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धड़कन तू है मेरी Chapter-5

धड़कन तू है मेरी Chapter-5

मंजरी आज लाल रंग के लहंगे में बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसके चेहरे पर दुल्हन बनने की खुशी साफ झलक रही थी और आँखों में अपने नए जीवन को लेकर अनगिनत सपने तैर रहे थे। उसके साथ रिया और राध्या भी बेहद प्यारी लग रही थीं। दोनों बड़े प्यार और अपनापन से मंजरी को अपने बीच लेकर मंडप की ओर ला रही थीं।

उधर मंडप में बैठा विवेक जैसे ही अपनी दुल्हन को अपनी ओर आते देखता है, उसकी नजरें उसी पर ठहर जाती हैं। लाल जोड़े में सजी मंजरी की खूबसूरती को वह बिना पलक झपकाए निहारता रह जाता है। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी, जैसे उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी आज उसके सामने आकर बैठने वाली हो।

विवेक ने भी मंजरी के लहंगे के रंग से कॉम्बिनेशन करती हुई शेरवानी पहन रखी थी। दोनों को एक साथ देखकर ऐसा लग रहा था जैसे एक-दूसरे के लिए ही सजकर आए हों। परिवार के सभी लोगों की नजरें उन दोनों पर थीं और हर किसी के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी।

मंडप में विवाह की रस्में शुरू हो गईं।

इसी बीच साहिल धीरे-धीरे राध्या के पास आकर खड़ा हुआ। उसने राध्या को देखते हुए कहा, “तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो। मैंने आज तक तुमसे ज्यादा हसीन कोई लड़की नहीं देखी। मैं बहुत लकी हूँ कि तुम मेरी होने वाली हो।”

इतना कहते हुए उसने राध्या का हाथ पकड़ लिया और मुस्कुरा दिया।

राध्या उसके इस अचानक हाथ पकड़ने से थोड़ी असहज महसूस करने लगी। उसने एक पल के लिए अपने हाथ की तरफ देखा, फिर साहिल की ओर। लेकिन वह उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी, इसलिए बिना कुछ कहे चुपचाप उसके साथ खड़ी रही।

उधर पंडित जी विवाह की अगली रस्म की तैयारी करते हुए बोले, “कन्यादान के लिए वधु के माता-पिता को बुलाइए।”

पंडित जी की बात सुनते ही कुछ पल के लिए माहौल शांत हो गया। परिवार के कई लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

मंजरी की आँखों में अचानक आँसू भर आए।

आज पहली बार उसे उस कमी का एहसास इतने गहरे रूप में हुआ था, जिसे वह हमेशा अपने भीतर दबाकर रखती आई थी। आज उसके जीवन का सबसे बड़ा दिन था, लेकिन कन्यादान के लिए उसके अपने माता-पिता वहाँ नहीं थे।

राध्या ने मंजरी की आँखों में आए आँसुओं को देख लिया। वह तुरंत उसके पास जाकर बैठ गई और प्यार से उसे चुप रहने का इशारा किया। उसने उसकी तरफ देखकर अपनी आँखों से जैसे कहा कि वह अकेली नहीं है।

तभी पीछे से वैदेही जी और शशिकांत जी आगे बढ़कर मंडप के पास आए।

वैदेही जी ने मंजरी की ओर देखते हुए कहा, “हम करेंगे हमारी बेटी का कन्यादान।”

उनके शब्द सुनते ही मंजरी की आँखों से आँसू बह निकले। पूरे परिवार के चेहरों पर खुशी और भावुकता एक साथ उतर आई।

मंजरी खुद को रोक नहीं पाई। वह तुरंत वैदेही जी और शशिकांत जी से लिपटकर रोने लगी। वैदेही जी ने उसे अपनी बेटी की तरह सीने से लगा लिया और शशिकांत जी ने भी उसके सिर पर हाथ रख दिया।

उस पल मंजरी को पहली बार अपनी उस कमी के बीच भी पूरा होने का एहसास हुआ।

तभी रिया ने माहौल को हल्का करने के लिए मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, अब सारे आँसू अभी ही गिरा लोगी तो विदाई के समय मुझे रोना पड़ेगा तुम्हारे बदले!”

रिया की बात सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

मंजरी ने आँसुओं के बीच रिया की ओर देखा और हल्का-सा मुस्कुरा दी।

और फिर मंडप में विवाह की रस्में आगे बढ़ने लगीं। जहाँ एक तरफ मंजरी अपनी जिंदगी के नए सफर की ओर कदम बढ़ा रही थी, वहीं पूरा झा परिवार उसे अपनी बेटी बनाकर उसके साथ खड़ा था।


शशिकांत जी और वैदेही जी ने पूरे विधि-विधान से मंजरी का कन्यादान किया। कन्यादान की रस्म पूरी करते हुए वैदेही जी ने मंजरी के सिर पर प्यार से हाथ रखा और भावुक होकर कहा, “आज से हमारी दो बेटियाँ हुईं।”

मंजरी की आँखें फिर से नम हो गईं। उसने दोनों के हाथ पकड़ लिए।

तभी पीछे से सोनल की आवाज आई, “और आज मुझे भाभी के साथ एक प्यारी-सी बहन भी मिल गई।”

उसकी बात सुनकर वहाँ खड़े सभी लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ गई। तभी अनिल जी भी हँसते हुए बोले, “और मुझे साली!”

