तेरे लिए जानम Chapter-6
- 24 October, 2026
रघुवंशी मेंशन का वातावरण अब पहले से बिल्कुल बदल चुका था। कुछ देर पहले तक जहाँ बरसों के बिछोह की नमी थी, वहीं अब घर के हर कोने में अपनापन और हल्की-हल्की हँसी घुल गई थी। बड़े-बूढ़ों के चेहरे पर संतोष था, बच्चों के मन में उत्साह, और घर की दीवारें भी जैसे वर्षों बाद लौटे अपने बेटे का स्वागत कर रही थीं।
इसी बीच पहली मंज़िल की कोरिडोर से एक जोड़ी आँखें लगातार नीचे का दृश्य देख रही थीं।
वह मृत्युंजय रघुवंशी थे।
वर्षों बाद अपने बेटे को सामने देखकर भी वह सीढ़ियाँ उतरकर उसके पास नहीं आ सके। न जाने कितनी बार मन ने चाहा कि एक बार उसे पुकार लें, उसके सिर पर हाथ फेर दें, उसे अपने सीने से लगा लें; पर उनके कदम जैसे वहीं थम गए थे।
राम केवल उनका बेटा ही नहीं था, वह उनकी पहली पत्नी अवंतिका रघुवंशी की अंतिम निशानी भी था।
मृत्युंजय की दृष्टि राम के चेहरे पर ठहर गई। समय ने उसके व्यक्तित्व को निखार दिया था। चेहरे की बनावट, चाल, कद-काठी और व्यक्तित्व—सब कुछ उन्हीं पर गया था। केवल उसकी आँखें... वे आँखें बिल्कुल अवंतिका जैसी थीं। वही गहराई, वही शांत गंभीरता और वही अनकहे भाव।
मृत्युंजय उन आँखों को देर तक देखते रहे। शायद उनमें वह अपना बीता हुआ जीवन खोज रहे थे।
तभी उनकी दृष्टि धीरे-धीरे राम से हटकर सामने गई।माधुरी रघुवंशी राम की ओर बढ़ रही थीं।
उन्हें देखते ही मृत्युंजय के चेहरे का भाव बदल गया। उनकी भौंहें अनायास तन गईं। आँखों की गंभीरता और गहरी हो उठी।
उन्होंने धीरे से अपना अंगूठा दूसरी उँगलियों पर रगड़ना शुरू कर दिया। यह उनकी पुरानी आदत थी। जब भी मन किसी गहरे द्वंद्व या चिंता में उलझता, उनकी उँगलियाँ अनायास ही यही हरकत करने लगती थीं।अब उनकी पूरी दृष्टि माधुरी पर टिक गई थी।
रघुवंशी मेंशन के हॉल में अभी हँसी की हल्की-हल्की गूँज शेष थी कि तभी ऊपर से आती रेशमी साड़ी की सरसराहट ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
सीढ़ियों से उतरती हुई माधुरी रघुवंशी धीरे-धीरे हॉल में आ रही थीं।
समय ने उनकी आयु अवश्य बढ़ाई थी, पर उनके व्यक्तित्व की आभा पर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। उनकी चाल में एक ऐसा संयमित आत्मविश्वास था, जिसे देखकर सहज ही आभास हो जाता था कि वे इस घर की बड़ी बहू हैं।
पर उनके हॉल में उतरते ही वातावरण की सहजता जैसे कहीं खो गई।
अभी कुछ क्षण पहले तक जो हँसी पूरे हॉल में बिखरी हुई थी, वह एकाएक सिमट गई। कई चेहरे अनायास ही गंभीर हो उठे। किसी ने कुछ नहीं कहा, फिर भी वहाँ उपस्थित लगभग हर व्यक्ति की आँखों में एक-सा भाव उतर आया।
किन्तु उन बदलते भावों से माधुरी क़ो कोई फर्क नही पड़ा। उसने एक बार भी इधर-उधर देखने का प्रयास नहीं किया। उसके कदम सीधे राम के सामने आकर थम गए।
कुछ क्षण तक वे उसे देखती रहीं।फिर शांत स्वर में कहा, "राम... तुम कब आये ! हमे तो किसी ने बताया ही नही। "मधुरी ने एक नजर केतकी पर डाली लेकिन केतकी क़ो जैसे फर्क ही नही पड़ा था।
राम ने कोई रिस्पांस नही किया बल्कि वह अपने भाई बहन के बीच उसी तरह से मौजूद रहा। जैसे माधुरी के आने से पहले था ।उसको यु खुद क़ो नजरअंदाज करते देख माधुरी खुन के घूंट पी कर रह गयी थी। फिर अगले पल उसने कटाक्ष मे कहा,
"अजीब बात है... तुम्हें मैं और तुम्हारे पापा दिखाई ही नहीं दिए। जिनके सबसे पहले चरण स्पर्श करने चाहिए थे या फिर... न्यूयॉर्क में रहकर रघुवंशी खानदान के संस्कार भी वहीं छोड़ आए हो?"
