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तेरे लिए जानम Chapter-10

तेरे लिए जानम Chapter-10

मुंबई...शहर का एक शांत-सा इलाका, जहाँ सुबह की पहली रोशनी अभी-अभी इमारतों की बालकनियों पर उतरनी शुरू हुई थी। उसी इलाके के एक छोटे-से वन बीएचके फ्लैट में अगरबत्ती की हल्की-सी खुशबू फैली हुई थी। खुली खिड़की से आती ठंडी हवा पूजा के कोने में जल रहे दीपक की लौ को कभी हल्का-सा झुका देती, तो कभी फिर से सीधा कर देती।

पूरे घर में उस समय बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी...एक लड़की की मधुर, शांत और बेहद सुकून देने वाली आवाज़—

«अच्युतं केशवं राम नारायणम्।
कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभम्।
जानकी नायकं रामचंद्रं भजे॥»

उसकी आवाज़ में बनावट नहीं थी।वह गा नहीं रही थी... पूरे मन से प्रार्थना कर रही थी।
हर शब्द के साथ जैसे घर का कोना-कोना एक अलग ही शांति से भरता जा रहा था। बाहर भागती-दौड़ती मुंबई अपनी रफ्तार पकड़ने की तैयारी कर रही थी, लेकिन इस छोटे-से फ्लैट के भीतर समय जैसे कुछ पल के लिए ठहर गया था।

जैसे ही प्रार्थना पूरी हुई, लड़की ने आँखें खोलीं। उसके होंठों पर हमेशा की तरह एक निश्छल-सी मुस्कान थी। उसने दोनों हाथ जोड़कर भगवान के सामने सिर झुकाया।

"हे गोविंद... सब पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके जीवन में सुख, शांति और—"

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पीछे से किसी ने आकर झट से उसके बगल में हाथ जोड़ लिए।

"हे मेरे राधा के गोविंद!" पीछे से आई लड़की ने पूरी श्रद्धा... और उतनी ही शरारत के साथ कहा, "सब पर कृपा बाद में करना... पहले मेरी इस सहेली पर अपनी स्पेशल कृपा बरसा दो।"

प्रार्थना कर रही लड़की ने बिना पीछे देखे ही हल्की-सी मुस्कान दबा ली। उसे आवाज़ पहचानने में एक पल भी नहीं लगा था।उधर दूसरी लड़की पूरे मन से अपनी फरियाद रखे जा रही थी।

"प्रभु, इसे कोई ऐसा लड़का मिलवा दो जो इसे सच्चा प्यार करे। बस एक बार इसकी लव स्टोरी शुरू करवा दो, ताकि ये जोगन... प्रेम की जोगन बन जाए।"

वह एक पल को रुकी, फिर आँखें खोलकर भगवान की मूर्ति की तरफ़ देखते हुए बोली,"और हाँ... मेरा भी कुछ सोच लेना प्रभु। नहीं तो ये तो एक दिन हिमालय निकल जाएगी तपस्या करने... और दोस्ती निभाने के चक्कर में मुझे भी साथ घसीट ले जाएगी।"

इतना सुनते ही पहली लड़की ने गहरी साँस ली, आँखें खोलीं और धीरे-धीरे उसकी तरफ़ मुड़ी।
उसके चेहरे पर नाराज़गी नहीं थी... बस एक बेबस-सी मुस्कान थी, जैसी किसी को अपने सबसे प्यारे इंसान की आदतों पर आती है।

"तेरी प्रार्थना खत्म हो गई हो..." उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तो अब भगवान को भी थोड़ी शांति दे दे। सुबह-सुबह उन्हें भी तेरी शिकायतें सुननी पड़ रही हैं।"

वह अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि बगल में खड़ी लड़की ने झट से उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

"अरे चुप कर, आरोही!" उसने धीरे से डाँटते हुए कहा, "क्या-क्या बोले जा रही है तू? भगवान को भगवान रहने दे, मेरी माँ। उनके साथ भी तुकबंदी लगाए बिना तेरा दिन शुरू नहीं होता क्या?"