उनकी बात सुनते ही सभी हँस पड़े। कुछ ही पल पहले जो माहौल भावुक हो गया था, उसमें फिर से हँसी और खुशियाँ लौट आईं। मंजरी भी आँसुओं के बीच मुस्कुरा उठी।

इसके बाद पंडित जी ने अगली रस्म शुरू करवाई। विवेक और मंजरी ने एक-दूसरे का हाथ थामा और विवाह के फेरे शुरू हुए। अग्नि को साक्षी मानकर दोनों ने सात फेरे लिए और एक-दूसरे का साथ निभाने के वचन लिए।

फेरों के बाद सिंदूरदान की रस्म हुई। विवेक ने मंजरी की माँग में सिंदूर भर दिया। उस पल मंजरी की आँखें झुक गईं और विवेक के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई।

पंडित जी ने दोनों को देखते हुए कहा, “आज से आप दोनों पति-पत्नी हुए। ठाकुर जी आप दोनों के जीवन को सुख और समृद्धि से भरें।”

विवेक और मंजरी ने झुककर पंडित जी का आशीर्वाद लिया और फिर परिवार के सभी बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श किए। हर किसी ने दोनों को आशीर्वाद दिया। पूरे घर में खुशी का माहौल था।

लेकिन इसी बीच राध्या के मोबाइल पर एक संदेश आया।

उसने सहजता से अपना फोन देखा, लेकिन जैसे ही उसकी नजर उस संदेश पर पड़ी, उसके चेहरे के भाव अचानक बदल गए। कुछ ही क्षण पहले जो चेहरा शादी की खुशी में मुस्कुरा रहा था, उस पर अब गंभीरता उतर आई थी।

राध्या ने बिना किसी से कुछ कहे फोन अपने हाथ में लिया और चुपचाप वहाँ से बाहर निकल गई।

वह घर से कुछ दूर एक सुनसान जगह पर पहुँची, जहाँ पहले से एक आदमी उसका इंतजार कर रहा था। राध्या उसके सामने जाकर रुक गई और सीधे उससे पूछा, “बोलो, क्यों बुलाया इतनी जल्दी?”

उस आदमी ने चारों तरफ देखा और फिर गंभीर आवाज में कहा, “दीदी… आपके परिवार की जान खतरे में है।”राध्या के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।

“क्या मतलब?”

वह आदमी कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “उन्हें पिछले दो दिनों से कुछ ऐसी ड्रग्स दी जा रही हैं, जो उनके ब्रेन के फंक्शन को रोक देंगी। इसके बाद वो न मरे हुए होंगे और न जिंदा… बस एक ऐसी अवस्था में चले जाएँगे, जहाँ उनका शरीर रहेगा, लेकिन उनका दिमाग काम नहीं करेगा।”

राध्या कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत रह गई।उस आदमी ने आगे कहा, “सबसे बड़ी बात… इसका कोई इलाज नहीं है। सिर्फ एक एंटीडोज है। लेकिन जिस डॉक्टर के पास वह एंटीडोज है, वो गायब है।”

राध्या की आँखों में चिंता और गहरी हो गई।“अगर पंद्रह दिनों के अंदर उन्हें वह एंटीडोज नहीं दिया गया,” वह आदमी आगे बोला, “तो वो कभी नहीं उठ पाएँगे। और दुनिया की नजर में… उन्हें ब्रेन-डेड माना जाएगा।”

इतना कहकर वह आदमी चुप हो गया।राध्या कुछ पल तक उसके सामने खड़ी रही। उसके हाथ में पकड़ा फोन धीरे-धीरे कसता चला गया। शादी के मंडप में बजती खुशियों की आवाजें जैसे उससे बहुत दूर चली गई थीं।

अब उसके सामने सिर्फ एक सवाल था।उसके परिवार के साथ आखिर यह सब कौन कर रहा था?


राजीव की बातें सुनते ही राध्या का चेहरा सफेद पड़ जाता है। उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक जाती है और वह लड़खड़ाकर गिरने लगती है। राजीव तुरंत उसे संभाल लेता है।

“संभलिए, दीदी!”

राध्या किसी तरह खुद को संभालती है, लेकिन उसकी आवाज अब भी काँप रही होती है। वह राजीव की तरफ देखते हुए पूछती है, “राजीव… ऐसा किसने किया होगा? हमारे घर में तो कोई बाहरी आदमी आ भी नहीं रहा है। फिर ये सब कैसे हो सकता है?”

