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तेरे लिए जानम Chapter-18

तेरे लिए जानम Chapter-18

विवान और अथर्व के बाहर जाते ही केबिन में एक बार फिर सन्नाटा फैल गया। कुछ क्षण तक राम वहीं खड़ा रहा, जैसे उसके मन में एक साथ कई विचार चल रहे हों। तभी उसकी नज़र सामने खड़े अभिमन्यु पर पड़ी, जो अब भी अपनी जगह से हिला तक नहीं था।

राम ने उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा, "तू गया नहीं?"
अभिमन्यु ने दोनों हाथ सीने पर बाँध लिए और बिना नज़र हटाए बोला, "तुझे मैं तेरे दोनों छोटे भाई दिखता हूँ क्या, जो तू जैसा बोलेगा, वैसा करके चुपचाप निकल जाऊँ?"

राम उसके अंदाज़ पर हल्का-सा मुस्कुरा दिया।उसके चेहरे पर आई वह छोटी-सी मुस्कान देखकर अभिमन्यु की आँखें फैल गईं। वह हँसते हुए बोला, "तू... हँस रहा है, मेरे यार! ये तो कमाल हो गया। सुबह से तेरे चेहरे पर जितनी सख़्ती थी, उसके बाद तो मुझे लगा था कि आज मुस्कुराना भी भूल गया होगा।"

राम ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। मुस्कान उतनी ही जल्दी गायब भी हो गई, जितनी जल्दी आई थी। उसके चेहरे पर फिर वही गंभीरता लौट आई।कुछ पल चुप रहने के बाद वह धीमे स्वर में बोला,"अभि..."

"हाँ, बोल राम।"राम की नज़र कुछ क्षण के लिए सीक्रेट रूम के बंद दरवाज़े पर ठहरी, जहाँ अनुराधा अब भी बेहोश थी। फिर उसने अभिमन्यु की ओर देखते हुए कहा,"मुझे मिस ठाकुर की पूरी जानकारी चाहिए।"

अभिमन्यु ने ध्यान से उसकी आँखों में देखा। वह राम को बचपन से जानता था। वह यह भी जानता था कि राम बिना किसी ठोस वजह के किसी के बारे में जानकारी निकलवाने की बात कभी नहीं करता।

"सिर्फ़ जानकारी?" उसने गंभीर स्वर में पूछा।

राम ने शांत लहज़े में कहा, "उसकी फैमिली, पढ़ाई, पिछले कुछ साल, किन लोगों के संपर्क में रही... और अगर उसके अतीत में ऐसा कुछ है, जिसने उसे आज इस हालत तक पहुँचाया है... तो वो भी। मुझे कुछ भी अधूरा नहीं चाहिए।"

अभिमन्यु कुछ क्षण तक चुप रहा। फिर उसने गहरी साँस लेते हुए पूछा,"तू श्योर है ना? कहीं जल्दबाज़ी तो नहीं कर रहा?"राम की आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास उतर आया।

"राम रघुवंशी की नज़र कभी धोखा नहीं खाती।"उसने बिना किसी हिचक के आगे कहा,"इसलिए... सब कुछ तैयार कर ले।"

अभिमन्यु ने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसे समझ आ गया था कि राम कोई साधारण फैसला नहीं ले रहा। जब वह इस तरह यक़ीन के साथ कोई बात कहता था, तो उसके पीछे कोई ऐसी वजह ज़रूर होती थी, जो अभी सिर्फ़ वही जानता था।

अभिमन्यु ने धीरे से सिर हिलाया।" ठीक है... मैं काम शुरू करता हूँ।"
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राम की आख़िरी बात सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर ऐसी खुशी फैल गई, जिसे वह छिपा ही नहीं पाया। अगले ही पल उसने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर राम को कसकर गले लगा लिया।

"यारा..." उसकी आवाज़ में बरसों की अपनापन भरी गर्माहट थी, "तूने आज जो बात कही है ना... दिल कर रहा है कि अभी यहीं झूम-झूमकर नाचूँ।"

