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तेरे लिए जानम Chapter-7

तेरे लिए जानम Chapter-7

राम की आँखें जैसे ही माधुरी से मिलीं, उनके भीतर उतर आया रक्तिम तेज़ देखकर हॉल में उपस्थित हर व्यक्ति का चेहरा बदल गया। वह क्रोध से चिल्लाने वालों में से नहीं था। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि वह अपने भीतर उठते तूफ़ान को भी चेहरे पर आने नहीं देता था। किन्तु जो लोग राम रघुवंशी को जानते थे, वे यह भी जानते थे कि जब उसकी आँखों का रंग बदलता है, तब उसके धैर्य की अंतिम सीमा समाप्त हो चुकी होती है। उसके बाद वह दया नहीं, केवल निर्णय करता था।

माधुरी के उठे हुए कदम अनायास ही पीछे हट गए। अभी कुछ क्षण पहले तक जो शब्द बिना रुके उनके होंठों से निकल रहे थे, वही होंठ अब मौन हो गए। हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया कि किसी के साँस लेने की आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई देने लगी।

राम ने बिना किसी उतावलेपन के विवान को अपने पीछे किया। फिर एक-एक शब्द पर ठहरते हुए बोला, "मिसेज़ माधुरी मृत्युंजय रघुवंशी..."

उसका स्वर ऊँचा नहीं था, पर इतना कठोर अवश्य था कि हर शब्द सीधे सुनने वाले के भीतर उतर रहा था।

"यह आख़िरी बार है... जब आपकी ज़ुबान मेरे सामने इस तरह खुली है। आज के बाद भूलकर भी आपने मेरे सामने एक भी अपमानजनक शब्द कहा... तो आपकी यही ज़ुबान काटकर फेंक दूँगा।"

राम कुछ क्षण उन्हें देखता रहा। उसके चेहरे पर क्रोध का कोई प्रदर्शन नहीं था, पर उसकी आँखों की कठोरता ही उसके शब्दों से कहीं अधिक भयावह थी।

"और एक बात..." उसने उसी शांत स्वर में कहा, "राम रघुवंशी की डिक्शनरी में 'No Mercy' केवल लिखा नहीं जाता... निभाया भी जाता है।"
माधुरी की दृष्टि अनायास झुक गई।हॉल में उपस्थित किसी व्यक्ति ने एक शब्द तक नहीं कहा।

राम ने धीरे से अपनी नजर ऊपर उठाई।पहली मंज़िल पर खड़े मृत्युंजय रघुवंशी अब भी वहीं थे। दोनों की आँखें एक क्षण के लिए मिलीं। उस एक क्षण में न कोई शिकायत कही गई, न कोई सफ़ाई दी गई; केवल वर्षों का मौन एक-दूसरे के सामने खड़ा था।

राम ने बिना कोई भाव प्रकट किए अपनी नजर हटा ली। फिर वह मुड़ा और उसी शांत चाल से हॉल से बाहर निकलने लगा।

राम जैसे ही मुड़कर बाहर जाने लगा, पूरे हॉल में जैसे एक साथ कई आवाज़ें गूँज उठीं।

"राम...! रुक जाओ, बेटा ...!"

जानकी जी लगभग दौड़ती हुई उसके पास पहुँचीं और पीछे से उसकी बाँह थाम ली। उनकी उँगलियों की पकड़ में वर्षों का डर था—मानो एक बार फिर उनका पोता उनसे दूर जा रहा हो।

हॉल में खड़ा शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नम न हुई हों। अभी-अभी जो मिलन हुआ था, वह फिर बिछड़ने की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा था।
जानकी जी ने काँपते स्वर में कहा, "रुक जा, मेरे बच्चे ...। ना जाने कब से तेरी राह देख रही थी। अभी आया है... और अब फिर जाने की बात कर रहा है?"