राजीव भी परेशान दिखाई देता है। वह धीरे से सिर हिलाते हुए कहता है, “पता नहीं, दीदी। यही बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही है। मुझे भी नहीं पता कि हमारे घर में ये सब कौन कर रहा है।”

राजीव की उम्र लगभग बीस साल है। वह राध्या का मुँहबोला भाई, दोस्त और शिष्य...सब कुछ है। बेहद इंटेलिजेंट राजीव राध्या के हर काम को अंजाम तक पहुँचाने में उसका राजदार भी है। राध्या उस पर पूरा भरोसा करती है और राजीव भी उसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।

राध्या कुछ पल आँखें बंद करके खुद को संभालती है। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देता है, लेकिन अगले ही पल वह अपने आँसू रोकते हुए दृढ़ स्वर में कहती है, “राजीव… मुझे एंटीडोज किसी भी हालत में ढूँढना होगा।”

राजीव तुरंत पूछता है, “लेकिन दीदी, आपने सोच लिया है?”राध्या बिना देर किए उसकी तरफ देखकर कहती है, “हाँ, मैंने सोच लिया है। बस तुम काम पर लग जाओ। मुझे किसी भी हालत में वो एंटीडोज चाहिए।”

राजीव सिर हिलाते हुए कहता है, “ठीक है, दीदी। मैं पूरी कोशिश करूँगा।”इसके बाद दोनों अपने-अपने रास्ते निकल जाते हैं।

राध्या घर की तरफ लौटते समय लगातार यही सोचती रहती है कि उसके परिवार के साथ आखिर ऐसा किसने किया होगा। उसके दिमाग में राजीव की कही हर बात घूम रही होती है। उसे सबसे ज्यादा डर इस बात का था कि अगर पंद्रह दिनों के अंदर एंटीडोज नहीं मिली, तो उसके अपने लोग शायद कभी आँखें नहीं खोल पाएँगे।

जब राध्या घर पहुँचती है, तो उसे घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ लगता है। कुछ देर पहले तक जहाँ शादी की खुशियाँ और चहल-पहल थी, वहीं अब घर में एक अजीब-सी खामोशी छाई हुई होती है।

राध्या का दिल तेजी से धड़कने लगता है।वह घबराकर दौड़ती हुई अंदर जाती है। सामने रिया रोती हुई दिखाई देती है।राध्या तुरंत उसके पास पहुँचकर पूछती है, “क्या हुआ, रियु? तू रो क्यों रही है?”

रिया कुछ बोल नहीं पाती। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे होते हैं। वह काँपते हुए हाथ से सामने की तरफ इशारा करती है।राध्या की नजर जैसे ही मंजरी पर पड़ती है, वह वहीं ठिठक जाती है।

मंजरी शादी के जोड़े में बैठी होती है। उसकी आँखें खुली होती हैं, लेकिन उनमें कोई भाव नहीं होता। वह बिल्कुल चुप बैठी होती है, जैसे उसे आसपास की किसी चीज का एहसास ही नहीं हो रहा हो।

“मंजरी…”राध्या की आवाज भर्रा जाती है। वह दौड़कर उसके पास बैठती है और उसके कंधे पकड़कर कहती है, “मंजरी… क्या हुआ तुम्हें? तुम ऐसे क्यों बैठी हो? मेरी तरफ देखो।”

मंजरी कोई जवाब नहीं देती।राध्या की बेचैनी और बढ़ जाती है। वह उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर कहती है, “मंजरी, बोल ना… क्या हुआ है? तू मुझे देख क्यों नहीं रही?”

जब मंजरी फिर भी कोई जवाब नहीं देती, तो राध्या घबराकर चारों तरफ देखने लगती है।“सभी कहाँ हैं?”कोई उसे जवाब नहीं देता।राध्या अचानक उठती है और बाहर की तरफ दौड़ते हुए जोर-जोर से आवाज लगाने लगती है, “माँ! पापा! दादी! छोटे पापा! भाई! बाबा! छोटी माँ! कहाँ हैं आप सब?”

उसकी आवाज में अब डर साफ सुनाई दे रहा होता है।तभी सोनल रोती हुई उसके पास आती है।राध्या उसे देखते ही उसका हाथ पकड़ लेती है और लगभग चीखते हुए पूछती है, “सोना दीदी, कोई मुझे बताएगा कि हुआ क्या है? सब ऐसे चुप क्यों हैं? क्या हुआ है मेरे परिवार को?”

सोनल की आँखों से आँसू बह रहे होते हैं। वह किसी तरह खुद को संभालते हुए कहती है, “वो… जान…”उसकी आवाज भर्रा जाती है।राध्या बेचैनी से उसका हाथ पकड़कर कहती है, “क्या हुआ? साफ-साफ बताओ मुझे!”

