तेरे लिए जानम Chapter-2
- 24 October, 2026
राम रघुवंशी के भारत लौटने की ख़बर पूरे देश में आग की तरह फैल चुकी थी। बिज़नेस जगत से लेकर मीडिया तक, हर जगह बस उसी की चर्चा थी। आख़िर ए.आर. एम्पायर के मालिक और रघुवंशी खानदान के सबसे बड़े बेटे की पंद्रह साल बाद वतन वापसी कोई मामूली ख़बर नहीं थी।
सुबह होने से पहले ही एयरपोर्ट के बाहर देश के लगभग सभी बड़े न्यूज़ चैनलों की ओ.बी. वैन पहुँच चुकी थीं।कैमरे प्रवेश द्वार पर टिके हुए थे और पत्रकार बेसब्री से उस एक पल का इंतज़ार कर रहे थे, जब राम रघुवंशी बाहर निकले और उन्हें उसकी पहली तस्वीर मिल सके।
दिलचस्प बात यह थी कि वहाँ मौजूद लगभग किसी ने भी राम रघुवंशी को कभी देखा नहीं था।
हर कोई सिर्फ़ एक झलक पाने के इंतज़ार में था।
हर पत्रकार के मन में एक ही सवाल था, "आख़िर राम रघुवंशी दिखते कैसे हैं?"
दुनिया उनकी दौलत, उनके साम्राज्य और उनकी कामयाबी के बारे में सब कुछ जानती थी, लेकिन उनके चेहरे से लगभग हर कोई अनजान था।इसकी वजह भी बेहद स्पष्ट थी।
राम रघुवंशी को कभी भी शोहरत का शौक़ नहीं था। उन्होंने अपने पूरे करियर में खुद को मीडिया और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा था। न वह किसी अवॉर्ड फ़ंक्शन में नज़र आता था, न किसी बिज़नेस समिट में मंच साझा करता था , न इंटरव्यू देता और न ही अपनी निजी ज़िंदगी को सार्वजनिक होने देता था ।
ए.आर. एम्पायर के नाम से पूरी दुनिया परिचित थी, लेकिन उसके मालिक का चेहरा आज भी एक रहस्य बना हुआ था।
यदि किसी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अनिवार्य भी होती, तो वहाँ सुरक्षा इतनी कड़ी होती कि बिना उनकी स्पष्ट अनुमति कोई कैमरा उनकी तस्वीर तक नहीं ले सकता था। उनके सुरक्षा प्रमुख पहले ही मीडिया की पहुँच सीमित कर देते थे, और बिना अनुमति खींची गई किसी भी तस्वीर को सार्वजनिक करने की हिम्मत शायद ही कोई करता।
यही कारण था कि आज एयरपोर्ट के बाहर मौजूद सैकड़ों कैमरे केवल एक तस्वीर के लिए बेताब थे।
हर किसी को उम्मीद थी कि पंद्रह साल बाद लौट रहा यह रहस्यमयी उद्योगपति आज पहली बार दुनिया के सामने आएगा।
लेकिन कोई नहीं जानता था कि राम रघुवंशी अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीता था... और उसकी एक झलक पाना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाता था।
राम और अभिमन्यु चारों ओर से अपने सुरक्षा गार्डों के घेरे में थे। उनकी सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि कोई चाहकर भी उनके पास नहीं पहुँच सकता था। कुछ ही देर में सभी अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर रवाना हो गए।
तभी राम का फोन बज उठा।मोबाइल स्क्रीन पर "विवान" का नाम चमक रहा था। राम के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने कॉल रिसीव की।
"हेलो..."लेकिन उसके कुछ कहने से पहले ही दूसरी तरफ से विवान की घबराई हुई आवाज़ गूँज उठी, "भाई! आप कहाँ हो?"
राम शांत स्वर में बोला, "छोटे, मैं निकल गया हूँ।"
"क्या...? लेकिन क्यों? हम तो आपको लेने आने वाले थे।"राम ने बिना किसी भाव के जवाब दिया, "कोई बात नहीं।"विवान ने तुरंत पूछा, "आप रघुवंशी मेंशन जा रहे हैं ना?"
"नहीं, विवान।" राम की आवाज़ इस बार पहले से अधिक गंभीर थी। मैं पहले अवंतिका विला जाऊँगा... उसके बाद रघुवंशी हाउस आऊँगा।विवान कुछ कहना चाहता था। उसके होंठों तक शब्द आए भी, लेकिन राम ने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया।
बाकी बात बाद में होगी।इतना कहकर राम ने बिना उसकी बात सुने ही फोन काट दिया।फोन कटते ही कार के भीतर कुछ क्षणों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। राम की निगाहें कार की खिड़की से बाहर टिकी थीं, मानो उसका मन पहले ही अवंतिका विला पहुँच चुका हो।
"हेलो... भाई...!"लेकिन दूसरी तरफ से कॉल कटने की आवाज़ आई।विवान ने एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे फोन नीचे कर लिया। क्या हुआ? अथर्व ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।
विवान फीकी मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए बोला, "कुछ नहीं... राम भैया पहले अवंतिका विला जाएँगे, उसके बाद रघुवंशी हाउस आएँगे।"यह कहते-कहते उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। चेहरे पर साफ़ उदासी झलक रही थी।
अथर्व ने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा,"तो इसमें उदास होने की क्या बात है? अगर वो नहीं आ रहे, तो हम ही उनसे मिलने चलते हैं।"
फिर उसने ड्राइवर सीट पर बैठे शमशेर की ओर देखा।"क्यों, शमशेर काका?"
