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तेरे लिए जानम Chapter-12

तेरे लिए जानम Chapter-12

सुबह का ट्रैफिक पार करते-करते दोनों जब रघुवंशी एम्पायर पहुँचीं, तब तक घड़ी की सुइयाँ दस बजने के करीब पहुँच चुकी थीं। पार्किंग में स्कूटी रोकते ही अनुराधा की नज़र सबसे पहले अपनी घड़ी पर गई।

"हे भगवान...!" घड़ी देखते ही अनुराधा के मुँह से निकला। उसने जल्दी से स्कूटी पार्क की और हेलमेट उतारते हुए बोली, "आरु, दस बजने वाले हैं...। हमें साढ़े नौ बजे तक पहुँच जाना था। अगर मेरी बात मानकर ट्रेन से चलते, तो इतनी देर नहीं होती। लेकिन मेरी सुनता ही कौन है।"

आरोही ने भी आराम से अपना हेलमेट उतारा। गले में लिपटा स्कार्फ़ खोलकर उसने स्कूटी की डिक्की में रखा और बिल्कुल बेफ़िक्र अंदाज़ में मुस्कुरा दी।अरे, ठीक है ना यार। इतनी-सी देर हुई है, जैसे दुनिया ही रुक जाएगी। चल, जल्दी।

फिर उसने शरारत से अनुराधा की तरफ़ देखा।और तू इतनी घबरा क्यों रही है? मैंने इतना भी नहीं डराया था तुझे।अनुराधा ने कोई जवाब नहीं दिया।उसने सिर्फ़ अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उठाकर आरोही को देखा। चेहरे पर अब भी स्कार्फ़ बँधा हुआ था। उस एक खामोश नज़र में जितनी नाराज़गी थी, उतनी शायद दस बातें कहकर भी नहीं जताई जा सकती थी।आरोही ने उसकी आँखों में देखते ही दोनों हाथ जोड़ लिए।अच्छा बाबा... गलती हो गई। अब ऐसे मत देख, सच में डर लगने लगा है। अनुराधा ने बस धीमे से सिर हिलाया... "चल!" वह दोनों तेज़ क़दमों से इमारत की तरफ़ बढ़ गई। 

अनुराधा की खामोश नज़र देखकर आरोही ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया और लगभग उसे खींचते हुए लिफ्ट की ओर बढ़ गई। दोनों आपस में बातें करती हुई तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं कि तभी उनकी नज़र सामने लगी लिफ्ट पर पड़ी।

लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने ही वाले थे।
"दौड़, अनु...! लिफ्ट बंद हो जाएगी।" आरोही लगभग भागते हुए बोली।

वह तेज़ी से दौड़कर समय रहते लिफ्ट के भीतर पहुँच गई, लेकिन अनुराधा उससे बस एक-दो कदम पीछे रह गई। जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँची, लिफ्ट के दोनों पल्ले उसके सामने बंद हो गए।

"ओह, शिट!"

आरोही ने माथे पर हाथ मार लिया। लिफ्ट के भीतर खड़ी वह बेबस होकर बंद दरवाज़े को देखती रह गई, जबकि बाहर खड़ी अनुराधा ने हल्की-सी साँस छोड़ते हुए सामने लगे डिस्प्ले की ओर देखा, जहाँ लिफ्ट ऊपर बढ़ने लगी थी।

लिफ्ट के बंद दरवाज़ों को देखकर अनुराधा ने एक गहरी साँस छोड़ी। घड़ी पर नज़र गई तो दिल की धड़कन जैसे एक पल को और तेज़ हो गई। 9:58"गई आज तो..." वह बुदबुदाई।
सुबह से ही देर होने की चिंता अलग थी, ऊपर से आज पहला दिन... और वह भी नए बॉस के साथ। पता नहीं ऑफिस पहुँचते ही क्या-क्या काम इंतज़ार कर रहे होंगे।

उसने बेचैनी से सामने लगी डिस्प्ले स्क्रीन की तरफ़ देखा। लिफ्ट अभी कई फ़्लोर नीचे थी।
इतना इंतज़ार करूँगी, तो सच में लेट हो जाऊँगी..."बुदबुदाते हुए उसकी नज़र बगल में गई।वीआईपी लिफ्ट क़ो देख कर वह एक पल को ठिठक गई।

"न... नहीं... इससे कैसे जा सकती हूँ?"अगले ही पल उसने खुद ही अपने मन की बात काट दी।
लेकिन... मैं अब सर की पर्सनल असिस्टेंट हूँ। अगर कभी ज़रूरत पड़े, तो इसी लिफ्ट से तो जाना होगा।"

वह खुद को समझाने लगी, जैसे अपने ही मन से इजाज़त माँग रही हो।और वैसे भी... आज मजबूरी है। बस आज के लिए..."इतने में वीआईपी लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने लगे।

"अरे...!"सोचने का वक़्त ही नहीं मिला।वह लगभग दौड़ पड़ी...रुकिए...!"
दरवाज़े के बीच पहुँचते ही उसने झट से हाथ बढ़ाया। सेंसर ने उसे पहचान लिया और दोनों पल्ले फिर से खुल गए।

"थैंक गॉड..."राहत की साँस लेते हुए वह जल्दी से अंदर आ गई। अंदर आते ही उसने आदतन अपना दुपट्टा ठीक किया, बैग कंधे से उतारकर सँभाला और एक तरफ़ खड़ी हो गई।देर होने की घबराहट में उसका पूरा ध्यान बस घड़ी की सुइयों पर था।

