धड़कन तू है मेरी Chapter-4
- 2 November, 2026
राध्या ने अपनी बात खत्म करते हुए दोनों हाथ जोड़कर हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, “आपसे मिलकर अच्छा लगा।” फिर शालीनता से “Excuse me” कहते हुए वह वहाँ से दूसरी ओर चली गई।
युवराज कुछ पल तक उसे जाते हुए देखता रहा। उसके चेहरे पर मुस्कान अब भी कायम थी, मगर राध्या के बेझिझक अंदाज ने उसके मन में एक हल्की-सी जिज्ञासा जरूर छोड़ दी थी। आमतौर पर लोग उससे इस तरह साफ शब्दों में बात करने से पहले कई बार सोचते थे, जबकि यह लड़की बिना किसी झिझक के उसे इंकार करके चली गई थी। युवराज ने बस एक हल्की-सी साँस छोड़ी और अपनी नजरें दूसरी ओर फेर लीं।
उधर राध्या की नजर विवेक पर पड़ी। वह मंजरी के साथ खड़ा था। राध्या चुपके से उसके पीछे पहुँची और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, “भाई... डांस?”
विवेक ने पीछे मुड़कर देखा तो उसके चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई। “जरूर, मेरी जान।” उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और राध्या ने बिना किसी संकोच के उसका हाथ थाम लिया। दोनों भाई-बहन हँसते हुए डांस फ्लोर के बीच आ गए।
संगीत की धुन बदल चुकी थी। पहले चल रही धीमी धुन की जगह अब एक हल्की-सी वेस्टर्न बीट ने ले ली थी। गीत के बोल अब माहौल पर हावी नहीं थे, बल्कि संगीत की लय ही पूरे हॉल को अपने साथ बहा रही थी।
राध्या ने जैसे ही पहला कदम उठाया, उसके चेहरे पर खिली मुस्कान देखकर साफ समझ आ रहा था कि वह डांस को केवल जानती नहीं थी, बल्कि उसे जीती थी।
विवेक ने एक स्टेप लिया और राध्या ने उसी लय में उसका साथ दिया। कभी दोनों आमने-सामने आकर कदम मिलाते, तो कभी विवेक उसे हल्के से घुमाकर वापस अपनी ओर ले आता।
राध्या की काली साड़ी का पल्लू हर घूमने के साथ हवा में लहराता और उसके लंबे बाल उसके चेहरे को छूकर पीछे चले जाते। उसके कदमों में इतनी सहजता थी कि एक पल के लिए ऐसा लगता, जैसे संगीत उसके इशारे पर चल रहा हो।
विवेक ने जानबूझकर एक मुश्किल स्टेप लिया, शायद अपनी बहन को चुनौती देने के लिए। राध्या ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए वही स्टेप उससे भी ज्यादा खूबसूरती से दोहरा दिया। विवेक का मुँह खुला का खुला रह गया।
“अच्छा! तो आज अपनी सारी कला दिखाने का इरादा है?” उसने हँसते हुए कहा।
राध्या ने घूमते हुए जवाब दिया, “आपने ही तो डांस के लिए बुलाया था भाई, अब शिकायत क्यों कर रहे हैं?”
विवेक हँस पड़ा और अगले ही पल दोनों फिर से उसी लय में आ गए।
उनका तालमेल देखकर आसपास मौजूद लोग धीरे-धीरे डांस फ्लोर से हटकर किनारे खड़े होने लगे। अब किसी को इस बात की जल्दी नहीं थी कि संगीत पर कौन डांस कर रहा है। सबकी नजरें राध्या और विवेक पर थीं।
परिवार के लोग भी मुस्कुराते हुए उन्हें देख रहे थे। मधु की आँखों में अपनी बेटी को देखकर गर्व था और विधि तो हर दूसरे पल अपनी भतीजी की बलाएँ लेने को तैयार बैठी थी।
राध्या उस समय पूरी तरह अपने परिवार में खोई हुई थी। कुछ देर पहले जिस अनजान पुरुष के सामने उसने अपनी बात इतनी स्पष्टता से रखी थी, उसके बारे में वह जैसे पूरी तरह भूल चुकी थी। अपने भाई के साथ हँसते हुए डांस करती राध्या का यह रूप उन लोगों के लिए बिल्कुल सामान्य था, जो उसे वर्षों से जानते थे।
लेकिन युवराज के लिए नहीं।वह थोड़ी दूरी पर खड़ा चुपचाप उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी आत्ममुग्ध मुस्कान नहीं थी। उसकी आँखों में बस एक शांत-सी उत्सुकता थी।
अभी कुछ देर पहले उसे लगा था कि राध्या शायद बाकी लड़कियों की तरह उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाएगी, लेकिन उसने जिस सहजता से उसे मना किया और फिर अपने भाई के साथ जिस तरह खुलकर हँसती हुई डांस करने लगी, उससे युवराज को एहसास हुआ कि शायद उसने उसे पहली नजर में जितना समझा था, वह उससे कहीं अलग थी।