शमशेर के चेहरे पर बरसों पुरानी यादों से भरी मुस्कान उभर आई।
"हाँ-हाँ, क्यों नहीं छोटे मालिक।" उन्होंने स्नेह से कहा, "बहुत साल हो गए... राम बेटा को देखे हुए। पता नहीं अब कितना बदल गया होगा... लेकिन मेरे लिए तो आज भी वही नन्हा-सा राम है, जो पूरे घर में शरारतें करता फिरता था।"
शमशेर की बात सुनकर विवान की आँखों के सामने बचपन की कई धुंधली यादें तैर गईं।एक पल में उनका चेहरा बुझ-सा गया। आँखों में हल्की नमी उतर आई। उहोने चुपचाप खिड़की के बाहर देखा, जैसे अतीत की कोई कसक फिर से दिल में जाग उठी हो।
अथर्व ने उसकी खामोशी महसूस की, लेकिन कुछ नहीं कहा। वह जानता था कि कुछ रिश्तों की दूरी केवल वर्षों की नहीं होती... उनके बीच अधूरी यादें, अनकहे सवाल और अनगिनत एहसास भी खड़े होते हैं।
अवंतिका विला...शहर की भीड़-भाड़ से दूर, हरियाली की गोद में बसा अवंतिका विला आधुनिक वास्तुकला का अद्भुत नमूना था। इसकी हर ईंट, हर दीवार और हर कोना एक कहानी कहता था।
यह केवल एक आलीशान विला नहीं था... यह राम के लिए उसकी माँ की यादों का मंदिर था।
उसने यह विला अपनी माँ अवंतिका रघुवंशी की स्मृति में बनवाया था। यहाँ रखी हर वस्तु, हर चित्र, हर फूल और हर सजावट में उनकी पसंद की झलक दिखाई देती थी। ऐसा लगता था मानो इस घर की हवा में भी उनकी मौजूदगी आज तक महसूस की जा सकती हो।
चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों से सजे विशाल बगीचे, बीचों-बीच संगमरमर से बना भव्य फव्वारा और काँच की दीवारों वाला आधुनिक विला अपनी शालीनता और भव्यता से किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता था।
कार मुख्य द्वार पर आकर रुकी।राम बिना कुछ कहे धीरे-धीरे अंदर बढ़ गया।जैसे ही उसने मुख्य हॉल में कदम रखा, उसकी नज़र सीधे सामने वाली दीवार पर टिक गई।वहाँ सुनहरे नक्काशीदार फ्रेम में उसकी माँ अवंतिका रघुवंशी की आदमकद तस्वीर लगी थी।
तस्वीर में उनके चेहरे पर वही स्नेहभरी मुस्कान थी... वही ममता से भरी आँखें, जो हर बार राम को यह एहसास दिला देती थीं कि माँ आज भी उसके साथ हैं।
राम वहीं ठिठक गया।उसकी आँखें तस्वीर से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। चेहरे पर कोई भाव नहीं था, लेकिन उसकी खामोशी बहुत कुछ कह रही थी। वर्षों से दिल में दबे अनगिनत जज़्बात उसकी आँखों में उतर आए थे।
कुछ पल तक वह बस अपनी माँ को निहारता रहा... जैसे उन बेजान तस्वीर वाली आँखों में भी उसे अपनी दुनिया दिखाई दे रही हो।
पीछे खड़ा अभिमन्यु चुपचाप उसे देख रहा था।वह जानता था कि इस समय राम को किसी शब्द की नहीं, केवल अपनी माँ की यादों के साथ कुछ पल अकेले रहने की ज़रूरत है।इसलिए वह बिना कुछ बोले वहीं खड़ा रहा।
पूरे हॉल में गहरा सन्नाटा पसरा था। बस दीवार पर टंगी तस्वीर के सामने जलता हुआ छोटा-सा दीपक अपनी शांत लौ से मानो यह बता रहा था कि कुछ रिश्ते कभी समाप्त नहीं होते... वे समय के साथ केवल यादों में बस जाते हैं।
अथर्व और विवान जैसे ही अवंतिका विला के भीतर पहुँचे, विवान ने राम को आवाज़ देने के लिए होंठ खोले, पर शब्द बाहर न आ सके। उसकी दृष्टि सामने खड़े राम पर ठहर गई।
राम निश्चल खड़ा था। उसकी आँखें सामने दीवार पर टँगी अवंतिका रघुवंशी की बड़ी-सी तस्वीर पर जमी थीं। उस क्षण जैसे उसे अपने आसपास किसी की उपस्थिति का भान ही न था।
विवान की दृष्टि भी उसी तस्वीर पर जा ठहरी। कुछ क्षण वह मौन खड़ा रहा। फिर उसके होंठों से धीमा-सा स्वर निकला,"बड़ी माँ..."!उसने एक बार फिर तस्वीर की ओर देखा और चुपचाप लौटने के लिए मुड़ गया।
उसी समय राम का गंभीर स्वर पीछे से सुनाई दिया, "छोटे..."। राम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था।
राम की आवाज़ सुनते ही विवान के कदम वहीं थम गए। वह भी बिना पीछे मुड़े खड़ा रह गया।
अथर्व ने एक बार राम की ओर देखा, फिर विवान के पास आकर धीमे स्वर में बोला," तू तो भाई से मिलने आया था, फिर बिना मिले ही क्यों लौट रहा है?"
विवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह मौन खड़ा रहा। उसकी चुप्पी ही उस समय उसका उत्तर थी।
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