सोनल रोते हुए कहती है, “जब हम शादी से वापस आ रहे थे, तभी अचानक बड़े मामू, छोटे मामू, नानू और विवेक… चारों एक साथ बेहोश होकर गिर गए।”राध्या का चेहरा सुन पड़ जाता है।

“क्या?”
“हाँ, जान… हम सब बहुत घबरा गए थे। जल्दी-जल्दी में उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए। लेकिन वहाँ डॉक्टरों को भी समझ नहीं आ रहा है कि चारों एक साथ इस तरह अचेत अवस्था में कैसे पहुँच गए।”

राध्या की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। अभी… कहाँ हैं वो? सभी हॉस्पिटल में हैं।”

सोनल अपने आँसू पोंछते हुए आगे कहती है, “डॉक्टर उनका इलाज कर रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी को समझ नहीं आया कि आखिर उन्हें हुआ क्या है। मैंने कुणाल को भी बुला लिया है। सबका रो-रोकर बुरा हाल है, जान… किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा।”

राध्या कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो जाती है।उसके कानों में जैसे सिर्फ एक ही बात गूँज रही होती है। चार लोग एक साथ बेहोश हुए हैं।उसे अचानक राजीव की कही बात याद आती है।

“आपके परिवार की जान खतरे में है…”राध्या का दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है। उसे महसूस होता है कि राजीव की बात और घर में हुआ ये हादसा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
उसकी आँखों के सामने अपने पिता, छोटे पापा, बाबा और विवेक के चेहरे घूमने लगते हैं।

“नहीं…” उसके होंठों से धीमी आवाज निकलती है। “मेरे परिवार के साथ ऐसा नहीं हो सकता…”उसकी आँखों से आँसू लगातार बहने लगते हैं। वह अपने आँसू पोंछने की कोशिश करती है, लेकिन वे रुकते ही नहीं।

फिर उसकी नजर मंजरी पर जाती है।मंजरी अब भी उसी तरह चुप बैठी होती है। उसकी नजरें कहीं दूर टिकी होती हैं। वह खुद को इस पूरे हादसे का जिम्मेदार मान चुकी होती है।उसे लग रहा होता है कि उसकी शादी की वजह से परिवार के साथ ये सब हुआ है। वह खुद को मनहूस मानकर पूरी तरह चुप हो गई होती है।

राध्या यह देखकर उसके पास बैठती है और उसका हाथ अपने हाथों में ले लेती है।“मंजरी… मेरी तरफ देख।”मंजरी धीरे से उसकी तरफ देखती है, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ खालीपन होता है।

राध्या का दिल टूट जाता है। एक तरफ उसका परिवार अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है और दूसरी तरफ उसकी सबसे प्यारी दोस्त खुद को इस हादसे का दोषी मानकर अंदर ही अंदर टूट रही होती है।

राध्या अपनी आँखों के आँसू पोंछती है और मंजरी का हाथ कसकर पकड़ लेती है।अब उसके चेहरे पर डर के साथ-साथ एक दृढ़ निश्चय भी था।उसे अपने परिवार को बचाना था और इसके लिए उसे हर हाल में उस एंटीडोज को ढूँढना था।


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राध्या को तो जैसे कुछ होश ही नहीं था। सबकुछ इतनी जल्दी हुआ था कि उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। कुछ देर पहले तक जिस घर में शादी की खुशियाँ थीं, उसी घर के चार लोग अचानक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच पहुँच चुके थे। 

उसे अब अपने बड़े भाई को बुलाना ही होगा, यही बात उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी, लेकिन वह उनसे संपर्क नहीं कर पा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहले क्या करे और कहाँ से शुरू करे।

वह धीरे-धीरे अपने कदमों पर जोर डालते हुए मंजरी के पास पहुँची और उसके सामने बैठकर दोनों हाथों में उसका चेहरा थाम लिया। उसकी आवाज भर्रा रही थी, “मंजरी मेरी जान… एक बार देख मेरी तरफ।”

राध्या की आवाज सुनते ही जैसे मंजरी की टूटी हुई खामोशी फूट पड़ी। वह जोर-जोर से रोने लगी। राध्या ने अपने अंदर उठ रहे तूफान को दबाया और खुद को मजबूत करते हुए उसके आँसू पोंछे।

“चुप… एकदम चुप। मुझ पर भरोसा है ना?”मंजरी ने आँसुओं से भरी आँखों से उसकी तरफ देखा और धीरे से सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ…”

राध्या ने उसके और अपने आँसू पोंछे और उसे समझाते हुए कहा, “चल, अब उठ। खुद को तैयार कर। सबकी हिम्मत बनकर रहना है। परिवार का ध्यान रखना है। मैं हूँ ना… मुझ पर भरोसा रखना। मैं सब ठीक कर दूँगी। तू थोड़ी देर आराम कर, मुझे कुछ जरूरी काम है। वो करने से पहले मैं हॉस्पिटल जा रही हूँ। मुझे खुद जाकर सबकी हालत देखनी है।”

मंजरी तुरंत बोली, “राध्या, मैं भी चलूँगी।”राध्या ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “ठीक है, पहले कपड़े बदल लो।”

तभी राध्या के मोबाइल पर कंपनी से विपुल जी के असिस्टेंट सुद जी का फोन आता है। राध्या ने फोन उठाते हुए कहा, “कहिए सुद अंकल, क्या बात है?”

