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तेरे लिए जानम Chapter-13

तेरे लिए जानम Chapter-13

राम जाने कब से सामने खड़ी उस लड़की को देख रहा था। यह देखना भी अजीब था। उसने कई बार चाहा कि अपनी नज़र वापस मोबाइल की स्क्रीन पर ले आए, लेकिन हर बार सामने खड़ी उस अनजान लड़की की कोई-न-कोई छोटी-सी हरकत उसका ध्यान फिर अपनी ओर खींच लेती। कभी वह घड़ी देखती, कभी धीमे-धीमे खुद से कुछ बुदबुदाती और फिर अपने बिखरे बालों को समेटने लगती।

शायद खुले बाल उसे बार-बार परेशान कर रहे थे। उसने दोनों हाथ पीछे ले जाकर उन्हें एक साथ समेटा। घुँघराले बालों का पूरा गुच्छा उसकी उँगलियों में कैद था। बाल हटते ही गर्दन के नीचे उसकी पीठ का  हिस्सा दिखाई देने लगा। सफ़ेद अनारकली  सूट का पिछला हिस्सा बहुत गहरा था। उसकी गोरी पीठ के दाहिनी ओर बना एक छोटा-सा काला तिल जाने कैसे राम की नज़र में उतर आया।

वह तिल कोई ऐसी चीज़ नहीं था, जिस पर किसी का ध्यान ठहर जाए। शायद किसी और ने देखा भी होता, तो अगले ही पल भूल जाता। लेकिन राम की नज़र जैसे वहीं ठहरकर रह गई। उसे खुद समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। वह तो बस एक मामूली-सा तिल था, फिर भी जाने क्यों उसकी आँखें उसी से हटने का नाम नहीं ले रही थीं।

एक पल के लिए उसे अपना गला सूखता हुआ महसूस हुआ। उसने अनायास लार निगली और जैसे खुद को याद दिलाया कि वह क्या कर रहा है। यह उसके स्वभाव में कभी नहीं रहा था। उसने नज़र फेरनी चाही, लेकिन अगले ही क्षण वह फिर अनजाने में उसी ओर लौट आई, जैसे उसकी आँखें उसके मन की नहीं, अपनी ही किसी ज़िद की मान रही हों।

कुछ क्षणों बाद राम ने जैसे खुद को झटका दिया। उसने गहरी साँस लेकर अपनी निगाहें उससे हटा लीं।लेकिन नज़रें फेर लेने से मन कहाँ मानने वाला था।
एक अनजानी-सी बेचैनी अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। जाने क्यों, उसका मन बार-बार यही जानना चाहता था कि उस गुलाबी दुपट्टे के पीछे छिपा चेहरा आखिर कैसा होगा।

यह ख़याल आते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी कठोरता लौट आई। उसने मन ही मन खुद को डाँटा।

"यह क्या कर रहा हूँ मैं...?कब से इस अनजान लड़की की हर छोटी-छोटी हरकत पर ध्यान दिए जा रहा हूँ। इसकी बेवजह की बातें भी चुपचाप सुन रहा हूँ... आखिर क्यों?"

उसे खुद पर झुंझलाहट होने लगी।जिसने हमेशा अपने मन को अपने फैसलों से चलाया था, आज वही मन किसी अनजान एहसास के पीछे भटकने लगा था। यह बात उसे बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।

उसने बिना वजह उठती उस उत्सुकता को भीतर ही भीतर दबाने की कोशिश की और अपना पूरा ध्यान मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाने का प्रयास किया, लेकिन शब्द आँखों के सामने होने के बावजूद दिमाग़ तक पहुँच ही नहीं रहे थे।
उसी असमंजस में डूबा वह खड़ा रहा कि तभी हल्के-से झटके के साथ लिफ्ट सोलहवें फ़्लोर पर आकर रुक गई।

सोलहवीं मंज़िल पर पहुँचते ही लिफ्ट के दरवाज़े धीरे-धीरे खुल गए। अनुराधा ने राहत की एक हल्की-सी साँस ली। देर होने की बेचैनी अब भी उसके चेहरे पर साफ़ थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे हर पल उसे याद दिला रही थीं कि आज पहले ही दिन वह पूरे तीस मिनट देर से पहुँची है। यही सोचते हुए उसने बिना इधर-उधर देखे तेज़ी से लिफ्ट से बाहर कदम रख दिया।

लेकिन अगले ही पल उसके कदम अपने-आप ठिठक गए।उसे लगा जैसे किसी ने बहुत हल्के से पीछे की ओर रोक लिया हो।
पहले तो उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा शायद दुपट्टा बैग में अटक गया होगा। उसने बिना पीछे देखे ही एक बार हल्का-सा खिंचाव देकर आगे बढ़ना चाहा, मगर इस बार दुपट्टा और कस गया।

