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तेरे लिए जानम Chapter-20

तेरे लिए जानम Chapter-20

राम की उँगलियाँ अभी भी अनजाने में उसके गालों पर पड़े लाल निशानों को देख रही थीं। उसके भीतर उठता अपराधबोध पहली बार उसके गुस्से पर भारी पड़ने लगा था। वह कुछ कहना चाहता था... शायद अपनी बात समझाना चाहता था... लेकिन शब्द अभी होंठों तक पहुँचे भी नहीं थे कि अनुराधा ने अचानक दोनों हथेलियाँ उसके सीने पर रख दीं।

अगले ही पल उसने पूरी ताक़त से उसे धक्का दिया। उसकी पूरी देह उस एक धक्के में जैसे अपना सारा विरोध, सारा डर और सारा अपमान उँडेल देना चाहती थी।लेकिन राम टस से मस नहीं हुआ।
वह वहीं खड़ा रहा।

अनुराधा की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। धक्का देने की कोशिश में उसके कंधे तक काँप उठे थे, लेकिन सामने खड़ा आदमी जैसे पत्थर का बना हुआ था। उसने झुंझलाकर अपने हाथ वापस खींच लिए।
राम अब भी कुछ नहीं बोला।वह बस उसे देख रहा था।

उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं। पलकों के किनारों पर ठहरी बूँदें बार-बार छलकने को होतीं, लेकिन वह हर बार उन्हें रोक लेती। गुस्से से काँपते गुलाबी होंठ, रोने की वजह से लाल पड़ चुकी नाक और उसके गालों पर उभरे अपनी ही उँगलियों के निशान... न जाने क्यों राम की नज़र बार-बार वहीं जाकर ठहर जा रही थी।

वह समझ ही नहीं पा रहा था कि इस लड़की की बातों पर गुस्सा करे... या उसकी आँखों में छिपे उस डर को पढ़ने की कोशिश करे, जो हर पल उसके आक्रोश के पीछे से झाँक रहा था।
लेकिन अनुराधा ने उसकी उस खामोश नज़र का अर्थ कुछ और ही निकाल लिया।उसे लगा, वह फिर से उसे उसी तरह घूर रहा है जैसे लिफ्ट में घूर रहा था।

उसकी बेचैनी एक बार फिर गुस्से में बदल गई।उसने अपनी भीगी पलकों को ज़बरदस्ती झपकाकर आँसू भीतर रोक लिए, ठुड्डी तनिक ऊपर उठाई और इस बार पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ आवाज़ में बोली,"आप हटेंगे... या ऐसे ही घूरते रहेंगे?"

कमरे की खामोशी में उसकी आवाज़ साफ़ गूँज गई।मैं तो जाहिल हूँ ना... लेकिन आप तो बड़े अक्लमंद हैं।उसने होंठ भींचे और बिना नज़रें झुकाए सीधे राम की आँखों में देखते हुए कहा,"अगर आपको मुझ पर इतना ही गुस्सा था... तो उसका क्या, जो आपने मुझे लिफ्ट के अंदर खींचा था?"

इतना कहते हुए उसने अपनी आँखें और बड़ी कर लीं। यह गुस्से का प्रदर्शन कम और अपने डर को छिपाने की कोशिश ज़्यादा थी। उसे महसूस हो रहा था कि अगर उसने एक पल के लिए भी नज़रें झुका दीं, तो सामने खड़ा आदमी उसकी आँखों में छिपी घबराहट पढ़ लेगा। इसलिए वह लगातार उसे घूरे जा रही थी... जैसे अपनी ही टूटती हुई हिम्मत को उसकी आँखों में टिकाकर संभालने की कोशिश कर रही हो।


राम ने उसकी आँखों में कुछ पल तक बिना कुछ कहे देखा। अनुराधा बाहर से जितनी सख़्त बनने की कोशिश कर रही थी, उसकी आँखें उतनी ही साफ़ बता रही थीं कि वह अभी भी डरी हुई है। बार-बार अपनी आँखें बड़ी करके उसकी तरफ़ देखना, बिना पलक झपकाए उसकी नज़रों का सामना करना... यह गुस्सा कम और अपने डर को छिपाने की कोशिश ज़्यादा थी। 

राम यह बात समझ चुका था, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। उसने हमेशा की तरह अपने भीतर उठे हर एहसास को अपने चेहरे तक पहुँचने ही नहीं दिया।
अचानक उसने अनुराधा की एक बाँह पकड़कर हल्के से अपनी तरफ़ खींच लिया। दोनों के बीच की दूरी फिर से सिमट गई। 

