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तेरे लिए जानम Chapter-9

तेरे लिए जानम Chapter-9

अभिमन्यु की गहरी निगाहें लगातार राम पर टिकी थीं। वर्षों की दोस्ती ने उसे इतना तो सिखा ही दिया था कि राम के चेहरे पर भले ही कोई भाव न दिखाई दे, लेकिन उसके भीतर उठने वाली हलचल को वह आसानी से पहचान सकता था। अनुराधा का नाम सामने आने के बाद राम के व्यवहार में आया यह हल्का-सा बदलाव भी उससे छिप नहीं पाया था।

उधर राम भी अभिमन्यु की निगाहों का मतलब अच्छी तरह समझ रहा था। वह जानता था कि अगर अभिमन्यु ने कुछ पूछ लिया, तो बात यहीं नहीं रुकेगी।
इसलिए अभिमन्यु के कुछ कहने से पहले ही राम ने फ़ाइल बंद कर दी और शांत, लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,

"चाहे मिस ठाकुर कितनी भी काबिल क्यों न हों..."उसने एक पल रुककर सामने बैठे तीनों की ओर देखा।"मुझे अपने साथ किसी लड़की को असिस्टेंट के तौर पर नहीं रखना है। उन्हें कोई दूसरी ज़िम्मेदारी दे दो... और मेरे लिए एक मेल असिस्टेंट हायर कर लो।"

राम का निर्णय सुनते ही कमरे में फिर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। विवान और अथर्व ने अनायास एक-दूसरे की ओर देखा, जबकि अभिमन्यु की निगाहें अब भी राम के चेहरे पर ही टिकी थीं। उसे महसूस हो रहा था कि यह फैसला केवल एक ऑफिसियल डिसीजन नहीं था।।इसके पीछे कोई ऐसी बात थी, जिसे शायद खुद राम भी अभी शब्द नहीं दे पा रहा था।

राम की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि विवान ने झिझकते हुए कहा, "लेकिन भाई... नए मेल असिस्टेंट को हायर करने में कम से कम एक सप्ताह तो लग ही जाएगा। तब तक अगर आप अनुराधा दी के साथ..."

विवान की बात अधूरी ही रह गई।राम ने धीरे से अपनी आँखें सिकोड़ते हुए उसकी ओर देखा और बीच में ही पूछा, "दी... का क्या मतलब?"

विवान और अथर्व ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर अथर्व मुस्कराकर बोला, "भाई... हम दोनों उन्हें 'दी' ही कहते हैं। पता नहीं क्यों, लेकिन उनसे हमेशा बड़ी बहन वाली ही फीलिंग आती है। इसलिए आदत पड़ गई।"

विवान ने भी तुरंत उसकी बात का समर्थन किया।"हाँ, भाई। और आपने हमसे जो भी जानकारी निकलवाने को कहा था, उसमें अनुराधा दी ने हमारी बहुत मदद की। अकेले इतना सारा डेटा और रिकॉर्ड जुटाना आसान नहीं था। उनकी और उनकी दोस्त की मदद से ही हम इतनी जल्दी सारी डिटेल्स इकट्ठी कर पाए।"

राम बिना कुछ बोले दोनों की बातें सुनता रहा। उसके चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया, लेकिन उसकी निगाहें कुछ पल के लिए फिर उसी फ़ाइल पर टिक गईं, जिसमें अनुराधा ठाकुर का नाम दर्ज था।

अथर्व के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। वह जैसे अनुराधा की तारीफ़ करने का कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता था।

"और भाई..." उसने सहज भाव से कहा, "वो जितनी दिखने में खूबसूरत है, उतनी ही प्यारी भी है। और बोलती इतनी मीठी है कि....!"