उसकी नजर राध्या से हटकर एक पल के लिए विवेक पर गई। दोनों के बीच का अपनापन साफ दिखाई दे रहा था। युवराज ने कुछ सोचते हुए हल्का-सा सिर झुकाया और फिर वापस राध्या की ओर देखने लगा।
“मिस राध्या झा...” उसके मन में अनायास ही उसका नाम दोहराया गया। होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आई। “आप जितनी सीधी दिखाई देती हैं... शायद कहानी उतनी सीधी है नहीं।”
उसने इसके आगे कुछ सोचने की कोशिश नहीं की। फिलहाल वह सिर्फ उसे देख रहा था। एक ऐसी लड़की को, जिसने पहली मुलाकात में ही उसकी उत्सुकता को बाकी तमाम लोगों से अलग तरीके से जगा दिया था।
उधर संगीत अपनी आखिरी धुनों पर पहुँच रहा था। राध्या ने एक आखिरी घूमता हुआ स्टेप लिया और विवेक ने उसके साथ ताल मिलाते हुए डांस खत्म किया। दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसे और राध्या ने हाँफते हुए अपने भाई से कहा, “बस भाई, अब और नहीं। सच में मेरी साँस फूल गई।”
विवेक ने हँसकर कहा, “अभी तो तूने आधी पार्टी सिर पर उठा ली है, मेरी जान।”“तो आप संभालिए अपनी बहन की पार्टी,” राध्या ने मुस्कुराकर कहा और उसके हाथ पर हल्की-सी थपकी दे दी।विवेक फिर हँस पड़ा।
युवराज की नजर अब भी डांस फ्लोर की तरफ थी, जहाँ कुछ देर पहले राध्या अपने भाई विवेक के साथ डांस कर रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जिसमें आकर्षण से कहीं ज्यादा एक खतरनाक जिद छिपी हुई थी। राध्या ने जिस तरह बिना झिझक उसके सामने उसके प्रस्ताव को ठुकराया था, वह बात उसके अहं को भीतर तक चुभ गई थी।
वह धीमे से खुद ही बुदबुदाया, “Not bad, beautiful girl... बहुत तेज हो तुम। तुम्हारे आत्मविश्वास के तो अलग ही तेवर हैं।”
उसके होंठों पर एक टेढ़ी मुस्कान फैल गई।“उफ़्फ़... बिना चाकू के ही दिल पर वार कर देती हो। बिना खून किए ही किसी की रूह निकाल लेने का माद्दा रखती हो तुम।” उसकी नजरों में अब वह सभ्यता नहीं थी, जो कुछ देर पहले उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। “I love your way you talk... तुम्हारा attitude... तुम्हारा figure... तुम्हारा face...”
वह कुछ पल चुप रहा और फिर धीमे से हँसा।“बस अब तुम्हें चखना है मुझे।”उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक उतर आई।मेरी नजरों को जो एक बार पसंद आ जाए... वो सिर्फ युवराज सिंह चौहान की होती है।
उसने राध्या का नाम जैसे अपने अधिकार से दोहराया “और तुम... राध्या... राध्या झा...” वह कुर्सी पर पीछे टिकते हुए बुदबुदाया, “तुम तो मेरे दिल, दिमाग और साँसों में चढ़ चुकी हो।”
उसकी मुस्कान और गहरी होती चली गई।बहुत जल्द तुम्हारे साथ डांस भी करूँगा... और फिर तुम्हारे जिस्म की हर खूबसूरती को करीब से देखूँगा... महसूस करूँगा।
कुछ क्षण वह खामोश रहा, जैसे अपने ही विचारों में डूबा हो। फिर उसके चेहरे पर एक बेहद घिनौनी हँसी फैल गई।तुम्हें अभी अंदाजा भी नहीं है, राध्या... तुमने किसकी नजरों में खुद को ला खड़ा किया है।
वह धीरे-धीरे हँसने लगा। उसकी उस हँसी में कोई प्रेम नहीं था...सिर्फ जुनून, अहंकार और किसी चीज को अपना अधिकार समझ लेने की क्रूर चाहत थी।
इतना सोचकर उसने अपने असिस्टेंट को इशारे से अपने पास बुलाया। असिस्टेंट तुरंत उसके सामने आकर खड़ा हो गया। युवराज ने बिना किसी भूमिका के कहा, “मुझे V. J. Construction की पूरी जानकारी चाहिए।
कंपनी की हिस्ट्री, उसके सारे बड़े प्रोजेक्ट्स, बिजनेस पार्टनर्स, मौजूदा डील्स और परिवार से जुड़ी हर जरूरी जानकारी। कल तक सब कुछ मेरी टेबल पर होना चाहिए।”
असिस्टेंट ने तुरंत कहा, “जी सर।”
युवराज ने उसकी तरफ देखते हुए आखिरी बात जोड़ी, “और झा परिवार के हर सदस्य की अलग-अलग प्रोफाइल चाहिए। खासकर... उस घर की बड़ी बेटी, राध्या झा की। उसकी पढ़ाई, काम, पुराने रिकॉर्ड, परिवार, उससे जुड़ी हर जानकारी। कुछ भी छूटना नहीं चाहिए।”