आरोही ने उसके हाथ को हटाया और आँखें दिखाते हुए बोली, "अच्छा! मैं फालतू बोल रही हूँ... या तू बोल रही है, मेरी भक्तिन अनु?"

अनु बस मुस्कुरा दी। वह जानती थी, आरोही से बहस करना मतलब खुद ही हार मान लेना।

"अच्छा बाबा... तू जीत गई।" उसने दोनों हाथ उठाकर कहा, "अब चल, ऑफिस भी समय पर पहुँचना है। पहली ही मीटिंग लेट हो गई, तो फिर तेरी ही शिकायतें सुननी पड़ेंगी।"
"मेरी नहीं, तेरी," आरोही ने तुरंत टोका, "मैं तो समय पर तैयार हो जाती हूँ। देर हमेशा तू पूजा में लगा देती है।"

"हाँ, हाँ... सब मेरी ही गलती होती है।"दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़ीं।हँसी थमने के बाद दोनों ने फिर से भगवान गोविंद के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। आरोही तो बाहर निकलने के लिए मुड़ गई, लेकिन अनु कुछ पल वहीं खड़ी रही। उसने भगवान की मूर्ति की तरफ़ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली,

"मेरी दोस्त की बातों का बुरा मत मानना, गोविंद।"उसने एक पल रुककर धीरे से सिर झुका दिया।
"थोड़ी नादान है... और थोड़ी-सी बेवकूफ़ भी। जो मन में आता है, वही बोल देती है।"पीछे से आरोही की आवाज़ आई, "सब सुन रही हूँ मैं ! 

"हाँ... हाँ... क्यों नहीं!" आरोही ने मुँह बनाते हुए कहा, "तू तो पैदा ही दादी माँ हुई थी।"अनु उसे बस देखकर मुस्कुरा दी।जा अब... पहले तैयार हो जा।
"हाँ, जा रही हूँ। लेकिन प्लीज़, आज पूजा के बाद कोई नया प्रवचन मत शुरू कर देना।"

इतना कहकर आरोही अपने कमरे की तरफ़ चली गई। जाते-जाते भी उसकी बड़बड़ाहट बंद नहीं हुई, जिसे सुनकर अनु के चेहरे की मुस्कान और गहरी हो गई।
आरोही के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही घर में फिर वही सुबह वाली शांति लौट आई।

अनुराधा ने अपने लंबे, घुँघराले बालों को पीछे समेटकर ढीला-सा जूड़ा बना लिया। फिर रसोई की तरफ़ बढ़ते हुए खुद से ही बुदबुदाई,
"चल अनु... जब तक आरू तैयार होती है, नाश्ता बना लेती हूँ। नहीं तो मैडम की वजह से फिर खाली पेट ही ऑफिस भागना पड़ेगा।"

रसोई में पहुँचकर उसने गैस जलाई और फ्रिज खोलते हुए जैसे अचानक कुछ याद आया।वैसे आज थोड़ा जल्दी निकलना होगा..."

उसने सब्ज़ियाँ निकालते हुए खुद ही अपनी बात पूरी की,"सर के बड़े बेटे आज पहली बार ऑफिस आने वाले हैं। पंद्रह साल बाद वापस लौटे हैं... और अब वही कंपनी संभालेंगे।"एक पल को उसके हाथ रुक गए।

"देखते हैं..." उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई, "आख़िर कैसे होंगे नए बॉस।"अगले ही पल उसने सिर झटक दिया, जैसे खुद को ही टोक रही हो।"मुझे क्या... बॉस कोई भी हो, काम तो वही करना है।"

इतना कहकर उसने फिर पूरी तल्लीनता से नाश्ता बनाने में खुद को लगा दिया। उसके लिए हर दिन की तरह यह सुबह भी बस एक और कामकाजी सुबह थी।

उसे क्या पता था...जिस इंसान को वह सिर्फ़ अपना नया बॉस समझ रही थी, कुछ ही घंटों बाद वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाला था।