"बस...!"राम की आवाज़ ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।कमरे का माहौल एक पल में बदल गया।राम ने फ़ाइल बंद करते हुए दोनों भाइयों की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, लेकिन आवाज़ में साफ़ झुंझलाहट थी।

"बहुत हो गया। जितनी तारीफ़ करनी थी, कर चुके तुम दोनों अपनी 'दी' की।"

विवान और अथर्व एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उन्हें समझ नहीं आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया था।राम ने कुर्सी से हल्का-सा पीछे टिकते हुए कहा, "जो काम कहा है, वो करो। मेरे लिए एक मेल पर्सनल असिस्टेंट ढूँढो।"

फिर जैसे उसे अचानक कुछ याद आया हो, उसने जानबूझकर भौंहें सिकोड़ लीं।"तब तक... मेरा काम कौन देखेगा? क्या नाम है उसका...! वह कुछ पल सोचने का नाटक करता रहा।विवान और अथर्व लगभग एक साथ बोल पड़े,"भाई... अनुराधा ठाकुर।"

"हाँ... हाँ, वही।" राम ने ऐसे कहा, जैसे अभी-अभी उसे नाम याद आया हो। "आज ही पता चल जाएगा कि तुम दोनों ने उसकी जितनी तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं... वो सच में उनकी हक़दार है भी या नहीं।"

उसने फिर फ़ाइल खोल ली।अब जाओ। कुछ देर में ऑफिस के लिए निकलना है। दोनों ने एक साथ सिर हिलाया और कुर्सियों से उठ गए। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते विवान ने एक बार पलटकर राम की तरफ़ देखा। वह फिर उसी तल्लीनता से फाइलों में डूब चुका था, मानो अभी हुई पूरी बातचीत का उस पर कोई असर ही न पड़ा हो।

लेकिन विवान और अथर्व दोनों जानते थे...। राम किसी इंसान के बारे में राय बनाने में कभी जल्दबाज़ी नहीं करता। और एक बार अगर उसने किसी को खुद परखने का फैसला कर लिया, तो फिर उसकी असली परीक्षा शुरू हो जाती थी।

दोनों चुपचाप स्टडी रूम से बाहर निकल गए।

विवान और अथर्व के जाते ही स्टडी रूम में सन्नाटा छा गया। अभिमन्यु काफी देर से लगातार राम को देखे जा रहा था। उसकी निगाहों में शरारत भी थी और एक गहरी पड़ताल भी।

आख़िरकार राम ने झुंझलाकर उसकी ओर देखा।

"क्या है? इस तरह क्यों घूरे जा रहा है मुझे? जा, पहले फ्रेश हो जा। थोड़ी देर में ऑफिस निकलना है।"

राम की चिढ़ देखकर अभिमन्यु के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

"तू इतना चिढ़ क्यों रहा है, राम?" उसने हँसी दबाते हुए कहा, "वैसे एक बात है... पहली बार तू किसी लड़की के साथ काम करने वाला है। उफ़्फ़... क्या सीन होगा!"

राम ने उसे घूरा।

"अगर एक शब्द और बकवास की, तो सीधा न्यूयॉर्क वापस भेज दूँगा।"

अभिमन्यु ने हँसना बंद कर दिया। कुछ पल वह चुपचाप राम को देखता रहा, फिर इस बार उसके चेहरे पर गंभीरता उतर आई।

"हम्म..." उसने धीमे स्वर में कहा, "पता नहीं यार... इस लड़की के नाम में ही कुछ बात है। जब से इसका नाम सुना है... अनुराधा ठाकुर... न जाने क्यों, मेरे दिमाग़ में बार-बार यही नाम घूम रहा है।"

राम ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने बस एक पल के लिए अभिमन्यु की ओर देखा, फिर खिड़की के बाहर नज़रें टिक गईं। अजीब बात यह थी कि जिस नाम को अभिमन्यु अपने दिमाग़ से नहीं निकाल पा रहा था, वही नाम जाने कब से राम के मन में भी अनचाहे ही दस्तक दे रहा था। फिर भी उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।

राम ने उसे घूरते हुए कहा, "अगर ज़्यादा ही दिमाग़ में घुस गई है, तो बोल... निकाल देता हूँ। जब से उसका नाम सुना है, तब से बस मिस ठाकुर का गुणगान ही किए जा रहा है।"

अभिमन्यु हँस पड़ा।

"अरे यार, तू इतना चिढ़ क्यों रहा है?" उसने कुर्सी पर आराम से टिकते हुए कहा, "तू मत रखना उसे अपना असिस्टेंट... मैं रख लूँगा।"

