तेरे लिए जानम Chapter-4
- 24 October, 2026
कुछ देर बाद सब लोग ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गए। बाहर सुबह धीरे-धीरे अपना आँचल फैला रही थी, जबकि भीतर वर्षों की दूरियाँ सिमटकर अपनापन बन चुकी थीं। वातावरण में अब पहले जैसी भारी खामोशी नहीं थी। उसकी जगह धीमी हँसी, पुराने किस्से और अपनेपन से भरी बातें ले चुकी थीं।
अभिमन्यु कभी अथर्व की खिंचाई कर रहा था, तो कभी विवान की। अथर्व भी पीछे हटने वालों में कहाँ था। दोनों की नोकझोंक सुनकर शमशेर के चेहरे पर बार-बार मुस्कान आ जाती। वह बीच-बीच में उन्हें टोकते भी, मगर उनकी आँखों में साफ़ दिखाई देता था कि उन्हें यह शोर अच्छा लग रहा है।
राम उन सबके बीच बैठा था, पर सबसे कम बोल रहा था। वह बस सबको देख रहा था... सुन रहा था। कभी किसी बात पर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ जाती, तो कभी उसकी दृष्टि एक-एक चेहरे पर ठहर जाती। जैसे वह इन पलों को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए सहेज लेना चाहता हो।
तभी उस सहज वातावरण को विवान के मोबाइल की घंटी ने भंग कर दिया।विवान ने जेब से फोन निकाला।स्क्रीन पर नाम उभरा, "दादू..."! ओह्ह तेरी मै तो भूल गया था भाई से मिलकर की हमे रघुवंशी मेंशन जाना था।
उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। उसने एक नज़र राम की ओर देखा, फिर कॉल रिसीव कर ली।
"जी, दादू..."उधर से आवाज़ आई, और इतनी ऊँची कि फोन कान पर होने के बावजूद कमरे में बैठे लोगों तक उसका स्वर पहुँच गया, "नालायक! कहाँ है तू?"
विवान ने कुछ बोलना चाहा, लेकिन दादू बिना रुके बोले जा रहे थे। यहाँ तेरी दादी ने मेरी चाय तक बंद करवा रखी है। कह रही है, 'जब तक राम घर नहीं आ जाता, तब तक इनकी चाय भी नहीं बनेगी... न नाश्ता मिलेगा।' अरे, मैंने कहा मेरा क्या कसूर है? तो बोली—'कसूर चाहे किसी का भी हो, भुगतना आपको पड़ेगा।'"
दादू की शिकायत सुनते ही अभिमन्यु अपनी हँसी रोक न सका। अथर्व ने भी मुस्कुराकर सिर झुका लिया। शमशेर के चेहरे पर भी बरसों बाद वैसी ही हँसी लौट आई, जैसी कभी इस परिवार की रौनक हुआ करती थी।
विवान ने हँसी दबाते हुए कहा,"दादू... मेरी बात तो सुनिए...! "बिल्कुल नहीं!" दादू ने उसे बीच में ही रोक दिया, "आज तेरी कोई सफ़ाई नहीं सुननी।"
विवान ने फिर कोशिश की, "लेकिन दादू..."! अरे, चुप... एकदम चुप! दादू की आवाज़ पहले से भी ऊँची हो गई।फोन स्पीकर पर डालो... अभी के अभी।
विवान ने मुँह बनाते हुए सबकी ओर देखा, फिर चुपचाप फोन स्पीकर पर डाल दिया।अगले ही क्षण पंचदेव रघुवंशी की भारी और अधिकारपूर्ण आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
"राम बेटा... मुझे मालूम है, तुम इस समय अपने विला में हो। इसलिए बिना कोई बहाना बनाए, अभी के अभी रघुवंशी हाउस पहुँच जाओ। नहीं तो तेरी दादी मेरा जीना मुश्किल कर देगी।"
इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ का कठोरपन जैसे अपने आप पिघल गया। वही पंचदेव रघुवंशी, जिनकी बात सुनकर बड़े-बड़े लोग सहम जाते थे, राम से बात करते समय अनायास ही एक स्नेहिल दादा बन जाते थे।
उनके स्वर का यह परिवर्तन सुनते ही अथर्व से रहा न गया। वह हँसते हुए थोड़ा ऊँची आवाज़ में बोला,"वाह दादू...! कमाल है। हमसे बात करते समय तो आपकी ज़ुबान से अंगारे बरसते हैं, और राम भैया से बात करते ही फूल झड़ने लगते हैं।"
कुछ पल के लिए उधर सन्नाटा छा गया।फिर पंचदेव रघुवंशी की वही रौबदार आवाज़ सुनाई दी,"चुप... गधे!"कमरे में बैठे सभी लोगों की हँसी छूट गई। मैं पंचदेव रघुवंशी हूँ... समझे!
