेरा क्या काम है? पापा को भी बोलो ना माँ।”

मधु ने बेटी की तरफ देखा और प्यार से कहा, “जाने दो न, अगर नहीं जाना चाहती तो...”
लेकिन इससे पहले कि मधु अपनी बात पूरी करतीं, विवेकानंद बीच में ही बोल पड़ा, “अरे नहीं, बड़ी माँ! इसे तो जाना ही पड़ेगा।”

राध्या ने तुरंत अपने भाई की तरफ देखा। भैया... आपको मेरी इतनी चिंता कब से होने लगी?
विवेकानंद ने शरारती अंदाज में उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “देख मेरी जान, तू अगर नहीं चलेगी न, तो तेरे इस भाई की कंपनी खतरे में पड़ जाएगी।”

राध्या ने आँखें सिकोड़कर पूछा, “मेरी वजह से आपकी कंपनी को क्या खतरा है?”विवेकानंद ने इधर-उधर देखा, फिर उसके पास जाकर धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, “बहुत सारी खूबसूरत लड़कियाँ आएँगी वहाँ...”राध्या ने भौंहें चढ़ा दीं।

विवेकानंद ने अपनी बात जारी रखी, “जो तेरे भाई पर डोरे डालेंगी। अब उन्हें मुझसे कौन बचाएगा?”राध्या ने उसे घूरकर देखा। “आपको कोई बचाने वाला चाहिए भी नहीं है। आप खुद ही उनसे दूर रहना।”विवेकानंद ने नाटकीय अंदाज में अपना हाथ सीने पर रखा।ये कैसी बहन है मेरी? अपने इकलौते भाई को भेड़ियों के बीच अकेला छोड़ देगी?

राध्या ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, लेकिन उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई थी।
विवेकानंद ने मौका देखकर फिर उसके कान के पास जाकर धीरे से कहा, “और सुन... अगर मैं वहाँ किसी पर फिसल गया तो?”राध्या ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“तो?”

विवेकानंद ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, “फिर अपनी बेस्ट फ्रेंड मंजरी को क्या जवाब देगी? सोच... वो इतने दिनों से तेरी भाभी बनने का सपना देख रही है। अगर मैं किसी और पर फिसल गया तो बेचारी का क्या होगा?”

राध्या ने अपना मुँह फेर लिया और भाई की सारी बातें सुनती रही।भैया, आप भी ना... हर बात में मंजरी को बीच में ले आते हो।क्यों न लाऊँ? आखिर वो मेरी होने वाली बीवी है...! किसने कह दिया?“तूने।“मैंने कब कहा?“जब तूने बचपन में कहा था कि मेरी शादी मंजरी से ही करवाएगी।”

राध्या ने आँखें घुमाईं। मैंने तब कहा था, जब मुझे आपकी समझदारी पर भरोसा था।विवेकानंद हँस पड़ा।कुछ ही देर पहले जिस राध्या का मन पार्टी में जाने के नाम से घबरा रहा था, भाई की इन बचकानी बातों ने उसके चेहरे पर मुस्कान ला दी थी।

लेकिन उसके दिल के किसी कोने में वह बेचैनी अब भी मौजूद थी।उसे क्या पता था कि जिस पार्टी में जाने के लिए उसका भाई उसे इतनी आसानी से मना रहा था...वही पार्टी उसकी जिंदगी की सबसे भयानक याद बनने वाली थी।

विवेक ये कहते हुए उसके सामने आकर खड़ा हो गया और बड़े मासूम अंदाज़ में बोला, “ठीक है... अगर मेरी जान को नहीं जाना है तो बड़ी माँ, आप भी इसे मत कहिए। क्यों जान... सही कह रहा हूँ ना?”

राध्या ने अपनी खिंची हुई नजरों से उसे घूरकर देखा। वह जानती थी कि उसका भाई उसे मनाने के लिए ये पूरा नाटक कर रहा है।कुछ पल तक दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखते रहे। आखिरकार राध्या ने हार मानते हुए लंबी साँस ली और बोली, “ठीक है... मैं चलूँगी।”

राध्या के इतना कहते ही विवेक के चेहरे पर जीत वाली मुस्कान आ गई।लेकिन अगले ही पल राध्या उसके बिल्कुल पास गई और उसके कान के पास झुककर धीरे से बोली, “भाई... देख लेना, मैं आपका ब्रेकअप करवा दूँगी।”

विवेक कुछ समझ पाता, उससे पहले ही राध्या ने उसके पैर पर हल्की-सी किक मारी और तेजी से अपने कमरे की तरफ भाग गई.“आह!”विवेक अपना पैर पकड़कर वहीं खड़ा रह गया और मुँह फाड़े उसे जाते हुए देखने लगा।

फिर अचानक उसे जैसे कुछ याद आया। वह जोर से उसके पीछे चिल्लाया,“जान! रुको तो!”
राध्या ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।“जान, सुन तो!”वह फिर भी अपने कमरे की तरफ भागती रही।“अरे मेरी जान! एक मिनट रुक जा!”