राम ठिठक गया।उसने धीरे से पलटकर अपनी दादी की ओर देखा। फिर बहुत प्यार से उनके हाथ अपने हाथों में ले लिए। कुछ पल तक वह उन्हें देखता रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो।

"नहीं, दादी माँ..." उसका स्वर पहले जैसा ही शांत था, "अब यहाँ... और नहीं रुक सकता। वजह... आप जानती हैं।"

बस इतना ही कहा उसने।जानकी जी की आँखें झुक गईं। उनके पास उस बात का कोई उत्तर नहीं था। वे जानती थीं कि राम किस दर्द की ओर इशारा कर रहा है।कुछ पल का मौन दोनों के बीच ठहर गया।

राम ने दादी के चेहरे पर उतर आई उदासी देखी तो स्वयं ही बात बदल दी। होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाते हुए बोला, "अरे... अब तो मैं यहीं हूँ। इतनी भी क्या चिंता? जब मन करे, आप सब अवंतिका विला आ जाइए।"

फिर उसने मुस्कुराकर केतकी जी की ओर देखा।"और छोटी माँ..." उसकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन लौट आया, "आपके हाथ का खाना... बहुत मिस किया मैंने। किसी दिन आऊँगा... तो आपके हाथ का खाना खाऊँगा।"
क्षणभर रुककर वह बिल्कुल पुराने दिनों की तरह मुस्कुराया,"खिलाएँगी ना...?"

केतकी जी की पलकों पर ठहरे आँसू आखिर छलक ही पड़े। उन्होंने कुछ कहने के बजाय अपने पास रखा टिफ़िन बॉक्स उठाया और चुपचाप विवान के हाथ में रख दिया।
फिर राम की ओर देखकर बोलीं, "यह बात भला मैं कैसे भूल सकती हूँ, मेरे बच्चे।"

उन्होंने भीगी मुस्कान के साथ आगे कहा, "मुझे मालूम था... कुछ लोगों की आदत ही होती है रिश्तों के बीच आग लगाने की ! यह कहते हुए उनकी नजर सीधे माधुरी की तरफ गयी । इसलिए मैं तेरे लिए खाना पहले ही पैक करके ले आई थी।"

उनकी बात सुनकर राम की आँखों में भी एक क्षण के लिए अपनापन और कृतज्ञता एक साथ उतर आए। उस टिफ़िन में केवल खाना नहीं था... छोटी माँ का वह स्नेह था, जो वर्षों की दूरी भी कम नहीं कर सकी थी।

राम की नज़र जैसे ही पंचदेव जी पर पड़ी, उसके कदम अपने आप उनकी ओर बढ़ गए।
अब तक सबको संभालते-संभालते खड़े पंचदेव रघुवंशी की वृद्ध आँखों की नमी उनसे छिपाए नहीं छिप रही थी। चेहरे पर वही पुराना रौब था, मगर आँखें अपने पोते को रोक लेने की मौन विनती कर रही थीं।

राम उनके सामने आकर ठहर गया। बिना कुछ कहे उसने उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उन झुर्रियों से भरे हाथों में आज भी वही दृढ़ता थी, जिसने वर्षों तक पूरे रघुवंशी साम्राज्य को संभाले रखा था।

राम ने उनकी आँखों में देखते हुए हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,"पंचदेव रघुवंशी... इतने कमज़ोर तो नहीं हैं।"
पंचदेव जी ने उसकी ओर देखा। उनकी भीगी आँखों में गर्व उतर आया। उन्होंने मुस्कुराते हुए धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ..." फिर अपनी भर्राई आवाज़ को सँभालते हुए बोले, "आख़िर दादा किसका हूँ... राम रघुवंशी का।"

दोनों के होंठों पर एक साथ हल्की मुस्कान आ गई।कुछ पल दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे को देखते रहे। उनके बीच शब्दों से कहीं अधिक विश्वास खड़ा था।

राम ने गंभीर स्वर में कहा, "आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। रघुवंशी एम्पायर तब तक मेरे भरोसे रहेगा, जब तक वह अपने सही हाथों में वापस नहीं पहुँच जाता।"उसकी आवाज़ में दृढ़ विश्वास था।
मैं आपके भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगा। और जहाँ मेरी ज़रूरत होगी... मैं आता रहूँगा।

