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तेरे लिए जानम Chapter-17

तेरे लिए जानम Chapter-17

राम के मुँह से "मेरी वाइफ..." सुनते ही अभिमन्यु, विवान और अथर्व के चेहरे एक साथ देखने लायक हो गए।

तीनों की आँखें पहले राम पर टिकीं, फिर अनायास एक-दूसरे की तरफ़ उठीं, जैसे यह यक़ीन करना चाह रहे हों कि उन्होंने सचमुच वही सुना है जो उनके कानों ने सुना।अभिमन्यु तो कुछ ज़्यादा ही हैरान था।

वह राम को बचपन से जानता था। उसके स्वभाव, उसके फैसलों और उसकी आदतों से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। इसलिए राम के मुँह से निकले उन दो शब्दों ने उसके भीतर जितने सवाल खड़े कर दिए थे, उतने शायद किसी और के मन में नहीं थे।

अनायास उसका मुँह खुल गया।वह कुछ पूछने ही वाला था कि तभी राम की ठंडी, लेकिन सख़्त नज़र बस एक पल उस पर पड़ी।
अभिमन्यु ने बिना कुछ कहे अपना मुँह बंद कर लिया। वह उस नज़र का मतलब अच्छी तरह समझता था। यह वही नज़र थी, जो साफ़ बता रही थी कि इस समय कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।

अगले ही क्षण उसकी नज़र अपने बगल में खड़े विवान पर पड़ी।विवान अब भी उसी तरह मुँह खोले राम को देख रहा था।अभिमन्यु से रहा नहीं गया। उसने हल्के से विवान की ठोड़ी ऊपर उठाई और उसका खुला हुआ मुँह बंद कर दिया।

विवान ने पहले उसे घूरकर देखा, फिर जैसे अपनी ही हालत का एहसास हुआ। उसकी नज़र बगल में खड़े अथर्व पर गई।अथर्व भी किसी मूर्ति की तरह खड़ा था। उसकी आँखें राम पर जमी थीं और मुँह अब भी खुला हुआ था।

विवान ने बिना कुछ कहे उसकी ठोड़ी पकड़कर उसका मुँह भी बंद कर दिया।अगर उस समय कोई बाहर वाला वहाँ मौजूद होता, तो शायद इस दृश्य पर हँसे बिना न रह पाता।लेकिन उन तीनों के लिए यह हँसी का नहीं, हैरानी का विषय था।

अब तीनों पूरी तरह चुप थे।किसी के होंठ नहीं हिल रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में तैरती उत्सुकता हर पल बढ़ती जा रही थी।वे बार-बार राम को देख रहे थे। जो अब भी डॉक्टर के कुछ कहना का इंतजार कर रहा था।

इन तीनों के मन में सिर्फ़ एक ही सवाल था, " आख़िर राम करने क्या वाला था...?

डॉक्टर कुछ क्षण तक चुप खड़ी रही। उसके चेहरे पर झिझक साफ़ दिखाई दे रही थी। वह जैसे अपने शब्दों को कई बार मन ही मन तौल रही थी कि बात कैसे कहे।

आख़िर उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, "जी सर... वैसे आपकी वाइफ बिल्कुल ठीक हैं। घबराने वाली कोई बात नहीं है। बस... ये शायद समय पर अपने लिए प्रॉपर डाइट नहीं लेतीं। शरीर में थोड़ी वीकनेस है, इसलिए अचानक बेहोश हो गईं।"

राम बिना पलक झपकाए उसकी बात सुनता रहा।डॉक्टर ने एक बार फिर उसकी ओर देखा, फिर धीमे से बोली, "और... शायद..."शब्द फिर उसके होंठों पर आकर ठहर गए।

राम की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं। उसकी गहरी नज़रें डॉक्टर के चेहरे पर टिक गईं।आगे बोलिए, डॉक्टर।"उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर की झिझक और बढ़ गई।

उसने एक गहरी साँस ली और हिम्मत जुटाकर बोली, "सर... मुझे ऐसा लगता है कि... आप अपनी वाइफ के साथ... बहुत ज़्यादा cruel होते होंगे।"उसकी बात पूरी होते ही वहाँ का माहौल जैसे एक पल में बदल गया।

राम के चेहरे का ठहराव वैसा ही रहा, लेकिन उसकी आँखों की गहराई अचानक और सख़्त हो गई। जबड़े हल्के-से भींच गए। कुछ क्षण तक वह डॉक्टर को देखता रहा, फिर बेहद नियंत्रित आवाज़ में बोला,"क्या मतलब है आपका?"

