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तेरे लिए जानम Chapter-5

तेरे लिए जानम Chapter-5

जानकी जी अब भी राम का चेहरा दोनों हथेलियों में थामे उसे निहारे जा रही थीं। मानो पंद्रह वर्षों की दूरी को अपनी आँखों में समेट लेना चाहती हों। वह बार-बार उसके माथे को सहलातीं, कभी उसके चेहरे को देखतीं, तो कभी उसे अपने सीने से लगा लेतीं।

उधर पंचदेव रघुवंशी काफ़ी देर से यह सब देख रहे थे।उनके मन की अवस्था भी कुछ भिन्न न थी। वह भी अपने पोते को बाँहों में भर लेना चाहते थे, उसके सिर पर हाथ फेरना चाहते थे, उससे दो बातें करना चाहते थे; पर जानकी जी थीं कि अपने पोते पर से अपना अधिकार हटाने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

आख़िरकार उन्होंने हल्की-सी खीझ और मुस्कान छिपाते हुए कहा,"बस भी कीजिए, जानकी जी।"
उनकी आवाज़ सुनकर सबकी दृष्टि उनकी ओर उठ गई।

उन्होंने बनावटी नाराज़गी से आगे कहा, "बच्चा इतने वर्षों बाद घर लौटा है और आप सारा रोना-धोना यहीं निपटा लेंगी क्या? ज़रा उसे घर के भीतर तो आने दीजिए।"फिर राम की ओर देखते हुए बोले, "हम भी यहीं खड़े हैं। हमसे भी तो मिलने दीजिए उसे।"

पंचदेव जी की बात सुनते ही वहाँ खड़े सब लोगों के चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान फैल गई। जानकी जी ने भी आँसू पोंछते हुए उनकी ओर देखा और अनमने मन से राम का हाथ छोड़ दिया, मानो अपना सबसे अनमोल ख़ज़ाना कुछ पल के लिए किसी और को सौंप रही हों।

जानकी जी अभी राम को अपने स्नेह से मुक्त भी न कर पाई थीं कि तभी पीछे से किसी ने आकर उन्हें और पंचदेव जी, दोनों को एक साथ अपनी बाँहों में भर लिया।

"दादू... दादी...!"अचानक हुए इस हमले से दोनों एक पल को चौंक पड़े।"अरे...!" जानकी जी के मुँह से अनायास ही निकला।

अभिमन्यु दोनों के कंधों पर अपनी ठुड्डी टिकाए बच्चों की तरह मुस्कुरा रहा था। उसके चेहरे पर वही पुरानी शरारत थी, जिसने न जाने कितनी बार इस घर की उदासी को हँसी में बदल दिया था।

"वाह...!" उसने बनावटी शिकायत के साथ कहा, "सारा प्यार तो अपने इस अकड़ू पोते पर ही लुटा दिया। ज़रा अपने इस गोद लिए पोते की भी नज़र उतार लीजिए।"यह कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर स्वयं की ओर इशारा किया।

"देखिए तो... कितना सोणा-सा मुंडा खड़ा है आपके सामने। पता नहीं कितनी चुड़ैलों की नज़र लगी होगी मुझे।"इतना कहकर वह एकाएक रुक गया।उसने गर्दन घुमाकर राम की ओर देखा, फिर होंठ दबाकर मुस्कुराया।

"...क्योंकि आपके इस अकड़ू पोते को तो किसी की नज़र लग ही नहीं सकती।"उसकी अधूरी बात सुनकर सब उसकी ओर देखने लगे।अभिमन्यु ने जानबूझकर कुछ क्षण का मौन रखा, फिर मासूमियत से बोला,"अरे... पूछिए तो सही क्यों?"

जानकी जी की आँखों की नमी अब मुस्कान में बदल चुकी थी। उन्होंने हँसी रोकते हुए पूछा, "अच्छा... बता, क्यों?"
"क्योंकि..." अभिमन्यु ने नाटकीय अंदाज़ में लंबी साँस ली, "उसकी नज़र उतारने के लिए तो पहले इसकी आँखो मे कोई देख तो ले। जो कोई इसकी डरवानी आँखो मे देखने की हिम्मत ही कँहा करता है,  जो साहब क़ो नजर लग जाये।"

उसकी बात पूरी होते ही वातावरण में फैली भारी नीरवता जैसे टूट गई। अभी तक जो आँखें आँसुओं से भीगी थीं, उन्हीं आँखों में अब हँसी की चमक उतर आई। पंचदेव जी ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। राम उसे बस घूर रहा था। लेकिन वह था अभिमन्यु राठौर, जिसे किसी का डर नही था।


जानकी जी ने स्नेहभरी झिड़की देते हुए उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।"चुप कर, बदमाश! इस उम्र में भी पिटने का बड़ा शौक है तुझे।"फिर उन्होंने उसी स्नेह से उसकी भी आरती उतारी, जैसे कुछ क्षण पहले राम की उतारी थी।आरती पूरी होते ही उन्होंने उसके गाल पर प्यार से हाथ फेरा।

"अब खुश?"अभिमन्यु बच्चों की तरह मुस्कुराकर बोला,"अब आया मज़ा..."।उसकी बात सुनते ही सब एक बार फिर हँस पड़े।जानकी जी ने मुस्कुराते हुए सबको भीतर चलने का इशारा किया।
"चलो... अब घर के अंदर चलें। बहुत देर से दरवाज़े पर ही खड़े हैं।"