अनुराधा ने तुरंत अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन राम ने इस बार उसे रोकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी बात पूरी करवाने के लिए पकड़ा था। उसकी नज़रें लगातार अनुराधा की आँखों में टिकी रहीं। कुछ क्षण तक वह उसे देखता रहा, फिर धीमे स्वर में बोला,

 "Silly Girl... तुम्हारा दुपट्टा मेरी घड़ी में फँस गया था। कहते हुए उसने अपनी कलाई उसकी ओर कर दी, मानो वही दृश्य फिर से उसकी आँखों के सामने रख देना चाहता हो। "और तुम..." उसके होंठों पर क्षीण-सी मुस्कान आई, जो अगले ही पल गायब भी हो गई, "...पीछे मुड़कर यह देखने की बजाय कि दुपट्टा अटका कहाँ है, पूरी ताक़त से उसे खींचे जा रही थीं।तुम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ़ उसे छुड़ाने पर था। एक बार भी यह देखने की कोशिश नहीं की कि वह फँसा कहाँ है।"

जिस बात का इल्ज़ाम तुम कब से मुझ पर लगाए जा रही हो, उसका सच जानने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई तुम्हें?"

अनुराधा ने कुछ कहना चाहा, पर उसने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

"तुम लिफ्ट के बाहर खड़ी थीं और दुपट्टा अंदर फँसा हुआ था। अगर मैं तुम्हें अपनी तरफ़ नहीं खींचता..." कहते-कहते वह रुक गया। उसकी नज़रें एक पल के लिए अनुराधा के चेहरे पर ठहर गईं, मानो वह चाहता हो कि आगे की बात वह खुद समझ ले। फिर उसने धीमे से वाक्य पूरा किया, "...तो लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हो जाता और तुम बाहर रह जातीं। उसके बाद क्या होता... शायद तुम्हें बताने की ज़रूरत नहीं है।"

राम की आवाज़ में न अपनी सफ़ाई देने की बेचैनी थी, न खुद को सही साबित करने की ज़िद। वह सिर्फ़ सच बता रहा था। पहली बार उसकी आँखों में वही कठोरता नहीं थी, बल्कि एक ऐसा ठहराव था जिसमें शिकायत भी थी और हल्की-सी नाराज़गी भी। 

उसने बस अनुराधा की आँखों में देखते हुए धीमे स्वर में कहा, "अब बताओ... उस वक़्त मैं तुम्हें बचा रहा था... या तुम्हारे साथ बदतमीज़ी कर रहा था?
जिस बात को तुम जबरदस्ती समझ रही थीं... वह दरअसल तुम्हें बचाने की कोशिश थी। लेकिन तुमने मुझे बोलने का एक मौका भी नहीं दिया। पहले थप्पड़ मार दिया... फिर बिना कुछ जाने मुझे चरित्र का सर्टिफिकेट भी दे दिया।"

उसने बात पूरी करके अपनी पकड़ ढीली कर दी, लेकिन उसकी नज़रें अब भी अनुराधा के चेहरे से नहीं हटी थीं। वह जानना चाहता था कि उसकी बात सुनने के बाद भी क्या अनुराधा उसी यक़ीन के साथ उसे दोषी मानेगी, या पहली बार उस घटना को अपने डर की नहीं, सच की नज़र से देखने की कोशिश करेगी।

राम की बात ख़त्म होते-होते अनुराधा की आँखों में फैला गुस्सा धीरे-धीरे उलझन में बदलने लगा। लिफ्ट का पूरा दृश्य जैसे एक-एक करके उसकी यादों में लौट आया....दुपट्टे का कहीं अटक जाना, उसका बिना पीछे देखे लगातार उसे खींचना, और अगले ही पल किसी का उसे अपनी तरफ़ खींच लेना।

 कुछ देर पहले तक जिस घटना को वह ज़बरदस्ती समझ रही थी, अब उसी घटना का दूसरा पहलू उसके सामने खड़ा था।उसने धीरे-धीरे अपनी नज़रें झुका लीं।

कुछ क्षण तक कमरे में चुप्पी रही। वह जैसे अपने ही व्यवहार को याद करके भीतर-ही-भीतर शर्मिंदा हो रही थी। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली, "माफ़ कर दीजिए... मुझे ग़लतफ़हमी हो गई थी। आपने मेरी जान बचाई... और मैंने आपको ग़लत समझ लिया।"

उसकी आवाज़ में कोई बनावट नहीं थी। वह सिर झुकाए खड़ी थी, जैसे अपनी ही नज़रों में छोटी पड़ गई हो।राम उसे देखता रहा।

उसके चेहरे पर फैली वही मासूम झिझक, अपनी गलती मान लेने का सीधापन और बिना किसी बहाने के माफ़ी माँग लेना... यह सब देखकर उसके होंठों पर अनायास एक हल्की-सी मुस्कान आ गई।

मुस्कान इतनी क्षणिक थी कि शायद अनुराधा ने उसे देखा भी नहीं।अगले ही पल राम ने अपने चेहरे को फिर से पहले की तरह निर्विकार बना लिया। उसने हल्का-सा सिर तिरछा किया, जैसे उसकी बात को परख रहा हो, और फिर शांत स्वर में बोला, "अच्छा... ऐसी बात है?"