डॉक्टर कुछ कह पाती, उससे पहले ही राम ने फिर पूछा,"क्या मैं उसे मारता हूँ?"उसके शब्द धीमे थे, लेकिन उनमें दबा हुआ आक्रोश साफ़ महसूस किया जा सकता था।
"क्या मैं तुम्हें ऐसा आदमी लगता हूँ?"

डॉक्टर का गला सूख गया। उसने तुरंत घबराकर सिर हिलाया।"न... नहीं सर। मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था।"उसने जल्दी-जल्दी सफ़ाई देते हुए कहा,"मेरा मतलब था कि... पति पत्नी के रिश्ते जब....!!"वाक्य पूरा होने से पहले ही उसकी आवाज़ थम गई।

राम की लाल पड़ती आँखें अब भी उसी पर टिकी थीं। उन आँखों में ऐसा ठंडा गुस्सा था कि डॉक्टर की हिम्मत आगे बोलने की नहीं हुई।

कुछ क्षण पहले तक जहाँ सिर्फ़ चिंता थी, अब वहाँ एक ऐसा सन्नाटा फैल चुका था, जिसमें किसी की भी आवाज़ उठाने का साहस नहीं हो रहा था। अभिमन्यु, विवान और अथर्व भी चुपचाप खड़े यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर तो हैरानी इस कदर बढ़ गयी थी की उनसे कण्ट्रोल नही हो रहा था।

राम की आँखों में उतरती कठोरता देखकर डॉक्टर एक पल के लिए भीतर तक सहम गई। उसे महसूस हुआ कि यदि उसने अपनी बात अब भी अधूरी छोड़ी, तो सामने खड़ा आदमी तब तक सवाल करता रहेगा, जब तक उसे पूरा उत्तर न मिल जाए।

 उसने बिना एक पल गँवाए जल्दी-जल्दी कहना शुरू किया, "न... नहीं सर, मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था। दरअसल... इनके शरीर पर बहुत पुराने ज़ख्मों के निशान हैं। ऐसे ज़ख्म, जो बताते हैं कि इन्होंने कभी बहुत ज़्यादा तकलीफ़ सही है। इसलिए मुझे लगता है कि जब भी ये बहुत ज़्यादा घबराती होंगी, इनके अतीत में जो कुछ भी हुआ होगा, उसका दबाव ये संभाल नहीं पाती होंगी... और शायद इसी वजह से आज बेहोश हो गईं।"

डॉक्टर ने एक गहरी साँस ली और फिर थोड़ा संयत होकर बोली, "आप बस इतना ध्यान रखिएगा, सर... कि इनके सामने वैसी कोई परिस्थिति दोबारा न आए, जो इन्हें उस अतीत की याद दिला दे। फिलहाल इन्हें आराम की ज़रूरत है। ये कुछ दवाइयाँ हैं। अगले पंद्रह दिनों तक खाना खाने के बाद इन्हें दे दीजिएगा। कुछ देर में इन्हें होश आ जाएगा।"

अपनी बात पूरी करते ही उसने दवाइयों का पर्चा और दवा राम की ओर बढ़ा दी। फिर किसी के कुछ कहने का इंतज़ार किए बिना तेज़ी से मुड़ी और लगभग जल्दी-जल्दी कदमों से केबिन से बाहर निकल गई। ऐसा लग रहा था, जैसे वह उस कमरे में एक पल भी और रुकना नहीं चाहती।

डॉक्टर के बाहर निकलते ही राम की नज़र अथर्व पर गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस हल्के-से इशारे के साथ बोला, "मैम को छोड़ आओ।"