उसे ज़रा-सा भी एहसास नहीं हुआ...कि जिस पल वह लिफ्ट के अंदर दाख़िल हुई थी, ठीक उसी पल उसके पीछे एक और कदम भी उसी लिफ्ट में आकर रुका था।मोबाइल की स्क्रीन पर निगाहें टिकाए वह आदमी जैसे किसी और ही दुनिया में था। और अनुराधा...उसे अभी तक यह भी नहीं पता था कि वह लिफ्ट में अकेली नहीं थी।


लिफ्ट के दरवाज़े बंद होते ही अंदर फिर वही शांत-सी ख़ामोशी फैल गई। राम की उँगलियाँ अब भी मोबाइल की स्क्रीन पर चल रही थीं, लेकिन अचानक उसे अपने अलावा किसी और की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने अनायास ही नज़र उठाई। 

सामने, उससे कुछ ही कदम की दूरी पर एक लड़की खड़ी थी। सफ़ेद अनारकली सूट, चेहरे पर हल्के गुलाबी रंग का स्कार्फ़ और कंधे पर टिका बैग। शायद जल्दी-जल्दी आने की वजह से उसकी साँसें अभी तक पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थीं। वह एक पल घड़ी की तरफ़ देखती, फिर जैसे खुद को ही समझाते हुए धीमे से सिर हिला देती।

राम की नज़र बस यूँ ही उस तरफ़ गई थी, लेकिन जाने क्यों वापस मोबाइल पर नहीं लौट सकी। चेहरा अब भी स्कार्फ़ से ढका था, इसलिए उसे उसके बारे में कुछ भी पता नहीं चल सकता था। फिर भी उसकी हर छोटी-सी हरकत अनायास ही ध्यान खींच रही थी।

 लड़की ने धीरे से दोनों हाथ चेहरे तक उठाए और स्कार्फ़ खोलने लगी। उसकी कलाई ज़रा-सी हिली तो काले मेटल की पतली चूड़ियाँ आपस में टकराकर हल्के से छनक उठीं। लिफ्ट के भीतर पसरी ख़ामोशी में वह बहुत मामूली-सी आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे गई। राम ने कभी इस तरह किसी की चूड़ियों की आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन इस बार नज़र हटाने की कोशिश करने के बाद भी उसकी निगाह वहीं ठहरी रही।

स्कार्फ़ ढीला होते ही उसने उसे धीरे-धीरे चेहरे से अलग किया। उसी पल बालों में ढीला फँसा क्लिप अचानक निकल गया और लंबे, घुँघराले काले बाल एक साथ उसकी पीठ पर बिखर गए। उसने हल्की-सी झुँझलाहट के साथ उन्हें समेटना चाहा, मगर कुछ ज़िद्दी लटें फिर भी कंधों पर चली आईं। 

वह पूरी तरह अपनी ही दुनिया में थी, उसे इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि सामने खड़ा एक आदमी पिछले कुछ पलों से उसकी हर छोटी-बड़ी हरकत को अनजाने में देख रहा है। और शायद यही बात राम को सबसे ज़्यादा अजीब लग रही थी... क्योंकि उसने अब तक उस लड़की का चेहरा भी नहीं देखा था, फिर भी उसकी नज़र बार-बार उसी पर लौट रही थी।

अनुराधा ने हल्की-सी झुँझलाहट के साथ ऊपर देखा, जैसे छत नहीं, सीधे अपने गोविंद से बात कर रही हो।

"हे गोविंद..." उसके होंठों पर बेबस-सी मुस्कान आ गई, "आज क्या ठान ही लिया है आपने कि मुझे देर करवाकर ही मानेंगे?"
वह बुदबुदाते हुए अपने खुले बालों को दोनों हाथों से समेटने लगी। घुँघराले बाल बार-बार उसकी पकड़ से फिसल जाते और वह उन्हें फिर से इकट्ठा करने लगती।

"पहले आरु की ज़िद... फिर ट्रैफिक... फिर लिफ्ट..." उसने धीमे से शिकायत की, "और अब ये सब..."आख़िरकार उसने बालों का जूड़ा बनाया और पिन लगाने लगी।

"उधर पता नहीं बड़े सर के सुपुत्र कैसे होंगे।" उसने हल्की-सी साँस भरी। "जिससे पूछो, वही कहता है बहुत सख़्त मिज़ाज हैं। ऊपर से आज ही के दिन पूरे तीस मिनट लेट हो गई हूँ।"

उसने जूड़े में पिन ठीक से अटकाई, फिर एक बार उसे हाथ से टटोलकर तसल्ली की कि कहीं ढीला तो नहीं रह गया।
"बस..." उसने धीरे से आँखें बंद कीं, "बाकी अब आप ही संभाल लेना।"
इतना कहकर उसने एक गहरी साँस ली, जैसे मन का आधा बोझ सचमुच अपने गोविंद को सौंप दिया हो।

उसे कहाँ पता था...कि जिस इंसान के बारे में वह पिछले दो मिनट से निश्चिंत होकर शिकायत किए जा रही थी, वह उसी लिफ्ट में, उसके ठीक पीछे खड़ा, उसकी एक-एक बात सुन रहा था।