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तेरे लिए जानम Chapter-19

तेरे लिए जानम Chapter-19

राम ने धीरे-धीरे अपना चेहरा सीधा किया। गाल पर थप्पड़ की लाल छाप साफ़ उभर आई थी, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं। 

थप्पड़ पड़ने के बाद भी राम ने न तो अपना हाथ उठाया और न ही कोई जवाब दिया। उसने बस बहुत धीरे से अपना चेहरा सीधा किया। उसके जबड़े की नसें तन चुकी थीं और आँखों में उतरती लालिमा उसके भीतर उठ रहे उबाल का पता दे रही थी। वह बिना पलक झपकाए अनुराधा को देख रहा था। उसकी वह चुप्पी किसी भी ऊँची आवाज़ से कहीं ज़्यादा भारी थी।

लेकिन अनुराधा जैसे रुकने वाली नहीं थी। उसके भीतर वर्षों से दबा भय, अपमान और गुस्सा एक साथ शब्द बनकर बाहर निकल रहा था। उसे यह भी एहसास नहीं रहा कि सामने खड़ा आदमी एक शब्द तक नहीं बोला था। वह बस अपने भीतर जमा हर तकलीफ़ उसी पर उँडेलती जा रही थी।

"मैंने तो सिर्फ़ इतना कहा था कि... आप बदतमीज़ हैं।" उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, फिर भी वह बोलती रही, "लेकिन आप तो निहायत ही... घटिया इंसान हैं। एक अकेली लड़की देखी नहीं कि..."

वाक्य अधूरा रह गया।बोलते-बोलते उसकी नज़र पहली बार सीधे राम की आँखों से जा मिली।
वह जैसे वहीं ठिठक गई।

उन आँखों में गुस्सा था, लेकिन वह शोर मचाता हुआ गुस्सा नहीं था। वह बिल्कुल स्थिर था। इतना स्थिर कि उसे देखकर अनुराधा के भीतर का साहस एक पल के लिए डगमगा गया। उसके होंठ खुले रह गए, पर आवाज़ साथ छोड़ चुकी थी। कमरे में फिर वही सन्नाटा उतर आया जिसमें केवल दोनों की साँसें सुनाई दे रही थीं।

अनुराधा ने अनायास अपने होंठ भींच लिए। वह जानती थी कि वह डर गई है, मगर वह यह डर उसके सामने प्रकट नहीं होने देना चाहती थी। उसने अपनी उँगलियाँ दुपट्टे में और कस लीं, एक गहरी साँस लेकर खुद को संभालने की कोशिश की और दोबारा कुछ कहने के लिए होंठ खोले।

उसी क्षण राम उसकी ओर बढ़ा।उसके कदम तेज़ नहीं थे, फिर भी हर कदम अनुराधा के दिल की धड़कन और बढ़ा देता था। वह अनायास पीछे हटती चली गई। एक कदम... फिर दूसरा... फिर तीसरा... और तभी उसकी पीठ दीवार से जा लगी। उसने पलटकर देखा, पीछे हटने की अब कोई जगह नहीं बची थी।

राम उसके सामने आकर रुक गया।दोनों के बीच बस उतनी ही दूरी रह गई थी जितनी दो लोगों के बीच साँसों के टकराने के लिए काफ़ी होती है। अनुराधा ने महसूस किया कि उसका गला पूरी तरह सूख चुका है। उसने मुश्किल से थूक निगला। उसके हाथ अब भी दुपट्टे को कसकर पकड़े हुए थे, मानो वही उसे टूटने से बचाए हुए हो।

वह अपने चेहरे पर दृढ़ता बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में उतर आई घबराहट अब छिप नहीं रही थी।

उसने काँपते होंठों से बोलना चाहा।"य... ये...आ... आप..."। लेकिन शब्द वहीं अटक गए। सामने खड़ा आदमी अब भी चुप था, और उसकी वही ख़ामोशी अनुराधा के भीतर उठ रहे तूफ़ान को और गहरा करती जा रही थी।

राम एक कदम और आगे बढ़ा। दोनों के बीच की दूरी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथ अनुराधा के दोनों ओर दीवार पर टिकाए, लेकिन उसे छुआ नहीं। फिर भी उसके इतने करीब खड़े होने भर से अनुराधा की धड़कनें बेकाबू हो गईं। वह दीवार से लगी खड़ी थी और उसकी निगाहें कभी राम के चेहरे पर जातीं, तो कभी बाहर निकलने का कोई रास्ता ढूँढ़ने लगतीं।