फिर उसने जानकी जी की ओर देखा और धीमे स्वर में बोला,"बस... हो सके तो दादी माँ को समझा दीजिए। और... कुछ दिन बाद आप भी मेरे साथ अवंतिका विला चलिएगा।"

पंचदेव जी की आँखें भर आईं।उन्होंने बिना कुछ कहे राम को अपने सीने से लगा लिया। वर्षों का गर्व, अपनापन और विश्वास उस आलिंगन में उतर आया।राम की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने भर्राए स्वर में कहा,"मुझे तुम पर पूरा भरोसा है... मेरे शेर।"

राम की नज़र फिर अर्जुन जी पर जाकर ठहर गई। वह कुछ क्षण उन्हें देखता रहा, जैसे मन की कोई बात शब्दों में ढालने की कोशिश कर रहा हो। फिर धीरे-धीरे उनके पास आकर बोला, "चाचू... आगे जो कुछ भी करना है, उसमें मुझे आपकी मदद की ज़रूरत पड़ेगी। बाकी सारी बातें ऑफिस में करेंगे... लेकिन आज आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।"

उसने एक पल रुककर अर्जुन जी की आँखों में देखा।

"मेरी ज़िंदगी में पिता की जगह हमेशा आपने निभाई है। जब-जब मैं गिरा... जब-जब मैं अकेला पड़ा... या मुझे किसी अपने की ज़रूरत हुई... हर बार सबसे पहले आप मेरे साथ खड़े मिले। और..." उसकी नज़र केतकी जी की ओर मुड़ गई, "...माँ का आँचल अगर कभी दोबारा महसूस हुआ, तो छोटी माँ... वह सिर्फ़ आपके पास।"

उसके शब्दों के साथ ही अर्जुन जी की आँखें भर आईं। उन्होंने बिना कुछ कहे राम को अपनी बाँहों में भर लिया। केतकी जी भी आगे बढ़ीं और दोनों ने मिलकर उसे वैसे ही अपने बीच समेट लिया, जैसे बरसों पहले किसी डरे हुए बच्चे को चुप कराया करते थे।

अर्जुन जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, "पगले... हमने कभी यह माना ही नहीं कि हमारे सिर्फ़ दो बच्चे हैं, क्योंकि अर्थव और सौम्या से पहले,हमारे लिए तो तू हमेशा पहला और सबसे बड़ा बेटा रहा है।"

केतकी जी ने भी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा, "इसलिए आज के बाद ऐसी बातें फिर कभी मत करना। रिश्तों को साबित नहीं किया जाता... बस निभाया जाता है।"

राम बस मुस्कुरा दिया। उस मुस्कान में अपनापन भी था और संतोष भी।
अर्जुन जी ने फिर सहज स्वर में कहा, "ऑफिस की सारी डिटेल्स तुम्हारी असिस्टेंट के पास हैं। बाकी जो भी ज़रूरी होगा, अथर्व और विवान तुम्हें समझा देंगे।"

"और हाँ..." केतकी जी ने बीच में ही बात पकड़ ली, "रात का खाना मैं रोज़ भिजवा दूँगी। इसमें कोई बहस नहीं होगी। लेकिन अभी... सुबह का नाश्ता करके ही जाना।"

राम  ने सर हिला दिया "ठीक है... छोटी माँ।"उसके इस संबोधन पर केतकी जी की आँखों में फिर वही ममता उतर आई।

ऊपर अपनी बालकनी से मृत्युंजय रघुवंशी अब भी यह सब देख रहे थे। नीचे अपने छोटे भाई और पत्नी के साथ खड़े राम को देखकर उनके भीतर न जाने कितने भाव एक साथ उमड़ रहे थे। वह चाहते तो एक आवाज़ देकर उसे रोक सकते थे... लेकिन शब्द जैसे उनके साथ छोड़ चुके थे।

उनकी आँखों की नमी अब छिपाए नहीं छिप रही थी।

उन्होंने एक आख़िरी बार राम की ओर देखा, फिर धीरे से मुड़े और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चले गए। पीछे छूट गईं कुछ अधूरी दूरियाँ... और एक पिता का मौन, जो शायद वर्षों बाद भी अपने बेटे तक पहुँचने का रास्ता खोज रहा था।