एक पल रुककर उन्होंने फिर उसी अधिकार से कहा, "और राम... अगले दस मिनट के भीतर रघुवंशी हाउस पहुँचो। यह मेरा आदेश है।"
इतना कहकर उन्होंने बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए फोन काट दिया।कुछ क्षण तक कमरे में सन्नाटा रहा... फिर सबकी नज़र एक साथ राम पर जा ठहरी। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी। दादू का आदेश वह टाल भी नहीं सकता था, और शायद टालना चाहता भी नहीं था।
फिर अचानक अथर्व ने विवान की ओर देखा। विवान ने भी उसकी ओर देखा। अगले ही क्षण दोनों की हँसी एक साथ फूट पड़ी।उनकी हँसी पूरे कक्ष में गूँज उठी।अभिमन्यु भी स्वयं को रोक न सका। वह भी उनके साथ हँस पड़ा।
राम उन तीनों को देखता रहा। उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान उभरी। उसने धीमे से सिर हिलाया, मानो कह रहा हो। दादू आज भी वैसे ही हैं... और शायद हमेशा वैसे ही रहेंगे।कुछ क्षण बाद वह उठ खड़ा हुआ।
"अभि।"अभिमन्यु ने उसकी ओर देखा।तुम भी तैयार हो जाओ... और मैं भी अपने कमरे में जा रहा हूँ।उसने अपनी घड़ी पर एक दृष्टि डाली।दस मिनट बाद रघुवंशी हाउस के लिए निकलते हैं।
"ठीक है।"अभिमन्यु ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
दोनों लगभग साथ ही अपने स्थान से उठे। वर्षों की संगति ने उनके बीच शब्दों की आवश्यकता बहुत कम कर दी थी। कई बार केवल एक दृष्टि ही पर्याप्त होती थी।दोनों साथ-साथ हॉल से सीढ़ी की तरफ बढ़ गए। कॉरिडोर तक पहुँचकर उनके मार्ग अलग हो गए। जहाँ अभिमन्यु का फ्लोर दूसरा था तो वही राम का तीसरा फ्लोर था। जहाँ सभी नही जाते थे।
राम अपने कमरे की ओर बढ़ गया।अभिमन्यु भी अपने कमरे की ओर मुड़ गया।मुख्य हॉल में अब केवल विवान, अथर्व और शमशेर रह गए थे।विवान की दृष्टि उन दोनों को जाते हुए देखती रही। अर्थव ने कहा, बस कुछ दिन बाद हम भी यही भाई के साथ रहेंगे। विवान ने हां मे सर हिला दिया।
अवंतिका विला का निर्माण केवल एक निवास के रूप में नहीं हुआ था। उसके प्रत्येक सदस्य के लिए वहाँ एक अलग कक्ष बनाया गया था। अभिमन्यु बचपन से ही राम के साथ था।अवंतिका रघुवंशी के निधन के बाद से उसने जैसे अपने जीवन का एक मौन संकल्प बना लिया था।
उस दिन से लेकर आज तक उसने राम का साथ शायद ही कभी छोड़ा हो।सुख हो या संकट, यात्रा हो या एकांत, मौन हो या संघर्ष..अभिमन्यु सदैव उसके साथ खड़ा रहा।उनकी मित्रता समय के साथ किसी औपचारिक संबंध की सीमा से बहुत आगे निकल चुकी थी।
वे एक-दूसरे के जीवन के ऐसे अभिन्न अध्याय बन चुके थे, जिन्हें अलग करके पढ़ना संभव ही नहीं था।
कुछ ही देर बाद गाड़ियों का काफिला रघुवंशी मेंशन के मुख्य द्वार पर आकर रुका।मेंशन का विशाल फाटक पहले से खुला था, मानो अपने सबसे प्रिय सदस्य की प्रतीक्षा कर रहा हो।
