तेरे लिए जानम Chapter-16
- 24 October, 2026
राम का इस तरह अचानक फोन करना ही अभिमन्यु के लिए हैरानी की बात थी। ऊपर से उसने बिना कुछ समझाए सिर्फ़ इतना कहा था, "एक फीमेल डॉक्टर को लेकर तुरंत मेरे केबिन आओ।"
बस... इतना कहकर उसने कॉल काट दिया।
अभिमन्यु कुछ क्षण फोन की स्क्रीन देखता रह गया। वर्षों की दोस्ती में उसने राम को कभी इस तरह किसी बात की जल्दबाज़ी करते नहीं देखा था। उसके मन में न जाने कितने सवाल उठे, लेकिन वह जानता था कि इस समय सवालों से ज़्यादा ज़रूरी राम की बात मानना है।
बिना एक पल की देरी किए वह तुरंत एक महिला डॉक्टर को साथ लेकर चौबीसवीं मंज़िल की ओर निकल पड़ा। रास्ते में विवान और अथर्व भी उनके साथ आ गए। दोनों के चेहरे पर भी उलझन साफ़ दिखाई दे रही थी। आखिर ऐसा क्या हो गया था कि राम ने खुद फोन करके एक महिला डॉक्टर बुलवाई?
कुछ ही देर बाद चारों राम के केबिन के भीतर बने सीक्रेट रूम में दाखिल हुए।कमरे में कदम रखते ही अभिमन्यु की नज़र अनायास सामने बिस्तर पर चली गई... और वहीं ठहर गई।
बिस्तर पर एक लड़की बेहोश पड़ी थी।
एक पल के लिए उसकी आँखें अविश्वास से फैल गईं। उसे अपनी हैरानी पर यक़ीन ही नहीं हुआ। वह राम को जितना जानता था, उतना शायद ही कोई और जानता हो। इस सीक्रेट रूम में तो आज तक परिवार के गिने-चुने लोगों के अलावा किसी को आने की इजाज़त नहीं मिली थी, फिर आज इस अनजान लड़की का यहाँ होना... उसकी समझ से बिल्कुल बाहर था।
उसकी नज़र धीरे-धीरे उस लड़की से हटकर राम के चेहरे पर पहुँची। वह कुछ पूछने के लिए होंठ खोल ही रहा था कि महिला डॉक्टर ने बिना समय गँवाए शांत लेकिन सख़्त लहज़े में कहा,
"प्लीज़... आप सब बाहर वेट कीजिए। पहले मुझे इन्हें चेक करने दीजिए।"
डॉक्टर की बात सुनकर राम बिना कुछ कहे एक तरफ़ हट गया। उसके पीछे अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी चुपचाप कमरे से बाहर निकल आए। राम ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और उसकी नज़रें उसी बंद दरवाज़े पर टिक गईं, जबकि अभिमन्यु के मन में उठे सवाल अब पहले से कहीं ज़्यादा गहरे हो चुके थे।
डॉक्टर के कमरे के अंदर जाते ही दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया। बाहर गलियारे में फिर वही ख़ामोशी फैल गई। चारों की नज़रें कुछ क्षण तक उसी बंद दरवाज़े पर टिकी रहीं। माहौल इतना अचानक बदल गया था कि किसी के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।
राम दरवाज़े के सामने बिल्कुल स्थिर खड़ा था। उसकी निगाहें दरवाज़े से हट ही नहीं रही थीं। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही ठहराव था, लेकिन जो लोग उसे अच्छी तरह जानते थे, वे समझ सकते थे कि उसके भीतर बहुत कुछ चल रहा है।
अभिमन्यु कुछ देर तक चुपचाप उसे देखता रहा। जितनी हैरानी उसे उस लड़की के बेहोश होने पर नहीं थी, उससे कहीं ज़्यादा इस बात पर थी कि राम उसे अपनी बाँहों में उठाकर सीधे अपने सीक्रेट रूम तक ले आया था।
इस कमरे में आज तक किसी बाहरी व्यक्ति का आना तो दूर, उसके बारे में जानने वाले लोग भी उँगलियों पर गिने जा सकते थे। और आज उसी कमरे के अंदर एक लड़की उसके अपने बेड पर लेटी थी।
आख़िरकार उसने आगे बढ़कर राम के कंधे पर हाथ रखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में सवाल साफ़ दिखाई दे रहे थे।
"माजरा क्या है?" उसने धीमे स्वर में पूछा। "ऐसा क्या किया तूने कि एक लड़की बेहोश हो गई? और ऊपर से उसे अपने कमरे में... अपने ही बेड पर सुला दिया।"
वह कुछ पल रुका, फिर सिर हिलाते हुए बोला, "तुझे इतने सालों से जानता हूँ, राम। तूने आज तक ऐसा कभी नहीं किया। ख़ासकर किसी लड़की के लिए... कभी नहीं।"
राम ने उसकी तरफ़ देखा। वह शायद पूरी बात बताने ही वाला था कि तभी अब तक चुप खड़ा विवान अचानक बोल पड़ा,
"भाई... ये अनुराधा दी बेहोश कैसे हो गई?"
उसके मुँह से 'अनुराधा' नाम सुनते ही राम की दोनों भौंहें अनायास आपस में जुड़ गईं। उसने पहली बार उस नाम को अपने भीतर दोहराया।
"अनुराधा...?"
