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तेरे लिए जानम Chapter-8

तेरे लिए जानम Chapter-8

सुबह के छह बजने को थे। रात और दिन के बीच की वह शांत घड़ी, जब शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था। रघुवंशी मेंशन से निकलकर राम, अभिमन्यु, विवान और अथर्व के साथ अवंतिका विला लौट आया था ।
पूरी रात की भागदौड़ और लगातार चलती घटनाओं की थकान अब सबके चेहरों पर साफ़ दिखाई दे रही थी।

जैसे ही चारों हॉल में पहुँचे, अभिमन्यु ने बिना किसी औपचारिकता के खुद को सोफ़े पर छोड़ दिया। उसने गर्दन पीछे टिकाई, लंबी साँस ली और आँखें बंद करते हुए बोला,
"यार, विवान... जरा शेफ से बोलो एक स्ट्रॉन्ग कॉफी बना दे। न्यूयॉर्क से इंडिया तक... एक पल का भी सुकून नसीब नहीं हुआ।"

उसकी बात सुनकर अथर्व मुस्कुरा दिया, जबकि विवान ने हल्का-सा सिर हिलाया और शेफ को आवाज़ देने के लिए मुड़ गया।उधर राम ने केवल एक नज़र अभिमन्यु पर डाली। उस नज़र में हल्की-सी मुस्कान भी थी और काम की गंभीरता भी। बिना कुछ कहे वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

सीढ़ियों पर पहुँचकर वह रुका भी नहीं। बस चलते-चलते इतना कहा,"मैं स्टडी रूम जा रहा हूँ। कॉफी लेकर... तुम तीनों ठीक दो मिनट में वहाँ पहुँचो।"

उसकी बात सुनकर तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। वे जानते थे, राम ने दो मिनट कहा है... तो उसका मतलब सचमुच दो मिनट ही होता है।
राम तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ सीधे स्टडी रूम की ओर बढ़ने लगा।

तभी अभिमन्यु ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाकर सीढ़ियों की ओर देखा। उसके चेहरे के भाव ऐसे थे, मानो इस समय अगर राम सामने आ जाए तो उसे वहीं खड़ा-खड़ा खा जाए।ऊपर जाती सीढ़ियों पर राम बिना पीछे देखे आगे बढ़ता रहा। तभी चलते-चलते उसकी शांत आवाज़ नीचे तक सुनाई दी।

"अभि... आँखें फाड़-फाड़कर देखना बंद करो और सीधे स्टडी रूम में आओ।"

अभिमन्यु एक पल को ठिठक गया। फिर दोनों हाथ कमर पर रखकर बड़बड़ाया, "हुह...! निशाचर कहीं का। ना खुद चैन से जीता है, ना मुझे जीने देता है।"
उसकी झुँझलाहट देखकर सामने खड़े विवान और अथर्व अपनी हँसी रोक न सके। दोनों के होंठों पर दबाई हुई मुस्कान साफ़ दिखाई दे रही थी।

अभिमन्यु ने तुरंत उनकी ओर देखा। दोनों अब भी हँसी रोकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।

"ओए...!" उसने उँगली दिखाते हुए कहा, "ये जो दाँत निकालकर 'खी... खी...' कर रहे हो न... बंद कर दो। ज़्यादा हँसी आई, तो सारे दाँत गिनने पड़ जाएँगे।"

अभिमन्यु की धमकी सुनते ही विवान और अथर्व ने तुरंत अपने होंठ भींच लिए। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बिना कुछ कहे उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

सीढ़ियों तक पहुँचते-पहुँचते अभिमन्यु ने अथर्व की ओर गर्दन घुमाई और उसे घूरते हुए बोला, "पहले कॉफी लेकर आ... नहीं तो मैं यहीं सो जाऊँगा। और फिर तेरा वो कमीना मुझे चैन से सोने भी नहीं देगा।"

अथर्व हँसते हुए सिर हिलाकर किचन की ओर मुड़ गया, जबकि अभिमन्यु और विवान सीधे स्टडी रूम की ओर बढ़ गए।

अवंतिका विला का स्टडी रूम बाकी कमरों से बिल्कुल अलग था।  दीवारों पर सजी अलमारियाँ, व्यवस्थित रखी फ़ाइलें, बड़ी-सी वॉल स्क्रीन और बीचों-बीच रखा विशाल टेबल... हर चीज़ अनुशासन और गंभीरता का आभास करा रही थी।