“जी सर, कल तक सारी डिटेल्स आपके पास होंगी,” असिस्टेंट ने कहा और तुरंत वहाँ से निकल गया।
युवराज कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसकी नजर आखिरी बार डांस फ्लोर की तरफ गई, जहाँ राध्या अब अपने परिवार के बीच खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही सहज मुस्कान थी, जैसे उसे इस बात का जरा भी अंदाजा न हो कि कुछ ही देर की मुलाकात ने किसी के भीतर इतनी जिज्ञासा पैदा कर दी है।
युवराज ने अपनी जैकेट ठीक की, होंठों पर हल्की मुस्कान आई और वह पार्टी हॉल से बाहर निकल गया। लेकिन उसके कदम भले ही वहाँ से दूर जा रहे थे, उसके दिमाग में बार-बार सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा था....राध्या झा।
🌿लब्जो कम्प्लीट 🌿🌹
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राध्या और विवेक का डांस खत्म होते ही आसपास मौजूद लोगों की तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी। कई लोग उनके डांस की तारीफ करते हुए कहने लगे कि दोनों का तालमेल कमाल का था, खासकर राध्या के स्टेप्स ने तो सभी का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था। राध्या और विवेक मुस्कुराते हुए सबको धन्यवाद कह रहे थे।
तभी रिया खुशी से लगभग दौड़ती हुई राध्या के पास पहुँची और उसे जोर से गले लगाते हुए बोली, “दियुजान... तुम क्या चीज हो यार! उउउम्म्मुआआआ...!” कहते हुए उसने राध्या के गाल पर कई सारी किस कर दीं। “मजा आ गया तुम्हारा डांस देखकर। सच में, तुमने तो कमाल कर दिया!”
रिया की बात पर बाकी सभी भी हँसते हुए उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे। राध्या मुस्कुराकर अपनी छोटी बहन को देख ही रही थी कि तभी विवेक ने बनावटी नाराजगी के साथ कहा, “अरे! मैं भी था डांस में। मेरी तरफ तो कोई देख ही नहीं रहा। मुझे तो कोई वाह-वाह नहीं कर रहा है।”
रिया ने तुरंत उसकी तरफ देखकर मासूमियत से कहा, “भाई, आप तो रहने ही दो। हमने देखा था आपको। आप तो बस दियु के साथ इधर-उधर घूम रहे थे।”
रिया की बात सुनते ही सबकी हँसी छूट गई। विवेक ने उसे घूरकर देखा और बोला, “चुहिया! तेरी इस महीने की पॉकेट मनी कैंसिल।”
रिया का चेहरा तुरंत उतर गया। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ते हुए कहा, “अरे नहीं भाई! मैं तो बस मजाक कर रही थी।” फिर अपनी पूरी बत्तीस दाँतों वाली मुस्कान दिखाते हुए बोली, “प्लीज भाई... आप तो बेस्ट डांसर हो। आपसे अच्छा डांस तो पूरी पार्टी में किसी ने किया ही नहीं।”
विवेक के चेहरे पर आखिरकार मुस्कान आ गई। उसने सिर हिलाते हुए कहा, “हम्म... अब आई न लाइन पर।”
लेकिन रिया कहाँ चुप रहने वाली थी। थोड़ी ही देर में उसकी शरारती बुद्धि फिर जाग उठी। वह बड़े विश्वास से बोली, “भाई, मैं तो कहती हूँ आपको डांस इंडिया डांस में पार्टिसिपेट करना चाहिए। देखना, ट्रॉफी भी आप ही लेकर आएँगे।”
यह कहते हुए वह अपनी चमकती बत्तीसियाँ दिखाकर हँसने लगी।विवेक ने बिना एक पल गंवाए उसका कान पकड़कर हल्का-सा मरोड़ दिया।तूने कुछ ज्यादा लंबा नहीं बोल दिया?
“आअह्ह्ह्ह... भाई! छोड़ो!” रिया अपना कान छुड़ाने की कोशिश करते हुए चीखी। फिर तुरंत अपने माता-पिता की तरफ देखकर बोली, “बड़ी माँ! पापा! देखो ना... भैया मुझे परेशान कर रहे हैं।”विवेक ने उसका कान छोड़ते हुए कहा, “बहुत बोलती है तू।”
विपुल और विशाल दोनों अब तक हँसते हुए भाई-बहन की यह नोकझोंक देख रहे थे। आखिरकार विपुल ने मुस्कुराकर कहा, “बस करो विवेक। कौन कहेगा कि तुम इतनी बड़ी कंपनी के सीईओ हो? बच्चों की तरह रिया से लड़ रहे हो।”
विशाल जी भी हँसते हुए बोले, “सच में, कंपनी संभालने वाला आदमी अपनी छोटी बहन से हार रहा है।”
रिया ने मौका मिलते ही विवेक से दूरी बनाई और दौड़कर विपुल और विशाल के बीच पहुँच गई। दोनों के गले लगते हुए वह खुशी से बोली, “थैंक यू... बड़े पापा! थैंक यू, डैड!”