अब तक कमरे में मौजूद सभी लोग दोनों भाई-बहन की नोकझोंक देखकर हँस पड़े थे।
मधु ने मुस्कुराते हुए अपना सिर हिलाया, जबकि बाकी परिवार भी उनकी रोज की इस प्यारी-सी नोकझोंक का मजा ले रहा था।

राध्या और उसके भाई-बहनों के बीच यही तो रिश्ता था..प्यार, शरारत और एक-दूसरे को परेशान करने का कोई मौका न छोड़नाऔर शायद इसीलिए घर में हर कोई उसे प्यार से “जान” कहकर पुकारता था।

उस वक्त किसी को क्या पता था कि कुछ ही समय बाद यही हँसी, यही शरारतें और यही भरा-पूरा परिवार राध्या की जिंदगी की सबसे खूबसूरत... और सबसे दर्दनाक याद बनकर रह जाने वाला था।

पार्टी के लिए घर में सुबह से ही तैयारियों का माहौल था। शाम होते-होते पूरा झा परिवार एक-एक करके तैयार होने लगा था। घर के हर कोने में चहल-पहल थी और सभी एक-दूसरे को देखकर उनकी तारीफ करने में लगे हुए थे।

सबसे पहले विपुल जी तैयार होकर बाहर आए। उन्होंने ब्लैक सफारी सूट पहन रखा था, जो उनके व्यक्तित्व पर काफी रौबदार लग रहा था। उनके साथ मधु जी सफेद साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही थीं। दोनों को साथ देखकर साफ महसूस हो रहा था कि इतने सालों बाद भी उनके बीच वही अपनापन और खूबसूरत बॉन्डिंग थी।

उनके बाद विशाल जी और विधि जी तैयार होकर आए। विशाल जी ने ब्राउन सफारी सूट पहना था, जबकि विधि जी ने ग्रीन साड़ी पहनी थी। दोनों की जोड़ी भी बेहद प्यारी लग रही थी। विधि जी के चेहरे की ममता और विशाल जी के व्यक्तित्व की गंभीरता एक-दूसरे को खूब सूट कर रही थी।

फिर शशिकांत जी और वैदेही जी बाहर आए। शशिकांत जी व्हाइट सफारी सूट में काफी सलीकेदार लग रहे थे, वहीं वैदेही जी ने रेड साड़ी पहनी थी। दोनों को देखकर घर के बाकी लोग भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह सके।

झा परिवार की ये तीनों जोड़ियाँ आज की शाम बेहद खूबसूरत लग रही थीं। एक तरफ उम्र और अनुभव का रुतबा था, तो दूसरी तरफ इतने सालों से साथ निभाने वाले रिश्तों की गर्माहट।
विश्वनाथ जी और शांतिजी आज पार्टी में नहीं जा रहे थे। दादा-दादी की तबियत कुछ ठीक नहीं थी, इसलिए उन्होंने घर पर ही रहने का फैसला किया था। जाते-जाते परिवार के सभी लोग उनका हाल पूछकर और उनका आशीर्वाद लेकर ही निकलने वाले थे।

इसके बाद घर के जूनियर सदस्य भी तैयार होकर सामने आने लगे।सोनल चौधरी और उनके पति अनील चौधरी भी पार्टी के लिए तैयार थे। अनील जी ग्रे थ्री-पीस सूट में काफी स्मार्ट लग रहे थे, वहीं सोनल ने पिंक साड़ी पहन रखी थी। दोनों साथ में बेहद प्यारे लग रहे थे।

रूही भी किसी से कम नहीं लग रही थी। राध्या की छोटी बहन ने ग्रे इंडो-वेस्टर्न ड्रेस पहनी थी, जिसमें वह बेहद क्यूट और मासूम लग रही थी। उसके चेहरे की प्यारी-सी मुस्कान उसे और भी खूबसूरत बना रही थी और फिर बारी आई घर के हैंडसम लड़के की।

विवेकानंद झा ब्लैक सूट में तैयार होकर जैसे ही बाहर आया, तो उसकी पूरी पर्सनैलिटी ही बदल गई। आमतौर पर बहन को परेशान करने वाला वही शरारती विवेक आज काफी कूल और हैंडसम लग रहा था। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी।
एक-एक करके लगभग सभी तैयार हो चुके थे।

बस एक इंसान अभी भी अपने कमरे से बाहर नहीं आया था,राध्या।मधु जी ने घड़ी की तरफ देखा और फिर उसकी तरफ आवाज लगाई, “राध्या बेटा! तैयार हुई या अभी भी कमरे में ही हो?”

कोई जवाब नहीं आया।विवेक ने तुरंत आवाज लगाई, “जान! जल्दी कर, वरना तेरे भाई की वजह से पार्टी मिस हो जाएगी।”अंदर से फिर भी कोई जवाब नहीं आया।“राध्या!” इस बार विधि जी ने भी पुकारा।

तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।राध्या बाहर आई।उसके बाल अभी भी गीले थे। वह