तेरे लिए जानम Chapter-24
- 24 October, 2026
अनुराधा शायद उसके शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश ही कर रही थी कि तभी राम उसके कान की लौ के पास झुका और उसके कान की लौ को हल्के से चूम लिया।वह अब भी उससे बेहद करीब खड़ा था।
अनुराधा की आँखें अब भी बंद थीं।शायद इसलिए कि उसे अभी तक यक़ीन ही नहीं हुआ था कि जिस थप्पड़ का इंतज़ार वह कर रही थी... उसके बदले उसे कुछ बिल्कुल अप्रत्याशित महसूस हुआ था।
राम की इस हरकत पर अनुराधा झुंझलाकर उसकी तरफ मुड़ी, लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे के भाव बदल गए। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि राम उसके इतना करीब खड़ा होगा।
उसी पल, अनजाने में उसके होंठ राम के होंठों से छू गए।दोनों जैसे वहीं ठिठक गए। कुछ सेकंड के लिए न कोई कुछ बोल पाया, न ही कोई हिल सका। अचानक हुई इस घटना ने दोनों को पूरी तरह चौंका दिया था।
सबसे पहले अनुराधा को होश आया। उसने फौरन अपनी नज़रें झुका लीं और बिना उसकी तरफ देखे उसे हल्का-सा हटाकर आगे बढ़ने लगी।लेकिन राम ने उसकी कलाई पकड़ ली।
अनुराधा के कदम वहीं रुक गए। उसने चौंककर उसकी तरफ देखा, तभी राम ने एक झटके में उसे अपनी तरफ खींच लिया। दोनों के बीच अब फिर से वही बेहद कम फ़ासला रह गया था। अनुराधा की साँसें तेज़ चल रही थीं, जबकि राम की निगाहें बिना पलक झपकाए उसी पर टिकी थीं।
राम के खींचते ही अनुराधा अपना संतुलन खो बैठी और अगले ही पल सीधे उसके सीने से आ लगी।उसने झटके से खुद को संभाला और गुस्से से राम की तरफ़ देखा। राम की नजरें सिर्फ उसके होठो पर थी। उसका गला सुख रहा था। लेकिन वह खुद क़ो कंट्रोल कर रखा था। लेकिन कब तक यह शायद उसे भी नही मालूम था।
"तुम"वह कुछ कह पाती, उससे पहले ही राम ने बिना उसे मौका दिए उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।अनुराधा की आँखें हैरानी से पूरी तरह फैल गईं।उसे जैसे यकीन ही नहीं हुआ कि राम ने अचानक ऐसा कर दिया।कुछ पल के लिए उसका दिमाग़ बिल्कुल सुन्न पड़ गया।
अगले ही क्षण उसने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की। उसके दोनों हाथ लगातार राम के सीने पर पड़ रहे थे। कभी वह उसे धक्का देती, कभी मुट्ठियाँ भींचकर उसके सीने पर मारती, लेकिन राम अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिला। वह सिद्द्त से उसके होठो क़ो चूम रहा था।
राम ने बिना कुछ कहे अनुराधा के दोनों हाथ अपनी पकड़ में लिए और उन्हें उसके सिर के ऊपर दीवार से टिकाकर रोक दिया। अनुराधा ने छूटने की कोशिश की, लेकिन उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि वह बस बेबस होकर रह गई। लेकिन उसके होठो क़ो चूमना नही छोड़ा। कब से वह एक प्यासे की तरह उसकी होठो क़ो निहार रहा था। अब जब उसे यह मौका मिला था तो वह बिलकुल छोड़ने के मूड मे नही था।
शुरुआत में जैसे वह सिर्फ़ उसे चुप कराना चाहता था, लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर दबे हुए सारे जज़्बात उस एक पल में उतरने लगे। उसकी बेचैनी, उसका गुस्सा, उसकी तड़प... सब कुछ उस किश में घुलता चला गया। उधर अनुराधा लगातार उसके सीने पर हाथ मारती रही, खुद को छुड़ाने की कोशिश करती रही, मगर कुछ ही क्षणों में उसकी साँसें बुरी तरह उलझने लगीं।
राम को जैसे ही उसकी तेज़ होती साँसों का एहसास हुआ, उसने तुरंत अपने होंठ उससे अलग कर लिए।दोनों कुछ पल तक तेज़-तेज़ साँसें लेते रहे।राम ने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे से अपना चेहरा अनुराधा की गर्दन के पास टिका दिया।उसकी गर्म सांसे अनुराधा की बेकाबू धड़कन के साथ उलझी हुई थी।
उसकी आवाज़ अब पहले जैसी सख़्त नहीं थी। वह बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए बोला,
"ये... तुम्हारे थप्पड़ की सज़ा थी।"इतना कहकर वह कुछ क्षण वैसे ही रुका रहा। फिर उसने धीरे से अपना चेहरा उठाया, अनुराधा के माथे पर एक हल्का-सा चुंबन रखा और उसके होंठों पर हल्की-सी तिरछी मुस्कान उभरी।