उसकी मासूम खुशी देखकर आसपास खड़े परिवार के सभी लोग मुस्कुरा उठे। कुछ ही पलों पहले जहाँ पार्टी में राध्या के डांस की चर्चा हो रही थी, वहीं अब झा परिवार की यह प्यारी-सी नोकझोंक पूरे माहौल को अपनी तरफ खींच चुकी थी।
सभी लोग अब भी विवेक की हालत देखकर हँस रहे थे। रिया अपनी शरारत पर खुश होकर मुस्कुरा रही थी, जबकि विवेक उसे घूरते हुए भी अपनी हँसी रोक नहीं पा रहा था। कुछ देर पहले तक जो माहौल एक औपचारिक बिजनेस पार्टी का था, वह अब झा परिवार की हँसी-मजाक से बिल्कुल घरेलू हो चुका था।
कुछ देर बाद विपुल जी ने घड़ी की तरफ देखा और गंभीर स्वर में कहा, “चलो, अब घर निकलते हैं। काफी देर हो गई है।”फिर उन्होंने विवेक की तरफ देखते हुए कहा, “विवेक, तुम मंजरी को उसके घर छोड़ देना। इधर हम सभी निकलते हैं।”
“जी, बड़े पापा,” विवेक ने सिर हिलाते हुए कहा।
विपुल जी ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में बोले, “मंजरी को छोड़कर सीधे घर आना। उसके बाद तुम और विशाल मेरे स्टडी रूम में मिलना। विशाल जी ने उनकी तरफ देखा। विपुल जी के चेहरे की गंभीरता देखकर उनके माथे पर हल्की-सी चिंता की लकीर उभर आई।
विपुल जी ने एक पल रुककर जैसे कुछ सोचते हुए कहा, “और हाँ... राध्या को इस बारे में कुछ मत बताना।”विवेक ने थोड़ा हैरान होकर उनकी तरफ देखा, लेकिन उनके चेहरे पर सवाल करने की हिम्मत नहीं हुई। उसने बस सिर हिलाते हुए कहा, “जी, बड़े पापा।”
“अब जाओ,” विपुल जी ने संक्षेप में कहा।विवेक मंजरी के साथ बाहर की ओर बढ़ गया। उधर घर की महिलाएँ अनील के साथ पहले ही बाहर निकलने लगी थीं।
कुछ ही पलों बाद विशाल जी वापस विपुल जी के पास आए और उनके कंधे पर हाथ रखते हुए चिंतित स्वर में बोले, “बड़े भैया, बात क्या है? आप अचानक इतने परेशान क्यों लग रहे हैं? अभी तक तो सब ठीक था।”
उनके पीछे शशिकांत जी भी आ गए। उन्होंने भी विपुल जी के चेहरे को गौर से देखा और कहा, “हाँ भाईसाहब, हम भी यही सोच रहे हैं। पार्टी खत्म होते ही आपने अचानक हम दोनों को स्टडी रूम में बुलाया... आखिर ऐसी क्या बात हो गई? और अगर बात इतनी गंभीर है, तो राध्या को क्यों नहीं बुलाया?”
विपुल जी कुछ क्षण तक दोनों भाइयों को देखते रहे। उनके चेहरे पर ऐसी गंभीरता थी, जो उनके परिचित लोगों ने भी बहुत कम देखी थी।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और धीमे स्वर में कहा, “अभी यहाँ खड़े होकर बात करना ठीक नहीं होगा। तुम दोनों मेरे साथ घर चलो... वहाँ बैठकर बात करेंगे।”
“लेकिन बड़े भैया” विशाल जी ने कुछ पूछना चाहा।विपुल जी ने उन्हें रोकते हुए बस इतना कहा, “घर चलो, विशाल।”उनकी आवाज में ऐसा कुछ था कि विशाल और शशिकांत दोनों खामोश हो गए।
तीनों धीरे-धीरे पार्टी हॉल से बाहर निकल गए।किसी को अंदाजा नहीं था कि उस रात झा परिवार के स्टडी रूम में होने वाली वह बातचीत आने वाले दिनों में उनकी जिंदगी की दिशा बदलने वाली थी।
विवेक जब मंजरी को लेकर उसके फ्लैट के सामने पहुँचा, तब तक दोनों के बीच पूरे रास्ते एक मीठी-सी खामोशी पसरी रही थी। कभी दोनों की नजरें मिल जातीं, कभी बिना कुछ कहे ही दोनों मुस्कुरा देते। जैसे शब्दों की जरूरत ही नहीं थी; उनके बीच मौजूद रिश्ता उस खामोशी में भी अपनी पूरी कहानी कह रहा था।
गाड़ी रुकते ही मंजरी ने उसकी तरफ देखा और धीमे से कहा, “अब मैं चलूँ?”
विवेक ने उसकी तरफ देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया। “हम्म...”