राम अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसके बैठते ही कमरे का माहौल जैसे अपने आप बदल गया। अभी तक जो सहज बातचीत चल रही थी, उसकी जगह अब काम ने ले ली थी।
कुछ ही क्षण बाद विवान और अभिमन्यु भी सामने वाली कुर्सियों पर बैठ गए। अथर्व भी कॉफी ट्रे में रखकर अंदर आया। उसने एक-एक कप सबके सामने रखा और स्वयं भी अपनी जगह बैठ गया।

विवान ने अपने हाथ में पकड़ी मोटी फ़ाइल राम की ओर बढ़ाई।
"भाई... इसमें कंपनी के सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों की पूरी डिटेल है। फाइनेंस डिपार्टमेंट, ऑपरेशंस, हमारे चल रहे प्रोजेक्ट्स, कॉम्पिटिटर्स... सब कुछ।"

राम ने बिना कुछ कहे फ़ाइल अपने सामने रख ली।उसी समय अथर्व ने फ़ाइलों का दूसरा बंडल अभिमन्यु की ओर बढ़ाते हुए कहा, "और ये स्टॉक, अकाउंट्स, पीवीआर, मार्केटिंग और सप्लायर्स की फाइल्स हैं। मैंने जितनी अपडेटेड जानकारी थी, सब इसमें रख दी है।"

राम ने दोनों फ़ाइलों पर एक नज़र डाली। अगले ही पल उसने पहली फ़ाइल खोली।वह एक-एक करके दोनों फाइलों के पन्ने पलट रहा था। उसकी नज़र हर दस्तावेज़, हर आँकड़े और हर नोट पर ठहरती, फिर आगे बढ़ जाती।  कुछ देर तक फाइलें देखने के बाद राम ने एक पन्ने पर उँगली रोक दी। उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।

"ये डील..." उसने फाइल से नज़र हटाए बिना कहा, "मृत्युंजय रघुवंशी ने हमारे सबसे बड़े रायवल के साथ कैसे साइन कर दी?"उसने दूसरा दस्तावेज़ खोला, "और ये... मेहता एंड सन्स... रावत ब्रदर्स..."

कुछ क्षण तक वह उन कागज़ों को देखता रहा। फिर कुर्सी की पीठ से टिकते हुए बोला,"एक बात मेरी समझ से बाहर है। कंपनी को पिछले आठ सालों में इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट मिले हैं, फिर भी लगातार लॉस में कैसे जा रही है? कहीं न कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो कागज़ों में दिखाई नहीं दे रहा... और मैं वही जानना चाहता हूँ।"

राम की आवाज़ पहले की तरह शांत थी, लेकिन उसे जानने वाले समझ रहे थे कि उसका दिमाग अब हर छोटी-बड़ी बात को जोड़ना शुरू कर चुका है।विवान ने अथर्व की ओर देखा। दोनों जैसे पहले से ही इस प्रश्न के लिए तैयार थे।

विवान ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, "भाई... आपके और बड़ी मॉम के जाने के बाद बड़े पापा कंपनी तो आते रहे, लेकिन धीरे-धीरे पूरा कंट्रोल दोनों मामाओं और उनके बेटों के हाथ में चला गया।"

अथर्व ने बात आगे बढ़ाई, "उस समय हम दोनों भी बहुत छोटे थे। समझ तो थी नहीं कि कंपनी के अंदर क्या चल रहा है। बाद में जब हमने काम शुरू किया, तो आपने जो कंपनी हमें संभालने के लिए दी थी, हम उसी में पूरी तरह व्यस्त हो गए।"

विवान ने सामने रखी फाइल की ओर इशारा किया।
"रघुवंशी ग्रुप के अंदर क्या फैसले लिए जा रहे थे... उनकी पूरी जानकारी हमें भी नहीं मिल पाती थी। जितनी जानकारी मिली, हमने सब इस फाइल में इकट्ठा कर दी है।"

राम ने बिना कुछ कहे दोनों की बात सुनी। उसकी उँगलियाँ अब भी फाइल के उसी पन्ने पर टिकी थीं, लेकिन उसकी नज़रें बता रही थीं कि वह केवल दस्तावेज़ नहीं पढ़ रहा... पिछले आठ वर्षों का पूरा हिसाब अपने भीतर जोड़ रहा था।