"अब..." उसने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "...हिसाब बराबर।"
राम जैसे ही थोड़ा पीछे हटने लगा, अनुराधा की आँखों में फिर से वही गुस्सा भर आया। उसने बिना एक पल गंवाए अपना हाथ दोबारा उठाया। इस बार उसके इरादे साफ़ थे। वह फिर से उसे थप्पड़ मारना चाहती थी। क्योंकि राम ने हरकत ही ऐसी की थी।
लेकिन इस बार राम पहले से तैयार था।उसने फुर्ती से उसकी कलाई थाम ली। अगले ही पल उसकी बाँह को हल्का-सा मोड़कर उसकी पीठ के पीछे रोक दिया और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया। अचानक दोनों के बीच की दूरी फिर से मिट गई। दोनों के सीने एक दूसरे क़ो महसूस होने लगे थे। अनुराधा ने तुरंत छूटने की कोशिश की, लेकिन जितना वह खुद को छुड़ाने की कोशिश करती, उतनी ही उसकी झुँझलाहट बढ़ती जा रही थी।
राम ने उसकी आँखों में देखते हुए हल्की-सी मुस्कान दबाई। उसकी आवाज़ में अब पहले वाला गुस्सा नहीं था, बल्कि वही चिर-परिचित टीज़िंग लौट आई थी।
"थोड़ा संभलकर, मिस ठाकुर...!"वह जानबूझकर कुछ पल रुका, फिर उसकी आँखों में देखते हुए बोला,"कहीं ऐसा तो नहीं... कि तुम्हें मेरा kiss इतना अच्छा लगा कि बार-बार थप्पड़ मारने की गलती कर रही हो?"
एक पल के लिए अनुराधा जैसे उसकी बात समझ ही नहीं पाई।फिर अगले ही क्षण उसका चेहरा गुस्से से सुर्ख हो उठा। उसने पूरी ताक़त से खुद को छुड़ाने की कोशिश की और दाँत भींचते हुए लगभग फट पड़ी, "यू...! Leave my hand!"
उसकी आवाज़ कमरे में गूँज उठी। वह लगातार अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, जबकि उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें गुस्से से राम को घूरे जा रही थीं। उस पल अगर नज़रों से किसी को घायल किया जा सकता, तो शायद राम सबसे पहले घायल होता।:::
अनुराधा अब भी गुस्से से उसे देख रही थी। उसकी साँसें अभी तक सामान्य नहीं हुई थीं। आँखों में रोष था, अपमान था और उसके भीतर उठता विरोध अब भी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह बार-बार अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन जितना वह छूटने की कोशिश करती, उतनी ही उसकी झुँझलाहट बढ़ती जाती।
राम उसकी हर कोशिश को बिना कुछ कहे देख रहा था। उसके चेहरे पर वही हल्की-सी रहस्यमयी मुस्कान थी, जो अनुराधा को और ज़्यादा परेशान कर रही थी। उसने धीरे से अपना चेहरा उसकी ओर झुकाया और उसके कंधे पर अपने होंठ टिका दिए और सिद्द्त से उसे चूम लिया।
बस इतना-सा स्पर्श...से ही अनुराधा का पूरा शरीर एक झटके से सिहर उठा। उसने गुस्से में अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसके जबड़े भींच गए। ऐसा लग रहा था, जैसे वह अपने भीतर उमड़ रहे हर भाव को किसी तरह रोक लेना चाहती हो। इतना कुछ होने के बाद भी उसे राम की छुवन मे कोई बुरी नियत नही महसूस हो रहीं थी । यह उसके फ़्रस्ट्रेशन क़ो और बढ़ा रहीं थी।
राम की आँखो मे गहराई थी तो वही अनुराधा के आँखो मे उलझन से भरी बेबसी। उसे महसूस हो रहा था की वह चाहती थी राम रुक जाये। लेकिन कुछ हद तक वह उसकी करीबी मे खुद क़ो असहाय भी महसूस करती थी।
राम की नज़र उसके चेहरे पर ही थी।उसे देखकर उसके होंठों पर फिर वही हल्की-सी मुस्कान लौट आई।अगले ही पल उसने अपने होंठों की हल्की-सी हरकत से उसके बालों में लगा जूड़ा पिन खींच लिया।
पिन ढीला पड़ते ही अनुराधा के घने कर्ली बाल एक झटके में खुलकर उसकी पीठ और कंधों पर बिखर गए। कुछ लटें उसके चेहरे के दोनों तरफ़ आकर ठहर गईं।राम कुछ क्षण तक उन खुले बालों को देखता रहा।
जाने क्यों... उसे हमेशा लगता था कि यह लड़की खुले बालों में ज़्यादा खूबसूरत लगती होगी।
उसने धीरे से उसकी कलाई छोड़ दी और बहुत हल्के से उसे अपनी तरफ़ घुमा दिया।अब दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।
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