मंजरी गाड़ी से उतरने के लिए मुड़ी ही थी कि विवेक ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया। वह पलटकर उसकी तरफ देखने लगी। विवेक ने उसे अपनी ओर खींच लिया और अगले ही पल दोनों के बीच की दूरी खत्म हो गई।
उसके होंठ मंजरी के होंठों से जा मिले। कुछ क्षणों के लिए दोनों जैसे आसपास की दुनिया भूल गए। उस छोटे-से पल में वर्षों से छिपी उनकी मोहब्बत, इंतजार और एक-दूसरे को खो देने का डर सब कुछ जैसे सिमट आया था।
कुछ देर बाद जब दोनों अलग हुए तो उनकी साँसें कुछ तेज थीं। मंजरी ने झिझकते हुए अपनी नजरें झुका लीं, जबकि विवेक उसे अपनी बाँहों में थामे मुस्कुरा रहा था।
“मंजरी...” उसने बेहद धीमे स्वर में पुकारा।
“हम्म...” मंजरी ने उसी तरह उसकी बाँहों में सिमटे हुए जवाब दिया।
विवेक ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा, “मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, जान। तुम जानती हो, राध्या को हमारे बारे में सब मालूम है। अब मैं घर में सबके सामने तुम्हारे बारे में बात करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम सिर्फ मेरी मोहब्बत बनकर नहीं, बल्कि हमेशा के लिए मेरी जिंदगी का हिस्सा बनकर मेरे साथ रहो।”
वह एक पल के लिए रुका, फिर उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, “मुझसे शादी करोगी?”
मंजरी की आँखों में नमी उतर आई। उसने बिना कुछ सोचे खुद को विवेक की बाँहों में और समेट लिया।
“मैं इंतजार करूँगी,” उसने धीमे से कहा, “उस दिन का... जब आप मुझे हमेशा के लिए अपना बना लेंगे।”विवेक के चेहरे पर ऐसी खुशी आई, जिसे वह छिपा ही नहीं पाया। उसने उसे अपने करीब करते हुए कहा, “ओह... आज मैं बहुत खुश हूँ, मंजरी। I love you, मेरी जिंदगी।”
मंजरी मुस्कुराई। “I love you too, विवेक जी।”
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। फिर विवेक ने उसके माथे पर प्यार से चुंबन दिया और उसे धीरे से अपने से अलग किया।“अब जाओ,” उसने मुस्कुराकर कहा, “नहीं तो मैं तुम्हें जाने ही नहीं दूँगा।” मंजरी हँस पड़ी। “आप भी ना... अपना ध्यान रखिएगा।”
“तुम भी।”
“बाय...”
“बाय, जान।”
मंजरी फ्लैट के दरवाजे तक पहुँची, फिर एक बार पीछे मुड़कर विवेक को देखा। विवेक अब भी उसी जगह खड़ा उसे देख रहा था। दोनों की नजरें मिलीं और एक आखिरी मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ।
मंजरी को अंदर जाते देख विवेक ने आखिरकार अपनी गाड़ी स्टार्ट की और घर की ओर निकल पड़ा। उसके चेहरे पर अब भी वही मुस्कान थी। क्योंकि आज पहली बार उसे लगा था कि उसकी मोहब्बत अब सिर्फ उसका सपना नहीं रही, बल्कि जल्द ही उसके परिवार के सामने उसका अपना सच बनने वाली है।
🌿🌿🌿लब्जो कम्प्लीट + stuck 🌿🌿
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शांति मेंशन के स्टडी रूम में इस वक्त माहौल कुछ अलग ही था। कमरे में विपुल जी, विशाल जी और अनील जी बैठे हुए विवेक का इंतजार कर रहे थे। तीनों के चेहरों पर गंभीरता थी और बीच-बीच में घड़ी की तरफ जाती नजरें साफ बता रही थीं कि उन्हें विवेक के आने का बेसब्री से इंतजार था।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला और विवेक अंदर आया।उसे देखते ही विशाल जी की त्यौरियाँ चढ़ गईं।“इतनी देर कहाँ हो गई थी? कब से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।”
विवेक ने तुरंत सिर झुका दिया। “सॉरी, डैड... वो मैं...”विशाल, शांत हो जाओ,” विपुल जी ने बीच में ही रोकते हुए कहा। “कोई बात नहीं। शायद ट्रैफिक हो गया होगा... क्यों, बरखुरदार?”
“जी... जी, बड़े पापा,” विवेक ने जल्दी से जवाब दिया।
वह अभी ठीक से बैठ भी नहीं पाया था कि विपुल जी उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखकर धीमे से बोले, “हम्म... तो कब बता रहे हो सबको मंजरी के बारे में?”विवेक जैसे वहीं जम गया।उसकी आँखें फैल गईं। “वो... नहीं... ऐसा... कुछ...!”
विपुल जी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उन्होंने उसके कंधे पर प्यार से थपथपाया और उसके कान के पास झुककर बोले, “कोई बात नहीं। ऐसा होता है। लेकिन जल्द से जल्द सबको बता देना। अभी तो तुम्हारे बाप से तुम्हें बचा लिया है... देर हुई तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊँगा।”
विवेक कुछ पल उन्हें देखता रहा, फिर शर्मीली-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।जी, बड़े पापा।”विपुल जी वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गए। फिर अचानक उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह गंभीरता ने ले ली।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “चलिए... जिस बात के लिए हम सब यहाँ आए हैं, उस पर बात कर लेते हैं।”
कमरे में एकाएक खामोशी छा गई।विशाल जी और अनील जी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। विवेक भी अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था।विपुल जी ने कुछ क्षण सबको देखा, फिर बोले, “विवेक।”
“जी, बड़े पापा।”तुम युवराज सिंह चौहान के बारे में जितनी जल्दी हो सके, पूरी जानकारी पता लगाओ। विवेक की भौंहें सिकुड़ गईं। “युवराज सिंह चौहान?”