सुद जी कुछ पल चुप रहे, फिर भारी आवाज में बोले, “बिटिया… मुझे पता है अभी हालात ठीक नहीं हैं, फिर भी मैंने फोन किया है। वो टेंडर… हमारी कंपनी को मिल गया है।”

राध्या कुछ पल चुप रही। जिस टेंडर की खबर कभी पूरे परिवार के लिए खुशी का कारण बन सकती थी, आज उसी खबर को सुनकर उसके अंदर कोई खुशी नहीं हुई।

सुद जी आगे कुछ कहने वाले थे, लेकिन अचानक चुप हो गए।राध्या ने शांत स्वर में कहा, “सुद अंकल, अभी आपको ही सबकुछ देखना होगा। दस-पंद्रह दिन बाद ही हम सबकुछ संभाल पाएँगे। फिलहाल हमारा ध्यान परिवार पर है।”

“जी बिटिया रानी, आप निश्चिंत रहिए। हम सब देख लेंगे। धन्यवाद अंकल… ठीक है, रखती हूँ।”राध्या ने फोन रख दिया।

अभी उसने फोन नीचे रखा ही था कि उसके मोबाइल पर एक और संदेश आया। उसने संदेश खोला और जैसे-जैसे उसे पढ़ती गई, उसके चेहरे के भाव बदलते गए। कुछ ही पल पहले तक उसकी आँखों में चिंता थी, लेकिन अब उनमें गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

संदेश में लिखा था, “दीदी, मुझे कुछ ऐसी जानकारी मिली है जिससे शक युवराज सिंह चौहान पर जा रहा है। आपके परिवार के साथ जो हुआ है, उसके पीछे उसका हाथ हो सकता है। आप सावधान रहिए और बिना पूरी जानकारी के कोई कदम मत उठाइए।”

युवराज का नाम पढ़ते ही राध्या के हाथ कसकर मुट्ठी में बदल गए।उसके सामने एक-एक करके पिछली सारी बातें घूमने लगीं। पार्टी में युवराज की नजरें, उसका राध्या के पीछे पड़ना और उसका वह अजीब व्यवहार… क्या यह सब सिर्फ संयोग था?

क्या उसके परिवार के साथ जो हुआ, उसके पीछे सच में युवराज का हाथ था?
उसका मन एक पल के लिए काँप उठा। वह तुरंत अस्पताल जाना चाहती थी। अपने परिवार के पास रहना चाहती थी। लेकिन अगर सचमुच युवराज इस सबके पीछे था, तो उसे उससे जवाब लेना भी जरूरी था।

राध्या के भीतर दो आवाजें एक साथ चल रही थीं। एक कह रही थी कि अभी अपने परिवार के पास जाओ। दूसरी कह रही थी कि अगर इस हमले के पीछे युवराज है, तो उसे रोकना होगा, वरना खतरा फिर लौट सकता है।

उसने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। आँसू उसकी आँखों में थे, लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।

“नहीं… मैं अपने परिवार को कुछ नहीं होने दूँगी,” उसने खुद से कहा।फिर उसने सोनल की तरफ देखते हुए कहा, “सोना दीदी, आप सब हॉस्पिटल निकलो। मैं बाद में आप सबसे मिलूँगी।”

सोनल ने हैरानी से पूछा, “तू कहाँ जा रही है, जान?”राध्या ने बस इतना कहा, “एक जरूरी काम है। आप लोग हॉस्पिटल जाइए। मैं बाद में वहाँ पहुँचती हूँ।”

इतना कहकर वह तेजी से बाहर निकल गई।कार में बैठते ही उसने एक बार फिर मोबाइल की स्क्रीन देखी। युवराज का नाम उसकी आँखों के सामने था। उसके दिल में डर था, अपने परिवार को खोने का डर… लेकिन उसी डर के साथ एक दृढ़ निश्चय भी था।

अगर उसके परिवार पर हमला करने वाला सच में युवराज था, तो वह उसे यूँ ही नहीं छोड़ने वाली थी।राध्या ने कार स्टार्ट की और सीधे चौहान मेंशन की तरफ निकल गई।

राध्या इस समय गुस्से की ऐसी ज्वाला में दहक रही थी, जैसे उसके भीतर जमा हुआ हर डर और हर बेचैनी आग बनकर उसकी आँखों में उतर आया हो। उसकी आँखें इतनी लाल थीं कि उसे देखते ही किसी के भी कदम ठिठक जाएँ। वह कार चलाते हुए लगातार एक्सीलेटर दबाती जा रही थी। उसके मन में इस समय सिर्फ एक ही नाम था..युवराज सिंह चौहान।