उसका स्वर ऊँचा नहीं था, फिर भी हॉल का एक-एक व्यक्ति वह कटाक्ष स्पष्ट सुन रहा था।
एक पल में वातावरण फिर बदल गया।अर्जुन जी के चेहरे की मुस्कान गायब हो चुकी थी। केतकी जी की उँगलियाँ अनायास एक-दूसरे में उलझ गईं। अभिमन्यु की आँखों में क्षणभर के लिए तीखापन उतर आया। विवान और अथर्व ने भी एक-दूसरे की ओर देखा, पर किसी ने कुछ नहीं कहा।
सबकी दृष्टि अब केवल राम पर थी।किन्तु राम की मुद्रा में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं आया।
वह उसी शांत भाव से खड़ा रहा। उसके चेहरे पर न प्रतिवाद था, न आक्रोश, न ही कोई असहजता। जैसे उसने उन शब्दों को सुना ही नही और मौजूद शख्स उसके लिए कोई महत्व नही रखता हो।
उसकी चुप्पी, उस क्षण, किसी भी उत्तर से कहीं अधिक गहरी थी।
उसका यु सबके सामने कोई रिस्पांस नही देना माधुरी क़ो बिलकुल गवारा नही थी और इस वक़्त उसने अपनी जहर की जुबान खोल दी।
राम का सबके सामने यूँ शांत खड़े रहना और एक शब्द तक न कहना, माधुरी को बिल्कुल स्वीकार नहीं हुआ। उन्हें जैसे उसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार था, जो उन्हें मिली ही नहीं। राम की खामोशी ने उनके भीतर का आक्रोश और बढ़ा दिया।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और इस बार उनके शब्दों की धार पहले से कहीं अधिक तीखी थी।
"तुम बचपन में भी बदतमीज़ थे... और इतने साल बाद भी वैसे ही हो। बाहर रहकर भी अपनी हरकतें नहीं सुधार सके।"
उनके शब्द पूरे हॉल में गूँज उठे।कुछ क्षण पहले तक जो घर अपनों के मिलन की खुशियों से भरा था, वहाँ अब एक अजीब-सी खामोशी फैल गई। कोई कुछ नहीं बोला, लेकिन हर चेहरा बता रहा था कि माधुरी की बातें सबको चुभ रही थीं।
माधुरी अभी और कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी हॉल में एक तेज़ आवाज़ गूँजी, " मॉम...!"
सबकी नज़र एक साथ विवान की ओर उठ गई।अब तक शांत खड़ा विवान पहली बार अपनी माँ के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
"आपकी प्रॉब्लम क्या है?" उसकी आवाज़ में दबा हुआ आक्रोश अब खुलकर सामने आ चुका था। "आपको किसी ने यहाँ बुलाया था? यहाँ आकर आप होती कौन हैं भाई के लिए कुछ भी कहने वाली?"
वह बिना रुके बोलता गया।"किस हक़ से आप उनसे इस तरह बात कर रही हैं?"उसने एक पल के लिए राम की ओर देखा, फिर वापस माधुरी की तरफ़ मुड़ा।
"आपको तो अच्छी तरह मालूम है... भाई ने आपको कभी अपनी माँ का दर्जा दिया ही नहीं। आप उनके लिए हमेशा डैड की दूसरी पत्नी रहेगी। हर बार मुँह उठा कर क्यों चली आती है आप !""