राम उसकी इस अचानक की खुशी पर बस हल्का-सा मुस्कुराया। उसने दोस्त की पीठ पर दो-तीन हल्की थपकियाँ दीं और शांत स्वर में बोला, "बस कर... ज़्यादा उड़ मत। फिलहाल इस बात को ऐसे ही छिपा रहने दे।"

उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
"क्योंकि बात चाहे जैसी भी हो... है तो धोखे की। जब यह बात सामने आएगी ... तब क्या होगा, मैं नहीं जानता।"

अभिमन्यु ने तुरंत खुद को उससे अलग किया और कुछ पल तक बिना कुछ कहे उसका चेहरा देखता रहा। फिर उसने दोनों हाथों से राम के कंधे पकड़ लिए।

"तुझे सच में ऐसा लगता है?"राम ने कोई जवाब नहीं दिया।

अभिमन्यु हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "एक बात याद रख, यारा... मोहब्बत और जंग में बहुत-सी बातें सीधी रेखाओं से नहीं चलतीं।"वह कुछ पल रुका, फिर हँसते हुए बोला, "और वो लाइन तो सुनी ही होगी तूने... अगर परिणाम अच्छा हो, तो झूठ और धोखे का महत्व नहीं रह जाता।"

उसने राम के कंधे पर हाथ रखते हुए आगे कहा, "वैसे भी, मैं इसे धोखा नहीं मानता। हर सच बताने का भी एक सही वक़्त होता है। अभी बस वो वक़्त नहीं आया है। जब सही समय आएगा, सब कुछ साफ़ हो जाएगा।"

राम उसकी बातें चुपचाप सुनता रहा। उसके चेहरे पर अब भी वही गंभीरता थी, लेकिन अभिमन्यु उसे अच्छी तरह जानता था। उसे मालूम था कि बाहर से जितना सख़्त दिखने वाला यह आदमी है, भीतर से उतना ही ज़्यादा सोचने वाला भी है।

माहौल को हल्का करने के लिए अभिमन्यु ने अचानक मुस्कुराकर कहा, "इसलिए अब ज़्यादा मत सोच... चिल मार।"फिर उसने उँगली उठाकर शरारती अंदाज़ में जोड़ा, "और हाँ... आज रात की पार्टी तेरी तरफ़ से। इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।"

राम के होंठों पर अनायास मुस्कान लौट आई। उसने बेबसी से सिर हिलाया, मानो जानता हो कि इस मामले में अभिमन्यु से बहस करना बेकार है।

"ठीक है।"
बस इतना सुनना था कि अभिमन्यु विजयी मुस्कान के साथ मुड़ा, केबिन का दरवाज़ा खोला और सीटी बजाते हुए बाहर निकल गया। उसके जाते ही कमरे में फिर वही खामोशी लौट आई, लेकिन इस बार उस खामोशी में राम के चेहरे पर ठहरी हल्की-सी मुस्कान कुछ देर तक बनी रही।

कमरे के भीतर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। ए.सी. की ठंडी हवा धीरे-धीरे पूरे कमरे में फैल रही थी कि तभी बिस्तर पर लेटी अनुराधा की पलकों में हल्की-सी हरकत हुई। कुछ क्षण बाद उसकी आँखें अचानक खुल गईं।एक पल के लिए वह बिल्कुल स्थिर पड़ी रही।

उसकी नज़रें अनजान छत पर टिक गईं। फिर धीरे-धीरे कमरे की दीवारों, फर्नीचर और आसपास की हर चीज़ पर घूमने लगीं। अगले ही क्षण उसे एहसास हुआ कि यह जगह उसके लिए पूरी तरह अपरिचित है।

उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।घबराहट जैसे एक ही पल में उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। माथे पर पसीने की बारीक बूँदें उभर आईं, जबकि कमरे में ठंडक थी। उसने बिना देर किए घबराकर खुद को ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी साँसें तब तक तेज़ चलती रहीं, जब तक उसे यह यक़ीन नहीं हो गया कि उसके कपड़े पूरी तरह ठीक हैं और उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ है।

यह देखकर उसे थोड़ी राहत तो मिली, लेकिन वह राहत उसकी बेचैनी को पूरी तरह शांत नहीं कर सकी।उसके चेहरे पर अब भी डर साफ़ दिखाई दे रहा था। जैसे मन बार-बार उसे सावधान कर रहा हो कि जितनी जल्दी हो सके, इस जगह से निकल जाना चाहिए।

