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तेरे लिए जानम Chapter-11

तेरे लिए जानम Chapter-11

कमरे का दरवाज़ा खुला और आरोही बाहर निकली। निकलते-निकलते उसने शीशे में खुद पर एक नज़र डाली, गले में पड़ा गुलाबी स्कार्फ़ उँगलियों से ठीक किया और चेहरे पर आ रही बालों की एक लट को कान के पीछे सरका दिया। अगले ही पल वही लट फिर वापस आ गई।

"उफ़्फ... तू भी ना!" वह खुद से बुदबुदाई और हार मानकर मुस्कुरा दी।

हमेशा की तरह सबसे पहले आरोही की आवाज़ घर में गूँज गई।मैडम अनुराधा ठाकुर... ज़रा इधर भी नज़र डाल लीजिए।"lअनु ने पलटकर देखा तो अनायास ही उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।

उसकी इस आदत पर उस को हमेशा हँसी आती थी। खुले, रेशमी बालों से वह चाहे जितनी लड़ाई लड़ ले, आखिर में उन्हें खुला ही छोड़ देती। ब्लू जींस और ढीली-सी सफ़ेद शर्ट में वह हमेशा की तरह बेफ़िक्र लग रही थी। आँखों का हल्का-सा लाइनर उसकी बड़ी-बड़ी आँखों को और उभार रहा था, होंठों पर लगी हल्की-सी लिप ग्लॉस बिना बनावटी लगे चेहरे की ताज़गी बढ़ा रही थी। कानों में मोती की छोटी-सी बालियाँ और कलाई पर बँधी घड़ी... बस, इससे ज़्यादा सजना उसे कभी पसंद भी नहीं था।

"अब ऐसे मत देख..." उसने अनु को अपनी तरफ़ देखते पकड़ लिया, "वरना मुझे सच में लगने लगेगा कि मैं बहुत सुंदर लग रही हूँ।"

अनु हँस पड़ी।"लगने क्यों लगेगा? तू है ही सुंदर। आरोही ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ लिए और नाटकीय अंदाज़ में ऊपर देखते हुए बोली, "हे गोविंद... आज तुम्हारी भक्तिन ने मेरी तारीफ़ कर दी। लगता है आज सच में कोई चमत्कार होने वाला है।"

अनु ने पास रखा किचन टॉवल उठाकर उसकी तरफ़ उछाल दिया।बहुत ड्रामा करती है तू। आरोही ने हँसते हुए टॉवल पकड़ लिया और किचन के स्लैब पर बैठ गई।ड्रामा नहीं मैडम... कॉन्फिडेंस कहते हैं इसे। और अब तू भी जल्दी से तैयार हो जा, मेरी राधा।

उसने शरारती नज़रों से अनु को देखा।आख़िर आज तेरी मुलाक़ात तेरे नए बॉस से जो होने वाली है...।वह  प्लेट में रखा चिल्ला उठाकर खाने लगी। वैसे..." उसने चिल्ला का एक कौर लेते हुए कहा, "आज मुझे तेरी थोड़ी चिंता हो रही है।"

अनु ने गैस धीमी करते हुए पूछा,"अब क्या हुआ?"आरोही ने रहस्यमयी अंदाज़ में आँखें छोटी कर लीं। सुना है, आज से सर के बड़े बेटे ऑफिस संभालने आ रहे हैं। पूरे पंद्रह साल बाद इंडिया लौटे हैं।

अनु ने मुँह बना कर बोली, यह बात पूरी ऑफिस ने सुना है। कुछ नया हो तो बोल। आरोही ने उसके मुँह मे चिल्ला का एक कौर देती हुई बोली, " "और लोग कहते हैं....बंदा बड़ा खतरनाक है। गुस्सा ऐसा कि सामने वाला दो बार साँस लेने से पहले भी सोचे। ऊपर से आज तक ऑफिस में किसी ने उन्हें ठीक से देखा तक नहीं। पूरा का पूरा मिस्ट्री मैन!"

वह एक पल को रुकी, फिर अचानक अनु की तरफ़ उँगली करके बोली,"और मेरी सीधी-सादी, भोली-भाली भक्तिन को उसी आदमी की पर्सनल असिस्टेंट बना दिया गया है।"

उसने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर देखा।"हे राधा रानी... मेरी इस गाय जैसी दोस्त की रक्षा करना।"
अनु अपनी हँसी रोक न सकी। "गाय?"