वह मुस्कराया और आगे बोला, "आख़िर जब विवान और अथर्व जैसे लोग किसी लड़की की इतनी तारीफ़ कर रहे हैं, तो मानना पड़ेगा कि लड़की सच में काबिल-ए-तारीफ़ होगी। वरना ये दोनों किसी की यूँ ही तारीफ़ करने वालों में से नहीं हैं।"

उसने शरारती अंदाज़ में अपनी भौंहें उचकाईं।

"और वैसे भी... मैं अभी सिंगल हूँ। क्या पता, यही मिस ठाकुर आगे चलकर मिसेज़ राठौड़ बन जाए।"

इतना कहकर अभिमन्यु ने जानबूझकर राम की ओर देखा। उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, मानो वह राम के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया तलाश रहा हो। कमरे में कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गई, लेकिन उस खामोशी में भी अभिमन्यु की नज़रें लगातार राम के बदले हुए भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।

राम ने गहरी साँस ली और भारी आवाज़ में कहा, "अगर मिस ठाकुर का यह तारीफ़ पुराण खत्म हो गया हो... तो अब कुछ काम की बात करें।"

उसकी आवाज़ में लौट आई गंभीरता देखकर अभिमन्यु का चेहरा भी शांत हो गया। वह समझ गया कि अब मज़ाक का समय खत्म हो चुका है।

राम ने सामने रखी फ़ाइल पर नज़र डालते हुए कहा, "तू यह पता कर कि इन दोनों मामाओं का क्या चक्कर है। और मृत्युंजय रघुवंशी ने आखिर कैसे पूरा कारोबार उनके भरोसे छोड़ दिया।"

वह कुछ पल के लिए रुका, फिर धीमे लेकिन गंभीर स्वर में बोला, "जो आदमी कभी बिज़नेस की दुनिया का बेताज बादशाह था... वह अचानक इतना लापरवाह कैसे हो गया? कहीं न कहीं कुछ ऐसा हुआ है, जो अभी तक हमारी नज़र से छिपा हुआ है।"

अभिमन्यु ने सहमति में सिर हिलाया।

राम ने आगे कहा, "अब तू भी जाकर थोड़ा फ्रेश हो जा। आज ही पता चल जाएगा कि रघुवंशी एम्पायर के अंदर आखिर चल क्या रहा है।"

अभिमन्यु उठने ही वाला था कि उसने पलटकर पूछा, "और तू? तुझे फ्रेश नहीं होना है?"

राम ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया, "मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊँगा।"

"ठीक है।" इतना कहकर अभिमन्यु कमरे से बाहर निकल गया।

उसके जाते ही स्टडी रूम एक बार फिर शांत हो गया।

राम कुछ देर तक यूँ ही कुर्सी पर बैठा रहा। फिर उसने सामने रखी फ़ाइल दोबारा खोली। पता नहीं क्यों, उसकी उँगलियाँ सीधे उसी पन्ने पर जाकर रुकीं, जहाँ अनुराधा ठाकुर का नाम दर्ज था।

उसने पूरी प्रोफ़ाइल ध्यान से देखी।फ़ाइल में उसकी शैक्षणिक योग्यता, कार्य अनुभव और मुंबई का पता दर्ज था, लेकिन उसकी कोई तस्वीर नहीं थी।
राम ने एक बार फिर पूरा पन्ना देखा, मानो कहीं कोई फोटो छूट गई हो। जब उसे यकीन हो गया कि फ़ाइल में सचमुच उसकी कोई तस्वीर नहीं है, तो वह कुछ क्षण उसी नाम को देखता रहा।

धीरे से उसके होंठ हिले।

"अनुराधा... ठाकुर..."

उसने बस इतना ही कहा, जैसे उस नाम को पहली बार नहीं, बल्कि किसी अनजाने एहसास के साथ दोहरा रहा हो। उसके बाद उसने फ़ाइल बंद नहीं की। उसकी नज़रें अब भी उसी नाम पर ठहरी थीं, जबकि उसके मन में उठते प्रश्नों के उत्तर अभी भी उससे बहुत दूर थे।