अभिमन्यु जैसे एकदम ठिठक गया। पहले उसने विवान की तरफ़ देखा, फिर राम की ओर, और अगले ही पल अविश्वास में अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
"रुको..." उसके मुँह से अनायास निकला। "क्या... ये मिस ठाकुर हैं?"उसने तुरंत अथर्व की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर अब उत्सुकता नहीं, बल्कि साफ़ हैरानी थी।
"अथर्व... वही मिस ठाकुर... जिन्हें भाई ने अपना नया पी.ए. रखा है?"अथर्व ने बिना कुछ कहे बस धीरे से सिर हिलाकर 'हाँ' कह दिया।
अभिमन्यु कुछ क्षण तक बिल्कुल चुप खड़ा रहा। उसकी नज़र कभी बंद दरवाज़े पर जाती, कभी राम के चेहरे पर लौट आती। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि किस बात पर ज़्यादा हैरान हो। इस बात पर कि बेहोश पड़ी लड़की वही मिस ठाकुर थी... या इस बात पर कि राम, जिसने आज तक किसी लड़की को अपने निजी दायरे में आने नहीं दिया, आज उसी लड़की के लिए डॉक्टर बुलाकर उसके कमरे के बाहर खड़ा था।
उधर राम के मन में भी पहली बार एक बात साफ़ हुई..अनुराधा...तो यही उसका नाम था।
अभिमन्यु की बात के बाद कुछ क्षण के लिए फिर सन्नाटा छा गया। राम की नज़र अब विवान पर टिक गई थी। उसके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं था, लेकिन उसकी आँखों में एक सीधा-सा प्रश्न साफ़ दिखाई दे रहा था।
अपनी उसी गहरी और स्थिर आवाज़ में उसने पूछा, "क्या... यही अनुराधा ठाकुर है?"
"हाँ, भाई... यही है।" विवान ने बिना एक पल गँवाए जवाब दिया।
राम कुछ नहीं बोला।उसने बस एक बार बंद दरवाज़े की ओर देखा, जिसके पीछे अनुराधा अब भी बेहोश पड़ी थी।राम ने मन मे कहा, " तो तुम हो... मिस ठाकुर ! उसके होंठों पर एक बेहद हल्की, लगभग अदृश्य-सी रेखा उभरी और उतनी ही जल्दी गायब भी हो गई।
"तुम्हारे नाम ने मुझे कल रात से परेशान कर रखा था... और अब तुम ख़ुद मुझे हक़ीक़त में परेशान कर रही हो।"
यह सोचते ही उसकी निगाह एक बार फिर उसी बंद दरवाज़े पर टिक गई।उसी समय कमरे का दरवाज़ा खुला।
दरवाज़े की हल्की-सी आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। डॉक्टर बाहर निकली। उसके चेहरे पर वह सहज संतोष नहीं था, जो सामान्य जाँच के बाद दिखाई देता है। उसकी भौंहों के बीच हल्की-सी सिलवट थी, मानो उसने कुछ ऐसा देखा हो जिसने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया हो।
एक पल में चारों की नज़रें उसी पर टिक गईं।सबसे आगे खड़ा राम बिना कुछ कहे डॉक्टर को देख रहा था। उसकी गहरी, स्थिर निगाहें डॉक्टर के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। वह किसी तरह की जल्दबाज़ी में नहीं था, लेकिन इंतज़ार ज़रूर कर रहा था। डॉक्टर के चेहरे पर उभरे उन हल्के-से परेशानी के भाव उसकी नज़र से छिप नहीं पाए थे। डॉक्टर ने भी एक क्षण के लिए राम की आँखों में देखा।
डॉक्टर धीमे-धीमे कदमों से चलती हुई राम के सामने आकर रुक गई। उसके चेहरे पर अब भी गंभीरता बनी हुई थी।उसने एक गहरी साँस ली और प्रोफेशनल लहज़े में कहा,"सर... वैसे तो आपकी वाइफ अब खतरे से बाहर हैं। फिलहाल उनकी हालत स्थिर है।"
"वाइफ...?"यह शब्द सुनते ही अभिमन्यु, विवान और अथर्व तीनों की आँखें एक साथ फैल गईं।
क्या...?तीनों लगभग एक साथ बोल पड़े, लेकिन इससे पहले कि कोई अपनी बात पूरी करता, राम ने बिना उनकी तरफ़ देखे बस अपना दाहिना हाथ हल्का-सा उठा दिया।
उसका इशारा ही काफ़ी था।तीनों तुरंत चुप हो गए। हालांकि उनके चेहरों पर छाया अविश्वास साफ़ बता रहा था कि उनके मन में इस वक्त हज़ारों सवाल उमड़ रहे थे।
उधर डॉक्टर भी उनकी प्रतिक्रिया देखकर कुछ पल के लिए असहज हो गई। उसे लगा शायद उसने कुछ ऐसा कह दिया है, जो उसे नहीं कहना चाहिए था।
कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बाद राम ने अपनी ठंडी, गंभीर और अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा,
"हाँ... तो आप क्या कह रही थीं, डॉक्टर?"वह एक पल रुका, फिर बिल्कुल सपाट चेहरे के साथ बोला,"क्या हुआ है... मेरी वाइफ को?"
'मेरी वाइफ' शब्द उसके मुँह से इतने सहज और ठहराव के साथ निकले कि डॉक्टर को ज़रा भी शक नहीं हुआ।लेकिन दूसरी तरफ़ खड़े अभिमन्यु, विवान और अथर्व के लिए यह किसी बम के फटने से कम नहीं था।
अभिमन्यु ने अविश्वास से राम की ओर देखा।"ये... कब हुआ?" उसने मन ही मन बुदबुदाया।विवान ने तो अपने होंठ ही दबा लिए, ताकि कहीं हँसी और हैरानी एक साथ बाहर न निकल जाए।वहीं अथर्व बस चुपचाप राम को देख रहा था।
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