“हाँ,” विपुल जी ने गंभीर स्वर में कहा। “आज पार्टी में मैंने उस आदमी को देखा। पता नहीं क्यों, लेकिन उसे देखते ही मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी हुई। कोई अच्छी फीलिंग नहीं आई।”
उन्होंने कुछ पल रुककर कहा, “कुछ तो है उस आदमी में... जो मुझे ठीक नहीं लगा।”
विशाल जी ने उनकी बात सुनकर कहा, “लेकिन भाईसाहब, ऐसा क्यों लग रहा है आपको? हो सकता है जैसे बाकी लोग उस टेंडर के सिलसिले में पार्टी में आए थे, वैसे ही वह भी आया हो।”
अनील जी ने भी सहमति में सिर हिलाया। “हाँ, जरूरी नहीं कि हर अजनबी के पीछे कोई वजह हो।”विवेक अब तक चुपचाप अपने बड़े पापा को देख रहा था। फिर उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “अगर बड़े पापा को ऐसा लग रहा है, तो जरूर कोई बात होगी।”
विशाल जी ने उसकी तरफ देखा।विवेक ने आगे कहा, “आज तक बड़े पापा ने किसी इंसान को पहचानने में धोखा नहीं खाया है। उनका अनुभव हम सबसे ज्यादा है। अगर उन्हें युवराज को लेकर कुछ गलत महसूस हुआ है, तो मैं उसकी तह तक जरूर जाऊँगा।”
विपुल जी ने उसकी तरफ देखा और धीमे से सिर हिला दिया।।मुझे भी यही चाहिए, विवेक। पता करो कि युवराज सिंह चौहान आखिर है कौन... उसका कारोबार क्या है, उसके रिश्ते कहाँ-कहाँ हैं और वह इस टेंडर के लिए यहाँ क्यों आया है।”
विवेक ने गंभीरता से कहा, “जी, बड़े पापा। कल नहीं... मैं आज से ही पता लगाना शुरू करता हूँ।”
कमरे में फिर खामोशी छा गई।किसी को नहीं मालूम था कि उसी वक्त, उसी शहर में एक दूसरा आदमी भी झा परिवार के बारे में जानकारी जुटाने का फैसला कर चुका था।और दोनों तरफ से शुरू हुई यह तलाश बहुत जल्द एक-दूसरे से टकराने वाली थी।
विपुल जी कुछ क्षणों तक चुप रहे। उनके चेहरे पर अब पहले जैसी सामान्य गंभीरता नहीं थी। बेटी की बात आते ही उनकी आँखों में एक पिता की चिंता साफ उतर आई थी। उन्होंने धीमे लेकिन बेहद दृढ़ स्वर में कहा, “राध्या का ध्यान रखना… खासकर तुम, विवेक। और इस टेंडर में उसे इन्वॉल्व मत करना। चाहे टेंडर मिले या न मिले, इस बार मैं नहीं चाहता कि राध्या इसमें शामिल हो।”
उनकी बात सुनते ही कमरे में मौजूद सभी लोग हैरानी से उनकी ओर देखने लगे। राध्या को किसी बिज़नेस डील से दूर रखने की बात विपुल जी ने पहले कभी नहीं कही थी। आखिर राध्या उनके लिए सिर्फ परिवार की एक सदस्य नहीं थी, बल्कि उनकी सबसे प्यारी बच्ची थी, जिस पर उन्हें जितना भरोसा था, उतनी ही उसकी सुरक्षा को लेकर चिंता भी रहती थी।
विशाल जी ने हैरानी से पूछा, “भैया, युवराज सिंह की बात तो समझ में आती है, लेकिन राध्या के लिए ऐसा क्यों? आप भी जानते हैं, वो इस टेंडर में हमारे ना चाहने के बावजूद शामिल होगी ही। और यकीनन टेंडर भी हमें मिल जाएगा। फिर आप उसे इससे दूर रखने की बात क्यों कर रहे हैं?”
विवेक ने भी बड़े पापा की ओर देखते हुए कहा, “हाँ, बड़े पापा… राध्या को इस तरह अलग करने की बात समझ नहीं आ रही। ऐसा क्या हुआ है, जो आप इस तरह की बातें कर रहे हैं? वैसे तो ‘जान’ को आप खुद हर बिज़नेस में शामिल करते हैं। फिर अचानक उसे इस टेंडर से दूर करने की बात क्यों?”