बात सुनने में जितनी साधारण थी, उसका अर्थ उतना ही स्पष्ट था। यह सिर्फ़ डॉक्टर को बाहर तक छोड़ आने के लिए नहीं कहा गया था। यह एक ख़ामोश चेतावनी भी थी कि इस कमरे में जो कुछ देखा और सुना गया है, वह इसी कमरे की चारदीवारी से बाहर नहीं जाना चाहिए।

अथर्व वर्षों से राम के साथ था। वह उसके इशारों की भाषा समझता था। उसने बिना कोई सवाल किए बस इतना कहा, "जी, भाई," और डॉक्टर के पीछे बाहर निकल गया।

दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर वही गहरी ख़ामोशी लौट आई। कुछ क्षण तक राम वहीं खड़ा रहा। उसके मन में डॉक्टर की कही हर बात एक-एक करके घूम रही थी—पुराने ज़ख्म... बहुत ज़्यादा तकलीफ़... अतीत का दबाव...!

उसने धीरे से अपना चेहरा विवान की ओर घुमाया।"मिस ठाकुर के अतीत के बारे में... क्या तुम कुछ जानते हो?"विवान ने बिना देर किए 'नहीं' में सिर हिला दिया।"नहीं, भाई। उन्होंने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया।"

कुछ पल तक राम चुप रहा। उसकी आँखों की गहराई बता रही थी कि वह किसी सोच में डूब चुका है।विवान ने संकोच से पूछा, "अगर कहें तो... मैं पता करूँ?"राम ने उसकी ओर देखा। फिर बिना एक शब्द बोले बहुत हल्के से 'नहीं' में सिर हिला दिया।

उसके इस छोटे-से इन्कार के साथ ही बात वहीं समाप्त हो गई। कम-से-कम अभी के लिए... वह अनुराधा के अतीत को उसकी अनुमति के बिना जानना नहीं चाहता था।

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अभिमन्यु के मन में सवाल अब भी वैसे ही खड़े थे। डॉक्टर के जाने के बाद से ही वह कई बार कुछ पूछना चाहता था, लेकिन हर बार राम के चेहरे की गंभीरता देखकर रुक जाता। आखिर इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा असामान्य बात यही थी कि राम ख़ुद असामान्य व्यवहार कर रहा था।

उधर राम ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। वह बिना कुछ कहे मुड़ा और सीधे अपने सीक्रेट रूम के अंदर चला गया।

अनुराधा अब भी बेहोश थी। कमरे की हल्की रोशनी उसके शांत चेहरे पर बिखरी हुई थी। बेहोशी ने उसके चेहरे की मासूमियत को ज़रा भी कम नहीं किया था। उल्टा, उसके चेहरे पर एक अजीब-सी निश्चलता उतर आई थी। कुछ बिखरी हुई लटें अब भी उसके गालों के पास ठहरी थीं। साँसों की धीमी लय बता रही थी कि अब वह पूरी तरह सुरक्षित थी।

राम कुछ क्षण वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

फिर उसके होंठों से एक बहुत हल्की, लगभग अनसुनी-सी गहरी साँस निकली।

उसने आगे बढ़कर बेड पर पड़ा कंबल सावधानी से अनुराधा के ऊपर ठीक कर दिया, ताकि उसे ठंड न लगे। उसके बाद दीवार पर लगे ए.सी. का टेम्प्रेचर थोड़ा कम किया, एक बार कमरे पर नज़र डाली और बिना कोई आवाज़ किए वापस बाहर आ गया।

बाहर निकलते ही उसकी नज़र सामने खड़े तीनों चेहरों पर पड़ी।विवान, अथर्व और अभिमन्यु...तीनों उसी को देख रहे थे।कोई कुछ बोल नहीं रहा था, लेकिन तीनों की आँखों में एक जैसे सवाल थे। जैसे वे उसके मुँह से कुछ सुनने का इंतज़ार कर रहे हों।

राम ने एक-एक करके तीनों को देखा। कुछ क्षण तक उनकी निगाहें उसी पर टिकी रहीं। आख़िरकार वह इस तरह लगातार घूरे जाने से झुँझला गया। उसने दाँत भींचते हुए कहा,