सभी लोग हॉल के भीतर आ चुके थे। घर का वातावरण अब पहले से कहीं अधिक आत्मीय हो गया था। बरसों बाद लौटे राम को हर कोई अपने पास बैठाना, उससे बातें करना और उसे जी भरकर देख लेना चाहता था।

राम और अभिमन्यु ने एक-एक करके घर के सभी बड़ों के चरण स्पर्श किए। राम जैसे ही अर्जुन रघुवंशी के पैरों की ओर झुका, उन्होंने तुरंत उसके कंधों को थाम लिया और झुकने नहीं दिया। अगले ही क्षण उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया। उनकी हथेली बड़े स्नेह से राम की पीठ पर फिर रही थी। बरसों से मन में जो खालीपन था, वह जैसे उस एक आलिंगन से भरता जा रहा था।

"तू तो हमेशा मेरे दिल में रहा है, बेटा।" अर्जुन का स्वर भीग उठा। "आ... अपने चाचू के गले लग जा। बरसों से तेरा इंतज़ार कर रहा था। आज लगता है, मन की सारी बेचैनी खत्म हो गई।"

राम भी उसी अपनत्व से उनसे लिपट गया।"कैसे हैं आप, चाचू? "अब बिल्कुल ठीक हूँ... मेरे शेर।"
दोनों अभी अलग भी नहीं हुए थे कि पीछे खड़ी केतकी मुस्कराकर बोलीं, "बस भी कीजिए। सारा प्यार आप ही कर लेंगे, या अपनी छोटी माँ को भी उसके बेटे से मिलने देंगे?"अर्जुन मुस्कराते हुए एक ओर हट गए।

तभी अभिमन्यु उनके गले लग गया और दोनो माँ बेटे के मिलन क़ो देखने लगे।

राम तुरंत झुककर उनके चरण स्पर्श करने लगा। केतकी जी ने उसे उठाया और बिना कुछ कहे उसके माथे को चूम लिया। उनकी आँखें भीग उठीं। दोनों हथेलियों में उसका चेहरा थामे वे देर तक उसे निहारती रहीं।

 समय ने उसके व्यक्तित्व को और अधिक गंभीर, संतुलित और आकर्षक बना दिया था, किंतु उनकी दृष्टि में वह आज भी वही बालक था, जिसकी एक मुस्कान पर उनका सारा दिन खिल उठता था।

उन्होंने स्नेह से उसके गाल पर हाथ फेरा। कुछ कहना चाहा, पर शब्द होंठों तक आकर ठहर गए। ममता कभी-कभी बोलती नहीं, केवल स्पर्श बनकर बहती है। राम ने भी चुपचाप उनके हाथों पर अपना हाथ रख दिया। उस मौन में जितना अपनापन था, उतना शायद शब्दों में कभी नहीं हो सकता था।

केतकी देर तक उसे निहारती रहीं, जैसे बरसों की कमी अपनी नज़रों से पूरी कर लेना चाहती हों।
"नज़र न लगे मेरे बच्चे को..."उन्होंने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरते हुए कहा। बहुत बदल गया है तू... लेकिन मेरे लिए आज भी वैसा ही है। अब तो ज्यादा हैंडसम हो गया।"

राम ने आदर से उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया और हल्की मुस्कान के साथ बोला, "कैसी हैं आप... छोटी माँ?"बस इतना सुनना था।केतकी की आँखों की नमी मुस्कान में बदल गई।
पुरे हॉल मे कुछ पल के लिए माहौल बेहद भावुक हो चुका था।

अभी केतकी जी का स्नेहिल स्पर्श राम के चेहरे पर ठहरा ही था कि अचानक दो चहकती हुई आवाज़ें पूरे हॉल में गूँज उठीं, "भैया...!"

राम ने जैसे ही मुड़कर देखा, रूहिका और सौम्या दौड़ती हुई उसकी ओर चली आ रही थीं। अगले ही क्षण दोनों एक साथ उससे आकर लिपट गईं।"भैया...!"उनकी आवाज़ में बरसों की प्रतीक्षा थी, तो बचपन की वही निश्छल खुशी भी।

राम के होंठों पर सहज मुस्कान फैल गई। उसने बिना किसी प्रयास के दोनों को एक साथ अपनी बाजु में उठा लिया। अगले ही पल वह उन्हें लेकर एक बार गोल-गोल घूम गया।रूहिका और सौम्या की खिलखिलाहट पूरे हॉल में गूँज उठी।

वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति अनायास ही मुस्कुरा उठा। बरसों बाद उस घर में फिर वही पुरानी रौनक लौट आई थी।दोनों को नीचे उतारते ही रूहिका ने होंठ फुलाकर पूछा,"भैया... हमारा गिफ्ट?"

राम ने बनावटी गंभीरता से उसकी ओर देखा, फिर बिना कुछ कहे अपने पीछे खड़े लोगों की ओर इशारा कर दिया।सबकी नज़र उधर गई।उसके साथ आए कुछ लोग हाथों में तरह-तरह के बड़े-बड़े बैग लिए खड़े थे।

राम मुस्कुराया, " "जाओ... देख लो। जो पसंद आए, सब तुम्हारा।"इतना सुनना था कि रूहिका और सौम्या एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खुशी से उधर दौड़ पड़ीं। उनकी उत्सुकता देखकर हॉल में एक बार फिर हँसी की हल्की-सी लहर दौड़ गई।