वह एक पल रुका। उसकी नज़रें अब भी अनुराधा के झुके हुए चेहरे पर थीं।
"लेकिन मुझे ऐसा क्यों लग रहा है..." उसके होंठों पर बेहद हल्की-सी मुस्कान फिर लौटी, "...कि ये माफ़ी तुम्हारे दिल से नहीं निकली है।"

अनुराधा ने तुरंत सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखों में हैरानी साफ़ उतर आई, जैसे उसे समझ ही न आया हो कि आखिर राम ने ऐसा क्यों कहा।

अनुराधा ने उलझन भरी नज़रों से राम की तरफ़ देखा। वह उसकी आँखों में कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही थी। अभी कुछ देर पहले तक जिस आदमी पर वह गुस्सा कर रही थी, वही अब कभी मुस्कुरा रहा था, कभी पल भर में बिल्कुल भावहीन हो जाता था। 

उसके चेहरे से यह समझ पाना लगभग नामुमकिन था कि उसके मन में आखिर चल क्या रहा है। राम रघुवंशी को समझना शायद इतना आसान नहीं था... कम-से-कम इस समय तो बिल्कुल भी नहीं।

राम ने महसूस किया कि अनुराधा लगातार उसी को देखे जा रही है। उसने हल्के से अपनी भौंहें उठाईं और बिना कुछ कहे इशारे से पूछा—क्या देख रही हो?

अपनी चोरी पकड़ी जाने पर अनुराधा एकदम सकपका गई। उसने फौरन नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर आई झेंप साफ़ दिखाई दे रही थी। कुछ पल तक वह अपने दुपट्टे का किनारा उँगलियों में मरोड़ती रही, फिर धीमे स्वर में बोली, "अब तो मैंने आपसे माफ़ी भी माँग ली... और सच में दिल से माँगी है। अब... मुझे जाने दीजिए।"

उसने आख़िरी शब्द बहुत धीरे कहे, जैसे डर हो कि कहीं फिर से कुछ ऐसा न कह दे जिससे सामने वाला नाराज़ हो जाए।राम ने उसकी बात सुनी, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।वह बस उसे देखता रहा।

उस पल अनुराधा किसी कॉरपोरेट ऑफिस में काम करने वाली समझदार लड़की से ज़्यादा, गलती करने के बाद डाँट का इंतज़ार करती एक मासूम बच्ची लग रही थी। उसकी झुकी हुई नज़रें, उँगलियों में उलझा दुपट्टा और चेहरे पर फैली संकोच भरी मासूमियत देखकर कोई भी आसानी से समझ सकता था कि वह दिखने जितनी मज़बूत बनने की कोशिश करती थी , भीतर से उतनी ही सहज और भोली थी ।

राम कुछ देर तक उसे देखता रहा। अनुराधा अब भी सिर झुकाए खड़ी थी। उसकी उँगलियाँ दुपट्टे के कोने से ऐसे खेल रही थीं, जैसे उससे नज़रें मिलाने से आसान वही काम हो। उसकी झेंपी हुई शक्ल देखकर राम के होंठों पर अनायास एक हल्की-सी मुस्कान तैर गई। लेकिन उसने हमेशा की तरह इस बार भी उसे छिपा लिया।

उसने हल्के से सिर तिरछा किया और बिल्कुल सहज लहजे में बोला, "अच्छा... तो तुमने मुझसे माफ़ी माँग ली?"

अनुराधा ने धीरे से सिर हिलाया, जी...।  पक्का? राम ने भौंहें उठाते हुए पूछा।"जी... सच में।"
राम ने होंठ भींचकर जैसे कुछ सोचा, फिर बड़ी गंभीरता का नाटक करते हुए बोला, "हम्म... लेकिन मुझे तो लग रहा है कि हिसाब अभी भी पूरा नहीं हुआ।"

अनुराधा ने उलझन से उसकी तरफ़ देखा। "जी... मतलब?"
राम ने अपने गाल पर उँगली रखी, ठीक वहीं जहाँ कुछ देर पहले उसका थप्पड़ पड़ा था, और मासूमियत से बोला, "ये जो तुम्हारा शानदार वाला थप्पड़ था... उसका क्या?"