कुछ ही देर में उसकी कार चौहान मेंशन के विशाल गेट के सामने पहुँची। उसने रफ्तार कम करने के बजाय कार को और तेज कर दिया। अगले ही पल गेट जोरदार आवाज के साथ टूटकर एक तरफ जा गिरा और राध्या की कार सीधे अंदर पहुँच गई। उसने कार को हॉल के सामने रोक दिया।

गाड़ी रुकते ही कई गार्ड उसे रोकने के लिए तेजी से उसकी तरफ बढ़े। लेकिन राध्या जिस तरह कार से बाहर निकली, उसे देखकर उनके कदम अपने आप रुक गए। उसकी आँखों में ऐसा गुस्सा था कि किसी में भी उसके सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं हुई। जो गार्ड कुछ क्षण पहले उसे रोकने के लिए आगे बढ़ रहे थे, वे धीरे-धीरे पीछे हटकर रास्ते से एक तरफ हो गए।

राध्या ने किसी की ओर ध्यान तक नहीं दिया। वह तेज कदमों से हॉल के अंदर पहुँची और अपनी पूरी आवाज में पुकार उठी, “युवराज सिंह चौहान…! बाहर आओ!  बेहूदा इंसान ! ”

उसकी आवाज पूरे हॉल में गूँज गई।उसी समय युवराज सिंह चौहान सिगार पीते हुए सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। राध्या की आवाज सुनते ही उसके कदम रुक गए। उसके चेहरे पर पहले हैरानी आई, फिर होंठों पर एक धीमी मुस्कान फैल गई।

तभी एक गार्ड घबराते हुए उसके पास पहुँचा और सिर झुकाकर बोला, “सरकार… सरकार… ये जबरदस्ती मेंशन का गेट तोड़ते हुए अंदर चली आईं। हमने इन्हें रोकने की कोशिश की, मगर…”

युवराज ने हाथ के इशारे से उसे आगे बोलने से रोक दिया, “जाओ।”गार्ड ने सिर झुकाया।
युवराज की नजर अब पूरी तरह राध्या पर थी।

“ये हमारे लिए बहुत खास हैं,” उसने बेहद सहज स्वर में कहा, “और अब कुछ दिन इसी मेंशन में रहेंगी।”उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।आज जो भी इन्होंने किया है… इसे हम इनका वेलकम गिफ्ट मान लेते हैं।

गार्ड वहाँ से चला गया।युवराज धीरे-धीरे राध्या की ओर बढ़ा। उसके चेहरे पर वही बेशर्मी भरा आत्मविश्वास था। वह राध्या के बेहद करीब जाकर रुक गया और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला, “मानना पड़ेगा… कोई मिली है युवराज सिंह चौहान के टक्कर की।”

वह थोड़ा और करीब झुका। फिर अपनी साँस की हल्की फूँक से राध्या के चेहरे पर आ रही बालों की लट को पीछे करने की कोशिश करते हुए धीमे स्वर में बोला, “उफ्फ… क्या नशीली आँखें हैं तुम्हारी।”

राध्या की आँखों में गुस्सा और भड़क उठा। वह उसे घूरने लगी । लेकिन युवराज बिना विचलित हुए अपनी बात कहता रहा।

“दुनिया की सारी खूबसूरती एक तरफ… और आप एक तरफ।”उसके होंठों पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई।
“यकीन मानो, अगर हमें प्यार-मोहब्बत और शादी जैसी बातों पर यकीन होता… तो हम तुमसे ही शादी करते।”

इतना कहते ही वह एक गंदी हँसी हँसने लगा।राध्या चुपचाप उसे देखती रही। उसके भीतर का गुस्सा अब और भड़क चुका था, लेकिन इस बार वह बिना सोचे कुछ करने नहीं आई थी। वह यहाँ एक जवाब लेने आई थी और उसे जवाब चाहिए था।

राध्या ने युवराज को देखा और उसके चेहरे पर एक हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में गुस्सा अब भी साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन आवाज में एक अजीब-सा ठंडा व्यंग्य उतर आया था। उसने युवराज की आँखों में देखते हुए कहा, “और तुझे ऐसा क्यों लगा कि राध्या झा तुमसे शादी करेगी? दुनिया का आखिर इंसान भी तुम होते, तब भी मैं तुझसे शादी नहीं करती। और मोहब्बत! भूल जाओ कि मुझे कभी तुम जैसे इंसान से मोहब्बत की चाहत होगी।”

इतना कहते ही राध्या ने आगे बढ़कर युवराज की गिरेबान पकड़ ली। उसकी आँखों में अब गुस्सा साफ दहक रहा था। उसने उसके कॉलर को कसकर पकड़ते हुए कहा, “अगर तुझे टेंडर चाहिए था, तो एक बार बोल देते। मैं टेंडर नहीं भरती। इतनी घिनौनी हरकत करने की क्या जरूरत थी?”