सबकी तरफ से बार-बार वही सवाल सुनकर विपुल जी का संयम टूट गया।तुम सबने नहीं देखा… मैंने देखा है।उनकी आवाज़ में इस बार गुस्से से ज्यादा अपनी बेटी को लेकर चिंता थी।
उन्होंने कुछ पल के लिए आँखें बंद कीं, जैसे पार्टी का वह दृश्य फिर से उनकी आँखों के सामने आ गया हो। फिर बोले, “युवराज सिंह को मैंने जिस तरह राध्या को देखते हुए देखा है, उसे मैं भूल नहीं पा रहा हूँ। तुम लोगों ने शायद उसकी नजरों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एक पिता होने के नाते मेरी नजर अपनी बेटी पर थी… और उसके आसपास मौजूद हर उस इंसान पर भी, जिसकी नजर मेरी बच्ची पर थी।”
कमरे में बैठे सभी लोग शांत हो गए।उसकी आँखों में राध्या के लिए जो बेहिसाब सनक थी… जो बदनीयती थी, वो मुझे साफ दिखाई दे रही थी। पूरी पार्टी में उसकी नजर बार-बार सिर्फ राध्या पर जा रही थी। और फिर वो सीधे उसके पास गया और उसे डांस करने के लिए कहने लगा।”
विपुल जी की आवाज़ भारी हो गई।मैं ही नहीं, राध्या ने भी उसकी हरकत को समझ लिया था। उसने कितनी समझदारी से उसे इनकार किया और फिर तुम्हारे साथ डांस करने चली गई। उस वक्त उसने खुद को संभाल लिया, लेकिन एक पिता के तौर पर मैं उस आदमी की नजरों को कैसे नजरअंदाज कर दूँ?”
उन्होंने विवेक की ओर देखा।मैं पिता हूँ उसका, विवेक। भले ही उस पार्टी में मैं हर पल उसके पास नहीं था, लेकिन मेरी नजर हमेशा मेरी बच्ची पर रहती है। वो खुश है या परेशान… उसके आसपास कौन है… कौन उसे किस नजर से देख रहा है… शायद वो खुद न देख पाए, लेकिन एक पिता की नजर इन चीजों को महसूस कर लेती है।”
विपुल जी कुछ पल के लिए रुक गए। उनकी आँखों में अपनी बेटी को लेकर वही चिंता थी, जिसे वे शब्दों में पूरी तरह बयान नहीं कर पा रहे थे।
फिर उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, “मुझे नहीं पता युवराज सिंह के मन में क्या है, लेकिन उसकी नीयत मुझे ठीक नहीं लगी। और मैं अपनी बेटी की सुरक्षा के मामले में कोई लापरवाही नहीं कर सकता। इसलिए कह रहा हूँ।
राध्या को इस टेंडर से दूर रखना। चाहे टेंडर हमें मिले या नहीं… लेकिन अपनी बच्ची को किसी परेशानी में डालकर मुझे वो टेंडर नहीं चाहिए।”
“लेकिन बड़े पापा… जान ने ये बात मुझे क्यों नहीं बताई?”विवेक की आवाज में अब चिंता साफ झलक रही थी।
“तुम्हें मालूम है ना, वो सबकी परेशानियों का समाधान करती है, लेकिन अपनी परेशानी की भनक तक किसी को नहीं लगने देती। अब तक उसने जो भी किया है, अपनी सूझ-बूझ और समझदारी से किया है। और इस बार भी शायद उसके मन में यही चल रहा होगा कि ‘मैं सब संभाल लूँगी।’”
विवेक कुछ पल के लिए रुका, फिर विपुल जी की तरफ देखते हुए बोला,
“लेकिन बड़े पापा, आप उसके पिता हैं। आपको उसकी चिंता होना बिल्कुल स्वाभाविक है।”
विपुल जी ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उनके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं, बल्कि अपनी बेटी को लेकर एक गहरी चिंता थी।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,“बेटियाँ जब बड़ी हो जाती हैं, तो अक्सर अपनी माँ के ज्यादा करीब हो जाती हैं। जब छोटी होती हैं, तो अपने पिता से हर छोटी-बड़ी बात कह देती हैं। लेकिन बेटी के बड़ी हो जाने का ये मतलब बिल्कुल नहीं होता कि उसके पिता का ध्यान उस पर कम हो जाता है।”
उन्होंने एक पल रुककर सबकी ओर देखा।
“एक पिता अपनी जवान बेटी पर हर वक्त अपनी नजर नहीं रख सकता… और न ही उसे हर पल ये एहसास दिला सकता है कि वो उसकी निगरानी कर रहा है। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि उसे अपनी बेटी की चिंता नहीं होती।
फर्क सिर्फ इतना होता है कि बेटी पर किसकी नजर है… कौन उसे किस नजर से देख रहा है… इस पर एक पिता की नजर हमेशा रहती है।”
विपुल जी की आवाज में अब पिता होने का दर्द और चिंता दोनों साफ सुनाई दे रहे थे।मैं भी बेटियों का पिता हूँ। मुझे भी अपनी बच्चियों की बहुत फिक्र होती है। मैं उसे दिखाऊँ या न दिखाऊँ… मेरी नजर अपनी बेटियों पर हमेशा रहती है। और उन्हीं नजरों के बीच आज मुझे युवराज सिंह की नजर भी दिखाई दी।”
उन्होंने गंभीर होकर कहा,“उसकी नजर मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई। एक पिता होने के नाते मैं इतना तो समझ सकता हूँ कि कोई आदमी मेरी बेटी को किस नजर से देख रहा है।”
विपुल जी के आखिरी शब्दों के साथ कमरे का माहौल और भी गंभीर हो गया।सभी विपुल जी की बातें ध्यान से सुन भी रहे थे और समझ भी रहे थे। उनके चेहरे पर अब पहले वाली उलझन नहीं थी। हर किसी को एहसास हो चुका था कि विपुल जी की चिंता सिर्फ युवराज सिंह तक सीमित नहीं थी, बल्कि राध्या की सुरक्षा को लेकर थी।
कुछ देर बाद अनील जी और विशाल जी ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर अनील जी ने विपुल जी से पूछा, “फिर भाईसाहब, आगे क्या सोचा है?”