अनुराधा की आँखें एकदम बड़ी हो गईं।वो... मैं... मैंने तो माफ़ी माँग ली।

"माँग ली।" राम ने उसकी बात दोहराई लेकिन चेहरा पर उसके वही कठोर भाव थे । "लेकिन मैडम, माफ़ी अपनी जगह... और थप्पड़ अपनी जगह। दोनों को एक ही फ़ाइल में कैसे बंद कर दिया तुमने?"

अनुराधा अब सचमुच समझ नहीं पा रही थी कि वह गंभीर है या उसका मज़ाक उड़ा रहा है।
राम ने अपनी भौंहें चढ़ाईं और बोला, "एक बात जानती हो? राम रघुवंशी की बहुत बुरी आदत है। ये किसी का उधार नहीं रखता।"

"उधार?" अनुराधा लगभग फुसफुसाई।"हाँ..." उसने मुस्कुराकर अपने गाल की तरफ़ इशारा किया, "ये जो तुम्हारा थप्पड़ है ना... इसका भी कुछ तो हिसाब होना चाहिए। तभी तो न्याय होगा।"

राम ने यह बात इतनी गंभीर शक्ल बनाकर कही कि एक पल के लिए अनुराधा सचमुच घबरा गई। लेकिन उसकी आँखों के कोनों में छिपी हल्की-सी शरारत बता रही थी कि वह उसे डरा नहीं रहा... बस उसकी उलझन का आनंद ले रहा था।

अनुराधा कुछ क्षण तक सिर झुकाए खड़ी रही। कमरे में फैली ख़ामोशी जैसे उसके लिए और भारी होती जा रही थी। उसने एक गहरी साँस ली, मानो मन ही मन कोई निर्णय कर लिया हो। फिर बिना कुछ कहे धीरे-धीरे अपना चेहरा राम की ओर घुमा दिया। 

उसकी पलकों ने खुद-ब-खुद आँखों को ढँक लिया और काँपती हुई आवाज़ उसके होंठों से निकली, "लीजिए... अगर इससे आपका हिसाब बराबर हो जाता है... तो आप भी मुझे थप्पड़ मार दीजिए।"
यह कहते हुए उसने आँखें नहीं खोलीं।

उसके शब्दों में चुनौती नहीं थी, बस अपनी गलती का बोझ था। उसे सचमुच यही लगा कि शायद इसी तरह वह अपनी भूल की भरपाई कर सकेगी।राम एकटक उसे देखता रह गया।

उसकी नज़र अनायास अनुराधा के चेहरे पर ठहर गई। रोने से उसके गुलाबी गाल अब भी हल्के लाल पड़े हुए थे। उन्हीं गालों पर उसकी उँगलियों के धुँधले निशान अभी भी दिखाई दे रहे थे और वही निशान कुछ देर पहले उसके भीतर उठे अपराधबोध को फिर से जगा रहे थे। 

उसने अनजाने में गहरी साँस ली। गला जैसे एकाएक सूख गया। एक पल को मन में कई भाव एक साथ उमड़े, लेकिन उसने उन्हें अपने चेहरे तक आने नहीं दिया। वह जानता था कि इस समय उसकी एक भी गलत हरकत अनुराधा के मन में बैठी सारी गलतफ़हमियों को फिर से ज़िंदा कर सकती है।

उधर अनुराधा अब भी आँखें बंद किए खड़ी थी। उसकी पलकों में हल्का-सा कंपन था। उँगलियाँ दुपट्टे के कोने को इस कदर भींचे थीं कि पोरियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। वह बाहर से जितनी स्थिर दिखाई देने की कोशिश कर रही थी, भीतर उतनी ही घबराई हुई थी।

राम ने उसकी उस घबराहट को साफ़ पढ़ लिया।वह धीरे-धीरे उसके थोड़ा और करीब आया, इतना कि अनुराधा को उसके आने का आभास हो जाए। दोनों के बीच की दूरी सिमटते ही उसकी गर्म साँसों का हल्का-सा स्पर्श अनुराधा के चेहरे तक पहुँचा। 

उसने अनायास अपनी साँस रोक ली। उसकी धड़कनें पहले से कहीं तेज़ हो गईं। बंद पलकों के पीछे बेचैनी और बढ़ने लगी। दुपट्टे का सिरा उसकी मुट्ठी में और कस गया, लेकिन उसने अब भी आँखें नहीं खोलीं। उसे बस इतना महसूस हो रहा था कि राम बिल्कुल पास खड़ा है... और अगले ही पल वह क्या करेगा, इसका उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था।