तेरे लिए जानम Chapter-15
- 24 October, 2026
राम ने जैसे ही अनुराधा के मुँह से अपनी माँ और बहन के बारे में वह बात सुनी, उसके बढ़ते कदम वहीं ठिठक गए। कुछ क्षण तक वह बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा। फिर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए धीरे-धीरे मुड़ा और उसी शांत चाल से वापस लिफ्ट की ओर चल पड़ा।
उसे अपनी ओर लौटते देख अनुराधा का चेहरा एकाएक बदल गया। अभी कुछ क्षण पहले तक जो गुस्सा उसके शब्दों में था, वह पलभर में जाने कहाँ गायब हो गया। उसे लगा, शायद उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है।
जैसे ही राम लिफ्ट के भीतर आया, उसने घबराकर तुरंत 'डोर क्लोज़' का बटन दबाने के लिए हाथ बढ़ाया, मानो किसी तरह दरवाज़ा बंद होने से पहले उसे बाहर ही रोक दे। लेकिन उसकी उँगलियाँ बटन तक पहुँचतीं, उससे पहले ही राम ने आगे बढ़कर अपनी हथेली से 'स्टॉप' का बटन दबा दिया।
हल्की-सी 'बीप' के साथ लिफ्ट वहीं ठहर गई।उस एक आवाज़ ने जैसे अनुराधा के भीतर भी सब कुछ रोक दिया।अब बंद लिफ्ट में फिर वही दोनों थे।
चारों तरफ़ गहरा सन्नाटा था। ऊपर जलती सफ़ेद रोशनी, बंद धातु की दीवारें और उनके बीच पसरी हुई खामोशी अचानक इतनी भारी हो गई कि अनुराधा को अपनी ही साँसों की आवाज़ साफ़ सुनाई देने लगी।
कुछ क्षण पहले तक वह जितनी निर्भीक दिखाई देने की कोशिश कर रही थी, उतनी ही तेज़ी से उसका साहस बिखरने लगा। उसके मन में एक साथ न जाने कितने ख़याल दौड़ पड़े। उसने अनायास एक कदम पीछे हटना चाहा, लेकिन पीछे फिर वही लिफ्ट की ठंडी दीवार थी।
उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। माथे पर पसीने की महीन बूँदें उभर आईं, जो देखते-देखते कनपटियों तक उतरने लगीं। गला जैसे सूख गया था। उसने कई बार कुछ कहना चाहा, मगर शब्द होंठों तक आते-आते बिखर जाते। उसकी नज़र एक पल राम के चेहरे पर जाती और अगले ही पल घबराकर झुक जाती। वह पहली बार सचमुच डर गई थी।
राम अब भी कुछ नहीं बोला। वह बस शांत खड़ा उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर क्रोध की कठोर रेखाएँ थीं, पर उनमें कोई उतावलापन नहीं था। यही संयम, यही मौन अनुराधा को और अधिक विचलित कर रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि सामने खड़ा आदमी अगले ही पल क्या कहेगा।
आख़िरकार काँपते हुए उसके होंठ खुले।
"मु... मु... मुझे..." उसने जैसे बड़ी मुश्किल से शब्दों को आवाज़ दी, "छो... छोड़ दो..."