विपुल जी ने बिना देर किए कहा, “सबसे पहले राध्या और रिया को कुणाल के पास भेजने की तैयारी करो। उसके बाद सोचेंगे कि आगे क्या करना है।”
विशाल जी ने तुरंत उनकी ओर देखते हुए कहा, “लेकिन भैया, राध्या मानेगी?”
फिर थोड़ा सोचकर बोले, “रिया तो खुशी-खुशी मान जाएगी, लेकिन राध्या… वो हमारे अचानक लिए गए इस फैसले पर बहुत सारे सवाल करेगी। और उसे शक भी हो जाएगा कि हम उससे कुछ छिपा रहे हैं।”
विपुल जी ने कुछ क्षण सोचा, फिर उनकी नजर विवेक पर टिक गई।विवेक, तुम वंश से कॉन्टैक्ट करो। वो अगर राध्या से कहेगा, तो वो शायद इनकार नहीं करेगी।“जी, बड़े पापा।”
विवेक के जवाब के बाद विपुल जी कुछ पल शांत रहे। फिर उन्होंने गंभीर होकर ऊपर ठाकुर जी की ओर देखा। उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक पिता की गहरी चिंता साफ सुनाई दे रही थी।
“ठाकुर जी… मेरी बच्ची पर कोई बड़ा संकट आने से पहले ही उसे खत्म कर देना।”
विपुल जी ने खुद को संभालते हुए कहा, “चलो, रात भी काफी हो गई है। कल सुबह एक बार फिर हम सब राध्या से बात करेंगे। अगर वो हमारी बात मान गई तो ठीक है… नहीं तो फिर वंश से बात करवानी पड़ेगी।”
वहाँ मौजूद सभी ने सहमति में सिर हिला दिया।एक-एक करके सभी कमरे से बाहर निकलने लगे। तभी पीछे से विपुल जी की आवाज़ आई,“विवेक!”
विवेक रुककर पीछे मुड़ा। “जी, बड़े पापा।”
विपुल जी ने उसकी ओर गंभीरता से देखते हुए कहा, “राध्या को अकेले कभी मत छोड़ना। और घर पर मंजरी के बारे में भी बात कर लो। अब जाओ… सो जाओ। रात काफी हो गई है।”
“जी, बड़े पापा।”विपुल जी वहाँ से चले गए।
विवेक कुछ देर वहीं खड़ा रहा। अभी-अभी हुई सारी बातें उसके मन में एक साथ घूम रही थीं..राध्या, युवराज सिंह, बड़े पापा की चिंता, उसे राध्या को अकेला न छोड़ने की हिदायत… और फिर मंजरी के बारे में घर पर बात करने की बात।
आखिरकार उसने एक लंबी साँस ली और अपने कमरे की ओर बढ़ गया। लेकिन उसके कदमों के साथ उसके मन में चल रहे सवाल भी उसके साथ ही चल रहे थे।
अगली सुबह शांति मेंशन में सभी लोग साथ बैठकर चाय पी रहे थे। सुबह का माहौल शांत था, लेकिन पिछली रात की बातचीत का असर अभी भी सबके मन में कहीं न कहीं था। विपुल जी के साथ विशाल जी और अनील जी भी बैठे हुए थे।
कुछ देर बाद विपुल जी ने चाय का कप नीचे रखते हुए विश्वनाथ जी की ओर देखा और कहा, “बाबूजी, मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों के लिए राध्या और रिया को कुणाल के पास भेज दिया जाए।”
विशाल जी और अनील जी ने भी विपुल जी की बात का समर्थन करते हुए हामी में सिर हिला दिया।विश्वनाथ जी और शांतिजी ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर लगभग एक साथ बोले, “बच्चा, वो सब तो ठीक है… लेकिन एक बात हम तुमसे कहना चाहते हैं।”
दोनों की बात सुनकर विपुल जी ने ध्यान से उनकी ओर देखा।
विश्वनाथ जी ने कहना शुरू किया, “तुम्हें हमारे बहुत करीबी दोस्त महेंद्र ओझा और उनकी पत्नी उर्मिला ओझा तो याद ही होंगे। दोनों हमारे परम मित्र हैं। एक समय था, जब हम
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