 राम एक-एक दस्तावेज़ बड़ी बारीकी से देख रहा था। बीच-बीच में वह किसी कागज़ पर उँगली रोक देता, कोई तारीख़ देखता, किसी साइन पर नज़र ठहर जाती, तो कभी बिना सिर उठाए ही विवान या अथर्व से उसका विवरण पूछ लेता। दोनों भी क्रम से हर सवाल का जवाब देते जा रहे थे।

काफ़ी देर तक सब कुछ देखने के बाद विवान ने सामने रखी एक पुरानी फ़ाइल खोलते हुए कहा, "भाई... करीब एक साल पहले दादू की मुलाक़ात कंपनी के सबसे पुराने मैनेजर, मिश्रा जी से हुई थी।"

राम ने बिना कुछ कहे उसकी ओर देखा।
"उन्होंने ही पहली बार कंपनी की असली हालत दादू के सामने रखी। बताया कि पिछले दस-पंद्रह सालों में रघुवंशी ग्रुप धीरे-धीरे कर्ज़ में डूबता चला गया है। बाहर से सब कुछ पहले जैसा दिखाई देता है, लेकिन अंदर की नींव कमज़ोर हो चुकी है। अब तो मार्केट में भी ये बात फैलने लगी थी।"

विवान कुछ पल रुका। शायद उस दिन का चेहरा आज भी उसकी आँखों के सामने था।
"दादू उसी दिन बहुत परेशान हो गए थे। उन्होंने वहीं से आपको फोन किया। काफी देर तक आप दोनों की बात हुई। उसके बाद आपका फोन हमारे पास आया।"

अथर्व ने बात आगे बढ़ाई, "आपने सिर्फ़ इतना कहा था कि कंपनी का एक-एक रिकॉर्ड निकालो। चाहे जितना समय लगे, लेकिन कुछ भी छूटना नहीं चाहिए। बस... उसी दिन से हम दोनों इसी काम में लग गए।"

विवान ने सामने रखी फाइलों की ओर इशारा किया।पिछले कई महीनों में जितनी भी जानकारी मिल सकी... पुराने अकाउंट्स, बोर्ड मीटिंग्स, कॉन्ट्रैक्ट्स, इंटरनल रिपोर्ट्स, सब कुछ इकट्ठा करके इन्हीं फाइलों में रखा है।"

कमरे में फिर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।राम कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें फाइलों पर थीं, लेकिन दिमाग़ जैसे कहीं और चल रहा था। वह एक-एक कड़ी को जोड़ रहा था। इतने बड़े प्रोजेक्ट... लगातार बढ़ता कारोबार... फिर भी कंपनी घाटे में। बात सिर्फ़ खराब मैनेजमेंट की नहीं हो सकती थी। कहीं न कहीं कोई ऐसी चाल चल रही थी, जो कागज़ों में दिखाई नहीं देती थी।

इसी सोच के बीच अचानक उसकी नज़र एक नाम पर आकर ठहर गई।उसने पन्ने पर उँगलियाँ स्थिर कर दीं।कुछ क्षण तक वह उस नाम को देखता रहा, फिर पहली बार सिर उठाकर बोला,
"ये... अनुराधा ठाकुर कौन है?"

नाम होंठों से निकलते ही जाने क्यों उसके भीतर एक हलचल-सी उठी....एक अजीब-सा एहसास...!
जैसे यह नाम उसने पहली बार पढ़ा हो, फिर भी उससे बिल्कुल अनजान न हो। वह उस अनुभूति का अर्थ समझ नहीं पाया। बस उसकी नज़र उसी नाम पर ठहरी रही। 


Ch-8🌼🌼🌼

राम के मुँह से अनुराधा ठाकुर का नाम निकलते ही विवान और अथर्व ने अनायास एक-दूसरे की ओर देखा। अगले ही क्षण दोनों के चेहरों पर हल्की-सी चमक उभर आई। उनकी इस अचानक बदली हुई प्रतिक्रिया राम की नज़र से छिप न सकी। उसने फ़ाइल से नज़र उठाकर दोनों को देखा। उसकी आँखें हल्की-सी सिकुड़ गईं।

"क्या बात है?" उसने शांत स्वर में पूछा। "इस नाम पर तुम दोनों के चेहरे क्यों बदल गए?"