"हाँ।" आरोही ने पूरी गंभीरता से सिर हिलाया। तू दुनिया की इकलौती लड़की है जो किसी से लड़ना तो दूर, तेज़ आवाज़ में बात तक नहीं कर सकती। और आज तेरा पाला सीधे ऐसे आदमी से पड़ने वाला है, जिसका नाम सुनकर लोग फाइलें सीधी पकड़ लेते हैं।

अनु ने उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।"बस कर... सुबह-सुबह मुझे डरा मत। मैं डरा नहीं रही..." आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा, "...मैं तो बस शाम का ट्रेलर पहले ही दिखा रही हूँ।"

मेरा क्या होगा? पहले कोई गलती तो करूँ।अनु ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।"अरे, गलती करने के लिए तेरे जैसा सीधा इंसान ही तो चाहिए।" आरोही ने तुरंत जवाब दिया।चल, अब चपड़-चपड़ बंद कर।  तू खा, मैं तैयार होकर आती हूँ। "जी, मैडम।"

अनु ने सिर हिलाया और फिर अपने कमरे मे चली गईं ।उसे अपने नए बॉस के बारे में कोई उत्सुकता नहीं थी।उसे बस समय पर ऑफिस पहुँचना था।और आरोही...उसे पूरा यक़ीन था कि आज ऑफिस में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होने वाला है, जिसकी कहानी शाम को चाय के साथ सुनने लायक होगी।


आरोही ने आराम से नाश्ता किया। बीच-बीच में मोबाइल पर नज़र डालती, कभी कोई धुन गुनगुनाने लगती, तो कभी बिना वजह मुस्कुरा देती। प्लेट खाली करके वह उसे सिंक में रखने उठी ही थी कि कमरे का दरवाज़ा खुलने की हल्की-सी आवाज़ आई।

उसने पलटकर देखा...और कुछ पल तक बस देखती रह गई।अनु धीरे-धीरे उसकी तरफ़ चली आ रही थी।क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रही है?"
तू इंसान है ना... या ऊपर वाले ने फुर्सत में बैठकर कोई स्पेशल पीस बनाया है?"

अनु खिलखिलाकर हँस पड़ी।सुबह-सुबह फिर शुरू हो गई? मैं मज़ाक नहीं कर रही। आरोही ने उसके गाल के पास आई बालों की एक लट पीछे करते हुए कहा, "देख ज़रा खुद को... बस थोड़ा-सा काजल, होंठों पर लिप बाम... और मैडम तैयार।"

अनु ने हँसते हुए उसका हाथ हटा दिया और तू? आधा घंटा शीशे के सामने खड़े होकर भी चैन नहीं पड़ता।।क्योंकि मेहनत मुझे करनी पड़ती है," आरोही ने नाटकीय अंदाज़ में आह भरी, "और तू... तू तो ऐसे ही लोगों का दिल दुखा देती है।"

दोनों अपनी-अपनी जगह बेहद खूबसूरत लग रही थीं, लेकिन अनुराधा में कुछ ऐसा था कि उस पर नज़र टिक जाए तो आसानी से हटने का नाम न ले। उसके चेहरे की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती थी।

 आरोही ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए। " अरे नही यार कसम से !  क्या बवाल लग रही है तू। रास्ते में किसी का खून करवाने का इरादा है क्या?" अनुराधा ने नाश्ते की प्लेट उठाते हुए उसे घूरा। क्योंकि अब वह चिढ गयी थी। आज आरोही कुछ ज्यादा ही उसे तंग कर रहीं थी।

"आरू, क्या बोले जा रही है तू? मैंने ऐसा क्या कर लिया? मैंने तो कुछ लगाया भी नहीं है।"
"यही तो दिक्कत है।" आरोही उसके पास आई और अपनी उँगली से थोड़ा-सा काजल लेकर उसके कान के पीछे टीका लगा दिया। "तुझे किसी की नज़र न लगे, मेरी राधू।"

फिर उसने अनुराधा को सिर से पाँव तक देखा और मुस्कराकर बोली, "तू कुछ करे या न करे, वैसे ही बहुत खूबसूरत है... और आज तो कमाल लग रही है। ऊपर से इस ठंड में तेरे गाल और नाक जो हल्के-हल्के लाल हो जाते हैं न... बस, फिर तो लड़कियों की ही नीयत डोल जाए, लड़कों का तो पूछ ही मत।"
अच्छा?" अनु ने भौंह उठाई और बैग उठाते हुए मुस्कुराकर बोली,"हो गया तेरी तारीफ़ों का कोटा? अब निकलें? पहले ही दिन देर हो गई तो अच्छा नहीं लगेगा।"

हाँ। ऑफिस में अगर आज किसी की नज़र तुझ पर पड़ गई ना, तो मुझे बिल्कुल हैरानी नहीं होगी।"
आरू...!" अनुराधा ने उसे बनावटी गुस्से से घूरा।

"अच्छा-अच्छा... मेरी देवी, माफ़ कर दे।" आरोही ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ लिए, फिर पास रखा उसका दुपट्टा उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए बोली, "ये ले, इससे अपना चेहरा ढक ले। कम से कम रास्ते में लोग चैन से अपने काम पर जा सकेंगे।"
दोनों ने घर का दरवाज़ा बंद किया और हँसते-बातें करते हुए बाहर निकल गईं।

अनुराधा मुस्कराए बिना नहीं रह सकी। उसने दुपट्टा चेहरे पर बाँधा, दोनों ने जल्दी-जल्दी अपना सामान उठाया और फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर नीचे आ गईं। कुछ ही क्षण बाद उनकी स्कूटी मुंबई की व्यस्त सड़कों की ओर बढ़ चुकी थी।