वाक्य पूरा करते-करते उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट में बदल गई। वह दीवार से लगी खड़ी थी, दोनों हथेलियाँ अपने दुपट्टे को कसकर पकड़े हुए, और उसकी आँखों में पहली बार गुस्से की जगह साफ़-साफ़ भय दिखाई दे रहा था।
उसकी काँपती हुई वह आवाज़ जैसे सीधे राम के भीतर उतर गई।अब तक उसे लग रहा था कि सामने खड़ी लड़की गुस्से में जाने क्या-क्या कहे जा रही थी । लेकिन उस एक वाक्य ने सब कुछ बदल दिया। वह पहली बार उसकी आँखों को ध्यान से देखने लगा।
उनमें अब गुस्सा नहीं था, न चुनौती... वहाँ केवल भय था। ऐसा भय जो किसी अभिनय का हिस्सा नहीं हो सकता था। उसका चेहरा पूरी तरह सफ़ेद पड़ चुका था। माथे पर उभरा पसीना कनपटियों से होता हुआ गर्दन तक उतर आया था। होंठ बुरी तरह काँप रहे थे और साँसें इस तरह टूट रही थीं, मानो सीने में अटक गई हों।
राम का सारा क्रोध उसी क्षण जैसे कहीं विलीन हो गया।उसे अचानक एहसास हुआ कि शायद उसने उसे ज़रूरत से ज़्यादा डरा दिया है। उसका इरादा उसे डराने का कभी नहीं था। वह तो बस उसकी कही हुई बातों का जवाब देना चाहता था, लेकिन सामने खड़ी लड़की की हालत देखकर पहली बार उसके भीतर एक अनजानी-सी बेचैनी उठी।
उसने सहज ही एक कदम उसकी ओर बढ़ाया। उसके चेहरे की कठोरता कब की उतर चुकी थी। वह कुछ कहना चाहता था, शायद यह समझाना चाहता था कि उसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन शब्द होंठों तक पहुँचने से पहले ही सब कुछ अचानक बदल गया।
अनुराधा की पलकों ने एक बार धीमे से झपकने की कोशिश की, जैसे वह सामने खड़े आदमी को आख़िरी बार साफ़ देख लेना चाहती हो। अगले ही क्षण उसकी आँखों की रोशनी बुझती-सी चली गई। उसके घुटनों ने जवाब दे दिया और उसका शरीर धीरे-धीरे आगे की ओर झुकने लगा।
"अरे..."
राम के मुँह से अनायास निकला। उसने बिना एक पल गँवाए आगे बढ़कर उसे अपनी बाँहों में थाम लिया। यदि वह ज़रा-सी भी देर कर देता, तो वह सीधे संगमरमर के फर्श पर गिर पड़ती। उसका हल्का-सा शरीर पूरी तरह ढीला पड़ चुका था। सिर आकर राम के कंधे से टिक गया और उसके बिखरे हुए बाल बाँह पर फैल गए।
राम ने एक क्षण उसे वैसे ही थामे रखा। उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि अभी कुछ पल पहले जो लड़की पूरे आत्मविश्वास से उससे उलझ रही थी, वह इस तरह बेहोश होकर उसकी बाँहों में निढाल हो जाएगी। उसने हल्के हाथों से उसके गाल थपथपाए।
"सुनो..."उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। उसमें पहली बार घबराहट साफ़ सुनाई दे रही थी।
"सुनिए... आँखें खोलिए... क्या हुआ आपको?"कोई उत्तर नहीं मिला।उसने फिर उसके गाल पर हल्की-सी थपकी दी। "सुन रही हैं आप...?"
लेकिन उसकी पलकों में कोई हरकत नहीं हुई। उसकी साँसें चल रही थीं, मगर वह पूरी तरह अचेत थी।
राम ने गहरी साँस ली। अब सोचने का समय नहीं था। उसने बहुत सावधानी से उसे अपनी बाँहों में उठा लिया, इस तरह कि उसका सिर और गर्दन बिल्कुल स्थिर रहें।
फिर एक नज़र उसके निस्तेज चेहरे पर डाली। कुछ क्षण पहले तक उसी चेहरे पर गुस्से की लाली थी, और अब वहाँ केवल बेहोशी की निस्पंद शांति थी।उसने तुरंत लिफ्ट का स्टॉप बटन हटाया। दरवाज़े खुलते ही वह तेज़ क़दमों से बाहर निकला और उसे सँभाले हुए अपने केबिन की ओर बढ़ गया। उसके कदम तेज़ ज़रूर थे, लेकिन इतने संतुलित कि उसकी बाँहों में बेसुध पड़ी लड़की को ज़रा-सा भी झटका न लगे।
लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही राम तेज़ क़दमों से बाहर निकला। चौबीसवीं मंज़िल पर हमेशा की तरह गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। पूरे फ़्लोर पर केवल एक ही केबिन था...राम रघुवंशी का।
रघुवंशी एम्पायर में यह नियम वर्षों से चला आ रहा था कि कोई भी व्यक्ति सीधे राम तक नहीं पहुँच सकता था। उससे मिलने की इच्छा रखने वाले को पहले अठारहवीं मंज़िल पर विवान या अथर्व से समय लेना पड़ता था। किससे, कब और कितनी देर के लिए मुलाक़ात होगी, इसका अंतिम निर्णय वही दोनों करते थे। चौबीसवीं मंज़िल तक बिना उनकी अनुमति के पहुँचना लगभग असंभव था।
राम ने अपने केबिन का दरवाज़ा खोला और बिना रुके भीतर चला गया।विशाल केबिन के पीछे, लकड़ी की पैनलिंग में इस तरह छिपा एक दरवाज़ा था कि पहली नज़र में उसका होना किसी को दिखाई भी न दे। उसने सुरक्षा लॉक खोला। दरवाज़ा खुलते ही भीतर बना वह सीक्रेट रूम सामने था, जिसके बारे में कंपनी में गिने-चुने लोगों को ही जानकारी थी।
कमरे में हल्की चंदन की सुगंध घुली हुई थी। दीवारों के रंग आँखों को सुकून देते थे और बीचोंबीच रखा चौड़ा बिस्तर पूरे कमरे को एक शांत गरिमा दे रहा था।राम ने अत्यंत सावधानी से उसे अपनी बाँहों से उतारा।
उसने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उसका सिर कहीं झटके से न लगे। धीरे-धीरे उसे बिस्तर पर लिटाया और तकिए को हल्का-सा ठीक कर उसके सिर के नीचे लगा दिया। फिर एक क्षण रुककर उसने उसके चेहरे की ओर देखा।
वह अब भी बेहोश थी।उसकी साँसें पहले की अपेक्षा कुछ संतुलित अवश्य थीं, पर चेहरा अभी भी फीका पड़ा हुआ था। माथे पर पसीने की महीन बूँदें अब भी चमक रही थीं। घुँघराले बालों की कुछ लटें चेहरे पर बिखर आई थीं।
राम ने जेब से अपना फ़ोन निकाला।उसने बिना समय गँवाए अभिमन्यु को केवल एक छोटा-सा संदेश भेजा,Immediately. My cabin."संदेश भेजते ही उसने फ़ोन एक ओर रख दिया।
कमरे में फिर वही गहरी ख़ामोशी लौट आई।राम बिस्तर के पास रखी कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसकी नज़र अनायास ही अनुराधा के चेहरे पर ठहर गई। कुछ देर पहले तक इसी चेहरे पर गुस्से की तपिश थी, आँखों में चुनौती थी और शब्दों में आग। अब वही चेहरा बिल्कुल शांत था। साँसों की धीमी लय के अलावा उसमें किसी हलचल का कोई चिन्ह नहीं था।
उसे पहली बार लगा कि यह लड़की जितनी निडर दिखने की कोशिश करती है, भीतर से उतनी ही कोमल है।
राम ने आगे बढ़कर उसके माथे के पास आ गिरी एक बिखरी लट को बहुत सावधानी से एक ओर कर दिया, ताकि वह उसके चेहरे पर न आए। उसके बाद उसने अपना हाथ तुरंत वापस खींच लिया। वह जानता था कि इस समय उसकी पहली ज़िम्मेदारी उसे होश में लाना और यह सुनिश्चित करना है कि वह सुरक्षित है।
फिर भी उसकी आँखें बार-बार उसी चेहरे पर लौट आती थीं।वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। उसने अपने जीवन में न जाने कितने लोगों से मुलाक़ात की थी। चेहरे उसके लिए कभी मायने नहीं रखते थे।
लेकिन इस लड़की के चेहरे की मासूमियत, उसके भावों की सच्चाई और कुछ देर पहले तक उसके भीतर उमड़ता हुआ गुस्सा..सब मिलकर जैसे उसकी स्मृति पर एक गहरी छाप छोड़ गए थे।
राम ने धीरे से लंबी साँस ली और कुर्सी की पीठ से टिक गया। उसकी निगाह अब भी उसी पर थी, लेकिन उस निगाह में आकर्षण से अधिक चिंता थी।उसे बस अभिमन्यु के आने का इंतज़ार था।
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