उसने हिम्मत जुटाकर कुछ कहना चाहा, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र राम की सुलगती हुई आँखों से मिली, उसके शब्द होंठों पर ही थम गए।

राम कुछ पल तक बिना कुछ बोले उसे देखता रहा। फिर उसने अपने जबड़े भींचे और हर शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा,

"How dare you... मुझे थप्पड़ मारने की।"उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन उसमें दबा हुआ गुस्सा साफ़ महसूस किया जा सकता था।तुम जानती भी हो... राम रघुवंशी को एक थप्पड़ मारने का अंजाम क्या हो सकता है?"

अनुराधा का गला सूख गया। उसने मुश्किल से अपने हलक में थूक निगला। डर अब भी उसके भीतर था, लेकिन उसने उसे अपने चेहरे पर हावी नहीं होने दिया। काँपती साँसों के बावजूद उसने खुद को संभाला और धीमे, मगर साफ़ शब्दों में जवाब दिया,

"हाँ... तो... तो आपकी हिम्मत कैसे हुई... मुझे इस कमरे में रखने की?"

उसने एक पल के लिए राम की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, फिर भी उसने अपनी बात पूरी की।
"ऐसे कौन करता है किसी लड़की के साथ? बिना उसकी मर्ज़ी के उसे एक अनजान कमरे में ले आते हैं... और फिर उम्मीद करते हैं कि वो डरे नहीं?"

उसके शब्दों के बाद कमरे में फिर वही भारी खामोशी उतर आई। दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े थे। एक के भीतर गुस्सा उबल रहा था, तो दूसरी के भीतर डर और आक्रोश एक साथ टकरा रहे थे।

राम अब तक अपने गुस्से को जैसे किसी तरह काबू में रखे हुए था, लेकिन अनुराधा का हर जवाब उसके धैर्य की आख़िरी सीमा को छू रहा था। उसकी आँखों में वही सुलगता हुआ गुस्सा था, जिसे वह लगातार दबाने की कोशिश कर रहा था।

अचानक उसने आगे बढ़कर एक हाथ से अनुराधा के दोनों गाल कसकर पकड़ लिए।अनुराधा दर्द से हल्का-सा सिहर उठी।

राम ने उसकी आँखों में सीधा देखते हुए दबी हुई, लेकिन बेहद सख़्त आवाज़ में कहा, "जाहिल लड़की... बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती हो, और हाथ भी बहुत जल्दी उठा देती हो। दिमाग़ नाम की भी कोई चीज़ होती है... जो लगता है तुम्हारे पास बिल्कुल नहीं है, बेवकूफ़ लड़की।"

उसके शब्द जितने कठोर थे, उतनी ही गहरी खामोशी कमरे में फैलती जा रही थी।अनुराधा ने खुद को छुड़ाने की कोशिश नहीं की। वह बस उसे देखती रही। अगले ही पल उसकी आँखों में तैरती नमी भर आई। उसने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन आँसू उसकी पलकों की कैद से निकल ही गए। दो बूँदें उसके गालों से लुढ़कती हुई सीधे राम की उँगलियों पर आ गिरीं।

राम की आवाज़ वहीं थम गई।उसकी नज़र पहली बार अनुराधा के चेहरे पर ठहरी। कुछ क्षण पहले तक गुस्से से भरा उसका ध्यान अब उस मासूम चेहरे पर टिक गया था, जो इस वक़्त डर, अपमान और बेबसी के बीच चुपचाप खड़ा था।

बिना कुछ कहे उसने धीरे से अपना हाथ उसके चेहरे से हटा लिया।फिर भी वह अपनी जगह से नहीं हटा।उन दोनों के बीच की दूरी अब भी उतनी ही कम थी।

उधर अनुराधा ने तुरंत अपना चेहरा झुका लिया। वह नहीं चाहती थी कि राम उसकी आँखों में भरे आँसू देखे। उसने होंठ भींच लिए, ताकि कोई सिसकी बाहर न निकल सके। उसकी उँगलियाँ दुपट्टे के किनारे को इतनी कसकर पकड़े हुए थीं कि पोर सफ़ेद पड़ गए थे।

कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।एक तरफ़ राम था, जो अब भी अपने भीतर उठते गुस्से से जूझ रहा था, और दूसरी तरफ़ अनुराधा, जो अपने आँसुओं को किसी भी कीमत पर उसके सामने अपनी कमज़ोरी नहीं बनने देना चाहती थी।

राम कुछ देर तक अनुराधा को देखता रहा। उसके झुके हुए चेहरे पर बिखरी बेबसी, पलकों से चुपचाप गिरते आँसू और खुद को मज़बूत दिखाने की उसकी नाकाम कोशिश राम के भीतर एक अजीब-सी उथल-पुथल पैदा कर रही थी। 

अभी कुछ क्षण पहले तक जो गुस्सा उसके भीतर धधक रहा था, वह जाने कब धीरे-धीरे पिघलने लगा। एक पल के लिए उसके मन में आया कि वह उसे अपने सीने से लगा ले, उसके काँपते हुए मन को सुकून दे दे, उससे कह दे कि अब उसे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं है।

 लेकिन अगले ही पल उसने अपनी उस इच्छा को वहीं दबा दिया। वह जानता था कि इस समय उसका ऐसा कोई भी कदम अनुराधा की नज़रों में उसकी छवि और खराब कर देगा। हालात उसके पक्ष में नहीं थे और न ही यह सही समय था।

उसने गहरी साँस लेकर अपने भीतर उठ रहे भावों को फिर से काबू में किया। कुछ क्षण तक चुप रहने के बाद वह धीमी, लेकिन सख़्त आवाज़ में बोला, "वैसे तो मैं किसी को अपनी सफ़ाई देना ज़रूरी नहीं समझता, लेकिन तुम्हारी जानकारी के लिए इतना बता देता हूँ कि जिस इंसान के बारे में तुम इतने देर से फ़ैसला सुनाती जा रही हो, उसने तुम्हारे साथ आखिर किया क्या है।"

राम की नज़रें अब भी उसी पर टिकी थीं, जबकि अनुराधा ने अपना चेहरा झुकाए रखा।
"तुम लिफ्ट में अचानक बेहोश हो गई थीं। उस समय पूरे फ्लोर पर कोई नहीं था। अब बताओ, तुम्हें उस हालत में अकेला छोड़ देता? इसलिए तुम्हें उठाकर यहाँ ले आया।"

वह कुछ पल के लिए रुका, फिर हल्की-सी कड़वाहट भरी मुस्कान उसके होंठों पर उभरी।
"Don't you think... इस सबके बाद तुम्हें कम-से-कम एक 'Thank You' तो कहना चाहिए था?"

उसने बिना आवाज़ ऊँची किए आगे कहा, "हर बात का दूसरा पहलू भी होता है। सिर्फ़ बोलती ही रहती हो... कभी-कभी सामने वाले की बात सुनना भी सीखो... पागल लड़की।"

अनुराधा अब भी चुप थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी पलकों से आँसू लगातार गिर रहे थे। तभी एक गर्म आँसू राम की उँगलियों पर आकर ठहरा। उस स्पर्श ने जैसे उसे अचानक एहसास दिला दिया कि वह अब भी उसके चेहरे को ज़रूरत से ज़्यादा कसकर पकड़े हुए है।

राम ने तुरंत अपनी पकड़ ढीली कर दी।धीरे से उसने उसकी ठुड्डी ऊपर की, ताकि उसका चेहरा ठीक से देख सके।अनुराधा ने चाहकर भी उसकी तरफ़ नहीं देखा।उसकी नज़रें झुकी रहीं।

लेकिन राम की नज़र उसके दोनों गालों पर जाकर ठहर गई।उसकी उँगलियों के लाल निशान उसके गोरे चेहरे पर साफ़ उभर आए थे।एक पल के लिए राम बिल्कुल शांत हो गया।उसे एहसास हुआ कि गुस्से में उसने उसके जबड़े को ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ज़ोर से दबा दिया था।

उसने अनजाने में उसे तकलीफ़ पहुँचा दी थी।यह ख़याल आते ही उसके भीतर एक गहरा अपराधबोध उतर आया। कुछ क्षण पहले तक जो आदमी अपने गुस्से को सही मान रहा था, वही अब उन लाल पड़े निशानों को देखकर खुद से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।