उसके चेहरे की बेचैनी पल भर में घबराहट में बदल गई।

"ये...?"उसने अनायास ही गर्दन मोड़ने की कोशिश की। अभी वह पीछे देख भी नहीं पाई थी कि उसके भीतर जाने कैसी आशंका उठी। खाली कॉरिडोर... सुबह की भागदौड़... और अचानक किसी अनदेखी पकड़ का एहसास...उसकी धड़कन जैसे एक पल को रुक गई।

उसी क्षण किसी मज़बूत हथेली ने उसकी बाँह थाम ली। सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि उसे समझने का अवसर ही नहीं मिला। एक हल्के, मगर दृढ़ झटके के साथ उसका संतुलन बिगड़ा और वह पीछे की ओर खिंच आई। 

डर के मारे उसकी आँखें अपने-आप बंद हो गईं। उसे बस इतना महसूस हुआ कि गिरने से पहले किसी ने उसे मज़बूती से थाम लिया है। उसकी उँगलियाँ अनायास ही सामने वाले की शर्ट की सिलवटों में कस गईं, जैसे शरीर ने बिना सोचे खुद को सँभालने का सहारा ढूँढ़ लिया हो।

कुछ क्षणों तक उसे यह भी समझ नहीं आया कि हुआ क्या है।उसके कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों की आवाज़ गूँज रही थी। साँसें तेज़ हो चुकी थीं और पूरे शरीर में एक अनजाना-सा कंपन दौड़ गया था। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलने की हिम्मत जुटाई...


राम ने उसे गिरने से बचाने के लिए जैसे ही अपनी पकड़ मज़बूत की, उसी पल पहली बार उसकी नज़र अनुराधा के चेहरे तक पहुँची और वह अनायास ठिठक गया।

अभी कुछ क्षण पहले तक वह सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुन रहा था, चूड़ियों की धीमी छनक, बालों को समेटती उसकी उँगलियाँ और उसकी मासूम-सी बड़बड़ाहट... चेहरा अब तक उससे अनदेखा था। लेकिन इस पल जैसे किसी ने एकाएक वह परदा हटा दिया हो।

उसकी आँखें अब भी डरी हुई बंद थीं। घबराहट की वजह से साँसें तेज़ चल रही थीं और हर साँस के साथ उसकी छाती हल्के-हल्के उठ-गिर रही थी। माथे पर पसीने की बारीक बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। छोटी-सी लाल बिंदी के नीचे सजी भौंहों के बीच डर की हल्की-सी लकीर खिंच आई थी। बिना किसी बनावट के गुलाबी होंठ काँप रहे थे, जैसे कुछ कहना चाहते हों, मगर आवाज़ उनका साथ न दे रही हो। आँखों में लगा काजल अब भी वैसा ही था, लेकिन बंद पलकों के कारण उसका सौंदर्य किसी चित्र की तरह स्थिर होकर सामने आ गया था।

राम जाने कितनी देर तक उसे देखता रहा।वह यह भी भूल गया कि अभी कुछ क्षण पहले क्या हुआ था।

उसे सिर्फ़ इतना महसूस हो रहा था कि उसकी बाँहों में सिमटी यह लड़की किसी बनावटी खूबसूरती की मिसाल नहीं थी। उसमें कुछ ऐसा था जिसे किसी मेकअप, किसी महँगे कपड़े या किसी दिखावे से नहीं पाया जा सकता। उसकी सादगी ही उसकी सबसे बड़ी पहचान थी... और शायद वही बात राम की नज़र को बाँध रही थी।

एक पल के लिए उसे सचमुच लगा जैसे समय ने अपनी चाल धीमी कर दी हो।

उसने अनगिनत चेहरे देखे थे। दुनिया के बड़े-बड़े शहर, ऊँची महफ़िलें, चमकते कैमरे, फैशन और ग्लैमर.....इन सबके बीच खूबसूरती उसके लिए कभी ठहर जाने की वजह नहीं बनी। लेकिन इस अनजान लड़की का चेहरा... जाने क्यों उसकी सारी आदतों, सारे तर्कों को चुप करा रहा था।

उसके होंठ अनायास हिले।"इंडियन ब्यूटी..."यह किसी तारीफ़ की तरह नहीं निकला था।जैसे उसके भीतर उठे किसी अनकहे एहसास ने बिना इजाज़त दो शब्दों का रूप ले लिया हो।लिफ्ट में इतनी ख़ामोशी थी कि वे धीमे-से निकले शब्द भी अनुराधा तक पहुँच गए।

उसकी पलकों में हल्की-सी हरकत हुई।डर अब भी कम नहीं हुआ था। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। सामने सबसे पहले उसे एक चौड़ा सीना दिखाई दिया, फिर उस पर टिकी अपनी हथेलियाँ... और अगले ही पल उसकी नज़र ऊपर उठी और सीधे राम की आँखों से मिली।