उसके आख़िरी शब्दों के साथ ही पूरा हॉल जैसे स्तब्ध रह गया। किसी ने शायद नहीं सोचा था कि विवान एक दिन अपनी ही माँ से इस तरह सवाल करेगा। उसकी आवाज़ में केवल गुस्सा नहीं था, बल्कि वर्षों से भीतर दबा हुआ सच भी था, जो आज सबके सामने आ गया था।
राम की खामोशी माधुरी को भीतर तक चुभ रही थी। उन्हें जैसे उसी पल का इंतज़ार था जब राम अपना संयम खो बैठे, लेकिन सामने खड़ा युवक बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत भाव से उन्हें देख रहा था। उसकी यही चुप्पी माधुरी के भीतर वर्षों से जमा आक्रोश को और भड़का रही थी।
उन्होंने तीखी नज़र विवान की ओर घुमाई। अपने ही बेटे का इस तरह सबके सामने उनके विरुद्ध खड़ा होना उन्हें असहनीय लगा। आवेश में उन्होंने बिना एक क्षण सोचे अपना हाथ उठाया और विवान के गाल पर थप्पड़ मारने के लिए उनका हाथ उठा.... लेकिन अगले ही पल..!
किसी को समझने का अवसर तक नहीं मिला कि हुआ क्या। अगले ही पल विवान राम के पीछे खड़ा था। राम ने इतनी तीव्र गति से उसकी बाँह पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया था कि माधुरी का उठता हुआ हाथ हवा में ही ठहरकर रह गया।
राम अब भी वहीं खड़ा था। उसके चेहरे पर पहले जैसी ही शांति थी। एक हाथ सहजता से विवान की बाँह पर टिका हुआ था, मानो उसे यह भरोसा दे रहा हो कि जब तक वह सामने खड़ा है, कोई हाथ उस तक पहुँच नहीं सकता।
माधुरी ने गुस्से मे अपना हाथ नीचे कर लिया। उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा था। दाँत भींचे वे कुछ क्षण तक केवल राम को देखती रहीं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वर्षों पहले का वह लड़का अब वैसा नहीं रहा।उन्होंने अपने भीतर उबलते विष को शब्दों का रूप दिया।
"विवान... तुम अपनी माँ से इस लहज़े में बात करोगे?" उनका स्वर अब पहले से कहीं अधिक कठोर था। "और जिसके लिए तुम मुझसे बहस कर रहे हो..." उनकी दृष्टि राम पर टिक गई, "...वो आखिर आ ही गया।"
उनके होंठों पर व्यंग्य तैर उठा।"क्यों, राम...? इतने साल बाद लौटने की वजह क्या है? इस घर की याद आ गई... या अपने हिस्से की?"
राम फिर भी मौन रहा।उसकी चुप्पी अब उत्तर नहीं, चुनौती बन चुकी थी। जितना वह शांत खड़ा था, माधुरी का स्वर उतना ही तीखा होता जा रहा था।
"पंद्रह साल पहले तुम्हारी..." उन्होंने लगभग ज़हर उगलते हुए कहा, "...वो बदचलन..."! माधुरी के
शब्द पूरा होने से पहले ही...।
राम की नजर उठी....बस एक नजर ...और उस नजर ने पूरे हॉल का वातावरण बदल दिया।
उसकी आँखों में पहली बार दबा हुआ ज्वालामुखी दिखाई दिया। चेहरा अब भी निर्विकार था, मगर आँखों की लालिमा बता रही थी कि अब बात उसके स्वाभिमान की नहीं रही थी।
उसने अपने लिए हर अपमान सह लिया था...लेकिन अपनी माँ के लिए नहीं। उस क्षण हॉल में उपस्थित हर व्यक्ति ने महसूस किया कि माधुरी ने वह सीमा लाँघ दी है, जहाँ से लौटना अब संभव नहीं था।
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