राध्या ने अपनी मुट्ठी में पकड़ा हुआ एक कागज निकाला और उसके चेहरे पर फेंकते हुए बोली, “ये लो टेंडर के एग्रीमेंट के कागज। मैंने इस पर दस्तखत कर दिए हैं। और तुमने जो बेहूदा हरकत की है ना… उसकी तो कोई माफी नहीं होगी। लेकिन फिर भी मैं इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इसलिए ये टेंडर पकड़ो और मुझे एंटीडोज दे दो।”

युवराज कागज को देखते हुए हँस पड़ा। उसके चेहरे पर वही घमंड भरी मुस्कान थी। उसने अचानक राध्या को अपनी तरफ खींच लिया और उसकी तरफ ऐसी नजरों से देखने लगा, जिनमें सम्मान का नाम तक नहीं था...सिर्फ हवस थी। जिसे राध्या बखूबी महसूस कर रहीं थी।

“आपको ऐसा क्यों लगता है कि हमें टेंडर चाहिए?” उसने बेहद बेशर्मी से कहा। फिर वह उसके और करीब आने लगा। “हमें तो बस आप चाहिए…”

उसकी नजरें राध्या के चेहरे पर ठहर गईं। उसने हाथ बढ़ाकर उसके चेहरे के पास आने की कोशिश की, लेकिन राध्या ने तुरंत उसका हाथ झटक दिया।

“अपनी हद में रहो, युवराज!”

राध्या की आवाज पूरे हॉल में गूँज उठी। उसकी आँखों में अब गुस्से के साथ ऐसी चेतावनी थी, जिसने एक पल के लिए युवराज की मुस्कान भी रोक दी।

लेकिन युवराज फिर हँस पड़ा। उसके लिए राध्या का गुस्सा भी जैसे उसके अहंकार को और बढ़ा रहा था।

राध्या ने उसकी आँखों में देखते हुए दृढ़ स्वर में कहा, “मेरे परिवार को हाथ लगाया है तुमने। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे परिवार को खतरे में डालकर तुम मुझे झुका सकते हो, तो तुमने राध्या झा को समझने में बहुत बड़ी गलती की है।”

उसने युवराज को पीछे धकेला और एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, “मुझे अपने परिवार को बचाने के लिए तुम्हारे सामने खड़ा होना पड़ा है, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि तुम मुझे कमजोर समझो। एंटीडोज दो… वरना तुम्हें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

युवराज कुछ पल उसे देखता रहा। राध्या की आँखों में डर नहीं था। वहाँ सिर्फ अपने परिवार को बचाने का जुनून और युवराज के लिए गहरी नफरत थी।

युवराज कुछ पल तक राध्या को घूरता रहा। उसके चेहरे पर अब हँसी नहीं थी, बल्कि एक अजीब-सी ठंडी गंभीरता उतर आई थी। उसने धीरे से अपनी सिगार का धुआँ हवा में छोड़ा और राध्या के बिल्कुल सामने आकर रुक गया।

“बहुत भरोसा है ना तुम्हें खुद पर?” उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें छिपी धमकी साफ महसूस हो रही थी। “और अपने परिवार पर भी…”

राध्या ने उसकी आँखों में देखते हुए कुछ नहीं कहा।

युवराज हल्का-सा मुस्कुराया। “यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलतफहमी है, राध्या। तुम्हें लगता है कि तुम यहाँ आकर मुझे धमकी दोगी, मेरे सामने शर्त रखोगी और मैं तुम्हारी बात मान लूँगा।”

वह एक पल रुका, फिर बेहद ठंडे स्वर में बोला, “तुम्हारे परिवार के साथ जो हुआ है, वो सिर्फ एक शुरुआत है। अगर मैंने चाहा, तो तुम्हारे घर का एक-एक इंसान तुम्हारी आँखों के सामने तुमसे दूर हो जाएगा… और तुम कुछ नहीं कर पाओगी।”

राध्या की मुट्ठियाँ भींच गईं।

युवराज ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तुम्हें अपने परिवार की चिंता है ना? तो मेरी एक बात याद रखना। मुझसे लड़ने से पहले अपने हर कदम के बारे में सोचना। क्योंकि तुम अकेली नहीं हो जिसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

उसकी आवाज और धीमी हो गई।
“तुम मुझे जितना रोकने की कोशिश करोगी, मैं उतना ही तुम्हारे करीब पहुँचूँगा। और जिस दिन तुम्हें समझ आएगा कि तुमने किससे दुश्मनी ली है… शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।”

युवराज पीछे हटते हुए मुस्कुराया।
“इसलिए मुझे धमकी देने के बजाय सोचो, राध्या… तुम्हें अपने परिवार को बचाना है या मेरे खिलाफ अपनी लड़ाई लड़नी है।”

राध्या उसकी बात सुनती रही। उसके चेहरे पर डर नहीं आया। उल्टा उसकी आँखों में युवराज के लिए गुस्सा और भी गहरा हो गया।
उसने दृढ़ आवाज में कहा, “तुमने मेरे परिवार को छुआ है, युवराज। अब ये सिर्फ तुम्हारी और मेरी लड़ाई नहीं रही।”