उसने जल्दी-जल्दी बिस्तर के आसपास नज़र दौड़ाई। कुछ ही दूरी पर उसका गुलाबी दुपट्टा रखा हुआ दिखाई दिया। उसने तुरंत उसे उठाया, काँपते हाथों से अपने कंधों पर ठीक से ओढ़ा और एक गहरी साँस लेकर बिस्तर से नीचे उतर आई।

उसके पैर अब भी हल्के-हल्के काँप रहे थे, लेकिन उस समय उसके मन में सिर्फ़ एक ही बात थी...
उसे किसी भी हालत में इस अनजान कमरे से बाहर निकलना था।इसी बेचैनी के साथ उसने दरवाज़े की दिशा में कदम बढ़ा दिए।

अनुराधा ने जैसे ही दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया, उसी पल हैंडल घूमने की आवाज़ हुई और दरवाज़ा खुल गया।सामने राम खड़ा था।एक पल...बस एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।

अनुराधा की आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। लिफ्ट में बिताया हर सेकंड, उसकी घबराहट, उसका डर... सब कुछ एक झटके में उसके ज़ेहन में लौट आया। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसने अनायास अपना दुपट्टा दोनों हाथों से सीने के पास कसकर पकड़ लिया और बिना कुछ सोचे पीछे हटने लगी। हर कदम के साथ उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी, जैसे उसके सामने कोई ऐसा इंसान खड़ा हो जिससे जितनी दूरी बना सके, उतना कम हो।

राम ने उसे ध्यान से देखा।उसने महसूस किया कि अनुराधा सिर्फ़ असहज नहीं थी... वह बुरी तरह डरी हुई थी। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही थी और पीछे हटते हुए उसके कदम भी लड़खड़ा रहे थे। एक पल के लिए राम के मन में यही आया कि अगर वह इसी तरह पीछे हटती रही, तो खुद को चोट पहुँचा बैठेगी।

वह बिना जल्दबाज़ी किए उसकी तरफ़ बढ़ा।

"रिलैक्स..."उसने धीमे स्वर में कहना चाहा, लेकिन शब्द पूरे भी नहीं हो पाए। जैसे ही उसने उसे संभालने के इरादे से उसकी बाँह की तरफ़ हाथ बढ़ाया, अनुराधा के भीतर जैसे बरसों से दबा हुआ भय अचानक फट पड़ा।

उसने एक झटके से अपना हाथ उठाया।चटाक...!थप्पड़ इतनी ज़ोर से पड़ा कि उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।राम का चेहरा एक तरफ़ मुड़ गया।कुछ सेकंड तक समय जैसे थम-सा गया।

न राम ने कुछ कहा...न अनुराधा ने।कमरे में सिर्फ़ दोनों की तेज़ साँसों की आवाज़ रह गई।

राम धीरे-धीरे अपना चेहरा सीधा करता है। उसके गाल पर उभरती लाल हथेली साफ़ दिखाई दे रही थी। वह सिर्फ़ अनुराधा को देख रहा था।

उधर अनुराधा का पूरा शरीर काँप रहा था। उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से की जड़ में एक गहरा डर छिपा हुआ था। उसकी आँखों में नमी उतर आई थी, जैसे यह थप्पड़ उसने सिर्फ़ सामने खड़े आदमी को नहीं, बल्कि अपने अतीत की किसी परछाईं को मारा हो।

वह काँपती आवाज़ में बोली,"बदतमीज़ इंसान...! क्या एक लड़की तुम लोगों के लिए सिर्फ़ पब्लिक प्रॉपर्टी होती है? जब मन किया, उसकी मर्ज़ी के बिना उसे छू लिया... उस पर अपना हक़ जमाने लगे।"

उसके शब्द कमरे की खामोशी को चीरते हुए निकले। हर शब्द में नफ़रत थी, शिकायत थी... और सबसे ज़्यादा, एक ऐसा दर्द था जो साफ़ बता रहा था कि यह गुस्सा सिर्फ़ इस पल का नहीं था।