अथर्व के होंठों पर लंबी-सी मुस्कान फैल गई। वह कुर्सी पर थोड़ा आगे सरक आया और बोला, "भाई... अनुराधा ठाकुर हमारी कंपनी की सबसे होनहार कर्मचारियों में से एक है। अपने कॉलेज की टॉपर रही है। पिछले तीन वर्षों से रघुवंशी एम्पायर के साथ काम कर रही है।"

वह बिना रुके आगे कहता गया, "काम के प्रति उसका समर्पण ग़ज़ब का है। कोई भी ज़िम्मेदारी हो, उसने आज तक कभी मना नहीं किया। जितना काम दो, उतनी ही लगन से पूरा करती है। मेहनती है, ईमानदार है और सबसे बड़ी बात... कंपनी के प्रति उसकी निष्ठा पर आज तक किसी ने सवाल नहीं उठाया।"

विवान हल्का-सा मुस्कुराया। "और भाई... एक वजह ये भी है कि वह हर बात बहुत जल्दी समझ लेती है। उन्हें बार-बार कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। कंपनी के अंदर क्या चल रहा है, किस डिपार्टमेंट में क्या समस्या है, किस कर्मचारी से कैसे काम लेना है... इन सब पर उसकी पकड़ कमाल की है।"

वह कुछ क्षण रुका, फिर सहज भाव से बोला, "शायद यही वजह रही कि बड़े पापा, दादू और डैड ने उसे आपकी पर्सनल असिस्टेंट चुना। उनका मानना था कि अगर कोई आपको सबसे कम शब्दों में, सबसे सही जानकारी दे सकता है, तो वो अनुराधा ही है।"

राम चुपचाप दोनों की बातें सुनता रहा। उसकी उँगलियाँ अब भी फ़ाइल के उसी पन्ने पर टिकी थीं, जहाँ अनुराधा ठाकुर का नाम लिखा था। उसने एक बार फिर उस नाम पर नज़र डाली, मानो केवल उस व्यक्ति के बारे में नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हर जानकारी को समझ लेना चाहता हो।

अथर्व हँस पड़ा, और एक बात तो हम भूल ही गए... उसकी मुस्कान।"विवान भी मुस्कुरा उठा।
" सच कहूँ भाई, कंपनी में आधे काम तो उनकी मुस्कान ही करवा देती है। जिस कर्मचारी से दूसरे लोग घंटों बहस करते रह जाते हैं, वही काम वो दो मिनट में करवा लेती है। लोग उनकी इज़्ज़त भी करते हैं... और उनकी बात टालते भी नहीं।"

राम चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।उसके चेहरे पर वह ही ठंडक भरी स्थिरता थी, जैसी हमेशा रहती थी। 
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि एक ऐसी लड़की, जिससे वह कभी मिला तक नहीं, उसके बारे में इतनी बातें सुनकर उसके भीतर यह अनजानी-सी बेचैनी क्यों उठ रही है।

उसने उस एहसास को वहीं दबा दिया।फिर धीरे से कुर्सी की पीठ से टिकते हुए दोनों भाइयों को देखा। उसकी नज़रें हमेशा की तरह शांत थीं, लेकिन उन्हें पढ़ पाना आसान नहीं था।

"तुम दोनों..." उसने धीमे, सपाट स्वर में कहा, "मिस ठाकुर की कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ नहीं कर रहे?"एक पल रुककर उसने दोनों को बारी-बारी देखा।"या फिर..." उसके होंठों पर बेहद हल्की-सी मुस्कान आई, "तुम दोनों में से किसी का... कोई चक्कर-वक्कर है?"

कमरे में जैसे एक पल के लिए समय ठहर गया।विवान और अथर्व एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। दोनों की आँखें फैल गई थीं, जैसे उन्हें यक़ीन ही न हो कि अभी-अभी यह सवाल राम ने पूछा है।

उधर अभिमन्यु भी उतना ही हैरान था।उसने पहले राम को देखा, फिर विवान और अथर्व को। अगले जवाब का इंतज़ार अब सिर्फ़ वही नहीं कर रहा था... जाने क्यों राम के भीतर भी एक अनकही-सी उत्सुकता जन्म ले चुकी थी।

उसने चेहरे पर उसका एक भी निशान नहीं आने दिया, लेकिन उसकी नज़रें अब जवाब से पहले कहीं और जाने को तैयार नहीं थीं।