वह उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “अब मैं तुम्हें रोककर ही दम लूँगी।”
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युवराज फिर राध्या के बेहद करीब आने लगा। उसके चेहरे पर वही बेशर्म मुस्कान थी। वह उसके चेहरे के पास झुकते हुए बोला, “मुझे तो बस आप चाहिए… आपकी इस खूबसूरती को बस निचोड़ लेना चाहता हूँ।”

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि राध्या ने उसका हाथ झटक दिया। युवराज फिर भी पीछे नहीं हटा और जैसे ही उसने दोबारा उसकी तरफ बढ़ने की कोशिश की, राध्या का धैर्य जवाब दे गया।

उसने पूरी ताकत से उसके पेट पर लात मार दी।

अचानक हुए वार से युवराज पीछे की तरफ लड़खड़ा गया। वह खुद को संभालने की कोशिश कर ही रहा था कि राध्या ने उसका कॉलर पकड़ लिया और उसे जोर से अपनी तरफ खींचकर नीचे धकेल दिया। युवराज का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और वह जमीन पर जा गिरा। राध्या ने गुस्से में उसकी पीठ पर दो-तीन वार किए और फिर एक कदम पीछे हट गई।

कुछ पल तक सिर्फ उसकी तेज साँसों की आवाज सुनाई देती रही।

राध्या की मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें सिर्फ गुस्सा नहीं था—उसमें अपने सम्मान को कुचलने की कोशिश के खिलाफ आग थी।

वह युवराज को घूरते हुए बोली, “तुम्हें क्या लगता है, युवराज? खूबसूरत लड़की होना क्या किसी को ये हक दे देता है कि वह उसकी मर्जी के बिना उसे छू सके?”

युवराज ने उसकी तरफ देखा।

राध्या की आवाज काँप नहीं रही थी। बल्कि हर शब्द पहले से ज्यादा दृढ़ होकर निकल रहा था।

“मेरी खूबसूरती मेरी पहचान नहीं है। मैं कोई ऐसी चीज नहीं हूँ जिसे तुम देखकर पसंद करो और फिर उसे अपना समझने लगो। मेरा शरीर, मेरी जिंदगी, मेरा फैसला—इनमें से किसी पर भी तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।”

वह एक कदम आगे बढ़ी।

“तुम्हारे जैसे मर्दों की सोच पर घिन आती है, जो किसी लड़की को देखते ही उसके इंसान होने की सारी हदें भूल जाते हैं। तुम्हें लगता है कि पैसा है, ताकत है, नाम है… तो तुम किसी की भी जिंदगी अपनी मर्जी से चला सकते हो।”

उसकी आँखों में नफरत साफ थी।

“लेकिन याद रखना, मैं राध्या झा हूँ। मुझे खरीदने की कोशिश मत करना। मुझे डराने की कोशिश मत करना। और मेरे स्वाभिमान को छूने की कोशिश तो बिल्कुल मत करना।”

राध्या ने उसकी तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “अगर तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी धमकियों से टूट जाऊँगी, तो तुमने मुझे पहचाना ही नहीं है। मैं अपने परिवार के लिए झुक सकती हूँ, उनके लिए किसी भी हद तक जा सकती हूँ… लेकिन अपने सम्मान का सौदा कभी नहीं करूँगी।”

उसकी आवाज में अब एक अजीब-सी शांति थी, जो उसके गुस्से से भी ज्यादा खतरनाक लग रही थी।

“और अगर इतना ही गुरूर है तुम्हें खुद पर कि तुम युवराज सिंह चौहान हो, तो सामने से वार करना। पीठ पीछे चाल चलकर किसी को कमजोर समझना तुम्हारी ताकत नहीं, तुम्हारी सोच की कमजोरी है।”

वह हल्का-सा मुस्कुराई।

“युवराज जी… हमें तो अंदाजा भी नहीं था कि दुश्मनों की सूची में एक नाम आपका भी शामिल हो जाएगा। अगर जरा-सा भी इल्म होता, तो आपको पहले ही बता देते कि आपके छल का जवाब देना हमें भी आता है।”

राध्या ने अपना चेहरा उसके करीब ले जाकर धीमे, मगर बेहद दृढ़ स्वर में कहा, “लेकिन अब जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता। इसलिए नाटक बंद कीजिए और सीधे मुद्दे पर आइए… आपको आखिर चाहिए क्या हमसे?”

उसकी आँखों में अब डर का एक कतरा भी नहीं था। वहाँ सिर्फ अपने परिवार को बचाने का संकल्प और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने का अडिग फैसला था।

युवराज अब तक वहीं खड़ा होकर राध्या की सारी बातें सुन रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे उसके सामने खड़ी लड़की का गुस्सा उसे जरा भी विचलित नहीं कर रहा हो। कुछ पल बाद वह धीरे-धीरे उसके पास आया और उसे ऊपर से नीचे तक देखने लगा