"क्या देख रहे हो?"उसकी आवाज़ सुनते ही विवान और अथर्व दोनों जैसे चौंक गए।"क... कुछ भी नहीं, भाई।"दोनों लगभग एक साथ बोल पड़े।

राम ने सपाट स्वर में कहा, "तो फिर जाओ... अपना काम करो।"दोनों ने बिना बहस किए सिर हिलाया और मुड़ने ही वाले थे कि पीछे से अभिमन्यु की आवाज़ आई,

"रुको... तुम दोनों।"दोनों वहीं ठिठक गए।अभिमन्यु ने धीरे-धीरे अपना चेहरा राम की ओर घुमाया। उसकी आँखों में अब मुस्कान नहीं थी। वर्षों की दोस्ती उसे इतना अधिकार देती थी कि वह वहाँ खड़े बाकी दोनों की तरह चुप न रहे।

वह राम के सामने आकर खड़ा हो गया।इन दोनों को तू डरा सकता है..." उसने राम की आँखों में देखते हुए कहा, "लेकिन मुझे नहीं।"कुछ पल दोनों की नज़रें एक-दूसरे पर टिकी रहीं।

फिर अभिमन्यु ने बिल्कुल सीधे स्वर में पूछा,"अब ये बता... बात क्या है?"

उसके इतना कहते ही विवान और अथर्व, जो अभी तक चुपचाप खड़े थे, फिर से मुड़कर अपने बड़े भाई की तरफ़ देखने लगे। उनकी आँखों में भी वही सवाल था।अब वे तीनों जवाब का इंतज़ार कर रहे थे और जवाब सिर्फ़ राम के पास था।

राम ने तीनों की ओर देखा। उनके चेहरों पर फैली उत्सुकता बता रही थी कि जब तक उन्हें जवाब नहीं मिलेगा, वे यहाँ से हटने वाले नहीं थे।

उसने धीमे से साँस छोड़ी और बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है। वो मेरे साथ लिफ्ट में थी... और अचानक ही बेहोश हो गई। इस फ्लोर पर उस समय कोई था भी नहीं। अब उसे उस हालत में अकेला लिफ्ट में कैसे छोड़ देता... इसलिए उसे यहाँ ले आया।"

राम की बात सुनते ही विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। दोनों के चेहरे पर जैसे एक साथ राहत उतर आई। उन्हें लगा था कि बात शायद जितनी दिखाई दे रही है, उससे कहीं ज़्यादा गंभीर होगी। लेकिन राम का जवाब सुनकर उनके मन का बोझ कुछ हल्का हो गया।

कुछ पल की चुप्पी के बाद विवान मुस्कुराते हुए बोला, "भैया... यही हैं अनुराधा ठाकुर। कुछ दिनों के लिए आपकी पर्सनल असिस्टेंट।"
राम ने बिना कोई भाव बदले उसकी तरफ़ देखा।"नहीं..."उसकी आवाज़ पहले की तरह शांत थी।
अब किसी और को अपॉइंट करने की ज़रूरत नहीं है। इन्हें ही रहने दो।

विवान कुछ क्षण तक राम का चेहरा पढ़ता रहा। सुबह की बात उसे साफ़ याद थी, जब राम किसी भी कीमत पर मिस ठाकुर को अपना पर्सनल असिस्टेंट बनाने के पक्ष में नहीं था। इसलिए उसके मुँह से अनायास निकल गया,"लेकिन भैया... आपने तो कहा था..."उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि राम ने बीच में ही उसे रोक दिया।

"तो मैं अभी भी वही कह रहा हूँ।"उसकी आवाज़ में न झुंझलाहट थी, न सफ़ाई... बस एक ऐसा ठहराव था, जो साफ़ बता रहा था कि उसने अपना फैसला सुना दिया है और उस पर अब कोई बहस नहीं होगी।

विवान ने कुछ पल तक उसे देखा, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुका दिया।जी, भाई।"
अथर्व ने भी बिना कुछ पूछे हामी भर दी।दोनों मुड़कर जाने लगे। जाते-जाते उनकी नज़र एक बार सीक्रेट रूम के बंद दरवाज़े पर पड़ी, फिर उन्होंने चुपचाप केबिन से बाहर कदम रख दिए।