मुख्य द्वार पर पूरा रघुवंशी परिवार खड़ा था। सबसे आगे पंचदेव रघुवंशी और जानकी रघुवंशी थे। उनके साथ अर्जुन, केतकी और परिवार के अन्य सदस्य भी वहीं खड़े थे। सभी की निगाहें एकटक उसी गाड़ी पर टिकी थीं, जिसमें राम आने वाला था।
जैसे ही गाड़ी प्रांगण में आकर रुकी, वहाँ उपस्थित हर चेहरे पर अलग-अलग भाव उभर आए। किसी की आँखों में प्रतीक्षा थी, किसी के चेहरे पर संतोष, तो किसी के मन में वर्षों से दबे भाव आज उमड़ पड़े थे।
धीरे-धीरे गाड़ी का दरवाज़ा खुला...। राम जैसे ही मुख्य द्वार पर आकर रुका, जानकी जी आरती की थाल लिए उसके सामने आ खड़ी हुईं। वर्षों की प्रतीक्षा आज उनकी आँखों में उतर आई थी। काँपते हाथों से उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ राम की आरती उतारी। आरती पूर्ण होते ही उन्होंने थाल चुपचाप केतकी की ओर बढ़ा दी।
इसके बाद स्वयं को रोक पाना उनके लिए संभव नहीं रहा।उन्होंने आगे बढ़कर राम को अपने सीने से लगा लिया।
राम भी बिना कुछ कहे उनके आलिंगन में समा गया। उसने धीरे से अपनी बाँहें दादी के चारों ओर फैला दीं। वर्षों का बिछोह उस एक स्पर्श में जैसे पिघलने लगा। जानकी जी के काँपते हाथ कभी उसके सिर पर ठहरते, कभी उसके कंधों को सहलाते, तो कभी उसके चेहरे को छूकर मानो यह विश्वास कर लेना चाहते कि उनका राम सचमुच उनके सामने खड़ा है।
"मेरा बच्चा..."उनका स्वर भर्रा गया।"कितने सालों बाद देखा है तुझे..."। वे उससे थोड़ा अलग हुईं। दोनों हथेलियों में उसका चेहरा थामकर देर तक उसे देखती रहीं। उनकी आँखें उसके चेहरे पर बीते वर्षों का हिसाब खोज रही थीं।
फिर होंठ काँपे और शिकायत ममता पर भारी पड़ गई।तुझे अपनी इस बूढ़ी दादी की ज़रा भी याद नहीं आई...? उन्होंने भीगी आँखों से उसे देखते हुए कहा, "बोल न, राम... क्या एक बार भी मन नहीं किया अपनी दादी से मिलने का?"
राम अब भी मौन खड़ा था।उसने धीरे से अपनी पलकों को झुका लिया। एक क्षण के लिए उसकी दृष्टि दादी के काँपते हाथों पर ठहर गई। फिर उसने बहुत आदर से उन दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
"ऐसी बात नहीं है, दादी माँ..." उसका स्वर धीमा था, पर हर शब्द दिल से निकला था। "आपसे दूर ज़रूर था... लेकिन आपका आशीर्वाद और आपके स्नेह से कभी दूर नहीं हुआ।"
इतना कहकर उसने झुककर जानकी जी के हाथ अपने माथे से लगा लिए।
"अगर मेरी वजह से आपको दुख पहुँचा है... तो आपका यह राम आज भी वही है... जो बचपन में आपकी डाँट सुनकर सबसे पहले आपकी गोद में ही आकर छिप जाता था।"
जानकी जी की आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उन्होंने बिना कुछ कहे फिर से राम का सिर अपने सीने से लगा लिया।
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