विवान ने मुस्कराते हुए अथर्व की बात आगे बढ़ाई, "और भाई, सबसे बड़ी बात यह है कि अनुराधा किसी भी चीज़ को बहुत जल्दी समझ लेती है। कंपनी के भीतर क्या चल रहा है, कौन किस ज़िम्मेदारी पर है और किस विभाग में क्या समस्या है... उसे लगभग हर बात की जानकारी रहती है। खासकर कर्मचारियों से जुड़ी कोई भी बात हो, उससे बेहतर शायद ही कोई बता सके। इसी वजह से दादू, डैड और बड़े पापा ने मिलकर उसे आपकी पर्सनल असिस्टेंट चुना।"

अथर्व हँसते हुए बोला, "और उसकी मुस्कान... मानो आधा काम तो उसी से हो जाता है। कई बार लोग सिर्फ उसके समझाने से ही मान जाते हैं।"

इतना सुनते ही राम की भौंहें हल्की-सी उठ गईं। न जाने क्यों, अनुराधा के बारे में हर नई बात उसके भीतर एक अनजानी-सी हलचल पैदा कर रही थी। एक अजीब-सी बेचैनी उसके मन में धीरे-धीरे आकार ले रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कोई भाव नहीं उभरा। वह उतनी ही शांति से बैठा रहा, जैसे इन बातों का उस पर कोई असर ही न हुआ हो।

उसने कुछ क्षण तक विवान और अथर्व को देखा, फिर धीमे लेकिन सपाट स्वर में पूछा,

"तुम दोनों... मिस ठाकुर की कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ नहीं कर रहे?"

दोनों ने एक साथ उसकी ओर देखा।

राम ने बिना पलक झपकाए अगला सवाल किया, "कहीं तुम दोनों में से किसी का... उसके साथ कोई चक्कर-वक्कर तो नहीं है?"

उसका प्रश्न सुनते ही कमरे का माहौल जैसे एक पल के लिए थम गया।

अभिमन्यु, विवान और अथर्व तीनों एक साथ राम की ओर देखने लगे। उनके चेहरों पर साफ़ हैरानी थी। शायद उनमें से किसी ने भी राम से ऐसा सवाल करने की उम्मीद नहीं की थी।

 राम बाहर से पूरी तरह शांत दिखाई दे रहा था, लेकिन भीतर वह स्वयं इस बात का जवाब सुनने के लिए अनजानी-सी उत्सुकता महसूस कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर एक ऐसी लड़की, जिससे वह कभी मिला भी नहीं, उसके बारे में सुनकर उसके मन में यह हलचल क्यों उठ रही थी। फिर भी उसने अपने चेहरे पर वही निर्विकार भाव बनाए रखे और चुपचाप तीनों के जवाब का इंतज़ार करने लगा।

राम का सवाल सुनते ही विवान ने बिना एक पल गंवाए जल्दी से कहा, "अरे नहीं, भाई! ऐसी कोई बात नहीं है। मिस ठाकुर हमसे बड़ी हैं और हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। उनके बारे में इस तरह सोचना भी गलत होगा।"

अथर्व ने तुरंत विवान की बात का समर्थन किया।

"मेरा मतलब वो नहीं था, भाई। मैं सिर्फ यह कहना चाहता था कि मिस ठाकुर आपको कंपनी की हर जानकारी सबसे अच्छे तरीके से दे सकती हैं। आपकी पर्सनल असिस्टेंट बनने से पहले वह ऑपरेशनल मैनेजर की पोस्ट पर थीं। कंपनी के लगभग हर विभाग की उन्हें पूरी समझ है।"

वह हल्का-सा मुस्कराया और बोला, "और रही हमारी बात... तो हमारे लिए तो वह बड़ी बहन जैसी हैं।"

दोनों के चेहरे देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वे अनुराधा की तारीफ़ सिर्फ उसके काम और काबिलियत की वजह से कर रहे थे। उनकी बात सुनकर राम ने कुछ नहीं कहा। उसकी निगाहें एक बार फिर फ़ाइल पर लिखे 'अनुराधा ठाकुर' नाम पर टिक गईं। चेहरे पर अब भी वही ठहराव था, लेकिन मन में उठ रहे सवाल पहले से कहीं ज़्यादा गहरे हो चुके थे।